वैश्वीकरण, मीडिया और हिंदी
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अच्युतानंद
मिश्र
हिन्दी
विश्व का प्रचंड सूर्य जो जनवरी,
1975 में नागपुर में उदित हुआ था वह सात महासम्मेलनों की
यात्रा पूरी कर आज सात समन्दर पार भौतिक समृध्दि की सम्मोहक मायानगरी न्यूयार्क
स्थित संयुक्तराष्ट्र के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। साथ ही हमारी अकर्मण्यता
को झकझोरते हुए यह बता रहा है कि पूरे विश्व में फैले सौ से अधिक
विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण और साठ करोड़ से अधिक हिन्दी प्रेमियों की
श्रध्दा और अनवरत अनुष्ठान से हिन्दी ने अन्तराष्ट्रीय भाषा होने का गौरव दशकों
पूर्व प्राप्त कर लिया था। यूनेस्को भी उसे अपनी स्वीकृत भाषाओं की सूची में
शामिल कर चुका है लेकिन हिन्दी को संयुक्तराष्ट्र की उन आधा दर्जन विश्व भाषाओं
की पंक्ति में बिठाने का नागपुर में लिया गया संकल्प जो बाद के हर सम्मेलन में
दोहराया गया है अभी तक निष्फल रहा है। भारत में हिन्दी को राजभाषा के पद पर
प्रतिष्ठित करने का संवैधानिक संकल्प न्यायपूर्ण क्रियान्वयन में कब परिवर्तित
होगा? 21वीं शताब्दी के किस दशक की कौन सी पीढ़ी हिन्दी
को इस अपमान और षडयंत्र से निकालकर मुक्त करेगी इसकी चर्चा करना भी आज की
हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधाओं और संचालकों को नापसंद है। नागपुर में प्रथम
महासम्मेलन और बाद के सभी सम्मेलनों में भी अन्तराष्ट्रीय जगत में हिन्दी की
अस्मिता, साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में परस्पर
सहयोग, हिन्दी को विश्व भाषा बनाने का संकल्प और
सम्मेलन का सचिवालय बनाने जैसे अनेक मुद्दों पर विद्वानों ने विमर्श किया है।
हिन्दी पत्रकारिता और जनसंचार माध्यमों की भूमिका से जुड़ी समस्याओं पर भी कई
विचार गोष्ठियों में लम्बी बहसें हुई हैं। आज की यह गोष्ठी भी उसी श्रृंखला में
है लेकिन इस विमर्शों में लिए गए अनेक फैसलों को आज भी कार्यान्वयन का इंतजार
है। नागपुर सम्मेलन से न्यूयार्क सम्मेलन तक भारत सहित अन्य देशों के जिन
मूर्धन्य हिन्दी विद्वानों और पत्रकारों ने विचार मंथन के इस वैश्विक मंच पर
विमर्श में साझीदारी की है उनके नाम सुपरिचित हैं। उन्होंने अपने लेखन तथा
चिन्तन से हिन्दी की श्री वृध्दि की है लेकिन अब तक उनके लिए गए फैसलों को
मूर्त रूप देने के लिए बनाई गयी कार्ययोजनाएं और उनके ठोस क्रियान्वयन का विवरण
उपलब्ध नहीं हैं।
भाषा स्वयं
संचार का माध्यम है और साहित्य तथा पत्रकारिता की अभिव्यक्ति में भाषा अनिवार्य
है। नागपुर सम्मेलन की विचारगोष्ठी में जब हमने जनसंचार माध्यमों की भूमिका पर
विमर्श किया था उस समय तक भारत में दूरदर्शन तथा टेलीप्रिंटर तो शुरू हो गए थे
लेकिन संचार और सूचना की क्रांति का विस्फोट नहीं हुआ था। पिछले तीन दशकों में
हुई जिस क्रांति ने संचार की परम्परागत संकल्पना की पूरी तरह झकझोर दिया है
उसने भाषा और पत्रकारिता पर ही नही दृश्य-श्रव्य माध्यमों,
सामाजिक नैतिकता और मानवीय सरोकारों के साथ जीवन शैली और
सम्पूर्ण चिन्तन में विस्मयकारी परिवर्तन किया है। पत्रकारिता का मीडिया में
रूपान्तरण, मीडिया का प्रोडक्ट बन जाना,
संप्रभु देश के नागरिकों को उपभोक्ता घोषित कर देना तथा एक
समन्वयवादी संस्कृति पर पश्चिमी दुनिया का भोगवादी कल्चर थोपने की कुचेष्टा इसी
दौर में तेज की गई है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से ही मीडिया की अधिकतर विधाओं
ने अर्ध सत्य को सत्य में बदलकर, मनमाने आंकड़ों को तथ्य
बताकर, विश्वसनीयता को हाशिए पर धकेल कर,
राजनीतिक सत्ता, आर्थिक बाजार और
विज्ञापन की शक्तियों की मदद से अकूत संपत्ति जमा की है। हिन्दी ही नहीं पूरी
दुनिया की मीडिया इन आरोपों के कटघरे में खड़ी है। उसके विरूध्द सत्ता
प्रतिष्ठानों से समझौते के अतिरिक्त सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने,
स्थानीय भाषाओं और लिपियों को विकृत करने,
वंचितों के बुनियादी अधिकारों की पक्षधरता छोड़ने तथा व्यापार
में खुली लूट की समर्थक विदेशी कम्पनियों के साथ साठगांठ का आरोप है। ईराक पर
आक्रमण करने वाले हमलावरों के साथ सांठगांठ, पालतू
पत्रकारों के सहारे पूरी दुनिया में युध्द की झूठी खबरों के प्रचार का जो कलंक
मीडिया पर लगा है उसकी जार्ज बुश की सफाई या टोनी ब्लेयर का इस्तीफा भी नही धो
सकता।
ग्लोबलाईजेशन
जिसका छदम अनुवाद है वैश्वीकरण,
का बुनियादी दावा तो अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के उदार
सहयोग से पूरी दुनिया में समृध्दि फैलाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़
करने का है लेकिन एशिया, अफ्रीका या दक्षिण अमेरिका में
अपनी गरीबी दूर करने के लिए संघर्षरत देशों में ग्लोबलाइजेशन का शिकंजा फैलाने
वाली कम्पनियों के हस्तक्षेप को देखते हुए अब किसी को किसी संदेह की गुंजाइश
नहीं रह गई है कि इसकी असली नीयत उपभोक्तावाद से नियंत्रित अर्थ प्रधान
संस्कृति के एक ऐसे मॉडल को स्थापित करना है जो कमजोर देशों में कठपुतली
सरकारों की मदद से नए आर्थिक साम्राज्यवाद की आधार भूमि तैयार कर सके।
ग्लोबलाईजेशन
की पश्चिमी अवधारणा जो मुक्त बाजार व्यापार नीति के रूप में
1846
में इंग्लैण्ड से शुरू हुई थी अब बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों से विश्व व्यापार
संगठन बनकर दुनियों के शान्तिप्रिय और विकासशील देशों की प्राकृतिक संपदा,
राजनीतिक और आर्थिक अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है।
ग्लोबलाईजेशन और मीडिया के अन्त: संबंधों को भी इसी कसौटी से परखना होगा जहां
शब्दों के अर्थ और प्रयोग उनके धातुमूल, परम्परा,
एतिहासिक संदर्भ या सांस्कृतिक बोध पर तय न होकर व्यापार और
बाजार के आर्थिक हितों को ध्यान में रककर निर्धारित किए जाते हैं। उदाहरण के
लिए पूरी दुनिया की पत्रकारिता में खेल समाचारों की प्रस्तुति युध्द की भाषा
में की जाती है। अब तक खेल भावना, सहयोग या अनुशासन
जगाने वाली शब्दावली अब पीटने, रौंदने,
धराशायी करने की शिक्षा दे रही है। ऐसे विवेकहीन प्रयोगों और
विकृत अनुवादों का प्रचलन खतरनाक है। हिन्दी में हिंसा और सांस्कृतिक प्रदूषण
फैलाने वाले इन शब्द प्रयोगों के पीछे ग्लोबलाईजेशन की ध्वज संवाहक अंग्रेजी को
पहचानना कठिन नहीं है। यह सत्य है कि हिन्दी पत्रकारिता की तेजस्वी,
शालीन और संवेदनशील भाषा को बाजार की वर्णसंकर भाषा बनने के
लिए अंग्रेजी और उसके मानसिक गुलामों ने बाध्य किया है लेकिन इस तस्वीर का
दूसरा पहलू भी हमको कम शर्मिन्दा नही करता है। भारत में हिन्दी सहित सभी भारतीय
भाषाओं को एक बार फिर अंग्रेजी की चेरी बनाने की जो साजिश शिक्षा,
राजनीति, प्रशासन या आर्थिक प्रबंधन के
क्षेत्र में हो रही है वह कहीं अधिक भयावह है। पहली कक्षा से अंग्रेजी में
शिक्षा और शहरों में हिन्दी पढ़े लिखे परिवारों में गर्व से अंग्रेजी बोलने का
चलन, मातृभाषाओं का लोप भी इस खिचड़ी भाषा के प्रचलन के
लिए उत्तरदायी है। संपूर्ण भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखकर राष्ट्रीय
एकता की वकालत करने के पीछे यही मनोवृत्ति काम कर रही है। योरोप की भाषाओं के
रोमन लिपि स्वीकार करने के बाद दो-दो महायुध्द वहां लड़े गए। भारत ही नहीं पूरी
दुनिया में इलेक्ट्रानिक चैनलों, इंटरनेट,
मोबाइल अर्थात जहां प्रस्तुतिकरण में भाषा का प्रयोग गौण है,
और चित्रों, शब्दों और लिपियों से
संचार होता है भाषाएं उपेक्षित हुई हैं। उनकी गुणवत्ता का अवमूल्य न हुआ है।
मीडिया ही नही साहित्य, दर्शन शिक्षा,
धर्म और समाज शास्त्र जैसे क्षेत्रों में भी सूचना को ज्ञान
समझने की प्रवृत्ति बढ़ी है और मानवता से जुड़े विषयों पर गंभीर विमर्श घटा है।
अपराध, अन्याय, हिंसा और अनैतिक
आचरण में निरन्तर हो रही वृध्दि तथा जीवन मूल्यों के क्षरण से पूरी दुनिया के
समाजशास्त्री बेचैन है।
विश्व व्यापार
संगठन के सुरक्षा कवच के बावजूद ग्लोबलाइजेशन का असली चेहरा उजागर होता जा रहा
है। दुनिया के छोटे,
कमजोर और साधनहीन देशों के सामने अपने प्राकृतिक संसाधनों,
एतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा का संकट पैदा हो
गया है। युध्द के भय से प्रतिरक्षा पर बढ़ते खर्च ने इन सभी देशों की सरकारों का
बजट असन्तुलित कर दिया है। खतरा केवल अफगानिस्तान, इराक
या ईरान पर ही नही बल्कि पूरी पृथ्वी के अस्तित्व पर है। जल,
जंगल, जमीन और पूरे वायुमंडल पर यह
संकट मंडरा रहा है। लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वाले ग्लोबलाइजेशन ने
लोकतंत्र और राष्ट्रीय सरकारों की संप्रभुता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
उपग्रह संचार, विदेशी पूंजी और वैश्विक कम्पनियों से
संचालित मीडिया ने इस पुरानी अवधारणा को लगभग नकार दिया है कि वह आज भी
लोकतंत्र का चौथा खंभा है। विदेशी पूंजी के सहारे उपभोक्ता बाजार का मजबूत खंभा
बनने में उसे चौतरफा लाभ दिखाई देता है। नागरिक अधिकारों की प्रहरी होने का दम
भरने वाली मीडिया अपने पाठकों और दर्शकों को ही एक अपरिहार्य बुराई लगने लगी
है। ग्लोबलाइजेशन के नए हथियार की मदद से मीडिया ने लोककल्याण के पुराने आदर्श
को तिलांजलि देकर मुनाफा बाजार के नए मंत्र को स्वीकार कर लिया है। मीडिया के
इस आत्मसमर्पण ने पूरी दुनिया में साहित्य संगीत, ललित
कलाओं और लोककलाओं के विद्वानों और चिन्तकों को हिलाकर रख दिया है। उपग्रह
संचार विकास की प्रचंड शक्ति है लेकिन अगर मीडिया संचार तंत्र और मुनाफाखोरों
से संचालित होगी तो उसके सहारे लोकतंत्र के भविष्य की कल्पना की जा सकती है।
पूरी दुनिया
में फैले हिन्दी भाषी समाज को अपनी बोलियों पर सदैव गर्व रहा है। लगभग
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लोकभाषाओं से समृध्द और निर्मित खड़ी बोली ने एक पुल की तरह इन बोलियों को जोड़ने
और उनसे शक्ति ग्रहण करने का काम किया है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र या पंडित
महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकालीन विद्वानों ने बोलचाल की भाषा को आधार बनाकर
समाचार पत्रों और साहित्यिक पत्रिकां के सहारे हिन्दी गद्य का निर्माण और
परिष्कार किया था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के
बाद हिन्दी को नई चाल में ढालकर हिन्दी नवजागरण और राष्ट्रीय जागरण का सूत्रपात
नई चेतना की भाषा अर्थात खड़ी बोली के माध्यम से ही शुरू हुई थी। बाबू
बालमुकुन्द गुप्त, रायकृष्णदास,
रामचंद्र शुक्ल, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी और हिन्दी के
इतिहास लेखन से जुड़े सभी विद्वानों ने माना है कि नई सामाजिक चेतना,
अंग्रेजी सत्ता के विरूध्द राजनीतिक जागरूकता,
आर्थिक राष्ट्रवाद और स्वदेशी की भावना उभारने का काम उस दौर
की हिन्दी पत्रकारिता ने किया था। ईस्ट इंडिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश सत्ता
के दौर में अंग्रेजों ने भारत को जिस तरह लूटा, मारा और
पददलित किया था उसकी व्यथा-कथा भी हिन्दी पत्रकारिता के दस्तावेजों में दर्ज
है।
हिन्दी और
अन्य भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता भी अपने आकार और साा में सर्वांग सुन्दर हो
गई है। प्रसार संख्या में भी उनका स्थान अंग्रेजी समाचार पत्रों की तुलना में
कही अधिक बड़ा है। राष्ट्रीय अस्मिता और बाजार की मांग और पाठक की पसन्द को ही
हिन्दी पत्रकारिता की नियति मानने वाले लोग इसको हिन्दी की प्रगति के लिए सबसे
बढ़ा कदम मानते हैं। इसी आधार पर क्राइम,
क्रिकेट, कामेडी,
सिनेमा, सेक्स की प्रस्तुति को सफलता
का नया फार्मूला बनाया गया है। उनका मानना है कि बाजारवाद के सहारे 21वीं
सदी में हिन्दी भाषा वैश्विक फलक पर अपनी जगह तलाश रही है। ग्लोबलाइजेशन का
दबाव और प्रोडक्ट या ब्राण्ड बनकर हिन्दी अपने नए तेवर के साथ आगे बढ़ती जा रही
है। हिन्दी राष्ट्रभाषा तो न बन पायी लेकिन वह मीडिया मालिकों के आर्थिक मनाुफे
की भाषा बन गई है। उनकी नजर में साहित्य और पत्रकारिता के चंद शुध्दतावादी लोग
जो इस क्रांति को भाषाई प्रदूषण बता रहे हैं यह नहीं समझ पाते कि वास्तव में यह
दौर हिन्दी मीडिया को मार्केट फ्रैंडली बनाने का है। टी.वी.चैनलों और एस.एम.एस.
भाषा से हिन्दी का केनवास बढ़ रहा है। भारतेन्दु के बाद हिन्दी को एक बार फिर
नयी चाल में ढालने की कोशिश हो रही है। इस बार यह कार्य साहित्य नहीं बाजार का
रहा है और उसके माध्यम हिन्दी पत्रकार हैं। बाजार की यह नई चाल भाषाओं को
पिछलग्गू और तेवरविहीन बनाने की है। जनसंचार की एक अत्यन्त लोकप्रिय और सशक्त
जनभाषा को बाजार में उतार कर उसकी तेजस्विता और विश्वसनीयता दांव पर लगाने की
साजिश क्या सचमुच खतरनाक लगती है। क्रांति की ज्वाला पैदा करने वाली भाषा को
वैचारिक और सांस्कृतिक विमर्श से काटकर विदेशी कम्पनियों का उत्पाद बेचने वाली
भाषा बनाने का प्रस्ताव इस सम्मेलन में आए या न आए हिन्दी विद्वान स्वीकार
करेंगे या अस्वीकार। इस सबसे अहम सवाल पर हो सके तो हमें इसी सम्मेलन में
निर्णय लेना चाहिए। एक कार्ययोजना बनानी चाहिए, क्योंकि
इसी से तय होगा कि हम अपने राष्ट्र और राष्ट्रभाषा को कितना प्यार करते हैं और
हमारी भावी पीढ़ियां हमें किस रूप से याद करेंगी। अग्निवेश शुक्ल की दो
पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं।
कुछ न दिखता
था अंधेरे में मगर आंखें तो थीं,
ये कैसी रोशनी
आई कि लोग अन्धे हो गए।
अच्युतानंद मिश्र- देश के वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक । नेशनल यूनियन आफ
जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे । संप्रति माखनलाल पत्रकारिता विवि. भोपाल
के कुलपति हैं । संपर्क- माखनलाल चतुर्वेदी रा. प.पत्रकारिता विवि. शाहपुरा,
त्रिलंगा, भोपाल
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