Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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विमर्श

 

 

जिंदगी में घुस आया है कैमरा

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जया जादवानी

 

मीडिया की प्रभावी भूमिका को आज कोई नहीं नकार सकता। चीजों के साथ-साथ कैमरा भी व्यक्ति के जीवन में घुस आया है। हर व्यक्ति दिखना और दिखाना चाहता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जितना फायदा मीडिया ने उठाया है, उतना औसत मनुष्य ने नहीं। उसे न इतनी समझ है, न उतनी शिक्षा। स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद हमारी शिक्षा की जो हालत है उस पर अलग से विचार करना आवश्यक है। मीडिया ही आज आदमी के लिए तय कर रहा है कि क्या खाना, क्या पहनना, कैसे रहना, कौन सी गाड़ी, बाइक  खरीदना वगैरह... वगैरह...। यहां तक कि क्या सोचना, क्या नहीं? यह हुआ है लोगों की आत्म सजगता के अभाव में... जिसका फायदा मीडिया ने जमकर उठाया है। तमाम धार्मिक चैनल बाबाओं के प्रवचन, तंत्र-मंत्र, वास्तु, ज्योतिष, शुभ-अशुभ दिनों, पत्थरों, अंगूठियों से भरे पड़े हैं। या सास बहू, पति-पत्नी की षडयंत्रकारी कहानियां जो कहीं नहीं ले जातीं। दरअसल इनका जन्म ही कहीं नहीं ले जाने के लिए होता है। ये उलझे हुए जागे हैं, इनका उद्देश्य भी उलझाना है।

 

दरअसल मीडिया भी उपभोक्तावादी संस्कृति का गुलाम है। कभी-कभी उसकी तटस्थ और प्रभावहीन भूमिका हैरान करती है। सूचना देने और घटनाओं के उबाऊ विवरण देना ही तो महज उसका काम नहीं है। औसत शिक्षित मनुष्य को उसकी कही भूमिका की बात आगाह करना और तमाम राजनैतिक- सामाजिक  सच्चाईयों को उजागर करना क्या उसका महत्वपूर्ण काम नहीं है। और जब-जब उसने ऐसा किया है, उसकी भूमिका सराही गई है... लोगों के सोच में तुरंत बदलाव लक्षित हुआ है। मीडिया की पहल से जो राजनीतिक भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं, उसने लोगों में एक किस्म की सजगता पैदा की है। यह हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो दर्शक वर्ग  टी.वी. के सामने बैठा है, वह औसत शिक्षित या कम शिक्षित वर्ग है। जिसमें अभी सही-गलत की वह सामाजिक चेतना कई कारणों के उत्पन्न नहीं हो पायी है, जो एक स्वस्थ समाज के गठन में प्रभावी भूमिका निभाने में कारगर होती है। ऐसे में अपने औसतपन और उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते मीडिया उनकी सोच को पंगु और विवेक  शक्ति को कुंद बना रहा है। सीरियल के पात्रों की तकलीफ उसे दिखाई देती है, अपने भाई की चीख उसे सुनाई नहीं देती। पात्रों को पहचानता है, पड़ोसी को नहीं। पैकिंग देखता है, चीज नहीं। उसके पास कोई भी आकर कुछ भी बेच सकता है, वह विरोध नहीं करता। हर आदमी सफल होना चाहता है, कोई मनुष्य नहीं होना चाहता। अगर सारे सीरियलों को इकट्ठा किया जाए तो सिर्फ दो कहानियां बनती हैं- जो कपड़े और चेहरे बदलकर पेश होती हैं, ऊबाऊ  घटनाक्रम, सस्ता मनोरंजन, निरन्तर दोहराव और वैज्ञानिक सोच का भारी अभाव। कितने क्षण हैं जीवन में कि हम सिर्फ मनोरंजन चाहते हैं। कुछ सार्थक करना या सोचना नहीं। ऐसा क्या कर रहा है आज का मनुष्य जो बोरडम उसे खाए जा रहा है। इसके लिए कहीं उसके अपने गलत चुनाव तो नहीं है।

 

ऐसा क्यूं है कि जीवन स्तर में निरंतर सुधार के बावजूद मनुष्य ज्यादा अंधविश्वासी, रूढ़िवादी और नियतिवादी होता जा रहा है। तो कौन लड़ेगा नागरिक की अपनी लड़ाई, अगर वह खुद अपनी नहीं लड़ सकता। इसके लिए ही मीडिया को सामने आना और रहना है। पर सवाल यह भी है कि जो सजे-धजे चेहरे दिख रहे हैं टी.वी. पर वे कितने शिक्षित हैं? अपने वेतन और रोजगार के अलावा उन्हें कौन सी दूसरी चिंता है समाज की? क्या वे अपनी ताकत का कहीं इस्तेमाल करना जानते हैं? मीडिया का काम सिर्फ हंसाना या मनोरंजन करना नहीं है..... तस्वीर का वह दूसरा पहलू भी दिखाना है, जो आमतौर पर छिपाया जाता है। वहीं तस्वीर बेबस और मूक जनता की सच्ची तस्वीर होगी। ब्रांडेड कपड़े पहनने वाले,हजारों प्रकार का खाना खाने वाले, अपने बच्चों को विदेशी कंपनियों के हाथों देने वाले, शानदार फ्लैटों में शानदार उपकरणों के बीच रहने वाले भारतीयों से अलग। इन्हें शिक्षित सजग करने का काम मीडिया करे, इनके हितों की आवाज उठाए। इससे मीडिया की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और राजनीतिक पार्टियां दबाव में आएंगी। गैरजरूरी मुद्दों पर बहस आयोजित करना, आपराधिक सरगनाओं को बार-बार महिमामंडित करके दिखाना, उनकी प्रेमिकाओं और रिश्तेदारों को हाईलाइट करना छोड़ना होगा।

 

जितने बदलाव सामाजिक स्तर पर परिलक्षित हो रहे हैं, वे अब बाहरी हैं। मूल रूप में मनुष्य वही है... सिर्फ एक देह...। खाना-कपड़ा, घर-परिवार, पति-पत्नी, बच्चे, तनाव, तलाक, झगड़ा असहनशीलता और यह व्यक्ति केन्द्रित तमाशा दिखा रहा है मीडिया। जहां अपनी महत्वाकांक्षा सर्वोपरि है। जो दूसरा रास्ते में आए, उसे रौंद दो। महत्वाकांक्षा भी एक -'मनी-मनी'। कोई मूल्य, कोई आदर्श, कोई सामाजिकता, कोई जिम्मेदारी, कोई मन या आत्मा नहीं। इसी एक देह की ख्वाहिशें पूरी करने को शीर्षासन किए जा रहे हैं। देह है कि तृप्ति होती नहीं। बदल दो, बदल दो, हर चीज, हर मनुष्य, हर रिश्ता बदल दो...। जो काम न आए, उसे फेंक दो। जो सचमुच बदलना चाहिए, वह क्या है, किसी को पता नहीं है। चीजों की कीमतें उठती-गिरतीं है, शेयर मार्केट के भाव नीचे-ऊपर हो रहे हैं, उसी अनुपात में मनुष्य की सांसें भी। मनुष्य सिर्फ पूंजी और ताकत की भाषा समझने लगा है, तीसरी बाबाओं की। इसका फायदा मीडिया जमकर उठाता है। अब ये बाबा अपने चैनलों की सीमाएं लांघकर खबरिया चैनलों में भी पहुंचने लगे हैं लैपटॉप लेकर ऑन लाइन समस्या समाधान, उपचार साथ-साथ। काश, जीवन का गणित इतना ही आसान होता?

 

क्या मीडिया सचमुच चाहता है कि लोग और समाज बदले, चेतना सम्पन्न हो या उनके इसी तरह कहने से ही वह अपनी भलाई जानता है और जानबूझकर किसी बड़े बदलाव की ओर हाथ नहीं बढ़ाता। पर उसे बढ़ाना तो पडेग़ा ही। इतिहास गवाह है, आप जनता को बहुत वक्त तक मूर्ख नहीं बना सकते। अपनी मर्जी से जब तक बनती है, बनी रहती है। एसएमएस करती है, बेबात हंसती है, पल दो पल के नायकों को अपने सिर चढ़ाती है, उतारती है, ताज को ख्वामख्वाह वंडर्स में शामिल करने को बेकरार रहती है, खुद को लुभवाती है। साजिशों का शिकार होती है। अपनी हकीकतों को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए रंगीन चश्मे में दुनिया देखती है और देखती है अपने 'इंडिया' को। इस सबके बीच ही मीडिया को अपनी सार्थक भूमिका खोजनी है। अपनी साख को बरकरार रखना है। माना कि टीआरपी महत्वपूर्ण है,पर इतनी ज्यादा नहीं। फिर जितना ज्यादा मीडिया आम आदमी की समस्याओं के नजदीक आएगा, टी.आर.पी. बढेग़ी ही। एक कदम उठाकर तो देखो यारों.....। 

 

  जया जादवानीः हिन्दी की प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार एवं कवियत्री,कई पुस्तकें प्रकाशित । बिलासपुर में रहती हैं।

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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