Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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संपादकीय

 

 

आवाज की दुनिया को सलाम!

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श्रीकांत सिंह

 

बहुत पुरानी बात नहीं है जब रेडियो सीलोन से प्रसारित बिनाका गीतमाला के लोकप्रिय उद्धोषक अमीन सायानी अपने श्रोताओं का अभिवादन -'आवाज की दुनिया के दोस्तों को सलाम' कहकर किया करते थे। प्रसारण के क्षेत्र को शायद इससे बेहतर ढंग से पारिभाषित नहीं किया जा सकता। केबल और सैट टॉप बॉक्सों के सहारे घर आंगन में डूबती-उतरती छवियों के दौर में भी रेडियो का रसूख कम नहीं हुआ है बल्कि इंटरनेट और मोबाइल के कंधे पर चढ़कर रेडियो एक नए अवतार में अपनी जड़ें फैलाने लगा है। अपनी व्यापक पहुंच, सरल तकनीक और इत्मीनान से उपयोग की क्षमता की वजह से प्रसार-माध्यम के तौर पर रेडियो का आज कोई जोड़ नहीं है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ सरकार के लापता हेलीकाप्टर की खोज में रिमोट सेसिंग से लगाकर हवाई सर्वेक्षण जैसी नई-नई तकनीकें भी थक-हार गईं। काम आया तो रेडियो, जिस पर समाचार सुनकर एक ग्रामवासी ने अपने को इतना जान रखा था कि हेलीकाप्टर उसके इलाके में भी कहीं हो सकता है। इसी ग्रामीण ने अपने पालतू कुत्ते की मदद से दुर्घटनाग्रस्त हेलीकाप्टर का मलबा खोज निकाला। सूचना, मनोरंजन और शिक्षा के तीन आयामों को स्पर्श करते हुए आकाशवाणी ने भारतीय श्रोता समुदाय की जर्बदस्त सेवा की है। सरकारी प्रसार माध्यम होने की वजह से इसकी अपनी सीमाएं हैं तो क्या हुआ। भारत जैसे देश में जहां साक्षरता दर आज भी सिसक रही है - रेडियो ने सामाजिक सरोकारों को काफी कुछ निभाया है। सच है कि जो संभावनाएं रेडियो में मौजूद हैं उनका आज भी बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। विसंगतियों से जूझते एक विकासशील देश में मीडिया ने जो चुनौती स्वीकारी है उसे पूरा करने में रेडियो महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। रेडियो की विकास यात्रा अब तक कैसी रही और क्या हो सकती है, इसकी भविष्यगत दिशाएं, इसी पर केंद्रित है मीडिया विमर्श का यह वार्षिकांक। उम्मीद है यह प्रयास आप सबको पसंद आएगा। पत्रिका के नियमित स्तंभ मेरा समय में इस बार वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक श्री राधेश्याम शर्मा के जीवन अनुभव जा रहे हैं। साथ ही रेडियो पर केंद्रित अंक होने के नाते रेडियो से लंबे समय तक जुड़े रहे श्री हसन खान भी अपनी स्मृतियों को इसी स्तंभ में टटोल रहे हैं यानि इस बार मेरा समय में दो विभूतियों के अनुभव पढ़ने को मिलेंगे।

 

इस अंक के साथ मीडिया विमर्श अपने प्रकाशन के एक साल पूरे कर दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रही है। दूसरे वर्ष का यह पहला अंक इसीलिए वार्षिकांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। ऐसे सभी परंपरागत लोकाचार जो एक छोटे शहर से किसी विशेष विधा पर हिन्दी में निकलने वाली वैचारिक पत्रिका को झेलने पड़ते हैं, झेलते हुए हमने एक साल पूरा कर लिया है। हमने प्रयास किया है कि सभी अंकों का बौध्दिक, वैचारिक और रचनात्मक स्तर समान हो। प्रयास यह भी रहा कि सभी अंक समय पर निकलें और पाठकों तक समय पर पहुंचे। ताकि पाठक संख्या में और पत्रिका के हितैषियों में निरंतर वृध्दि हो। मीडिया विमर्श  ने बिना किसी पूर्वाग्रह के मीडिया के क्षेत्र में चिंतन के लिए एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और वैचारिक मंच उपलब्ध कराया है।

 

प्रयास हमारे थे, उसमें हम कहां तक सफल हुए यह कहानी कहने का अवसर यह नहीं है, लेकिन इतना तो आपको जानना ही होगा कि ये सारे प्रयास हमने किसके बलबूते किये। आपके बलबूते पर। सच मानिए यदि मीडिया विमर्श  को आप सबका स्नेह, लाड़-प्यार, दुलार, सुझाव, मार्गदर्शन और कभी-कभी मीठी झिड़कियां नहीं मिली होतीं तो इसका शतांश भी कर पाना हमारे लिए कठिन ही नहीं, असंभव था। यह सब आगे भी बना रहे यही अनुरोध है!

 

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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