पढ़े जा रहे हैं अपठनीय अखबार
: प्रभाष जोशी
(वरिष्ठ
पत्रकार स्वर्गीय एन.राजन की स्मृति में व्याख्यान माला का आयोजन)
भोपाल।
वैचारिक विपन्नता के इस दौर में अखबारों में इस बात की होड़ लगी है कि जो जितना
ज्यादा अपठनीय होगा,
उतना ज्यादा से ज्यादा पढ़ा जाएगा। सचाई यह है कि आज अधिकांश
अखबार बौध्दिक प्रतिबध्दता से विलग हो चुके हैं। यह इसलिए भी दुखद है क्योंकि
भारत के अखबारों की गंभीर और निर्णायक भूमिका रही है।
वरिष्ठ
पत्रकार प्रभाष जोशी ने ये विचार दिवंगत पत्रकार एन. राजन की याद में स्वामी
प्रणवानंद पत्रकारिता ट्रस्ट द्वारा आयोजित पहली व्याख्यानमाला में प्रमुख
वक्ता की हैसियत से व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज टीवी चैनलों और अखबारों के
बीच इस बात की ज्यादा होड़ है कि कौन कितना अधिक दिखावा कर सकता है। अखबारों की
प्रमुख चिंता है कि यदि टीवी सब कुछ ले जाएगा तो उसके पास क्या बचेगा। स्थिति
यह हो गई है कि जो अखबार जितना ज्यादा अपठनीय होगा,
उतना ज्यादा से ज्यादा पढ़ा जाएगा। विचार के मूल पक्ष को तजने
के कारण ही आज मीडिया ने स्वयं के भीतर कुछ ऐसी प्रवृत्तियों को डाल लिया है,
जो वस्तु: उसका काम नहीं है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी,
लोकमान्य तिलक, चक्रवर्ती
राजगोपालाचार्य से बड़ा कोई संपादक नहीं हुआ जिन्होने न सिर्फ देश की बल्कि
दुनिया की आदतों को बदल दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया की समझ व निज स्वार्थ देश
के लोगों की समझ व हितों के विपरीत जा रहा है। मीडिया के असल चरित्र की चर्चा
करते हुए श्री जोशी ने सवाल किया कि लोकतंत्र मीडिया की प्राणवायु है। यदि
मीडिया ही पूंजीपतियों की राय को अपनी राय जताने लगा तो लोकतंत्र के रक्षकों का
क्या होगा? उन्होने एक मैच के दौरान अंपायर द्वारा सौरव
गांगुली को बॉलिंग करने से रोकने और राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को पुन:
राष्ट्रपति बनाए जाने जैसी बातों को लेकर टीवी चैनलों की एसएमएस,
ईएमएस और सर्वे नीति पर चुटीले ढंग से प्रहार भी किया।
कार्यक्रम की
अध्यक्षता कर रहे नागपुर के वरिष्ठ पत्रकार एमवाई वोधनकर ने कहा कि आज मीडिया
की स्थिति सुभाष घई की फिल्मों की तरह हो गई है,
जिसके तमाम आग्रह जनता की मांग के अनुरूप तय होते है। अखबारों
में आज वैचारिक प्रतिबध्दता पर तकनीकी प्रतिबध्दता हावी हो गई है। आज उच्च स्तर
की नहीं, निम्न स्तर की प्रतिस्पर्धा देखने में आती
है।
lll