ब्लेयर ने मीडिया को क्रुर नरपशु की संज्ञा दी
लंदन।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे टोनी ब्लेयर का
27 जून
को राजनीतिक सूर्यास्त हो गया लेकिन यह कुर्सी छोड़ने से पहले वे मीडिया को
कोसने से बाज नहीं आए। एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने जब मीडिया के लिए क्रूर
नरपशु की जब उपमा चुनी तो कई पत्रकार हक्के-बक्के रह गए। इससे ब्लेयर की छवि को
भी झटका लगा। कई पत्रकार मानते हैं कि ब्लेयर ने जाते-जाते एक ही झटके में
मीडिया में अपनी छवि तार-तार कर दी है।
रायटर्स
कार्यालय में अपने व्याख्यान में ब्लेयर ने जब इस शब्द का इस्तेमाल किया तो
स्तंभकारों,
पत्रकारों और यहां तक कि पाठकों को भी उनके खिलाफ प्रक्रिया
जारी करने का मौका मिला। प्रिंट मीडिया और साइबरस्पेस में अब ब्लेयर के खिलाफ
हजारों शब्दों के लेख छप चुके है। कुछ लोगों ने मीडिया और राजनीति के संबंध पर
ब्लेयर द्वारा की गयी टिप्पणी को जायज ठहराया तो अधिकांश ने ब्लेयर पर उसी हाथ
को जख्मी करने का आरोप लगा है जो हाथ पिछले 10 वर्षो से
उन्हें खाना खिला रहा था।
पत्रकारों का
कहना है कि मीडिया ने ही ब्लेयर को इस मुकाम तक पहुंचाने में खास योगदान दिया
था। ब्लेयर के बयान का सार यह है कि न्यूज मीडिया ब्रिटेन के सार्वजनिक जीवन
में हद से ज्यादा हस्तक्षेप करने लगा है। मीडिया इस कदर हावी है कि
प्रधानमंत्री और दूसरी हस्तियों को मीडिया की अपेक्षाओं की पूर्ति करने के लिए
भारी जद्दोजहद करनी पड़ती है। ब्लेयर का कहना है कि अगल प्रधानमंत्री या
सार्वजनिक जीवन की दूसरी शख्सियत मीडिया के सवालों का उत्तर देने के लिए वक्त न
निकाले तो मीडिया उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाएगा। उनका दावा है कि ऐसे में नेता
कोई अहम फैसला लेने की क्षमता खो देता है। मीडिया नेताओं को साहसिक फैसले लेने
से रोकता भी है। पत्रकारों और स्तंभकारों ने उनके इस बयान का गहरा संज्ञान लिया
है। इंडिपेंडेट अखबार के मुख्य संपादक सिमोन केलनर ने ब्लेयर के इस बयान को गलत
बताया है। ब्लेयर ने खासकर इंडिपेंडेट अखबार पर खबर और विचार के बीच की रेखा
खत्म कर देने का आरोप लगाया है।
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