Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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समाचार

 

 

आखिर क्यों लांछित की जाती है स्त्री?

 

(बहुभाषी पुस्तक टैबू का रंगारंग लोकार्पण)

बान्द्रा (पश्चिम)। मुम्बई के नामचीन लीलावती अस्पताल के ठीक बाजू में तन कर खड़ी है, महाराष्ट्र एजुकेशन ट्रस्ट की सुन्दर, नईनकोर इमारत। उस के भव्य, वातानुकूलित सभागार में, पिछले दिनों, पाकिस्तानीं लेखिका डॉ. फौजिया सईद की मौजूदगी में, उन की मूल अंग्रेजी पुस्तक टैबू के मराठी अनुवाद का जो लोकार्पण हुआ, उसे हर कसौटी पर यादगार कहा जाएगा।

 

टैबू के अंग्रेजी संस्करण के प्रकाशक हैं, आक्सफर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, करॉची। हिन्दी में यह अविस्मरणीय पुस्तक, कलंक शीर्षक से, डिमाई साइज के 396 पृष्ठों में मात्र रू. 200 में, मणिमाला बुक्स फॉर चेंज, सी 75, साउथ एक्सटेन्शन पार्ट 2, नई दिल्ली 110049 (फोन 011-51642348) से प्राप्त की जा सकती है।

 

यह कृति उर्दू में भी उपलब्ध है, उसी कलंक शीर्षक से। मराठी में अनुवादिका रेखा देशपाण्डे ने इस का शीर्षक टैबू ही रखना उचित समझा है, जिसे पद्यगन्धा प्रकाशन के लिए अरूण जाखडे ने प्रकाशित किया है।

 

सिने-जगत के मशहूर लेखक-गीतकार-बुध्दिजीवी जावेद अख्तर ने टैबू को लोकार्पित करते हुए समारोह की अध्यक्षता की। इस अवसर पर 56 मिनट की एक पाकिस्तानी कथा फिल्म शाहरूख खान की मौत भी प्रदर्शित हुई, जिस के निर्देशक एहतेशामुद्दीन के साथ नायक सय्यद तबरेजअली शाह ने भी मौजूद रह कर मौके की शान बढ़ाई।

 

समारोह का प्रारंभ हुआ मिलिन्द इंगले के गजल-गायन से। दो श्रेष्ठ गायिकाओं फैय्याज एवं वैशाली सावन्त ने भी अपने गजल-गायन से श्रोताओं को मुग्ध कर दिया। मुंबई-कराची फोरम की ओर से लेखक-पत्रकार संजय गोडबोले को मानपत्र एवं रू. दस हजार की राशि से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें दक्षिण एशियाई देशों के बीच सम्बंधों का सामास्य स्थापित करने के लिए दिया गया। मुम्बई विद्यापीठ के कुलगुरू डॉ. विजय खोले, स्टै्रटजिक फोरसाइट ग्रुप के निदेशक सन्दीप वासलेकर, एम.टी.डी.सी. के संचालक भूषण गगराणी, एम.ई.डी.सी. के पूर्व अध्यक्ष मुरलीधर चैनी एवं मराठी दैनिक लोकसत्ता के सम्पादक कुमार केतकर के सात हिन्दी साहित्य जगत् का प्रतिनिधित्व करते दिखाई दिए वेद राही और पुष्पा भारती। कार्यक्रम आयोजित हुआ था साफमा (साउथ एशियन फ्री मीडिया एशोसिएशन) एवं मुम्बई कराची फोरम के संयुक्त तत्त्वावधान में। टैबू में डॉ. फौजिया सईद ने लाहौर के रेड-लाइट इलाके शाही मोहल्ले में आठ बरसों तक लगातार शोध कार्य कर, वहीं की देहजीवी स्त्रियों की अत्यन्त मार्मिक गाथा प्रस्तुत की है। शोध कार्य के बाद लेखिका ने पाण्डुलिपि तैयार करने में दो बरस और लगाए। यूं कुल दस बरस लगे, इस गाथा को पाठकों के सामने रखते। यह कृति औपन्यासिक सांचे में ढली हुई है, जबकि है यह शुध्द शोध-ग्रन्थ पुरूष की ढिठाई, दकियानूसी और पत्थरदिली को भरपूर हिम्मत और बेबाकी के साथ प्रस्तुत करने में समर्थ डॉ. फौजिया सईद को टैबू के लेखन के दौरान कैसी घातक धमकियों का सामना करना पड़ा, इस का बयान सचमुच लोमहर्षक है। टैबू की आसान पठनीयता से उस की सामाजिक उपयोगिता बहुत बढ़ गई है। इस विवादास्पद, महत्वपूर्ण, नाजुक कृति के हिन्दी एवं उर्दू अनुवाद भले ही कलंक शीर्षक से प्रकाशित हुए हों, किन्तु टैबू का वास्तविक अर्थ है, प्रतिबंधित वर्जित, अभिशप्त, निषिध्द। डॉ. फौजिया सईद ने कहा कि देह का व्यापार सम्भव है ही नहीं, यदि उस में पुरूष और स्त्री, दोनों संलिप्त न हों। जब पुरूष की संलिप्तता स्त्री के बराबर ही है, तब रेड-लाइट एरिया में उलझी होने के लिए अकेली स्त्री को ही क्यों लांछित किया जाता है?                                   

मनहर चौहान

 

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

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