Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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प्रसंगवश

 

 

साहित्य, राजनीति और मीडिया

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डॉ. कमल कुमार

 

तिहास के पन्ने पलटें तो देखेंगे कि साहित्य, राजनीति और मीडिया का अटूट रिश्ता रहा है। देश की स्वाधीनता के समय, स्वाधीनता आंदोलन में साहित्य की भूमिका महत्वपूर्ण थी और मीडिया ने ही इस भूमिका को सार्थकता दी थी। साहित्य की स्वाधीनता आंदोलन मेें सक्रिय भागीदारी थी और मीडिया (पत्र-पत्रिकाएं) इसका जनता में प्रचार-प्रसार कर रहा था। भारतीय चिंतन परंपरा से राजनीति का गहरा रिश्ता रहा है। इसलिए साहित्य का पूरा इतिहास या तो राजनीति के सम्मुख या विमुख विपरीत दिशाओं में प्रवाहित हुआ। लेकिन आज राजनीति ,साहित्य और मीडिया मिलकर एक अब्सर्ड डिकॉकशन तैयार कर रहे हैं। भारत की आजादी के साथ विभाजन की त्रासदी भी हमें विरासत में मिली। स्वतंत्रता के बाद, 20वीं सदी के अंतिम चरण में बहुलतावाद, बहुसंस्कृतिवाद और प्लूरिस्टिक संस्कृति का विमर्श केंद्र आया। दूसरी ओर राजनीति भारत की समग्र जीवन दृष्टि और सह अस्तित्व की आचार संहिता को विभाजित, विद्वेषपूर्ण और विकृत रूप में प्रस्तुत करके अपना स्वार्थ साधने में लग गई। हमारा इतिहास और समाज सह अस्तित्व की धारणा के हिमायती रहे हैं। जबकि राजनीति ने वैमनस्य और विभेद उत्पन्न किया है। भारतीय चिंतन परंपरा जातीय संस्कृतियों (अस्मिताओं) को एक हाइफन-एक स्पेश के साथ मान्य ठहराती है। यह स्पेश न होने से बड़ी जातीय अस्मिता छोटी जातीय अस्मिताओं को निगल जाएगी। या छोटी जातीय अस्मिताएं बड़ी संस्कृति में सुराख करके उसका क्षरण करती रहेगी।

 

आज, राजनीतिक स्वार्थों और मीडिया की हाईप ने बड़ी विसंगति स्थिति उत्पन्न कर दी है। राजनीति जातियों, धर्म, भाषा और समुदाय को अपने राजनीतिक हितों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में बदल रही है। क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां राष्ट्रीय अस्मिता को अपने ही देश की राजनीति से खतरा हो। धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाले देश के संविधान में शरीयत और पर्सनल मुस्लिम ला का प्रावधान हो? यह समय, साहित्य के लिए भी चुनौतियों से भरा है। मीडिया हाईप, 24 घंटे के चैनल, टी.आर.पी. की भूख और अंतिम लक्ष्य मुनाफा है। प्रिंट मीडिया भी इसी राह का राही है। बहस के नाम पर बवाल खड़ा करने की राजनीति साहित्य में हंस  से शुरू हुई थी। राजेन्द्र यादव इसके बेताज बादशाह हैं। विवाद पैदा करना और पब्लिक लेना, यह नुस्खा सफल हुआ। दूसरे पत्र-पत्रिकाओं ने भी इसे अपनाया। इसमें संपादक और प्रकाशक के साथ लेखक भी कहीं पीछे नहीं रहा। ज्ञानोदय के पिछले तीन महीनों के अंकों से बाहर आकर जनसत्ता तक फैला नासिरा शर्मा प्रकरण उसका उदाहरण है। आखिर हुआ क्या है? यूं हर व्यक्ति को अधिकार है कि अपने साथ हुए अन्याय का विरोध करे। लेकिन चाय के प्याले में तूफान उठाना एक तरह की कला है और राजनीति भी। ज्ञानोदय के  स्तंभ 'मील का पत्थर' से पत्थरों की बौछार होगी, किसी ने नहीं सोचा था। मीरा सीकरी ने नासिरा शर्मा पर लिखे संस्मरण में नासिरा की शिकायत दर्ज की। वे क्योंकि मुसलमान हैं इसलिए बड़े पुरस्कारों में वंचित रह जाती हैं। तथा इसका जिक्र नासिरा शर्मा ने ज्ञानोदय के अगस्त अंक में संपादक को अपने पत्र में किया। जानते हो क्यों, मुसलमान होने से ये इनाम वे हमें नहीं देंगे। मैं यकीन करूं या ना करूं लेकिन यह सच है कि यह इनाम मुसलमान राइटर्ज को नहीं मिलेंगे। यह वाक्य उन्होंने उदृत किया है। कहा नहीं है नासिरा ने कहा, क्योंकि संस्मरण रिकार्ड नहीं किया गया, इसलिए यह गलत है। संस्मरण आधुनिक गद्य में निबंध की एक विधा है। साहित्य कोश में संस्मरण के बारे में लिखा है या तो यह आत्मचरित होता है जहां कथा का मुख्य पात्र वह स्वयं होता है। या कोई दूसरा पात्र संस्मरण के केंद्र में रहता है। बनारसीदास चतुर्वेदी के संस्मरण या महादेवी वर्मा के 'अतीत के चलचित्र', 'स्मृतियों की रेखाएं' और दूसरे कई निबंधकारों ने विभिन्न पात्रों पर संस्मरण लिखे और भावानुभूति के साथ पात्रों को अंकित किया। संस्मरण एक तरह का स्मरण है, जिसमें उस पात्र के बारे में लेखक के  अपने इम्प्रैशन होते हैं। साक्षात्कार को रिकार्ड किया जाता है। इसमें हु-बहू वही लिखा जाता है जो पात्र लेखक से कहता है। संस्मरण और साक्षात्कार के इस भेद को समझ लेना जरूरी है। रीना फहमी ने नासिरा शर्मा का साक्षात्कार लिया है। संस्मरण नहीं लिखा। मीरा सीकरी ने संस्मरण लिखा है, साक्षात्कार नहीं लिया। जिस तरह नासिरा शर्मा कह सकती हैं कि उन्होंने यह वाक्य उघृत किया था। उसी अधिकार से मीरा सीकरी भी रह सकती हैं कि नासिरा शर्मा ने उन्हें यह बात कही थी। इसका फैसला कौन करेगा? क्या सिर्फ नासिरा शर्मा? लेकिन मीरा सीकरी क्यों नहीं? इसके लिए लोग भी क्यों फैसला नासिरा शर्मा के पक्ष में देंगे? मीरा सीकरी के पक्ष में क्यों नहीं? बार-बार इस बात को कहा जा रहा है कि मीरा सीकरी का संस्मरण रिकार्ड नहीं है। क्या संस्मरण रिकार्ड किए जाते हैं? चलिए मान लें, मीरा सीकरी का संस्मरण रिकार्ड नहीं किया गया। इसलिए अविश्वसनीय है। यह भी क्यों माना जाए कि वह एक महान लेखिका हैं, जिनके लिए मीरा ने सुनहरे भविष्य की कामना की। उन्हें आने वाले समय में बड़े साहित्यक पुरस्कार मिलेंगे ही। नासिरा, मील का पत्थर क्यों हुईं? ज्ञानोदय में 24 पृष्ठों की हकदार कैसे बनीं? जनसत्ता का आधा संपादकीय पन्ना उन्हें क्यों कर मिला? क्या इसके पीछे भी कोई राजनीतिक खेल था? 'जो जितना दिखेगा उतना बिकेगा' साहित्यिक माइलेज का खेल। बाजारवाद के इस युग में साहित्यकार क्यों पीछे रहे? पत्रकार और प्रकाशक क्यों न बढ़कर आए? मुनाफा क्या उनका नहीं चाहिए। जहां तक पाठकों की प्रतिक्रियाओं का सवाल है, उनका हक है कि वे अपनी बात कहें और संपादक उन्हें छापे। उससे सहमत होना या न होना कोई जरूरी नहीं। हर पत्रिका के शुरू में लिखा रहता है कि इसमें व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं संपादक या संस्था की जिम्मेदारी नहीं। 'संस्मरण' लिखने वाले के मन में अपने पात्र के प्रति सद्भावना और आपसी विश्वास का रिश्ता होता है। अगर नासिरा ने यह कहा भी कि मुसलमान होने से उन्हें कुछ पुरस्कारों से वंचित रहना पड़ता है। मीरा ने इसे दर्ज किया, तो इसमें उसकी सद्भावना ही तो है। इसमें गलत भी क्या है? क्या संस्मरण में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और अन्याय नहीं होता। क्या हमारे अधिकतर साहित्यिक निर्णय राजनीतिक नहीं होते? क्या नासिरा शर्मा के साथ सारा प्रबुध्द पर जनवादी समाज उनके पक्ष में नहीं खड़ा है। नासिरा शर्मा अक्सर कहा करती थीं कि अगर वह उर्दू में लिखतीं तो कुर्तुर आपा की तरह उसे भी ज्ञानपीठ का सम्मान मिला होता। मेरे पास उसका यह कथन रिकार्डिंड नहीं है। यह हमारी आपसी बातचीत का हिस्सा है।

 

संपादक ने संपादकीय में टिप्पणी की - पुरस्कारों में मुसलमान होना बाधा नहीं है। अच्छी पुस्तक लिखी जाए तो पुरस्कार भी मिलेगा ही। लेकिन पुरस्कारों की भी अपनी एक  राजनीति है। एक माफिया है और लेखक इसके शिकार होते हैं। एक बार बड़ा पुरस्कार मिल जाने पर, दूसरे अनेकों पुरस्कारों की वर्षा भी उसी लेखक पर होने लगती  है। पुरस्कृत लेखकों की अपनी एक 'जमात' होती है। बाकी सारे लेखक हशिये पर और वे केंद्र में। मंचों पर, गोष्ठियों में, सभाओं में, विश्व सम्मेलनों में, विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों के बीच, सभी जगह उन्हें बुलाया, बैठाया और आसमान में उड़ाया जाता है। बाकी लेखक भी अंतत: उसी चूहा दौड़ में शामिल हो जाते हैं। आखिर में एक जरूरी बात, अगर मैं अपने को हिन्दू कहती हूं या नासिरा अपने को मुसलमान कहती है तो क्या यह कोई गुनाह है? हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या कुछ भी होना व्यक्ति का अपना परिवेश, जीवन शैली और आचार संहिता है। अपने -अपनी मूल्य मान्यताएं और धर्म है। 'धर्म' को रिलीजन के संकीर्ण अर्थ में मत समझिएगा। समझा ही नहीं जा सकता। नासिरा क्या धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदारों से भयभीत हैं? धर्मनिपरेक्षता के ठेकेदार, धर्म के ठेकेदारों से कम खतरनाक नहीं होते। नासिरा शर्मा के साहित्य को अगर कुछ विशिष्ट बनाता है तो उसमें मुस्लिम समाज और औरत का चित्रण। जैसे मैत्रेयी पुष्पा के साहित्य की विशेषता उसका ग्रामीण परिवेश है। लेखक अपनी अनुभूतियों में ही रचता है। नासिरा अपने को अगर मुसलमान कहती है तो क्या वे लेखिका नहीं रहेगी। वह लेखिका है इसलिए मुसलमान नहीं हो सकती। यह कितना हास्यास्पद है। उससे भी हास्यास्पद है नासिरा के पक्ष लेने के बहाने संपादकों और अपना अगला-पिछला हिसाब चुकता करने की कोशिश। साथ ही उस कोशिश को खुली छूट देने का उपक्रम मीरा सीकरी और नासिरा को एक बाक्स (पिंजरे) में डालना, बकरी और शेर को साथ रख देना है। अंग्रेजों ने हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ाया, उसमें घी डाला और भेदभाव की नीति से अपने साम्राज्य की नींव पुख्ता की। बाद में जाकर आजादी की शर्त विभाजन की भयावह हिंसा हुई। आजादी के बाद जो काम राजनेता जनता के बीच कर रहे हैं। वही काम इन समीकरणो ंद्वारा पत्र-पत्रिकाएं कर रही हैं। नेता जनता को भ्रमित कर रहे हैं, वहीं पत्र-पत्रिकाएं आम पाठक को भ्रमित कर रही हैं। साहित्य को समग्रता में देखने की अपेक्षा उसे स्त्री साहित्य, आदिवासी साहित्य, दलित साहित्य, अल्पसंख्यक साहित्य इत्यादि के खांचों में बांट कर देखा-परखा जा रहा है। इसमें भी कोई आपत्ति नहीं यदि इस वर्गीकरण को साहित्य की अलग-अलग विशेषताओं के माध्यम से रेखांकित करना हो।

 

जैसे आम आदमी के हित में राजनेताओं के सारे नारे और उद्धोषणाएं वोट बैंक की नीति का षडयंत्र है। वैसे ही लेखक आज पाठकों के बीच अपने लेखन की सार्थकता और सफलता न मानकर पुरस्कारों, प्रतिष्ठित मंचों, निर्णायक पदों और यश के झंडे तले अपने लेखन को सिध्द करने में लगा है। मीडिया, संवाद और स्वतंत्रता के नाम पर आक्रमक और अनुशासनहीन हो रहा है। इस प्रवृत्ति को जानना, समझना जरूरी है, आगे की सावधानी के लिए।

 

डॉ. कमल कुमारः हिन्दी की प्रख्यात कथाकार एवं कवियत्री कई पुस्तकें प्रकाशित । इन  दिनों दिल्ली के जीसस एण्ड मेरी कालेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में  एसोसिएट प्रोफेसर हैं। संपर्क : डी-38, प्रस एन्कलेव, साकेत, नई दिल्ली - 17

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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