Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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पत्रिका

 

 

हर्षित करती है श्रेष्ठ पत्रिकाओं की उपस्थिति

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गिरीश पंकज

 

मकालीन साहित्यिक परिदृश्य में कुछ श्रेष्ठ पत्रिकाओं की बौध्दिक उपस्थिति हमें हर्षित करती है। उनकी सजग वैचारिक ऊष्मा से एक तरह की पुनश्चर्या ही होती है। मीडिया विमर्श के क्षेत्र में आने वाली कुछ नई पत्रिकाएं हों अथवा अन्य साहित्यिक पत्रिकाएं; इनके अंक इस बात की गवाही देते हैं कि विधा कोई भी हो, उसकी सामग्री और प्रस्तुति को लेकर उनके संपादक प्रकाशक बेहद गंभीर हैं।

 

मीडिया मीमांसा (त्रैमासिक)

संपादक-अच्युतानंद मिश्र

प्रकाशक- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, ई-8, त्रिलंगा, भोपाल (म.प्र.),वार्षिक शुल्क-100 रुपये

पत्रकारिता विवि ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान अपनी उपस्थिति का गंभीर अहसास कराने का काम किया है। पढ़ाई के साथ-साथ विभिन्न शहरों  में आयोजित होने वाली मीडिया-केंद्रित वैचारिक संगोष्ठियों ने विवि की एक विशिष्ट पहचान कायम की है। एक कमी महसूस हो रही थी कि विश्वविद्यालय की अपनी कोई पत्रिका नहीं है, लेकिन अब 'मीडिया मीमांसा' के रुप में यह कमी भी पूरी हो गई है। द्विभाषिक 'मीडिया मीमांसा' का प्रवेशांक (जून-अगस्त 2007) मेरे सामने है। पत्रिका के प्रथमांक में प्रकाशित सामग्री को देखकर आश्वस्ति होती है कि पत्रिका के आने वाले अंक और ज्यादा समृध्द होंगे। पत्रिका चूंकि विश्वविद्यालय का प्रकाशन है इसलिए पत्रिका में व्यापकता भी दिखती है। सामग्री को लेकर पत्रिका के संपादक ने अपने संपादकीय के माध्यम से यह दावा किया है कि ''मीडिया मीमांसा पत्रिकाओं की भीड़ में शामिल एक और पत्रिका नहीं होगी।''  वैसे तो इस तरह के दावे हर नई पत्रिका करती है लेकिन 'मीडिया मीमांसा' के प्रवेशांक को देखकर सुधी पाठकों को पूरा यकीन है कि संपादक अपने दावे पर खरे उतरेंगे। पहला अंक देखकर भरोसा होता है कि यह पत्रिका लीक से हटकर अपनी अलहदा पहचान बना लेगी।

 

पत्रिका में बंगला एवं कन्नड़ की पत्रकारिता पर केंद्रित आलेख संग्रहणीय हैं। इस समय बौध्दिक एवं सामान्य जीवन का भी स्पंदन बनते जा रहे इंटरनेट पर तेजी से जगह बनाती बेव पत्रकारिता पर जयदीप कार्णिक का लेख भी है। पत्रिका में कार्टून भी हैं, तो व्यंग्य भी। यानी मीडिया के महत्वपूर्ण पक्ष को भी समाहित करने का साहस किया गया है जबकि ऐसा बहुत कम होता है। बौध्दिकता के नाम पर व्यंग्य से दूर रहना फैशन है।

 

पत्रिका द्विभाषिक है। इसके दूसरे यानी अंग्रेजी खंड में प्रकाशित लेखों में भी ताजगी है। फिर चाहे वह ''मीडिया रिवोल्यूशन इन द न्यू मिलेनियम'' हो चाहे ''इमर्जिंग टें्रड्स इन इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग'' हो। इन सब लेखों में न केवल महत्वपूर्ण सूचनाएं हैं, वरन नवचिंतन का आलोक भी है। स्वर्गीय वयोवृध्द पत्रकार शामलाल पर एलके शर्मा का 'मोनोलॉग' मर्मस्पर्शी है। पत्रकारिता के जागरूक साथियों के लिए एक अनिवार्य मंच की तरह है मीडिया मीमांसा। पत्रिका की प्रस्तुति प्रयोगधर्मी है।

 

मीडिया (त्रैमासिक)

संपादक-श्रीशचंद्र जैसवाल

आर-12, नेहरू एन्क्लेव, कालकाजी, नई दिल्ली, वार्षिक शुल्क-150 रुपये

केंद्रीय हिंदी संस्थान के दिल्ली केंद्र से प्रकाशित 'मीडिया' (त्रैमासिक) का अंक तीन (जुलाई-सितंबर 2007) मेरे सामने है। वैसे तो यह विशुध्द मीडिया-विमर्श का मंच है, लेकिन विश्व हिंदी सम्मेलन के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर इस अंक में विश्वमंच पर हिंदी और उसके वैश्विक साहित्यिक अवदानों पर अनेक विद्वानों के लेख संगृहीत हैं। हिंदी के अंतराष्ट्रीय संदर्भ को समझने के लिए 'मीडिया' का यह अंक कारगर साबित होगा। वैश्विक फलक पर हिंदी-साहित्य, रंगमंच एंव हिंदी के प्रचार-प्रसार पर केंद्रित लेखों को पढ़कर पता चलता है, कि हिंदी अब केवल भारत ही नहीं, विश्व में भी अपनी सुगंध बिखेर रही है। पत्रिका में प्रभाष जोशी, अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, गिरधर राठी, पंकज बिष्ट, अब्दुल बिस्मिल्लाह एवं नारायण कुमार जैसे अनेक लेखकों के हिंदी भाषा एवं साहित्य-विषयक वैचारिक लेख पाठकों को बौध्दिक समृध्दि प्रदान करने हैं। लेकिन 'वैचारिक परिप्रेक्ष्य' की दृष्टि से खगेंद्र ठाकुर का लेख 'नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ हिंदी' अच्छा बन पड़ा है। यह और बात है कि लापरवाही के कारण लेख का अंतिम वाक्य ही अधूरा है। पाठक इसे अपनी समझ के अनुसार पूर्ण कर लें तो कर लें। 'विश्वमंच पर हिंदी : एक अंतरंग विमर्श' में कुछ विद्वानों के माध्यम से हिंदी के अनेक आयामों पर प्रकाश पड़ता है। इक्का-दुक्का जगह मसखरी भी नजर आती है। इससे विमर्श की महत्ता को धक्का भी लगा। जैसे एक जगह प्रभाष जोशी कह उठते हैं - राजेंद्रजी तो हंस को हंसिनी करने को तैयार हैं। बरहाल 'मीडिया' की संपूर्ण सामग्री आश्वस्त करती है कि यह पत्रिका भी बहुत जल्द अपनी एक खास जगह बना लेगी।

 

साहित्य अमृत (मासिक)

संपादक - डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी,419 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-110002 वार्षिक-150 रुपये

साहित्य एंव संस्कृति का संवाहक 'साहित्य अमृत' सचमुच मधुर आस्वाद प्रदान करता है। इसके प्रत्येक अंक में प्रकाशित सात्विक एवं संतुलित साहित्यिक रचनाएं साहित्यिक पत्रकारिता को दूषित करने वाली कुछ तथाकथित पत्रिकाओं से हटकर अपनी शुचिता बनाए रखती हैं। पत्रिका का जुलाई- 2007 का अंक विश्वहिंदी सम्मेलन विशेषांक है। महाविशेषांक बड़ी तैयारी के साथ निकलता है। इसे पढ़ने के बाद पाठक को अब तक आयोजित किए गए विश्व हिंदी सम्मेलनों की प्रामाणिक जानकारियां मिल जाती हैं। साथ ही साथ अनेक देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में जुटे साहित्यकारों के अवदान का पता भी चल जाता है। विदेशों में प्रवासी भारतीयों द्वारा लिखी जा रही कहानी-कविताओं की बानगी भी है, जिससे पता चलता है कि उनके चिंतन-मनन की दिशा क्या है।

 

पत्रिका के संपादक डॉ. सिंघवी स्वयं एक अच्छे साहित्यकार हैं। उन्होंने अपने संपादकीय में हिंदी को लेकर अपने जो विचार व्यक्त किए हैं, वे भी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बिल्कुल सटीक लिखा है कि 'हिंदी राजनीति की लोकभाषा के रूप में अनिवार्य एवं अपरिहार्य है, किंतु अब भी राजभाषा के रूप में अस्त और विस्मृत सी है। न्याय और शासन के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग हाशिये पर हैं।' सिंघवी जी ने अनेक प्रश्न उठाए हैं। ये शाश्वत-से हैं। दुर्भाग्य यही है कि आजादी के साठ सालों के बावजूद हिंदी को उसकी वास्तविक पद-प्रतिष्ठा अब तक नहीं मिल सकती। फिर भी संपादक आश्वस्त है कि एक न एक दिन 'विश्व पटल पर हिंदी की अरुणिम आभा जरूर फैलेगी।'

 

नया ज्ञानोदय (मासिक)

संपादक-रवींद्र कालिया

प्रकाशक-भारतीय ज्ञानपीठ, 18- इन्स्टीटयूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली-110003, वार्षिक शुल्क-250 रुपये

आधुनिक भावबोध, कला संचेतना और नवीनता की इस प्रतिनिधि मासिक पत्रिका को पढ़ना सुखद अनुभूतियों से गुजरना होता है। लगभग हरेक अंक की रचनाएं ताजगी भरी होती हैं। पत्रिका का समीक्षित अंक (जून-2007) युवा पीढ़ी पर केंद्रित है। नवगति, नवलय, ताल छंद नव जैसी निराला की कालजयी गीत-पंक्ति के सहारे नया ज्ञानोदय ने अनेक नए रचनाकारों को बहुत सम्मानजक तरीके से प्रस्तुत किया है। यही इस विशेषांक की विशेषता है। रचनाकार को कैसे प्रस्तुत किया जा रहा है, इससे भी उसके बारे में पाठक की खास राय बनती है। समकालीन कविता-कहानी की दुनिया के नये स्वरों को एक साथ प्रस्तुत करके ज्ञानोदय ने बताया है कि गंभीर साहित्य के आकाश में कितने नए नक्षत्र दैदीप्यमान हो रहे हैं। जून अंक युवा पीढ़ी विशेषांक का दूसरा संस्करण है। इसके पहले का विशेषांक भी युवा पीढ़ी के रचनाकारों की सर्जना के नवआयामों को उद्धाटित कर चुका है। अपने सारगर्भित संपादकीय में कालिया जी के इस विचार से किसी को मतभेद नहीं हो सकता है कि ऐसे अनेक लेखक हैं जिन्हें तमाम अहर्ताओं के बावजूद साहित्य अकादमी का पुरस्कार नहीं मिला। उन्होंने कुछ नाम गिनाते हुए कहा है कि ऐसे बीसियों विशिष्ट रचनाकार हैं, जिन्हें पुरस्कार नहीं मिला। लेकिन इससे उनका रचनात्मक महत्व कम नहीं हुआ।

 

ज्ञानोदय के इस अंक में युवा साहित्यकारों की लंगी फेहरिस्त है। सबका जिक्र संभव नहीं है। लेकिन भगवान सिंह का लेख बेहद पठनीय है। पांच हजार साल पहले जब कविता ने नई करवट ली थी, उस समय की स्थितियों का विश्लेषण करते हुए, भगवान सिंह कहते हैं कि ''ऋग्वेद का आरंभ ही पूर्ववर्ती और नूतन ऋषियों के हवाले से होता है। पुरानी रचनाओं की स्पर्धा में अपनी नयी रचनाओं की बात करते हैं। नये गानों से शक्तियों का आह्वान करते हैं।'' मतलब यह कि पांच हजार साल पहले जब एक नई दृष्टि विकसित हो रही थी, तब भी वहां पुरातन से कुछ ग्रहण करने की प्रवृत्ति थी। अब जो समकालीन परिदृश्य है, वहां इस प्रवृत्ति की कमी दीखती है। नई कविता की जो हालत है, उसे देखकर तो कम से यही लगता है कि उसने परम्परा को बिलकुल त्याग दिया है। लेखक ने प्रयोगवाद के नाम पर कविता के साथ मजाक करने वाली प्रवृत्तियों की भी खबर ली है। ''आज का कथा समय'' में अजय तिवारी का लेख जितना वैचारिक है, दुर्भाग्यवश समकालीन कहानियां उतनी वैचारिक नहीं रही। युवा पीढ़ी के कुछ कथाकारों में जरूर संभावनाएं हैं लेकिन ज्यादातर लेखक नई कहानी के विकृत दौर की परम्परा को ही आगे बढ़ाने नजर आते हैं। जहां नंगई, आधुनिक-बोध है। यहां- वहां स्त्री और दलित विमर्श के नाम पर समाज में संघर्ष पैदा करने की दारूण स्थितियां हैं। इस कथा समय में बदलाव आना चाहिए। कहानी प्रेमचंद की परम्पराओं को आगे बढ़ाए, नए शिल्प गढ़े। अराजक भाषा नहीं। युवा पीढ़ी विशेषांक में भगतसिंह का एक पत्र प्रकाशित हुआ है। इसे पढ़कर भगतसिंह की परिपक्व बौध्दिक समझ का पता चलता है।

 

इस बार (त्रैमासिक)

संपादक-मधुकर सिंह,पता-घरहरा आरा-802301 (बिहार) वार्षिक-100 रुपये

प्रख्यात कथाकार मधुकर सिंह के संपादन में प्रकाशित होने वाली लघु पत्रिका 'इस बार' (अप्रैल-जून 2007) हर बार की तरह सार्थक रचनाओं के गुलदस्ते की तरह सामने आई है। यह अंक महान साहित्कार कमलेश्वर की स्मृति को समर्पित है। कमलेश्वर हमारे समय के ऐसे रचनाधर्मी थे, जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता, दोनों क्षेत्रों में समान रूप से हस्तक्षेप किया। उनकी साहित्यिक रचनाएं और पत्रकारीय दृष्टि को देखते हुए उस परम्परा की याद ताजा हो जाती है, जो परतंत्र भारत में अनेक सृजनधर्मी स्वतंत्रता सेनानी जी रहे थे। वे आजादी के लिए संघर्ष भी कर रहे थे और लेखन भी। आजादी के बाद कमलेश्वर जी ऐसे ही लेखक थे जो नए भारत के निर्माण के लिए प्रतिबध्द थे। उनका अखबारी लेखन इस बात का पुख्ता सबूत रहा।

 

'इस बार' में सुधीश पचौरी, क्षमा शर्मा, रविभूषण, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, अरविंद कुमार, गायत्री कमलेश्वर, कामतानाथ, प्रदीप पंत, मार्कण्डेय, शंकर आदि लेखकों ने कमलेश्वर के अवदान को शिद्दत से याद किया है। साहित्य, फिल्म और पत्रकारिता की त्रिवेणी, कमलेश्वर की कमी  पूरी नहीं की जा सकती। वे ऐसे इकलौते रचनाकार थे जो साहित्य के साथ-साथ टीवी-फिल्म और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी निरंतर सक्रिय थे। 'कितने पाकिस्तान के माध्यम से तो उन्होंने औपन्यासिक सर्जना में एक नया पड़ाव ही स्थापित कर दिया था। मधुरकर जी ने पूरी भावुकता के साथ अपना संस्मरण लिखा है और कमलेश्वर जी से संबंधित सामग्री का संचयन किया है। कमलेश्वर जी के अनेक लेख और उनकी कालजयी कहानी 'राजा निरबंसिया' का पुर्नप्रकाशन करके उन्होंने अपने पाठकों तक कमलेश्वर के महान रचनाकर्मी चेहरे को प्रस्तुत किया है। 'कितने पाकिस्तान' की सार्थक समीक्षा भी इस अंक में है। कुल मिलाकर कमलेश्वर को सच्ची श्रध्दांजलि है इस बार के 'इस बार' का विशेषांक।

 

परिकथा (द्वैमासिक)

सौजन्य संपादक- शंकर, पता -2  बेसमेंट, फेज ए, इरोज गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली, वार्षिक -225 रूपये

'समय और समाज की परिक्रमा' करने वाली पत्रिका 'परिकथा' का मई-जून 2007 अंक भी कमलेश्वर पर केंद्रित है। इसमें गायत्री कमलेश्वर, शेखर जोशी, डॉ. परमानंद श्रीवास्तव, विश्वनाथ त्रिपाठी, रमेश उपाध्याय, कामतानाथ, खगेन्द्र ठाकुर, आलोक मेहता, पद्मा सचदेव, हिमांशु जोशी, नमिता सिंह, पुष्पपाल सिंह, विजय बहादुर सिंह जैसे विद्वानों ने कमलेश्वर जी को समूची भावुकता के साथ याद किया है। पत्रिका ने कमलेश्वर जी की पांच कहानियां का पुर्नप्रकाशन किया है, 'कितने पाकिस्तानका एक अंश भी दिया है। कमलेश्वर की अखबारी टिप्पणियां भी हैं। उनके दो महत्वपूर्ण भाषण भी हैं। दो साक्षात्कार भी हैं। इसके अलावा डॉ. सिंधवी, अरविंद कुमार, पुष्पा भारतीद्रोणवीर कोहली, शरद दत्त, अरूण कुमार आदि कुछ लेखकों के संस्मरण हैं। 130 पृष्ठों तक पसरी कमलेश्वर विषय विषद् सामग्री को पढ़कर ही कमलेश्वर जी के विराट रचना व्यक्तित्व को समझा जा सकता था। किसी एक लेख की विशेष तारीफ अन्य लेखकों से अन्याय होगा। सारे लेख मन से लिखे गए हैं। कमलेश्वर ऐसे ही लेखक थे, जिसके बारे में मन से ही लिखा जा सकता है। जमशेदपुर में कमलेश्वर जी ने 'दस्तक' पत्रिका के शताब्दी अंक के लोकार्पण के सिलसिले में जो ऐतिहासिक भाषण दिया था, उसे छापकर 'परिकथा' ने सराहनीय काम किया है। 'शताब्दियों का अंत होने से साहित्य का या मनुष्य का अंत नहीं होता' इसी शीर्षक से छपे कमलेश्वर के विचारों में समकालीन साहित्य, समाज, राजनीति की दुष्प्रवृत्तियों पर गहरी चिंता व्यक्त की है।  'परिकथा' का कमलेश्वर केंद्रित पर विशेष अंक साहित्य में सच्ची रूचि रखने वाले रचनाकर्मी एवं पाठक के लिए एक तरह से संग्रहणीय दस्तावेज बन गया है। 

 

लेखक सद्भावना दर्पण के संपादक और प्रख्यात व्यंग्यकार, कथाकार हैं । संपर्क-जी-31, नया पंचशील नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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