Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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मेरा समय

 

 

वह भी कम्बख्त तेरा चाहनेवाला निकला

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राधेश्याम शर्मा

 

मुझे दो कार्य या व्यवसाय ही सबसे ज्यादा पसंद आते हैं एक तो पत्रकारिता और दूसरा शिक्षक का कार्य। संयोग ऐसा बना कि मैं दोनों से ही जुड़ा रहा और आज भी जुड़ा हूं कुल मिलाकर सक्रिय पत्रकारिता में 51 साल पूरे हो गए (अप्रैल 1956 से शुरू किया था जबलपुर से) वैसे तो विद्यार्थी रहते हुए वाराणसी में पत्रकारिता का चस्का 1952 में ही लग गया था। वहां कुछ अखबारों का संवाददाता भी बन गया था। शिक्षकीय व्यवसाय से भी 1953 से जुड़ा। फिर भी अखबार का संवाददाता बना रहा। पूर्णकालिक पत्रकार बनने के बाद महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण प्रशिक्षण से 1972 से जुड़ा हूं। पत्रकारिता खासकर रिपोर्टिंग पढ़ाने में पं. कालिका प्रसाद दीक्षित ने जुटाया।

 

पत्रकारिता में हर महत्वपूर्ण घटना को जो अच्छी हो या बुरी, सुखद हो या दर्दनाक, निकट से देखने को बड़े से बड़े मौके मिलते हैं। फिर लिखने या कुख्यात व्यक्ति से मिलने और बात करने के मौके मिलते हैं। फिर लिखने की भी  जिम्मेदारी होती है। नई जानकारी मिलना यानी नया ज्ञान। इसके मिलने का आनंद ही अलग होता है। रोज नई जानकारी, नया नजरिया, नयी व्याख्या से वास्ता पड़ता है। नये-नये लोगों से भेंट मुलाकात काफी कुछ सीखने को मिलता है। कटु अनुभव भी होते हैं तो कभी अपमानित भी होना पड़ता है। यह कार्य ऐसा है, जिसमें रोज कुँआ खोदा और पानी पीओ। यह नहीं हो सकता कि दो दिन अच्छी खबरें दे दी। तो दो दिन आराम कर लें, क्योंकि कब किस क्षण मौके-बेमौके कौन सा हादसा हो जाएगा इसकी क्या गारंटी है? दिन रात सतर्क रहना इस व्यवसाय की पहली शर्त है।  शिक्षकीय व्यवसाय का अंदाज भी निराला है। हर साल नई पीढ़ी आती है, सामने नई खुशनुमा पौध। उसे संवारने का दायित्व और उसमें आनंद नये खिले चेहरे उनके भविष्य के निर्माण का कार्य कितना पवित्र और महान है। मेरी प्रारंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश में हुई मेट्रिक 1950 में जबलपुर से किया। तब पुराने मध्यप्रदेश में 11 साल में मेट्रिक होती थी। मेट्रिक करके वाराणसी  गए काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विज्ञान पढ़ने। इरादा था डाक्टर बनने का। वहां से इंटरमीडिए साइंस के बाद बीएस सी प्रथम वर्ष में दाखिला लेने तक पत्रकारिता की ओर झुकाव होने लगा। अखबारों में लिखना और खबरें भेजना शुरू किया। इंडियन एक्सप्रेस गु्रप का दैनिक जनसत्ता 1952 में निकला था, तब मैं उसका बनारस में संवाददाता था। तब वह साल भर बाद बंद हो गया था। इस बीच आर्थिक संकट भी आया। पिताजी ने हाथ खड़े कर दिए तो फिर लौटे मध्यप्रदेश। शिक्षक रहते हुए सागर से बीए किया फिर दैनिक युगधर्म जबलपुर में 1956 से सिटी रिपोर्टर रहते हुए 1958 में जबलपुर विश्वविद्यालय से नियमित छात्र के बतौर एमए । यह संयोग ही है कि शिक्षकीय कार्य छोड़कर 1954 में नागपुर में दैनिक युगधर्म में प्रशिक्षु उप संपादक बने, साठ रूपये मासिक वेतन पर किंतु चार माह बाद संपादक जी ने भगा दिया कि जाओ पहले हिंदी लिखना सीखो तुम कभी पत्रकार नहीं बन सकते, सो लौट आए। फिर शिक्षकीय कार्य शुरू किया लेकिन अध्ययन और अखबारी लेखन या संवाद संकलन जारी रखा। संयोग बना कि 1956 में जबलपुर से उसी युगधर्म का जबलपुर संस्करण शुरू हुआ तो नगर संवाददाता का अवसर मिला। तब से आज तक यही व्यवसाय रास आया। आज भी आता है। तब नगर संवाददाता के बतौर वेतन होता था 80 रूपए मासिक । जब शुरू किया तब साधन नहीं होते थे। वेतन नगण्य होता था। साइकिल पर सारे शहर की परिक्रमा। खबर कहां मिलेगी, इसकी चिंता। खबर लाओ, लिखो खुद ही प्रूफ पढ़ो, फिर पेज का मेकअप कराओ तब छुट्टी होती थी। दिन में खबर के पीछे भागो प्रेस में रात के दो तीन बजे तक काम सबेरे उठे तैयार हुए और सीधे कालेज। राजनीतिक रिपोर्टिंग आती नहीं थी स्पोर्ट्स का जबलपुर अच्छा केंद्र था। उसकी ही रिर्पोटिंग शुरू कर दी। जहां कोई मैच हुआ, वहां पहुंच गए । तब खेल जगत वाले हिंदी के अखबारों को महत्व नहीं देते थे। उनकी खबरें भी अंग्रेजी अखबारों में छपती थीं, धीरे-धीरे तालमेल हुआ मित्रता का दायरा बढ़ता गया जबलपुर में स्पोर्टस की हिंदी अखबारों में नियमित रिर्पोटिंग की शुरूआत का श्रेय युगधर्म को मिला फिर अन्य अखबार भी रूचि लेने लगे।

 

राजनीति में अरूचि से रूचि : नगर निगम में या राजनीतिक दलों में उठापटक होती रहती थी। पर कुछ समझ नहीं पड़ता था कि इसका भी कोई महत्व है। तब एक पत्रकार टकराए सत्यनारायण श्रीवास्तव उन्होंने मुझ में राजनीतिक रिपोर्टिंग की रूचि पैदा की जो फिर बढ़ती गयी लिखने की प्रतिक्रिया होती तो आनंद आता। इस तरह संपर्क का दायरा बढ़ा। पार्षदों , सभी दलों के नेताओं ,महापौर सबसे परिचय होता गया। एक बात अवश्य है कि उस समय अफसर हो या प्राध्यापक, लेखक, व्यापारी अथवा राजनीतिक नेता, महापौर या मुख्य प्रशासक, जिलाधीश या पुलिस कप्तान जिनसे मिलते तो खबर के अलावा बहुत कुछ सीखने मिला। मार्गदर्शन मिला। उनके संस्मरण या उनके संपर्क की  गाथा सुनकर कार्य की दिशा मिलती। अपवाद को छोड़ सारे लोग बड़े प्यार से मिलते। इस बात से खुश होते कि यह काम भी करता है और पढ़ाई भी करता है। नए-नए परिचय करने की ललक से भी बहुत लाभ हुआ।

 

तब पत्रकारिता मिशन थी : वह समय था,जब पत्रकारिता मिशन थी। कुछ करने, समाज और देश के प्रति निष्ठा रखने की सीख वरिष्ठ पत्रकारों से मिलती थी। संघर्ष का बंधन नहीं, काम और काम। आजादी के संघर्ष में पत्रकारों का संघर्ष व त्याग करने वालों से प्रेरणा व दिशा मिली। पैसा बनाने वाले तब भी थे पर नगण्य । पीत  पत्रकारिता करने वाले य ब्लैकमेलर गिने-चुने थे उनकी कोई इात नहीं करता था। वह छिपकर काम करते थे निष्ठा से काम की कद्र थी लेकिन धीरे-धीरे यह वर्ग बढ़ा और फला-फूला। घटिया राजनेताओं या अफसरों से इन्हें संरक्षण शक्ति व प्रतिष्ठा मिली।

 

नई दिशा, नए इरादे : 1956 में राज्य पुनर्गठन हुआ तो हाईकोर्ट नागपुर से जबलपुर आया । सोचा अब हाईकोर्ट की भी रिपोर्टिंग करनी होगी। किसी भी बड़े एडवोकेट के पास पहुंच जाते कि कोई महत्वपूर्ण फैसला हो तो बता दें। एडवोकेट भी एक से एक दिग्गज और हम एकदम नादान, सामान्य वेशभूषा में लेकिन उनका बड़प्पन कि प्यार से मिलते। कभी फैसले की फाइल ही सामने रख देते। पूरे केस की पृष्ठभूमि। हमारी घबराहट देख कर फिर बताते कि अंतिम पृष्ठ पढ लो खबर बन जाएगी। उनको नाम छपाने की चिंता नहीं होती थी। बल्कि कहते कि नाम नहीं छापना, वैसे ही बहुत मुकदमे आते हैं। बाद में उनमें से कुछ हाईकोर्ट के और कुछ सुप्रीम कोर्ट के जज बने। एक वरिष्ठ एडवोकेट बैरिस्टर से वास्ता पड़ा बडे ख़ुश हुए बोले हम तुम्हें पत्रकार बनाएंगे। वे लंदन स्कूल आफ इकानामिक्स में पढ़े थे, वहां पत्रकारिता भी की थी। उनकी सभी बेटियां उन दिनों लंदन में पढ़ रही थीं। वे पत्रकारिता पर लेक्चर देते, समझाते ज्ञान की बात, कब क्या लिखना और कैसे लिखना।

 

साहस पर बड़प्पन का हाथ : तब मुख्य न्यायाधीश थे एम हिदायतुल्ला जो बाद में उपराष्ट्रपति भी बने। सोचा उनसे परिचय किया जाए। चिट देकर चेंबर में पहुंच गए उनका बड़ा दबदबा था, बड़ा नाम था बडे विद्वान, लेकिन सहृदय। लेकिन अत्यधिक सरल। जब भी जाता बड़े प्यार से मिलते और समझाते। एक दिन डा. भीमराव आंबेडकर का देहांत हो गया। रात को खबर आयी सिटी रिपोर्टर के नाते स्थानीय शोक संदेश बटोरने की जिम्मेदारी मिली। सोचा कानूनी जगत का इस शहर में हिदायतुल्ला साहब से बड़ा कौन है? उनका शोक संदेश लेना चाहिए। रात को 12 बजे फोन किया वो सो  चुके थे उन्होंने खुद फोन उठाया पहले नींद खराब करने की मैंने माफी मांगी अपना नाम बताया और कहा कि आपका शोक संदेश चाहिए। आपके शोक संदेश के बिना खबर पूरी नहीं होगी। बोले अच्छा लिखो, पर अंग्रेजी में लिखाऊंगा। उन्होंने फोन पर शोक संदेश लिखवाया, दूसरे दिन वह खबर सिर्फ हमारे यहां थी लेकिन उस व्यक्ति की कैसी महानता थी नाराज नहीं हुए । कोई घमंड नहीं कि अदना सा पत्रकार चीफ जस्टिस को रात में जगा रहा है, ऐसे-ऐसे व्यक्तियों से जीवन को दिशा मिलती गयी। आत्म विश्वास मजबूत  हुआ। आज का तामझाम, सिक्योरिटी, दबदबा देखते हैं तो हैरत होती है आज तो जज क्या मजिस्टे्रट से मिलना भी आसान नहीं है। हम सीधे चिट भेजकर चीफ जस्टिस से जब चाहते मिल आते। उनका आदर पूरा करते पर आतंक या दहशत नहीं, आत्मीयता का वह माहौल ही अलग था। इसी तरह आईसीएस अफसरों जैसे आरपी नरोना या राज्य बिजली बोर्ड के अध्यक्ष प्रसिध्द एसएन मेहता आदि से खुलकर बात करते। कैसे-कैसे कर्मठ, ज्ञानवान और चरित्रवान लोग थे। यह काम के साथ-साथ प्रशिक्षण भी था। दरअसल मैंने किसी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की कोई डिग्री नहीं ली लेकिन संपर्कों एवं अध्ययन का लाभ हुआ कि हम रोज घर लौटते ,कई पाठ पढ़कर मार्गदर्शन पाकर, जीवन की व ज्ञान की सही दिशा पाकर।

 

राजधानी भोपाल में : इस बीच एमए करते ही तरक्की मिली और भोपाल तबादला हो गया। विशेष संवाददाता तो बन गए पर वहां कोई सीधे मुंह बात नहीं करता था। खुद जाकर सबसे परिचय करना पड़ा। दिल्ली के अखबारों के संवाददाताओं का उन दिनों दबदबा ज्यादा था। फिर मेरा अखबार तो सरकार के खिलाफ भी दमदारी से लिखता था तो अनेक लोग जिनमें कुछ अफसर भी थे, अछूत जैसा बर्ताव करते। धीरे-धीरे हालात बदले। खबरें मिलने लगीं। तब राजनीतिक दलों के नेता, मंत्री, विधायकों में अधिकांश जनसेवा, त्याग और निष्ठा के बल पर आगे आए थे ,उनके पास बैठना यानी शिक्षित होना शासन, प्रशासन, सरकारी नीति को समझने के जनसमस्याओं के अहसास के अवसर मिला। तब विधानसभा की बहस का स्तर अत्यधिक गरिमामय एवं उच्च था। घटियापन या ओछी छींटाकशी नहीं। एक -दूसरे का लिहाज, विधायक तैयारी से आते सदन में ढेर सारी जानकारी मिलती। इससे पृष्ठभूमि मजबूत हुई, संपर्क बढ़ा। खबरें मिलने लगीं। उससे लोगों का विश्वास और सम्मान भी बढ़ा तब पं. रविशंकर शुक्ल एवं डा. कैलाश नाथ काटजू जैसे मुख्यमंत्री थे, जो वाकई समर्पित व्यक्ति थे। उसी दौरान राजनीतिक खेलों, दावपेंचों की जानकारी मिली और पता चला कि सत्ता संघर्ष क्या होता है। डा. काटजू को कांग्रेस के समर्थकों ने ही किस प्रकार हराया? 1962 की उनकी उस हार के तार पाकिस्तान तक कैसे जुड़े थे,यह जानकारी चौंकाने वाली थी। वहां पता चला कि योजना, पंचवर्षीय योजना क्या होती है। योजनाबध्द विकास किसे कहते हैं। इनका क्या महत्व है। डाकू समस्या क्या है और क्यों है? अपराध जगत और राजनीति उद्योग जगत और राजनीति वोट बैंक का खेल और अवसरवाद एवं तात्कालिक स्वार्थ के लिए देशहित और सिध्दांतों की बलि को प्रत्यक्ष देखने व समझने का अवसर मिला।

 

गोविंद नारायण सिंह : उस दौरान एक नेता से परिचय हुआ। वे थे ठाकुर गोविंद नारायण सिंह, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के टापर और स्वर्ण पदक प्राप्त लेकिन बोलते थे ठेठ देहाती बोली यानी बघेलखंडी सतना जिले के थे। उनको मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मूलचंद देहलहरा ने पार्टी की तीसरी पंचवर्षीय योजना समिति का सचिव बनाया। इस समिति को प्रदेश की योजना का खाका तैयार करके सरकार को देना था। उन्होंने काशी विश्वविद्यालय के छात्र होने के नाते छोटा भाई तो बना लिया लेकिन पहले परीक्षा भी ले ली। योजना के बारे में बताया और कहा कि छपने पर दिखा देना । जब खबर छपी तो पढ़ने के बाद स्थायी मित्र बन गए। पहली बार वे 15 अगस्त, 1960 में उपमंत्री बने तो मैंने कहा, दाऊ हमारे घर भी मुंह मीठा कर लेना। उन्होंने सुबह फोन किया- हम तोहार घर आब तो खाली मिठाई नहीं खाब खाना खाब। वे घर आए। साथ में प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री शत्रुघ्न सिंह तिवारी और जागरण के तत्कालीन स्थानीय संपादक जुगुल बिहारी अग्निहोत्री को भी लाए। घर में सोफा नहीं था और न डाइनिंग टेबल, जमीन पर दरी पर बैठकर भोजन किया। खुश होकर गए।

 

भरोसे की एक मिसाल : एक दिन मंत्रिमंडल की बैठक के बाद मैं उनके घर पहुंचा। दाऊ क्या फैसले हुए? बोले हम नहीं जानते जे फाइल पड़ी है देख लो। सारी मंत्रिमंडलीय बैठक की फाइल दे दी। इतना विश्वास । एक बार टाइम्स आफ इंडिया के स्टाफर पीसी टंडन साथ थे। वे अचम्भे मे बोले इतना भरोसा तो इतने बड़े अखबार के बावजूद मेरा कोई नहीं करता। लेकिन इस भरोसे की मैंने कंजूसी से रक्षा की। क्या मजाक किसी को भनक पड़ जाए। गोपनीय विषय रखे। सिर्फ खबर बनायी। वह विश्वास अंत तक अक्षुण्ण रहा। दरअसल पत्रकारिता के अपने इस व्यवसाय में मैंने विश्वास किसी का नहीं तोड़ा। जिससे खटक गयी, उसने भी विश्वास में जो बात बतायी, कभी उजागर नहीं की, चुगली या इधर की उधर बताने से ईश्वर ने बचाया। इसका लाभ यह मिला परस्पर विरोधी राजनेता या गुट भी भरोसे में लेकर बात करते। हां स्वस्थ आलोचना में किसी को नहीं बख्शा सर्वश्री प्रकाश चंद्र सेठी, तख्तमल जैन, मूलचंद देशलहरा, श्यामाचरण शुक्ल, वीरेंद्र सखलेचा, सुंदरलालपटवा, भाजपा के कुभाभाऊ ठाकरे, समाजवादी नेताओं, मुख्यसचिवों, सचिवों आदि का भी विश्वास मिला। खिलाफ खबर लिखने पर भी वे सम्मान करते। कोशिश यही रही कि असत्य या तथ्यहीन खबर नहीं दी जाए।

 

हारे या मुसीबत में फंसे के साथ : मैंने एक रणनीति सदैव अपनायी राजनीतिक दौड़ में कोई हार गया या पद से हटा दिया गया अथवा दरकिनार कर दिया गया तो भी मैंने उसके प्रति संपर्क और सम्मान में कोई कमी नहीं आने दी। वे बीमार पड़ते तो हाजिर हो जाता। सेवा भी करता, भले वह राजनेता हो या अफसर नतीजा यह हुआ कि जब वे पुन: सत्ता में आते तो सबसे ज्यादा विश्वास मुझ पर करते। 1951 में नेहरू जी से टक्कर लेने के बाद लौहपुरूष द्वारका प्रसाद मिश्र राजनीति में दरकिनार हो गए थे। मैंने पत्रकारिता में आते ही उनसे मुलाकात जारी रखी। जब वे सागर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे तब भी मिलने जाता। फिर 1963 में वे मुख्यमंत्री बने तो उनके खिलाफ भी कलम चलाई। अप्रत्यक्ष में धमकी के बाद भी मिलने जाता। फिर 1963 में वे मुख्यमंत्री बने तो उनके खिलाफ भी कलम चलाई। अप्रत्यक्ष में धमकी के बाद भी कलम नहीं रूकी, उनकी सरकार का तख्ता दलबदल के कारण पलटा। तब गोविंद नारायण सिंह से निकटता के कारण सारी खबरें मेरे पास होती थीं। संविद सरकार बनी। संविद सरकार गिरी। 1962 से मिश्र जी, नेहरू जी और इंदिरा जी के निकट भी आ गए थे। इंदिरा जी को प्रधानमंत्री बनाने में उनका बहुत बड़ा रोल था। बाद को इंदिराजी से भी खटक गयी वे जबलपुर तक सीमित हो गए। 1972 में मैं दैनिक युगधर्म का संपादक बनकर जबलपुर पहुंच गया। उनसे भेंट जारी रखी। उनकी महानता कि कभी मुझ से यह नहीं पूछा कि तुम गोविंदनारायण सिंह के इतना निकट क्यों हो गए थे। मेरे खिलाफ क्यों लिखते थे।

 

दिग्गजों से सत्संग : एक दिन मिश्र जी से मिलने गया तो वे कुछ उदास थे। बोले, अब मेरे पास तो कोई खबर नहीं है फिर भी क्यों आते हो? मैंने कहा मैं आपके पास खबर के लिए नहीं आता, तो उत्सुकता के साथ पूछा फिर क्यों आते हो ? मैंने कहा कि जब भी यहां से उठकर जाता हूं तो लगता है कि नई जानकारी मिली नई पृष्ठभूमि मिली, नई व्याख्या मिली, नया नजरिया मिला। बड़े खुश हुए बोले देखो तुम कभी भी आ सकते हो। उनसे चर्चाओं में मेरी राजनीतिक- प्रशासनिक एवं कांग्रेस संबंधी पृष्ठभूमि इतनी पुख्ता हुई कि दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ में आकर प्रेम भाटिया जैसे दिग्गज पत्रकार एवं प्रधान संपादक के साथ मेरी निभी और उनका  विश्वास एवं प्यार मिला। मिश्र जी ने मुझे अपनी ताश वाली ब्रिज की निजी मंडली में शामिल कर लिया। हर शनिवार की रात में मैंं उनके घर होता। डा. सत्याचरण बराट जैसे दिग्गज भी होते कई और भी दिग्गज वहां आते थे। रात के एक दो बजे जाते, लेकिन उनके प्रति अदब में कोई कमी नहीं आने दी। उनकी निकटता के कारण कई अफसर मुझसे बड़े अदब से मिलते।  ऐसी थी उनकी दहशत। उन्होंने जनवरी, 1977 में आपातकाल रहते चुनाव की घोषणा होते  ही बता दिया था कि कांग्रेस हारेगी। एक बार एक विषय पर संपादकीय लिखने के बारे में उनसे चर्चा की तो अपनी विशाल घरेलू पुस्तकालय की अलमारियों से निकालकर चार-पांच पुस्तकें दे दीं और बोले, पढ़ो और ध्यान रखना कि  संपादक को रोज खूब पढ़ना चाहिए। मिश्र जी के बारे में मेरी एक राय सदैव रही कि वे यदि राजनीति में नहीं होते तो बहुत  महान शिक्षाशास्त्री होते। सुभाष बाबू, गांधी और सरदार पटेल के वे बड़े निकट रहे थे। अक्सर कई संस्मरण सुनाते।  भोपाल में रहते हुए राजमाता विजयाराजे सिंधिया एवं उनके राजनीतिक सचिव सरदार आंग्रे का प्यार विश्वास और आशीर्वाद मिला। चंडीगढ़ जाने के बाद भी संपर्क बना रहा। मुझे विश्वास मे लेकर बात करती। कई राजनीतिक प्रवासों में उनके साथ रहा। भोपाल में रहते हुए इंदौर समाचार, यूएनआई, मुंबई के डीएफ कड़ाका के संपादकत्व में निकलने वाले अंग्रेजी साप्ताहिक दि करंट के भोपाल प्रतिनिधि रहकर काम करने का अवसर मिला। यह अनुभव भी फायदेमंद रहा।

 

आपातकाल : 1975 में आपातकाल लगा । मेरे अखबार पर तो पाबंदी लगा दी गई लेकिन मेरे संपर्कों और वैचारिक विरोधियों का भी मुझ पर विश्वास का नतीजा था मुझे हाथ नहीं लगाया। परेशान नहीं किया तब पत्रकार यूनियन के सारे ढाेंगी नेता किनाराकशी कर गए। कोई मदद या दिलासा नहीं दी। तीन माह बाद पाबंदी हटी। फिर से अखबार को खड़ा करने में साथियों के साथ जुटे, पत्रकारिता में संघर्ष अस्तित्व की रक्षा तथा अखबार को जनमानस से जोड़ने के संघर्ष का नया पाठ इस दौर ने सिखाया। लेकिन उस दौर के तनाव ने हाई ब्लड प्रेशर से स्थायी दोस्ती करा दी। फिर जुट गए।

 

सुखद संयोग : रिपोर्टर के बतौर और संपादक रहते हुए भी मुझे कांग्रेस, जनसंघ, प्रजा समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी आदि के प्रादेशिक एवं अखिल भारतीय सम्मेलनों के समाचार संकलन के अनेक अवसर मिले। पं. नेहरू, कृष्ण मेनन, आचार्य विनोबा भावे, पुरूषोत्तम दास टंडन, यशवंत राव चौहान, कामराज नाडार, मोरारजी देसाई, दीनदयाल उपाध्याय, जयप्रकाश नारायण, आचार्य कृपलानी, राममनोहर लोहिया, इंदिरा गांधी, अशोक मेहता, ए.के.गोपालन एवं भूपेश गुप्त आदि के समाचारों एवं पत्रकार वार्ताओं, भेंटवार्ताओं को कवर किया। राजेंद्र बाबू बात करने के अवसर मिले। जयप्रकाश जी कृपलानी जी, आचार्य नरेंद्र देव, लोहिया जी, अटल जी से तो अनेक बार भेंट के एवं बातचीत के सुअवसर मिले। इंदिरा जी से दो बार पृथक भेंटवाताएं ली। साहित्यकारों में दादा माखनलाल चतुर्वेदी, महादेवी वर्मा,बच्चन जी, रामधारी सिंह दिनकर, हरिशंकर परसाई, मुक्तिबोध, रामेश्वर गुरू,शेरी भोपाली, बालकवि बैरागी, प्रसिध्द पंजाबी व मराठी कवियों से भेंटवार्ताएं लेने एवं साथ ही बैठकर बात करने के जो सुअवसर मिले उससे आज लगता है वे स्वर्णिम क्षण थे। दादा माखनलाल द्वारा 1958 में प्रत्यक्ष बातचीत में कही गयी एक बात आज तक दिल दिमाग में गूंजती है- पत्रकार के लिए कलम ही सबसे बड़ी है, यह न रूकनी चाहिए और न झुकनी चाहिए न अटकनी चाहए और न भटकनी चाहिए। बडे-बड़े लेखकों, लेखक सम्मेलनों में अंतरंग चर्चा में उपस्थित होने का सौभाग्य मिला बड़े बडे लोगो से मिलने का यह सिलसिला अभी भी जारी है। दूसरी ओर पत्रकार के नाते कुख्यात डाकुओं, आतंकवादियाें, बड़े-बड़े कातिलों, अपराधियों, भ्रष्टाचार शिरोमणियों से भेंट व वार्ता के अवसर आए। डाकू समस्या के अध्ययन एवं लेखन के दौरान मेै देखकर दंग रह गया कि इस समस्या से राजनीति, जातिवाद, पूंंजीवाद और वोट बैंक की घृणित राजनीति कैसे जुड़े हुए हैं।

 

फिर आया नया मोड़ : 1978 में एक प्रसंग में दिल्ली आया तो पता चला कि ट्रिब्यून, चंडीगढ़ का हिंदी संस्करण निकलने वाला है यह लाहौर का अखबार है जो 1881 में शुरू हुआ था, और देश के विभाजन के बाद यहां आया। इसे एक ट्रस्ट चलाता है। सोचा यह अखिल भारतीय स्तर का होगा। क्या हर्ज है कोशिश करने में। चंडीगढ़ के एक परिचित पत्रकार मित्र से फोन पर बात की और बायोडाटा भेज दिया किसी को नहीं बताया तुरंत चंडीगढ़ से बुलावा आया और आने जाने का फर्स्ट क्लास का किराया देने की बात लिखी। जबलपुर में संपादक बनकर 1972 में आया था। सोचा अब बड़े क्षेत्र में काम करना चाहिए। युगधर्म में 22 साल हो गये थे। चुपचाप इंटरव्यू देने चला गया। चयन तो हो गया और जो कहा उतना वेतन भी देने को तैयार थे, लेकिन बोले नंबर दो पर रखेंगे संपादक तय कर चुके हैं। मैंने कहा फिर क्या फायदा? तो एक ट्रस्टी जो हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे बोले बहुत फायदा है। अभी तुम्हारी उम्र कम है आगे तुम ही संपादक बनोगे एक साल की छुट्टी लेकर 1978 में चंडीगढ़ चला गया। उन्होंने नियुक्त संपादक को तो आठ माह में चलता किया लेकिन दूसरे को लाकर संपादक बना दिया, मैंने इस्तीफा दे दिया था। फिर प्रेम भाटिया साहब के स्नेहपूर्ण आग्रह एवं आश्वासन पर वापिस ले लिया।  बाद में संपादक भी बन गया। वहां रहकर परिचय एवं कलम की पहचान का दायरा बढ़ा। पत्रकार के बतौर विशिष्ट पहचान मिली। ट्रिब्यून छोडे अब 17 साल हो गए हैं लेकिन वहां रहकर किए गए कार्य की पहचान अब तक कार्य करने में मदद कर रही है।

 

उसका संपादक रहते हुए हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और जम्मू कश्मीर के जन जीवन, जन समस्याओं को निकट से देखने, समझने और उन पर लिखने का अवसर मिला पंजाब के आतंकवाद को और आतंकवाद को और उसके पीछे छिपी ताकतों का पनपते और हावी होते निकट से देखा। उस समय काम करना कितना जोखिम भरा था।

 

वही रणनीति : भोपाल वाली रणनीति वहां भी काम आयी परस्पर घोर विरोधी चौधरी देवीलाल और चौधरी बंसीलाल दोनों का मुझे स्नेह और विश्वास मिला। बनारसी दास गुप्ता, चौ. भजनलाल, ओम प्रकाश चौटाला की आलोचना के बाद भी आपसी संबंधों में कभी नहीं खटकी। जब चौ. देवीलाल गर्दिश में थे मैंने उनको खूब छापा। उनका न्याय युध्द सफल