तुमसे मिलती हुई आवाज कहां से लाऊं
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हसन खान
उम्र की
रहगुजर पर चलते सालहा बीत गये,
अतीत का कोई जर्द पत्ता सरसराता हुआ जब मेरे सामने आ गिरता है
तब एक अजीब सी सिहरन मेरे तन बदन में झुरझुरी भर देती है। यकीनन मेरा रिश्ता उन
शहरों से तो नहीं है लेकिन मेरी आंखें आज भी उन परछाईयों का पीछा करती रहती हैं
तब यादों के दरीचों से कुछ जुगनुओं सा झिलमिल करता दिखाई देता है और फिर मैं
डूबता-उतराता बेशुमार यादों की लहरों में गहरे उतर जाता हूं ।
मेरा जीवन
मुसलसल संघर्षों का सहयात्री रहा है,
मेरे जुझारूपन ने ही मुझे आगे बढ़ाया। मैंने सदैव अपनी आंखों
में संभावनाओं का हिलोरें मारता हुआ समंदर देखा है और इसीलिए जेहन में हमेशा
सृजन की लालसा बिजलियों की तरह चमकती रही है॥ इसी कल्पनाशीलता ने मुझे रेडियो
में पहचान दी। बचपन में अपने बड़े भाई ऊर्दू के मशहूर अदीब जनाब शाहमीर राही की
उंगली पकड़कर आकाशवाणी- भोपाल जाया करता था। रेडियो का तिलिस्म तभी से मेरा
हमसफर बना और मैंने रेडियो में पहली बार नाटक में भाग लेने के लिए स्वर परीक्षण
दिया। चूंकि मैं स्कूल में नाटकों में अभिनय किया करता था,
इसलिए शायद रेडियो नाटक की स्वर परीक्षा में पास हो गया। बीए
कर रहा था और रेडियो के नाटकों में विभिन्न पात्रों का अभिनय भी करते हुए समय
बीतता रहा। जाने-अनजाने एक दिन मेरी आवाज और मेरे अभिनय की प्रशंसा रेडियो में
होने लगी और इस तरह रेडियो का मैं मान्य ए श्रेणी का कलाकार बन गया। अचानक एक
दिन घर संदेश आया कि दिल्ली से नाटकों के अखिल भारतीय कार्यक्रमों के प्रोडयूसर
श्री चिरंजीत आए हैं और मुझे बुलाया गया है। नाटकों के अखिल भारतीय कार्यक्रम
में एक घंटे का नाटक भोपाल केंद्र पर तैयार होना था। जिसे देश के सभी केंद्र
रिले करेंगे। नाटक प्रसिध्द लेखक शंकर शेष का लिखा हुआ था। मझली मां यह नाटक
भगवान श्रीराम की सौतेली माता कैकयी के जीवन पर आधारित था और मुझे इस नाटक में
मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम के अभिनय के लिए चुना गया। लक्ष्मण के अभिनय
के लिए वर्तमान में फिल्मों में अपनी पहचान बना चुके अभिताभ बच्चन के साढू श्री
राजीव वर्मा का चयन किया गया था। लक्ष्मण का चरित्र थोड़ा नटखटपन लिए था तथा
भगवान राम का जो चरित्र मुझे करना था, वह तो शालीन एवं
विराट मर्यादा के साथ करना था। मेरी उम्र उस समय अधिक नहीं थी,
ये कहा जाए कि लड़कपन था। मुझे याद है लाल टी शर्ट पहनकर हंसता
हुआ जब मैं दिल्ली से आए प्रोडयूसर श्री चिरंजीत के सामने खड़ा हुआ तो वह मुझे
देखकर कहने लगे- भाई, ये उद्ण्ड लड़का जिसके मुंह से
सिरगेट की बदबू आ रही है, ये क्या भगवान श्रीराम के
चरित्र को निभाएगा? मुझे आज भी याद है वो क्षण,
मैं रेडियो में अच्छे अभिनय के लिए जाना जाने लगा था। भोपाल
केंद्र से प्रसारित उन दिनों के प्रसिध्द कार्यक्रम युववाणी के सुप्रसिध्द
स्टार के रूप में भी मेरी ख्याति हो चुकी थी। दिल्ली से आए नाटक के चीफ
प्रोडयूसर श्री चिरंजीत की बातें सुनकर मैं खामोश रहा लेकिन नाटक मझली मां के
पहले ही दिन रिहर्सल में मैंने भगवान राम के चरित्र का अभिनय कर ऐसी छाप छोड़ी
कि प्रोडयूसर महोदय मुझे अब स्नेहिल नेत्रों से देख रहे थे और जब ये नाटक पूरे
देश में प्रसारित किया तब इस अभिनय से ही मुझे पहली बार अखिल भारतीय पहचान
मिली। मेरी आवाज की गंभीरता और उसकी खनक के लिए मुझे पहचाना जाने लगा। रेडियो
उद्धोषक के रूप में मेरी पहली पदस्थापना आकाशवाणी,
रायपुर में हुई थी। 1968 से 1971
तक तीन वर्षों से अधिक मैंने रायपुर केंद्र पर काम किया। मेरे
साथ केशरीप्रसाद वाजपेयी(बरसाती भैया), किशन गंगेले,
बिप्रत बोस और वीपी. साहू (बिसाहू भैया)कार्य करते थे। उन
दिनों रेडियो रायपुर में इन सभी लोगों का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था। जब मैं
नया-नया रायपुर केंद्र पर पहुंचा तब मेरा परिचय सिर्फ मेरी आवाज थी। सभी ने
मुझे पसंद किया। उन दिनों रायपुर से एक कार्यक्रम होता था- आपके मीत ये गीत ।
मैं हर रविवार को बहुत ही रोमांटिक तरीके से शेर-ओ शायरी के साथ बहुत भावुक
होकर इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करता था। क्या कहूं उम्र का तकाजा जो था नौ उम्र
, मेरी शादी भी नहीं हुई थी और मैं अपनी आवाज के जादू
के साथ पुराने फिल्मी दर्दीले गीत बजाता था तब रेडियो को लोग छोड़ते नहीं थे।
रेडियो रायपुर ने इस कार्यक्रम के द्वारा प्रसिध्द पाई और मुझे भी प्रसिध्दि
मिली। श्रोताओं के ढेरों खत आते विशेषकर लड़कियों के। इन खतों में गुलाब के फूल
बने होते और उनकी पंखुड़ियों में उनका अपना और मेरा नाम लिखा होता और यह भी लिखा
होता कि आपकी आवाज बहुत खूबसूरत है, मेहरबानी करके आप
अपना फोटो भेजिए। उन्हें क्या पता था कि मेरी सिर्फ आवाज ही अच्छी है,
सूरत की तो न पूछिए । फिर पत्रोत्तर कार्यक्रम के द्वारा इन
खतों के जवाब में यही कहता था-
घुडमुहा है
चेहरा,
आंख है पथरायी हुई।
इसलिए तस्वीरे
जां,
हमने खिंचवाई नहीं॥
रेडियो की
मैंने पूरे 37
वर्ष सेवा की। विभिन्न पदों पर रहा,
नाटक, कलाकार से रेडियो का जीवन आरंभ हुआ फिर उद्धोषक
हुआ, समाचार वाचक बना, हिंदी
प्रोडयूसर के लिए चयन हुआ फिर तब सहायक केंद्र निदेशक,
निदेशक तथा वरिष्ठ निदेशक के पद पर कार्य करते हुए रायपुर केंद्र से मई,
2003 में सेवानिवृत्त हुआ। रेडियो मेरी नस-नस में समाया हुआ
है। रेडियो मेरी सांसों में है। मेरी आंखों में है। मेरे खून के हर कतरे में
रेडियो की तरंगे हिलोरें लेती हैं। मेरा दिल मेरी संवेदनाएं,
मेरे जज्बात, मेरे अहसासात में और मेरे
मुख से निकलते हुए हर शब्द में हर तरफ रेडियो ही रेडियो नजर आता है। रेडियो एक
तिलिस्म है जिंदगी का, रेडियो तराना है इंसानी भावनाओं
का। रेडियो अमीरी-गरीबी नहीं देखता, रेडियो झोपड़ियों
में हैं, खेतों में है। रेडियो हर सुनने वाले को अपनी
आकर्षक बांहों में भर लेता है। उसे गुदगुदाता है,
हंसाता है और अपनी सुरीली तरंगों से मोहित करता है। रेडियो हर आम आदमी से उसकी
जिंदगी की बातें करता है। रेडियो चुनौतियां स्वीकार करता है। रेडियो समरसता
बिखेरता है। सद्भावना अर्पित करता है। प्यार बांटता है। रेडियो नफरत नहीं बल्कि
प्रेम का संदेश देता है। रेडियो अश्लीलता से नफरत करता है। रेडियो देश की
अखंडता के लिए वचनबध्द है और इसलिए रेडियो के लिए श्रोताओं के मन में बड़ा
सम्मान है। मेरे हमसफर रेडियो ने मुझे एक अलग सी पहचान दी। मैं उसका अहसानमंद
हूं क्योंकि मेरी पहचान ही मेरा वजूद है। विभिन्न पदों पर रहते हुए रेडियो पर
मैंने सामाजिक संस्कारों को कभी नहीं छोड़ा। मैैंने सदैव सामाजिक सौहार्द और
सद्भावना के कार्यक्रमों को तरजीह दी और इसलिए जब मैं कुछ दिनों के लिए रेडियो
श्रीनगर में गया तो राष्ट्रीय प्रेम से ओतप्रोत वादी की आवाज कार्यक्रम के
प्रस्तुतिकरण के लिए मुझे बेपनाह सराहना मिली। मैं हमेशा ऐसा ही भावभूमि के लिए
समर्पित रहा हूं। मुझे याद है जब मैं 1975 में
प्रोडयूसर के पद पर चयनित होकर पहली बार राजस्थान की धौरारी धरती बीकानेर गया
तो मैं वहां प्रसिध्द मांड गायिका अल्ला जिलाई बाई को देखकर अभिभूत हो गया।
उनकी उम्र उस समय 100 वर्ष को छू रही थी और जब मैंने
आकाशवाणी बीकानेर की एक संगीत सभा का संचालन करते हुए अल्ला जिलाई बाई को गाने
के लिए आमंत्रित किया । उन्होंने जो तान छेड़ी तो मैं एकटक होकर सुनता रहा वो गा
रही थीं- केसरिया बालम, आओ जी पधारो म्हारे देस। मैं इस
कंठ के जादू को कभी नहीं भुला पाया। राजस्थान की धौरों की धरती,
बीकानेर की बोली, वहां का सांस्कृतिक
वैभव, वहां की भुजिया ही नहीं,
वहां का हर व्यक्ति स्नेह बिखेरता है। वीरों और वीरांगनाओं की उस धरती को मैंने
सदैव नमन किया है क्योंकि वहां की वीरांगनाएं अपने सपूतों से कहती हैं-
इला न देंणी
आपणी,
हालरिया हुल राय।
पूत सिखावे
पालणौ,
मरण बड़ाइ माय॥
देशप्रेम और
अपनी धरती के लिए ऐसा पवित्र प्रेम मैंने राजस्थान की धरती पर ही देखा। वहां की
हर मां अपने बच्चे को पालने में सिखाती है,
बेटा धरती न देना प्राण न्यौछावर कर देना। ऐसी भावनाएं
रेगिस्तान के कण-कण में बसती हैं। एक वर्ष बाद ही बीकानेर से मेरा स्थानांतरण
राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर केंद्र के लिए हो गया। जहां मैंने अपने जीवन के
14 वर्ष व्यतीत किए । जयपुर के रेडियो के कार्यक्रमों
का और वहां के कलाकारों की उन दिनों पूरे देश में ख्याति थी । 1976
का वर्ष था, मुझे जयपुर केंद्र पर
ज्वाइन किए कुछ ही दिन हुए थे कि मुझे आदेश मिला कि तुरंत अजमेर जाना है। वहां
हजरत ख्वाजा गरीब नवाज का सालाना उर्स आयोजित है और मैं कवरेज टीम का इंचार्ज
हूं। सभी दायित्व मेरे हैं उन दिनों उर्स के दौरान की गई रिकार्डिंग राजस्थान
तथा देश के अनेकों आकाशवाणी केंद्रों से रिले की जाती थी। ऊर्दू सर्विस मुख्य
रूप से रिले करता था। पाकिस्तान तथा अन्य पड़ोसी देशों के लोग भी खूब सुनते थे।
उर्स की बड़ी ख्याति थी मैं आदेश मिलने के बाद से थोड़ा सहमा-सहमा सा था। मेरे एक
सहायक थे श्री नसीम जेब, केंद्र पर उद्धोषक थे। वह भी
मेरी अजमेर कवरेज की टीम में थे। उन्होंने मुझे हौसला दिया,
कुछ किताबें दीं। उनसे मैंने गरीब नवाज की जिंदगी को पहली बार
पढ़ा और उन्हें जाना, समझा। यकीनन गरीब नवाज वलियों के
वली हैं। मैं जब अजमेर पहुंचा तो देखा एक हुजूम, गरीब
नवाज के चाहने वालों का जो समंदर की तरह ठाठें मार रहा था। हर तरफ अकीदतमंदाने
गरीब नवाज और उनके परवाने दुनिया के गोशे-गोशे से अजमेर में आकर जमा हुए थे।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अनेकों मुल्कों के जायरीन
उर्स के मौके पर जमा होते हैं। पूरे उर्स के दौरान रेडियो कवरेज का काम बहुत
होता है। हर तरफ महफिले समां, हर जगह कव्वालियों का दौर
चलता रहता है, गरीब नवाज के आस्तानये आलिया पर बेपनाह
भीड़ होती है। बस सभी की जुबानों पर एक ही बात होती है-
दास का दिल
उदास है ख्वाजा,
आस्तानये पर
आस लाया हूं।
अब तो दामन
मुराद का भर दे,
आज मैं दिल की
प्यास लाया हूं॥
उर्स की कवरेज
एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है,
कई मुल्कों में इसे रेडियो के जरिए सुना जाता है। भारत की आन
है ख्वाजा, भारत की शान है ख्वाजा,
इसलिए हर शब्द तौलकर बोलना पड़ता था, हर
सांस को सुना जाता था।
चूंकि
पाकिस्तानी जत्था आता था उनके विचार भी उर्स की रेडियो रिपोर्ट में शामिल किए
जाते थे। मुझे याद है एक बार पाकिस्तानी जत्थे के लीडर वहां की सुप्रीम कोर्ट
के जस्टिस थे -जनाब अब्दुल रहमान चौधरी। मैं उन्हें रिकार्ड कर रहा था मेरे साथ
उस समय अजमेर के कलेक्टर तथा अन्य पदाधिकारी भी थे। मुझे याद है उन्होंने कहा
था कि- मैं भारत की एकता,
भाईचारा और यहां के धार्मिक सद्भाव पर फिदा हूं।भारत सूफी और
संतों का गहवारा है। मैं इस मुल्क के लिए गुलहाय अकीदत पेश करता हूं। मैंने
इसे पूरा इसी तरह रेडियो से ब्राडकास्ट किया था। बाद में पता चला कि पाकिस्तानी
अखबारों में भी रेडियो के कवरेज की खूब तारीफें छपी थीं। मैंने तब महसूस किया
था कि मुझे फख्र है अपने देश पर, मुझे नाज है अपने वतन
पर और मुझे गर्व है अपनी कौमी एकता पर। 14 वर्षों तक
मैंने अजमेर उर्स की कवरेज की और हर लम्हा मैंने ख्वाजा गरीब नवाज की खिदमत में
बिताया। ये लम्हे मुझे आज भी खुशियाेंं की शाहराह दिखाया करते हैं। अजमेर दरगाह
की बेमिसाल मर्सरतों के साथ-साथ मैंने मथुरा और वृंदावन की पावन कृष्णभूमि से
आनंद की अनुभूति भी अर्जित की है। मैं जब मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर से सीधे
प्रसारण के लिए भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की कमेन्ट्री के लिए चयनित हुआ तब
अचंभित तो था ही लेकिन खुश भी बहुत था। परंतु कहीं दिल के किसी कोने में कुछ
संकोच भी और डर भी उपज रहा था। मुझे याद है मेरे केंद्र निदेशक गिरीश चतुर्वेदी
जो स्वयं मथुरा के थे, उन्होंने मेरा इतना हौसला बढ़ाया
कि नियत तिथि यानि कृष्ण जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व मैं मथुरा पहुंच गया। मेरे
साथ कमेन्ट्री के लिए एक साथी और थे जो स्थानीय थे। मैं पूरे दिन कुछ डरा-डरा,
सहमा-सहमा रहा। चूंकि मैं मुस्लिम था इसलिए डरना भी स्वाभाविक
था। लेकिन मेरे गुरू श्री चतुर्वेदी जी का उत्साहवर्धन मेरे इतना काम आया कि
मैंने बहुत सुंदर ढंग, बडे अाकर्षक रूप से पूर्ण समर्पण
के साथ मैंने कमेन्ट्री की यानी कृष्ण जन्म का आंखों देखा हाल सुनाया था। मैं
धाराप्रवाह बोले जा रहा था। कार्यक्रम के बाद मुझे खूब सराहना मिली,
मुझे प्रशंसा का प्रसाद मिला । मथुरा के प्रबुध्दजनों ने मुझे
रसखान का नाम दे दिया। मैं आज भी सोचता हूं कि मैंने शायद रसखान के कृष्ण प्रेम
से अभिभूत हो यह कार्य किया था। मुस्लिम कवियों के कृष्ण प्रेम ने मुझे शक्ति
प्रदान की थी या शायद भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था ने ही मुझे
प्रसिध्दि के शिखर तक पहुंचाया था।
मैं अनवरत
37
वर्षों तक रेडियो के साथ जिया मैंने इस बीच प्रसारण के सैकड़ों
प्रतिमान स्थापित किए। मुझे आज भी याद है कि एक बार मैं मंच पर मशहूर गजल
गायिका बेगम अख्तर के कार्यक्रम का मंच संचालन कर रहा था। बेपनाह भीड़ थी और
श्रोता भी खूब उत्साहित थे। बेगम साहिबा बड़ी तमन्यता एवं दिल की गहराईयों के
साथ गजल गा रही थीं। अचानक किसी श्रोता ने सीटी बजा दी। बस फिर क्या था। बेगम
अख्तर का गुस्सा सातवें आसमान को छू रहा था। वे स्टेज छोड़कर अंदर चली गईं। हर
तरफ शोर ही शोर। मेरे केंद्र निदेशक बहुत घबराए हुए थे। लेकिन मैंने एक काम
बहुत अच्छा किया कि मैं लगातार मंच से बोले जा रहा था। मैंने इस बीच बहुत
खूबसूरत शेर सुनाए। मेरी आवाज का जादू काम करने लग गया। शोर थमने लगा। श्रोता
शायरी में डूबने लगे, मुझे याद है सीटी बजाने वाले को
तभी कुछ लोगों ने हाल से बाहर निकाल दिया। कुछ समय के बाद बेगम अख्तर पुन:
स्टेज पर आईं, उन्होंने मुझे मुस्कुराकर देखा,मेरा
हौसला बढ़ाया और जब मैंने उनसे उनकी मशहूर गजल की उद्धोषणा की। उनकी वह मशहूर
गजल थी- ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया और जैसे ही बेगम साहिबा ने अपनी
खूबसूरत आवाज से इस गजल को छुआ तो वहां उपस्थित सभी सुनने वालों को उनकी मोहक
आवाज उनके दिलों को छू रही थी और तब ये शेर अचानक ही मेरे लंबों में आ गया था-
उस नरगिसे
नाहीद की हर तान है दीपक
शोला सा लपक
जाये है आवाज तो देखो।
किसे भूलूं
किसे याद करूं। मैं मेरी हालत शायद अब ऐसी ही हो गई है। यादों का तिलिस्म जहां
खुशियां देता है वहीं वो कभी कभी दिल को बेचैन भी करता जाता है और जी चाहता है
कि मैं यहां हर लम्हे को निचोड़क़र रख दूं।
आने वाली
नस्लों तुम पर रश्क करेंगी ऐ लोगों,
उनको जब मालूम
ये होगा,
तुमने फिराक को देखा था।
हां,
मुझे फख्र है कि मैंने रघुपति सहाय फिराक यानि फिराक गोरखपुरी
को देखा ही नहीं बल्कि रेडियो के लिए उनसे इटंरव्यू भी किया था। जिसकी एक प्रति
उनकी खनकरदार आवाज के साथ मेरे पास आज भी महफूज है। बात 1976
की है- जयपुर के रामनिवास गार्डन में आयोजित एक मुशायरे में
उन्हें बुलाया गया था। इस मुशायरे की निजामत मैंने ही की थी। उन दिनों फिराक
साहब अलील थे, ठीक से खड़े नहीं हो पाते थे। मुशायरे में
भी उन्होंने बैठकर ही अपना कलाम पढ़ा था। ये शायद उनकी जिंदगी का आखिरी मुशायरा
था। मुशायरे में उन्होंने बेपनाह दाद लूटी। ऐसा लगता था कि लोग सिर्फ फिराक को
ही सुनने आए हैं। ये मुशायरा देर रात को खत्म हुआ। दूसरे दिन सुबह उनके होटल
जाकर, जहां फिराक साहब ठहरे थे। मैंने उनसे रेडियो के
लिए इंटरव्यू रिकार्ड किया था। उस वक्त वहां मौजूद कुछ सामइन भी थे। मुझे याद
है मैंने उनसे एक सवाल पूछा था कि फिराक साहब शायरी क्या है?
तब उन्होंने अपनी आंखों में चमक लाते हुए कहा था- मियां शायरी
ज्ञानी के आंसू हैं।
एक तवील
इंटरव्यू के बाद मैंने उनसे दरख्वास्त की थी कि फिराख साहब मेहरबानी करके ज्ञान
का एक मोती इस समय मौजूद सुनने वालों को भी अता कर दें। तब उन्होंने अपनी खनकती
हुई आवाज में जो शेर सुनाया था वह कुछ यूं था-
तुझ पे नजर
पड़ते ही ऐ जाने बहार,
संगीत की
सरहदों को छू लेता हूं।
एक घटना जो
मेरे मन में हिलोरे ले रही है,
उसे मैं कभी नहीं भुला सकता। बात 1982
की है देश में एशियाड खेल आरंभ होने वाले थे, इसके
प्रचार-प्रसार के लिए दूरदर्शन के लो पावर ट्रांसमीटर देश के साथ-साथ राजस्थान
के कुछ नगरों में भी स्थापित होने थे। चूंकि जयपुर दूरदर्शन उन दिनों केवल रिले
केंद्र था, स्टाफ कम था। इसलिए आकाशवाणी जयपुर को इनके
उदघाटन की जिम्मेदारी सौंपी गई। मुझे बाड़मेर में उद्धाटन की जिम्मेदारी सौंपी
गई, मैं गायकों-वादकों तथा लोक कलाकारों के साथ बाड़मेर
पहुंचा वहां उद्धाटन के अवसर पर एक रंगारंग संगीत सभा भी आयोजित की गई। समारोह
में बाड़मेर के वरिष्ठ सैनिक अधिकारी भी आमंत्रित किये गये थे। उन्हें यह
कार्यक्रम बहुत पसंद आया कार्यक्रम के बाद उन्होंने अनुरोध किया कि अगले दिन
शाम को भारत और पाकिस्तान बार्डर पर भारतीय सैनिकों के मनोरंजन के लिए यह
कार्यक्रम आयोजित किया जाए। दूसरे दिन हमारा कारवां जिसमें महिला कलाकार भी थीं,
बाडमेर से बार्डर की ओर बढ़ रहा था हर तरफ रेत के टीले ही टीले
नजर आ रहे थे। हम इन्हीं टीलों में भटक गए और अचानक हमारे ड्राइवर ने हमसे कहा
मालूम पड़ता है कि हम गलती से पाकिस्तानी सीमा में घुस गए हैं। हमने गाड़ियों रोक
दीं। डर के मारे हमारे चेहरे खौफजदा हो रहे थे। हम सब लोग भयभीत थे। ड्राइवर पर
गुस्सा आ रहा था लेकिन अचानक हमें कुछ सैनिक आते हुए दिखाई दिए । नजदीक आने पर
देखा, वह पाकिस्तानी सैनिक थे। उन्होंने हमें अदब के
साथ सलाम किया। मैंने सलाम का जवाब दिया लेकिन डर का यह आलम था कि बोलते नहीं
बन रहा था। उनमें से एक सैनिक ने हमसे कहा जनाब हमारे साथ चलें,
आप रास्ता भटक गये हैं। उनकी गाड़ी आगे चली और हम उनके पीछे
चले। हमारा डर और बढ़ता जा रहा था हम कहां जा रहे हैं हमें मालूम नहीं था हमारा
डर लम्हे -लम्हे बढ़ता जा रहा था। अचानक कुछ दूर पर हमें अपने भारतीय सैनिक
दिखाई पड़े, जो हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। पाकिस्तानी
सैनिकों ने ही हमें उन तक पहुंचाया था। लेकिन शाम को सैकड़ाें सैनिकों के सामने
जब हमने अपने संगीतमय कार्यक्रम का जादू बिखेरा तो सारा गम,
सारा खौफ खुशी में तब्दील हो चुका था। मैं इस कार्यक्रम का
संचालन कर रहा था। मैंने देखा बार्डर के उस पार कुछ ही दूरी पर पाकिस्तानी
सैनिक भी इस कार्यक्रम को देख रहे थे और जब एक देशभक्ति गीत के बाद मैंने ये
शेर पढ़ा-
आंधी से डरें
और न तूफां से डरेंगे।
ऐ देश तेरे
वास्ते हम कट भी मरेंगे॥
तब हमारे
सैनिकों की तलियों के साथ-साथ पाकिस्तानी सैनिकों ने भी तालियां बजाई थीं और
मैं महसूस कर रहा था,
मोहब्बत ने सारी सीमा रेखाएँ तोड़ दी हैं। हम एक थे,
हम एक हैं और हम एक रहेंगे। काश ये सीमाएं हम हमेशा के लिए तोड़
फेकें और हमारे प्याले मोहब्बत के जाम से लबरेज हो जाये। लम्हे मुट्ठी में रखी
रेत की मानिंद फिसलते जाते हैं ऐसा शायद सभी के साथ होता होगा। एक संस्मरण है
जो मेरे दिल में हलचल मचा रहा है। 1990 की बात है,
मैं भोपाल आकाशवाणी केंद्र पर सहायक केंद्र निदेशक था। यह तय
हुआ कि मध्यप्रदेश विधानसभा का बजट सत्र सीधे विधानसभा परिसर से आकाशवाणी भोपाल
द्वारा प्रसारित किया जाएगा, जिसे मध्यप्रदेश स्थित
अन्य आकाशवाणी केंद्र भी रिले करेंगे। शायद विधानसभा के इतिहास में ऐसा पहली
बार हो रहा था। मुझे इस प्रसारण की जिम्मेदारी दी गई और मुझे ही वहां से अपनी
आवाज में आंखों देखा हाल भी प्रसारित करना था। प्रसारण संबंधी सभी व्यवस्थाएं
पूर्ण कर ली गर्इं। हमारे लिए प्रसारण स्थल के रूप में विधानसभा की दर्शक
दीर्घा में एक स्थान नियत किया गया जहां से हमें नीचे सभा भवन की कार्यवाही का
आंखों देखा हाल तथा वित्तमंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट भाषण का प्रसारण करना था।
नियत समय पर विधानसभा अध्यक्ष अपनी आसंदी पर बैठ गये । मैंने लाइव उद्धोषणाएं
आरंभ कर दीं। अपनी आवाज के द्वारा विधानसभा कक्ष के वातावरण का मैंने एक चित्र
खींचना आरंभ कर दिया। बोल ही रहा था कि अचानक नीचे सभा भवन से शोर उठने लगा,
देखा कि सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष किसी बात पर आपस में झगड़ पड़े।
बस फिर क्या था, तुरंत नीचे सभा भवन से माइक काट दिया
गया। क्योंकि हमें विधानसभा की संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना था अब सिर्फ
मुझे ही बोलते रहना था मैं लगातार बोलता रहा, नीचे सभा
भवन में शोर थमने का नाम नहीं ले रहा था। मैंने मध्यप्रदेश के गौरव का वर्णन
आरंभ कर दिया। भोपाल के प्राकृतिक वर्णन से लेकर मध्यप्रदेश विधानसभा के इतिहास
का वर्णन। भोपाल की हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसालें,
भारत भवन की गरिमा पर अनवरत बाले जा रहा था। मेरे लिए यह क्षण किसी परीक्षा से
कम नहीं था। मैं इन क्षणों को जीवन में कभी नहीं भुला पाउंगा। मैं लगातार
35 मिनट तक बोलता रहा तभी अचानक मेरे भाग्य ने साथ दिया,
मैंने नीचे से अध्यक्ष महोदय की आवाज सुनी वे बजट प्रस्तुत
करने की आज्ञा दे रहे थे। मैंने तुरंत माइक्रोफोन का रूख उनकी तरफ मोड़ दिया और
फिर बजट सत्र का प्रसारण आरंभ हो गया। प्रसारण के बाद इस कार्यक्रम के लिए
श्रोताओं को बहुत पत्र आए, क्योंकि विधानसभा के इतिहास
में वहां की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण पहली बार सार्वजनिक रूप से रेडियो से
किया गया था। उन्हें क्या मालूम कि रेडियो के लोग किन-किन परीक्षाओं से गुजरते
हैं। लेकिन आकाशवाणी भोपाल को इसका श्रेय देते हुए तत्कालीन विधानसभा के सचिव
अशोक चतुर्वेदी ने इस प्रसारण को इतिहास के रूप में मध्यप्रदेश विधानसभा में
दर्ज कराया तथा उन्होंने अपने कई आलेखों में मेरे नाम के साथ इस वाकये का
उल्लेख भी किया है।