Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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बहस

 

 

भारत में चौंथे खंभे का पता-ठिकाना

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प्रो.ओमप्रकाश सिंह

 

भारत में चौथे खम्भे के पता-ठिकाने की मेरी खोज पूरी  हुई और साथ ही आप की प्रतीक्षा भी। जिस व्यक्ति ने मुझसे चौथे खम्भे का पता ठिकाना पूछा था वह व्यक्ति निश्चित समय पर मेरे पास आ ही गया। उसको देख मैं, मन ही मन अपनी खोज को दुहराने लगा। इसी बीच मुझे मौन देख उसने अपना प्रश्न फिर दुहराया। उसको तो चौथे खम्भे उर्फ प्रेस का पता-ठिकाना चाहिए। इसी बीच मैंने उससे फिर प्रश्न किया। मेरे प्रश्न का उद्देश्य न तो उसे भटकाना था और न ही परेशान करना था। मेरा उद्देश्य सिर्फ पिछली रामकहानी को याद दिलाना था। इसी कारण मैंने,उससे  पूछा था कि सिर्फ चारों स्तंभों की जानकारी। उसने मेरा प्रश्न सुनकर तुरन्त चारों खम्भों को गिनाना शुरू किया। ... पहला खम्भा सरकार, दूसरा खम्भा न्यायपालिका, तीसरा खम्भा जातिसम्प्रदाय और चौथा खम्भा प्रेस है। इसी के साथ उसने वह सवाल भी पूछा। जिसे सम्भवत: आप भी जानना ही चाहेंगे। उसकी जिज्ञासा  सामान्य थी। उसने यही पूछा था कि 'चारों खम्भों पर टिके उस भवन का नाम क्या है? प्रेस को चौथा खम्भा क्यों कहा गया? इस चौथे खम्भे उर्फ प्रेस का अर्थ क्या है?'

 

... उसके प्रश्नों की बाढ़ ने मुझे बीच में ही बोलने को विवश किया। आखिर मैं बोलता नहीं तो उसके इतने प्रश्न हो गए होते कि जिनके उत्तर के लिए इस पत्रिका नहीं बल्कि स्वतंत्र पुस्तक की ही जरूरत पड़ती। इसीलिए उसके प्रश्नों का उत्तर एक-एक कर देना शुरू किया। वह उत्तर भले नहीं जानता था पर आप तो जानते ही हैं कि चार खम्भों पर टिके जिस भवन की चर्चा हो रही है, उस भवन का नाम है 'लोकतंत्र'। वर्तमान में भारत का लोकतंत्र सरकार, पालिका, जातिसम्प्रदाय एवं प्रेस पर टिका है।  इसी उत्तर को मैंने दुहराया। इसके बाद मेरे सामने उसका दूसरा प्रश्न खड़ा था। लेकिन मैंने इस प्रश्न का उत्तर देने के पूर्व एक घटना का जिक्र किया। उस घटना को आपको भी बता देता हूं।  वाराणसी महानगर में एक भवन पर छापा पड़ा। यह छापा बनारस नहीं, बल्कि पंजाब की पुलिस ने डाला था। इस अवसर पर एक नवोदित पत्रकार सीधे मौके पर पहुंच गए। दोष उनका नहीं था। उन्होंने सुन रखा था कि प्रेस का पत्रकार कहीं भी फटक सकता है लेकिन उनको यहां फटकार मिली और पुलिस प्रशासन ने उन्हें भवन से बाहर कर दिया। बाहर निकलने पर घिसे-पिटे पुराने क्राइम  रिपोर्टर हंस-हंसकर उसे नए क्राइम रिपोर्टर की खबर ले रहे थे। यहां खबरची स्वयं के व्यवहार के कारण खबर बन गया था।... फिर इन खबरची लोगों की टोली पास में खड़ी सुरक्षा वैन के पास पहुंची। फिर नए क्राइम रिपोर्टर ने वैन में बैठे पुलिस वालों से छापे का कारण जानना चाहा। इन महोदय से पुलिस वालों ने ही प्रश्न किया। वह इनका परिचय पूछ रहा था। इसी बीच इनके मुख से उत्तर निकला...'हम प्रेस के लोग हैं।' इस उत्तर पर पुलिसिया उत्तर अजीब था। वैन के पुलिस कर्मी बोल पड़े, '... जाओ-जाओ हमें कपड़ा-वपड़ा नहीं प्रेस कराना है...' इस के बाद लाचार क्राइम रिपोर्टरों का समूह वहां से खिसका। नए क्राइम रिपोर्टर को यहीं प्रेस की सीमा का पता चला। साथ ही यह भी आभास हुआ कि प्रेस को अलग से कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। नागरिक के रूप में जो अधिकार व्यक्ति को मिले हैं उन्हीं अधिकारों का प्रयोग व्यक्ति प्रेस में सम्पादक, पत्रकार आदि के रूप में करता है।

 

मेरे इस उत्तर से उसके मन में प्रेस एवं पत्रकार के अधिकार और सीमा की स्पष्ट तस्वीर अंकित हो गई। इसी क्रम में मैंने उसे प्रेस के चौथे खम्भे का रहस्य भी बताया। उस रहस्य को आप भी शायद जानने के इच्छुक होंगे। विकास और शक्ति दोनों ही दृष्टियों से प्रेस चौथे पायदान पर रहा। सरकार रूपी पहले खम्भे से ही राजनीतिक समाज की यात्रा शुरू हुई। इसकी शक्ति भी व्यापक है। सब काम करने की क्षमता सरकार की इसलिए वह पहला खम्भा बनी। न्याय व्यवस्था की आवश्यकता विकास क्रम में बाद में हुई। हर घटना, हर कार्य के स्थान पर कभी-कभी उत्पन्न समस्याओं और विवादों के समाधान के कारण न्यायपालिका दूसरा खम्भा बनी। शक्ति एवं विकास क्रम में भारत में जातिसम्प्रदाय की शक्ति अभी भी बनी है। चाहे 1857 की क्रांति हो अथवा आज के लोकतंत्र का संचालन। जाति-सम्प्रदाय का सिर गिन-गिनकर टिकट बंटता है और उसी से लोकतंत्र भी चलता है। दल के नेता जातीय सम्मेलन करते हैं। नकारात्मक जातिसम्प्रदाय दलों से भी अधिक प्रभावी है। इसी कारण पश्चिम में चर्च तीसरा खम्भा है तो भारत में जाति -सम्प्रदाय। अब रही बात प्रेस की तो इसका विकास क्रम भी अन्त में रहा। प्रेस सभी काम नहीं करता यह तो सिर्फ जनता के व्यवहार और इच्छा को अभिव्यक्ति देता है और इसी सूचनाओं को फैलाता है। वास्तव में प्रेस प्रत्यक्ष कार्यशील न होकर सिर्फ वैचारिक शक्ति अथवा इच्छा और विचार शक्ति को व्यक्त करता है। इसी कारण वह चौथे पायदन पर गिना जाता है। वैसे भी समाज में देखें तो पुलिसिया बल या अन्य बलों के मुकाबले विचारवान और विद्वान की चकाचौंध नहीं होती। यही दशा प्रेस की थी। इसी कारण प्रेस चौथे पायदान पर खड़ा मिला। यह अपवाद है कि दृश्य श्रव्य होने के बाद प्रेस में चकाचौंध बढ़ी है पर शक्ति एवं कार्य के लिए अभी भी लोकतंत्र के अन्य तीनों खम्भों पर ही वह अर्थात् प्रेस खड़ा है।  ... इस प्रकार उसका प्रश्न घट रहा था और मेरा उत्तर बढ़ रहा था। अब भी उसका मूल प्रश्न शेष था। इसकी इच्छा प्रेस को समझने की थी। क्याेंकि इसी प्रेस को ही चौथा खम्भा कहा गया है। प्रेस समझ में आ जाय तो चौथा खम्भा भी सामने होगा। प्रेस के भिन्न-भिन्न अर्थ समाज में प्रचलित हैं। एक तो वहीं है जिसे पुलिसवालों ने क्राइम रिपोर्टरों से दुहराया था। अर्थात कपड़ा प्रेस वाली प्रेस। दूसरा भाव समाज में चलता है प्रिटिंग प्रेस अथवा छापेखाने का। तीसरा प्रेस का वह स्वरूप अथवा अर्थ है जिसे चौथा खम्भा कहा जाता है। इसी को बिलबर श्रेम ने 'प्रेस के चार सिध्दांतों' में स्थान दिया। लेकिन प्रेस को लेकर पत्रकारिता जगत में भी भ्रम है। क्योंकि कुछ लोग प्रेस का अर्थ छपाई की प्रवृत्ति या व्यवहार से जुड़े होने के कारण समाचार पत्र-पत्रिका से ही जोड़ते हैं। शेष पत्रकारिता जगत को वे प्रेस से काट जैसा देते हैं। ... यह सच नहीं है। इन्हीं भ्रमों के कारण उस व्यक्ति को प्रेस का पता-ठिकाना नहीं मिल रहा था। वह आदमी शरीफ निकला कि उसने प्रेस का पता-ठिकाना पूछने का प्रयास किया। लेकिन हमारे-आप के बीच अनेक हैं, जो प्रेस का अर्थ जानते भी नहीं परन्तु उसे पूछते नहीं। इससे तो प्रश्न करने वाला बड़ा है।

 

... इस विचार-विमर्श के बाद मैं 'प्रेस' के ही उत्तर की ओर बढ़ता हूं। मेरी इच्छा न तो इस लेख और बहस को लम्बा खींचने की है। इसीलिए मैं 'प्रेस' के अर्थ पर आ रहा हूं। वैसे आप भले प्रेस का अर्थ जानते हैं, पर मैं आपके लिए नहीं वरन प्रश्नकर्ता और उनके लिए प्रेस का अर्थ बता रहा हूं, जो अपरिचित हैं। वास्तव में प्रेस शब्द व्यापक है। इस में अर्थात प्रेस में समाचार पत्र, पत्रिका के अलावा रेडियो, टेलीविजन, केबल या अन्य चैनल, साइबर मीडिया के समाचार विभाग अथवा अनुभाग और इसमें कार्य करने वाले पत्रकार एवं छायाकार आते हैं। मेरे इस उत्तर को सुनकर उस व्यक्ति ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी। तो इसी की खोज थी। वह इसी अर्थ रूपी पते-ठिकाने के लिए भटक रहा था। इसके बाद प्रश्नकर्ता ही इस समस्या का व्याख्याता बन गया। अब वह प्रेस अथवा चौथे खम्भे से भ्रम की भीड़ हटाना शुरू किया। उसने दुहराया कि प्रेस में साहित्यिक, धार्मिक आदि चैनल एवं रेडियो, टेलीविजन प्रसारण तथा प्रकाशन नहीं आते। यही साइबर मीडिया पर भी लागू होता है। इसी कारण प्रेस सिर्फ सभी मीडिया की समचार सेवा का ही नाम है।  इस समाचार सेवा में लगे संवाददाता, रिपोर्टर, संपादक आदि प्रेस हैं। लेकिन प्रेस में मीडिया के मशीनमैन, व्यवस्थापक आदि नहीं आते हैं। अब वह व्यक्ति 'प्रेस' का अर्थ समझ चुकाया और उसका पता ठिकाना भी। इसी चर्चा के बीच उसने प्रश्न किया। वह प्रश्न भी जायज था। क्योंकि 'प्रेस' के बीच क्या उन्हें भी रखा जाय जो कभी-कभार अपने निजी प्रभाव के विस्तार के लिए एक छोटी-मोटी खबर छपवाकर स्वयं पत्रकार बन कर पत्रकारिता जगत को नाग की तरह डस कर विषाक्त करते हैं? यही प्रश्न उसने किया। वास्तव में यही दलाल व्यवहार पत्रकारिता में ट्रांसफर, प्रमोशन, घूस आदि का निषिध्द कार्य करता है। यह पत्रकारिता नहीं दलाली है। अपने नाम छपी खबर किसी खबर को लोगों को दिखाकर काम साधना वास्तव में पत्रकारिता की साधना नहीं है। इसी बीच ऐसे लोगों पर यह भी सवाल उठता है कि जब नाम को ही बेचना है तो खबर लिखने की भी फुर्सत नहीं होगी। तो ऐसे अपवित्र लोग पवित्र खबर थी दूसरों से ही लिखवाकर अपनी पीठ ठोंकते हैं।... इस प्रकार के अनेक व्यवहारों को क्या प्रेस कह सकते हैं? यह भी प्रश्न उसका था।

 

...वास्तव में उसने ऊपर जो-जो प्रश्न किया वह सब तो पत्रकारिता को अपवाद व्यवहार हैं। इसके लिए हमारी भ्रष्ट पत्रकारिता  एक व्यवहार है। उस व्यवहार को पत्रकार मूर्त रूप देता है। वह 'प्रेस' का व्यवहार नहीं क्योंकि 'समाचार' व्यवहार के अलावा जो भी घटता है अथवा जो भी करता है वह 'प्रेस' का व्यवहार नहीं क्योंकि 'समाचार' व्यवहार के अलावा जो भी घटता है अथवा जो भी करता है वह 'प्रेस' नहीं। इस कारण कथित पत्रकार बन कर समाज में भयादोहन करने वाला व्यवहार 'प्रेस' न होकर 'पथभ्रष्ट' पत्रकारिता है। इतना सुनने के बाद उसने फिर दुहराना शुरू किया कि समाचार पत्र-पत्रिका के अलावा रेडियो, टेलीविजन, केबिन पर डिश-चैनलों एवं साइबर मीडिया की समाचार सेवा एवं इस समाचार सेवा में काम करने वाले लोग ही 'प्रेस' अर्थात चौथे खम्भे की रामकहानी का पता चला, साथ ही उसे चौथे खम्भे उर्फ प्रेस का पता-ठिकाना मिला। इसी बीच आपकी प्रतीक्षा भी पूरी हुई और मेरी बहस तथा लेख भी पूरा हुआ। 

 

लेखक देश के महत्वपूर्ण जनसंचार विशेषज्ञ । जनसंचार पर कई पुस्तकें प्रकाशित । संप्रति काशी विद्यापीठ के महामना मालवीय पत्रकारिता संस्थान, वाराणासी में पत्रकारिता के प्रोफेसर हैं ।

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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