Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

स्वरूप बदलने से ही बचेगी प्रासंगिकता

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काकेश कुमार

 

ब हम रेडियो शब्द सुनते हैं तो दिमाग में छवि उभरती है एक छोटे से बक्से की जो कान उमेठने पर बोलने लगता था, मुझे याद है हमारे बचपन में रेडियो ही नियमित मनोरंजन का साथी होता था पर आज रेडियो का स्वरूप काफी हद तक बदल गया है क्या भविष्य में रेडियो बचा रहेगा? कैसा होगा भविष्य के रेडियो का स्वरूप? जब हम छोटे थे तो हमारे पास फिलिप्स का एक तीन बैंड का रेडियो हुआ करता था। यह वह जमाना था जब रेडियो अपेक्षाकृत बड़े आकार का होता था और ये बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि उस समय तीन बैंड के रेडियो पर सरकार को टैक्स भी देना होता था। जो पोस्टआफिस में जमा किया जाता था, एक पासबुक के आकार की पुस्तिका होती थी, जिसमें टैक्स जमा करने पर गोल- गोल मोहर लगा दी जाती थी, जहां तक मुझे याद है ये टैक्स 12 रूपया सालाना होता था।

 

उस समय रेडियो सुनना एक व्यक्तिगत अनुभव न होकर एक सामुहिक अनुभव होता था, सुबह आठ बजे जब हिन्दी समाचार आते थे तो घर के समस्त सदस्यों के कान रेडियो पर लग जाते थे, उस समय एक कार्यक्रम आता था ब्रज भारती सुबह 7.10 मिनट पर। उसी समय हमें स्कूल के लिये निकलना होता था तो मन ही नहीं करता था कि स्कूल जायें, विविध भारती बहुत प्रचलित था। विविध भारती का जयमाला कार्यक्रम हो या रात को 9 बजे बाद प्रसारित होने वाले प्रायोजित कार्यक्रम सभी बड़े शौक से सुने जाते थे। धीरे-धीरे रेडियो का स्वरूप बदला, टेलीविजन के आने से रेडियो की लोकप्रियता कम हुई फिर एफ.एम चैनल का अवतरण हुआ, आज इंटरनैट के जरिये भी रेडियो को सुना जा सकता है, अब सैटेलाइट रेडियो भी है और पाडकास्टिंग भी। बहुत से लोगों का मानना है कि पाडकास्टिंग और सेटेलाइट रेडियो के आने से अब रेडियो धीरे धीरे समाप्त हो जायेगा, मैं इससे पूरी तरह सहमत नही हूं लेकिन मेरा मानना है कि धीरे-धीरे रेडियो को अपना स्वरूप बदलना पड़ेगा और रेडियो के जिन्दा रहने के लिये यह जरूरी भी है। आज के वातावरण में कुछ गंभीर सवाल उठते हैं जिनके बारे में सोचना जरूरी है।

 

आप रेडियो सुनना क्यों पसंद करेंगे जब आपकी पसंद का संगीत इंटरनेट या अन्य माध्यम जैसे आई-पॉड, एम पी 3 प्लेयर आदि के जरिये जब चाहें जहां चाहें उपलब्ध हो, जब इस तरह के माध्यम से प्राप्त संगीत की गुणवत्ता रेडियो वाले संगीत से काफी बेहतर हो। जब इस तरह के संगीत के बीच -बीच विज्ञापनों की वजह से कोई व्यवधान भी ना हो, जब इस तरह के संगीत के लिये कोई निर्धारित समय ना हो यानि आप जब इसे सुनना चाहें तब सुन सकें। फिर भी यदि आज का रेडियो अपने स्वरूप को थोड़ा परिवर्तित कर कुछ नये अनुप्रयोग करे तो उसे विलुप्त होने से बचाया जा सकता। आज संगीत रेडियो के पारंपरिक बक्से से ही उपलब्ध ना होकर विभिन्न माध्यमों से उपलब्ध है जैसे आपका मोबाईल फोन, आई पॉड, आपका कम्प्यूटर या लैपटोप ये सभी आपको उच्च कोटि की गुणवत्ता वाला संगीत उपलब्ध करा सकते हैं। ऐसे में यदि पारंपरिक रेडियो इन सभी माध्यमों से उपलब्ध हो तो उसकी उपयोगिता बढ़ सकती है, रेडियो को अपनी पारंपरिक सोच से ऊपर उठना होगा और साथ ही अपने आप को अन्य माध्यमों से अलग और उत्तम भी सिध्द करना होगा, यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो पायेंगे कि रेडियो की अवधारणा संगीत उपलब्ध कराने के लिये नही वरन पैसा बनाने की सोच से प्रारंभ हुई। आज एफ.एम. के जमाने में भी जो रेडियो स्टेशन है उनका मूल ध्येय भी रेडियो के माध्यम से पैसा कमाना ही है। ये सही है कि रेडियो को चलाये रखने में धन की आवश्यकता है लेकिन यदि मूल ध्येय संगीत या जानकारी को श्रोता तक पहुंचाना हो तो धन गौण हो जाता है, ऐसे में सारा ध्यान श्रोता के अच्छे अनुभव की ओर रहता है ना कि पैसे की ओर।

 

भविष्य के रेडियो के लिये कुछ प्रमुख बिन्दु जिन्हें अपनाया जा सकता है वो निम्न हैं-

1.     रेडियो केवल संगीत का ही पर्याय न बने वो जानकारी और सूचना का श्रोत भी बने, जैसे यदि आप कोई फिल्मी गीत रेडियो में सुने तो उस गीत से संबंधित जानकारी रेडियो द्वारा दी जा सकती है।

2.     रेडियो एक ऐसे माध्यम में बदले जहां श्रोता कार्यक्रमों में भागीदारी भी कर सकें।

3.     श्रोताओं को अपनी पसंद चुनने की सुविधा हो साथ ही समय की कोई सीमा ना हो यानि श्रोता जब रेडियो सुनना चाहे तब वह उपलब्ध हो।

4.     बीच -बीच में व्यवधान उत्पन्न करने वाले विज्ञापनों से रेडियो को निजात मिले, ऐसे में सवाल यह उठता है कि फिर रेडियो खुद को बनाये रखने के लियेकमायेगा कहॉ से, इसके लिए कुछ नये तरीके खोजने होंगे। जिनसे व्यवधान भी उत्पन्न ना हो और कमाई भी की जा सके।

5.     रेडियो उस तरह के संगीत और कंटेंट का श्रोत बने जो आम तौर पर उपलब्ध ना हो, ऐसे में रेडियो को रचनात्मक (क्रियेटिव) होना पड़ेगा।

6.     रेडियो अपने स्वरूप को समय -समय पर बदलते रहे और नयी तकनीक को आत्मसात करता रहे।

7.     रेडियो हर तरह के माध्यम से उपलब्ध हो चाहे वो इंटरनेट हो या पॉडकास्टिंग।

8.     रेडियो आपको एक मशीनी संवाद की बजाय एक व्यक्तिगत संवाद प्रदान कर सकता है, जहां आप एक रेडियो जॉकी की सुन सकते हैं, रेडियो की इसी खूबी को और अच्छी तरह से प्रस्तुत करना होगा।

9.     रेडियो को यह समझ लेना होगा कि श्रोता ही रेडियो को चलाने वाले हैं इसलिए उन की पसंद ना पसंद का ख्याल रखना होगा।

10. अपने नये रूप में रेडियो श्रोताओं को मौका दे सकता है कि वो भी अपने शो बनाएं और उन्हें रेडियो के माध्यम से प्रसारित करें, श्रोता अपनी अपनी गली मुहल्ले के रिपोर्टर भी बन सकते हैं।

11. रेडियो की सूचना अन्य माध्यम जैसे प्रिंट मीडिया, इंटरनेट आदि पर भी उपलब्ध हो, रेडियो शो के रिव्यू करने का अधिकार श्रोता का भी हो।

12. रेडियो थीम पर आधारित कार्यक्रम करे जिसमें हर वर्ग और पसंद के लोंगों के लिए कार्यक्रम हो।

भविष्य के रेडियो के सामने ढेरों सवाल हैं, लेकिन यदि रेडियो अपनी मानसिकता बदलने को तैयार हो तो उन सवालों के जवाब भी है, देखना ये है कि क्या रेडियो अपनी मानसिकता बदलेगा या बदलने को मजबूर होगा। यही रेडियो के भविष्य का निर्धारण करेगा।

 

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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