Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

रेडियो को गंभीर बनाना होगा

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भव्य श्रीवास्तव

 

विविध भारती के दर्शकों को हमारा नमस्कार। इस जुमले को कई सौ आवाजों में सुनने वाला देश अब गानों के बीच कुलबुला रहा है। आकाशवाणी ने आज गानवाणी का रूप ले लिया है। एक दौर में जिसे जनवाणी सी लोकप्रियता हासिल रही हो, आज वो समय की गति को अलग-अलग गानों से नाप रहा है।

 

क्यों, क्या इसे रेडियो की नई फ्रीकवेंसी कहना उचित होगा। क्या महानगरों को गाना सुनाता रेडियो आज उपादेय माना जा रहा है। क्या भारतीय फिल्मी गानों में ही देश को गुनगुनाना भाता है। सवाल कई हैं और जवाब एक है। रेडियो ने वक्त के साथ अपने आप को बदल लिया है। या कहें कि रेडियो की मधुर आवाजों को सरकार सूचना में तब्दील होने से रोक रही है। ये कमी दोनों किनारों पर है। एक ओर रेडियो को केवल मनोरंजन का हाकर मानकर हर दिन एफएम चैनल नए नए कलेवरों में गीत संगीत बजा रहे हैं, वही सरकार उन्हें सूचना और संचार के समाचारीय रूख में तब्दील होने में बाधा बनी हुई है।

 

क्या डर है सरकार को। रेडियो आज के जमाने में सबसे सस्ता जनसंचार माध्यम है। रेडियो को सुनने और बजाने पर किसी तरह का टैक्स नहीं है और इसकी पहुंच गांव से लेकर शहर तक रही है। सरकार को इसका पता है। लेकिन वो अभी आश्वस्त इसलिए नहीं है कि क्योंकि किसी भी निजी रेडियो चैनल ने अपनी सोच और समझ से किसी किस्म की गंभीरता नहीं दिखाई है। व्यवसाय की जिस डोर को निजी रेडियो थामें हैं, वो अब बाजार के उत्पादों, सेवाओं पर केन्द्रित हो चली है। और इससे जुड़े व्यवसाय को वो पूरी तरह भुना भी रहा है। ऐसे में सरकार का बाधा बना कदम इस ओर भी संकेत करता है कि कहीं किसी हित को साधने के लिए निजी चैनल समाज के एक भाग को गलत जानकारी न देने लगे। केवल निजी रेडियो पर ही आने वाले विज्ञापनों को देखें तो पता चलता है कि रेडियो एक ऐसा कन्फैक्शनरी स्टोर हो चला है जहां घर से लेकर हर सामान उपलब्ध है। रेडियो की ताकत है आवाज और पहुंच। रेडियो ने आजादी के पहले और बाद में इसे महसूस भी कराया। आज भी सामुदायिक रेडियो से लाभांवित होने वाले गावों, समुदायों को ये पता है कि किस तरह रेडियो की बातें उन्हें तरह-तरह की जानकारियां देकर मजबूत बना रही हैं। रेडियो को गंभीर बनना होगा। मनोरंजन के साथ जानकारी की पेशकश करनी होगी। उसकी पहचान आज दुकान में रखे साबुन जैसी है जो दूर से एक जैसे लगते है। ऐसे में समय बिताने के लिए उनको बजाना तो ठीक है, लेकिन उसका सही इस्तेमाल करना अभी बाकी है।

 

लेखक स्टार न्यूज, दिल्ली में एसोसिएट प्रोडयूसर हैं

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