आ अब लौट चलें
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सृजन
शिल्पी
गांवों
के देश भारत में,
जहां तीन चौथाई आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। बहुसंख्यक
आम जनता को खुशहाल और शक्तिसंपन्न बनाने में पत्रकारिता की निर्णायक भूमिका हो
सकती है। विडंबना की बात यह है कि अभी तक पत्रकारिता का मुख्य फोकस सत्ता की
उठापटक वाली राजनीति और कारोबार जगत की ऐसी हलचलों की ओर रहा है,
जिसका आम जनता के जीवन-स्तर में बेहतरी लाने से कोई वास्तविक
सरोकार नहीं होता। पत्रकारिता अभी तक मुख्य रूप से महानगरों और सत्ता के
गलियारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों की खबरें समाचार
माध्यमों में तभी स्थान पाती हैं जब किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा या व्यापक हिंसा
के कारण बहुत से लोगों की जानें चली जाती हैं।
सूचना में
शक्ति होती है। लंबे संघर्ष के बाद दो वर्ष पहले लागू हुए सूचना का अधिकार
अधिनियम, 2005
के जरिए नागरिकों को सूचना का अधिकार हासिल हुआ। लेकिन
बहुसंख्य जनता इस अधिकार का व्यापक और वास्तविक लाभ अब भी नहीं उठा पा रही है,
क्योंकि आम जनता अपने दैनिक जीवन के संघर्षों और रोजी रोटी का
जुगाड़ करने में ही इस कदर उलझी रहती है कि उसे संविधान और कानून द्वारा प्रदत्त
अधिकारों का लाभ उठा सकने के उपायों को अमल में लाने की चेष्टा करने का अवसर ही
नहीं मिल पाता। उन्हें अब भी सूचना के लिए प्रेस और मीडिया का ही मुख्य सहारा
है। ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा, गरीबी और परिवहन
व्यवस्था की बदहाली की वजह से समाचार पत्र-पत्रिकाओं का लाभ सुदूर गांव-देहात
की जनता नहीं उठा पाती। बिजली और केबल कनेक्शन के अभाव में टेलीविजन भी ग्रामीण
क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाता। ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा सशक्त माध्यम बचता है
जो सुगमता से सुदूर गांवों-देहातों में रहने वाले जन-जन तक बिना किसी बाधा के
पहुंचता है। रेडियो आम जनता का माध्यम है और इसकी पहुंच हर जगह है,
इसलिए ग्रामीण पत्रकारिता के ध्वजवाहक की भूमिका रेडियो को ही
निभानी पड़ेगी। रेडियो के माध्यम से ग्रामीण पत्रकारिता को नई बुलंदियों तक
पहुंचाया जा सकता है और पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए आयाम खोले जा सकते
हैं। इसके लिए रेडियो को अपना मिशन महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वरूप को
साकार करने को बनाना पड़ेगा और उसको ध्यान में रखते हुए अपने कार्यक्रमों के
स्वरूप और सामग्री में अनुकूल परिवर्तन करने होंगे। निश्चित रूप से इस अभियान
में रेडियो की भूमिका केवल एक उत्प्रेरक की ही होगी। रेडियो एवं अन्य जनसंचार
माध्यम सूचना, ज्ञान और मनोरंजन के माध्यम से जनचेतना
को जगाने और सक्रिय करने का ही काम कर सकते हैं। लेकिन वास्तविक सक्रियता तो
ग्राम पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले पढ़े-लिखे नौजवानों और
विद्यार्थियों को दिखानी होगी। इसके लिए रेडियो को अपने कार्यक्रमों में दोतरफा
संवाद को अधिक से अधिक बढ़ाना होगा ताकि ग्रामीण इलाकों की जनता पत्रों और
टेलीफोन के माध्यम से अपनी बात, अपनी समस्या,
अपने सुझाव और अपनी शिकायतें विशेषज्ञों तथा सरकार एवं
जनप्रतिनिधियों तक पहुंचा सके। खासकर खेती-बाड़ी,
स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़े बहुत से सवाल,
बहुत सारी परेशानियां ग्रामीण लोगों के पास होती हैं,
जिनका संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञ रेडियो के माध्यम से
आसानी से समाधान कर सकते हैं। रेडियो को 'इंटरेक्विट'
बनाकर ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में वे मुकाम हासिल किए
जा सकते हैं जिसे दिल्ली और मुम्बई से संचालित होने वाले टी.वी. चैनल और
राजधानियों तथा महानगरों से निकलने वाले मुख्य धारा के अखबार और नामी समाचार
पत्रिकाएं अभी तक हासिल नहीं कर पाई हैं।
टी.वी. चैनलों
और बड़े अखबारों की सीमा यह है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने संवाददाताओं और
छायाकारों को स्थायी रूप से तैनात नहीं कर पाते। कैरियर की दृष्टि से कोई
सुप्रशिक्षित पत्रकार ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता कर क्षेत्र बनाने
के लिए ग्रामीण इलाकों में लंबे समय तक कार्य करने के लिए तैयार नहीं होता। कुल
मिलाकर,
ग्रामीण पत्रकारिता की जो भी झलक विभिन्न समाचार माध्यमों में
आज मिल पाती है, उसका श्रेय अधिकांशत: जिला मुख्यालयों
में रहकर अंशकालिक रूप से काम करने वाले अप्रशिक्षित पत्रकारों को जाता है,
जिन्हें स्ट्रिंगर कहा जाता है,
जिन्हें अपनी मेहनत के बदले में समुचित पारिश्रमिक तक नहीं मिल पाता। इसलिए कई
बार वे ऐसे अनैतिक उपायों द्वारा भी पैसा कमाने की कोशिश करते हैं जो पत्रकारों
के लिए कतई शोभनीय नहीं। इसलिए आवश्यक यह है कि नई ऊर्जा से लैस प्रतिभावान
युवा पत्रकार अच्छे संस्थानों से प्रशिक्षण हासिल करने के बाद ग्रामीण
पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए उत्साह से आगे आएं। इस
क्षेत्र में काम करने और कैरियर बनाने की दृष्टि से भी अपार संभावनाएं हैं। यह
उनका नैतिक दायित्व भी बनता है।
आखिर देश की
80
प्रतिशत जनता, जिनके बलबूते पर हमारे
यहां सरकारें बनती हैं, जिनके नाम पर सारी राजनीति की
जाती हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक योगदान
करते हैं, उन्हें पत्रकारिता के मुख्य फोकस में लाया ही
जाना चाहिए। मीडिया को नेताओं, अभिनेताओं और बड़े
खिलाड़ियों के पीछे भागने की बजाय उस आम जनता की तरफ रूख करना चाहिए,
जो गांवों में रहती है, जिसके दम पर यह
देश और उसकी सारी व्यवस्था चलती है।
पत्रकारिता
जनता और सरकार के बीच,
समस्या और समाधान के बीच, व्यक्ति और
समाज के बीच, गांव और शहर के बीच,
देश और दुनिया के बीच, उपभोक्ता और
बाजार के बीच सेतु का काम करती है। यदि यह अपनी भूमिका सही मायने में निभाए तो
हमारे देश की तस्वीर वास्तव में बदल सकती है। सरकार जनता के हितों के लिए तमाम
कार्यक्रम बनाती है, नीतियां तैयार करती है,
कानून बनाती है, योजनाएं शुरू करती है,
सड़क, बिजली,
स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक भवन
आदि जैसी मूलभूत संरचनाओं के विकास के लिए फंड उपलब्ध कराती है,
लेकिन उनका लाभ कैसे उठाना है, उसकी
जानकारी ग्रामीण जनता को नहीं होती। इसलिए प्रशासन को लापरवाही और भ्रष्टाचार
में लिप्त होने का मौका मिल जाता है। जन-प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद जनता के
प्रति बेखबर हो जाते हैं और अपने किए हुए वायदे जानबूझकर भूल जाते हैं।
ज्ञान-विज्ञान
के क्षेत्र में नई-नई खोजें रहती हैं,
शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में नए-नए द्वार खुलते रहते हैं,
स्वास्थ्य, कृषि और ग्रामीण उद्योग के
क्षेत्र की समस्याओं का समाधान निकलता है, जीवन में
प्रगति करने की नई संभावनाओं का पता चलता है। इन नई जानकारियों को ग्रामीण जनता
तक पहुंचाने के लिए तथा सरकार पर जनता के लिए लगातार काम करने हेतु दबाव बढ़ाने,
प्रशासन के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार को उजागर करने,
जनता की सामूहिक चेतना को जगाने,
उन्हें उनके अधिकारों औरर् कत्तव्यों को बोध कराने के लिए पत्रकारिता को ही
मुस्तैदी और निर्भीकता से आगे आना होगा। किसी प्राकृतिक आपदा की आशंका के प्रति
समय रहते जनता को सावधान करने, उन्हें बचाव के उपायों
की जानकारी देने और आपदा एवं महामारी से निपटने के लिए आवश्यक सूचना और जानकारी
पहुंचाने में जनसंचार माध्यमों, खासकर रेडियो की भूमिका
बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
पत्रकारिता
आमतौर पर नकारात्मक विधा मानी जाती है,
जिसकी नजर हमेशा नकारात्मक पहलुओं पर रहती है,
लेकिन ग्रामीण पत्रकारिता सकारात्मक और स्वस्थ पत्रकारिता का
क्षेत्र है। भूमण्डलीकरण और सूचना-क्रांति ने जहां पूरे विश्व को एक गांव के
रूप में तब्दील कर दिया है, वहीं ग्रामीण पत्रकारिता
गांवों को वैश्विक परिदृश्य पर स्थापित कर सकती है। गांवों में हमारी प्राचीन
संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ला
सकती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां यदि मीडिया के माध्यम से धीरे-धीरे ग्रामीण
उपभोक्ताओं में अपनी पैठ जमाने का प्रयास कर रही हैं तो ग्रामीण पत्रकारिता के
माध्यम से गांवों की हस्तकला के लिए बाजार और रोजगार भी जुटाया जा सकता है।
ग्रामीण किसानों, घरेलू महिलाओं और छात्रों के लिए बहुत
से उपयोगी कार्यक्रम भी शुरू किए जा सकते हैं जो उनकी शिक्षा और रोजगार को आगे
बढ़ाने का माध्यम बन सकते हैं।
इसके लिए
ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी सृजनकारी भूमिका को पहचानने की जरूरत है। अपनी
अनन्त संभावनाओं का विकास करने एवं नए-नए आयामों को खोलने के लिए ग्रामीण
पत्रकारिता को इस समय प्रयोगों और चुनौतियों के दौर से गुजरना होगा।
कम्युनिटी
रेडियो ग्रामीण पत्रकारिता का मुख्य ध्वजवाहक बन सकता है। आपको यह जानकर
आश्चर्य होगा कि कर्नाटक के एक छोटे से गांव बूडीकोट में भारत के पहले स्वतंत्र
कम्युनिटी रेडियो के द्वारा आज हो रहे बदलाव की खबर को सितम्बर
2003
में वाशिंगटन पोस्ट में कवर किया गया था, लेकिन भारतीय
मीडिया में इसकी खास चर्चा नहीं हुई। कम्युनिटी रेडियो के मामले में हमारा देश
अपने पडाेसी नेपाल और श्रीलंका से भी काफी पीछे है। यहां एफएम रेडियो के
लाइसेंस निजीक्षेत्र के बड़े व्यावसायिक मीडिया घरानों को दिए गए हैं। कम्युनिटी
रेडियो के लाइसेंस कुछेक बड़े शैक्षिक संस्थानों को दिए गए हैं। लेकिन बिहार के
एक छोटे से कस्बे वैशाली से एक ग्रामीण युवा द्वारा चलाए जा रहे एक लोकप्रिय
स्थानीय निजी रेडियो स्टेशन को सरकार ने बंद करा दिया। जब गांवों में पत्रकार
होंगे और वहां के ऐसे हालात की खबरें मीडिया में आएंगी तो डॉक्टर,
शिक्षक आदि भी गांवों में जाकर काम करने के लिए बाध्य होंगे।
पत्रकार ही इसे सुनिश्चित करा सकते हैं।
अपनी व्यापक पहुंच के कारण ही रेडियो जनसंचार का एक अत्यंत
संवेदनशील माध्यम है और सरकार इस बात के प्रति अत्यंत सचेत है। इसीलिए सरकार ने
निजी क्षेत्र के टीवी न्यूज चैनलों को समाचार प्रसारित करने की इजाजत नहीं दी
है, जबकि निजी क्षेत्र के टीवी न्यूज चैनलों को
समाचारों के नाम पर कुछ भी अगड़म-बगड़म फूहड़ हास्य और अश्लील मनोरंजन तक दिखाने
की खुली छूट मिली हुई है। सरकार को इस मामले में विरोधाभास और विसंगति को खत्म
करना पड़ेगा। कम से कम रेडियो को भी इस मामले में उतनी ही स्वतंत्रता मिलनी
चाहिए जितनी प्रिंट पत्रकारिता और इलेक्ट्रानिक टीवी पत्रकारिता को मिली हुई
है।
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