Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

देखिए यहां हैं रेडियो कैसे-कैसे

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संजीव गुप्ता

 

लेक्ट्रानिक मीडिया के सबसे सरल, सुलभ और सस्ते साधन के रूप में रेडियो की पहचान आज भी वैसी ही है, जैसे पहले हुआ करती थी। रेडियो इलेक्ट्रानिक मीडिया का सर्वाधिक लोकप्रिय साधन है। प्रौद्योगिकी के बढ़ते-बढ़ते आज रेडियो की तकनीक एवं स्वरूप में भी बहुत परिवर्तन हुआ है। आइये जानते हैं रेडियो के कैसे-कैसे रूप आज देखने-सुनने को उपलब्ध हैं।

 

1. हैम रेडियो : 1915 में वायरलैस टेलीग्राफी के समय अप्रशिक्षित, गैर प्रतिस्पर्धी आपरेटरों को हैम कहा जाता था। हैम संबोधन अपमान का सूचक था। नौसिखिए आपरेटरों को हैम नाम से व्यावसायिक वायरलेस सेवा प्रदाता आपरेटर पुकारते थे। 1920 के दौरान कुछ उत्साही नौसिखिए हैम शब्द को बड़े गर्व से अपने शौक को बताने के लिए करते थे। हैम शब्द की उत्पत्ति के संबंध में कुछ गलत भ्रांतियां भी हैं।

 

2. ए.एम. रेडियो : दुनिया में ए.एम. प्रसारण वर्ष 1920 के लगभग शुरू हुआ था। ए.एम. का अर्थ होता है एम्पलीटयूड माडयूलेशन इस तकनीक में रेडियो तंरगों के प्रसारण के दौरान कैरियर सिग्नल के एम्पलीटयूड को प्रसारित सिग्नल के एम्पलीटयूड के संदर्भ में परिवर्तित किया जाता है। शुरू में ए.एम. रेडियो स्टेशन ही होते थे। आकाशवाणी शार्ट वेब तथा मीडियम वेब द्वारा ए.एम. रेडियो का प्रसारण करता रहा है। ए.एम रेडियो तकनीक की खूबी है कि इसके सिग्नल को साधारण उपकरण भी टयून करके पकड़ सकता है अर्थात आवाज सुनी जा सकती है। इन साधारण रेडियो सेट्स में पॉवर की खपत भी नाम मात्र की होती है। ए.एम. प्रसारण वेब में 530 से 1700 केएचजेड फ्रीकेन्वसी के बीच होता है। जिस मानक प्रसारण बैंड कहा जाता है।

 

3. एफ.एम रेडियो : एफएम रेडियो का अविष्कार 1930 के आसपास एडबिन एच. आर्मस्ट्रांग ने किया था। ए.एम. रेडियो प्रसारण में अंर्तरोध की समस्या से निपटने के लिए एफएम रेडियो तकनीक का जन्म हुआ था। ए.एम. रेडियो प्रसारण विद्युतकीय तरंगों तड़ित तथा विद्युत चुंबकीय गतिरोधों से अत्याधिक प्रभावित होता है तथा रात्रि में इसके सिग्नल कमजोर होने की संभावना रहती है। जबकि एफ.एम. प्रसारण में इन दोनों समस्याओं के लिए कोई जगह नहीं है। एफ.एम रेडियो में उच्च आवाज फिडेलिटी तथा स्टीरियो प्रसारण बहुत सामान्य बात है। एफ.एम. रेडियो प्रसारण फ्रीकेबन्सी 88 से 108 एमएचजेड है चूंकि एफ.एम. रेडियो फ्रीकेबेन्सी काफी उच्च है जो मेगाहर्ट्स में है जबकि ए.एम.  रेडियो फ्रीकेबेन्सी किलोहर्टस में है, इसलिए जहां ए.एम. रेडियो के दो चैनलों के मध्य अंतर गैप 10 केएचजेड होता है, वहीं एफ.एम. रेडियो में न्यूनतम 200 केएचजेड है अर्थात 0.2 एमएचजेड होता है, जिससे दो चैनलों के मध्य अंर्तरोध की समस्या नगण्य हो जाती है, तथा दिन और रात के रेडियो प्रसारण में एक समान आवाज की स्पष्टता हो सकी। 1940 में न्यू इंग्लैंड में यानकी नेटवर्क से एफ.एम. रेडियो सेवा मूलत: आरंभ हुई। किंतु ए.एम. रेडियो प्रसारण को इससे कोई खतरा नहीं हुआ, क्योंकि इसके प्रसारण को सुनने के लिए विशेष उपकरण की आवश्यकता पड़ती थी। 1960 से 1970 तक ए.एम. रेडियो सेवा प्रदाता अपने कार्यक्रमों को एफ.एम रेडियो पर भी साथ-साथ प्रसारित करने लगे। सत्तर के दशक में एफसीसी द्वारा साथ साथ प्रसारण को रोका गया। तब एक ही रेडियो सेट में ए.एम. तथा एफएम सिग्नल को टयून करने की सुविधा वाले उपकरण उपलब्ध होना शुरू हुए धीरे-धीरे एफ.एम. रेडियो दुनिया के शहरों में लोकप्रिय होता रहा है, वहीं ए.एम. रेडियो गांवों में आज भी लोकप्रिय बना हुआ है।

 

4. सामुदायिक रेडियो : कम्युनिटी रेडियो या सामुदायिक रेडियो का सीधा अर्थ है कि यह स्थानीय स्तर पर किसी क्षेत्र विशेष की जरूरतों को पूरा करता है। ऐसे समुदाय या क्षेत्र की उपेक्षा सामान्यत: बड़े लोकप्रिय रेडियो प्रसारण द्वारा की जाती है वहां पर सामुदायिक रेडियो इस उपेक्षित क्षेत्र के श्रोताओं की स्थानीय भाषा और बोलियों में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। अमेरिका, कनाडा तथा आस्टे्रलिया जैसे देशों में सामुदायिक रेडयो गैर व्यावसायिक तथा बिना लाभ के उद्देश्यों के लिए शुरू किए गए।  भारत में भी  1995 में माननीय उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय पर कि एयरबेब्स आर पब्लिक प्रापर्टी अर्थात हवाई तरंग जनता की संपत्ति है। इस निर्णय के बाद शैक्षणिक परिसरों में सामुदायिक रेडियो प्रसारण की प्रेरणा मिली।

 

5. सैटेलाइट रेडियो : उपग्रह की सहायता से रेडियो कार्यक्रमों को सुनना ही सैटेलाइट रेडियो है। सेटेलाइट रेडियो, संचार उपग्रह से प्रसारित सिग्नल ग्रहण करता है जो बहुत बड़े भू भाग को कव्हर करता है, जबकि भौगोलिक रेडियो सिग्नल स्टेशन सीमित भू भाग में ही प्रसारण करता है। इसको हम लंबी यात्रा के दौरान अपनी कार में बिना बार -बार टयून करें लगातार एक ही स्टेशन के प्रसारण को स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं। जब हम विभिन्न शहरों से गुजरते हुए लंबी ट्रिप पर जाते हैं तो प्रत्येक 45 से 60 किलोमीटर बाद हमें अपने कार के रेडियो को टयून करना पड़ता था और बीच -बीच में सिग्नल भी कमजोर होता रहता था। किंतु सैटेलाइट रेडियो में इन मुसीबताेंे से छुटकारा मिल गया है। अब हम दुनिया के कोई भी रेडियो चैनल को जिसका प्रसारण उपग्रह की मदद से हो रहा है। सैटेलाइट रेडियो की मदद से आसानी से यात्रा के दौरान भी सुन सकते हैं।

 

सैटेलाइट रेडियो को डिजिटल रेडियो भी कहते हैं क्योंकि इसकी आवाज एकदम स्पष्ट बिना रूकावट के तथा सीडी गुणवत्ता वाली सुनाई पड़ती है। सैटेलाइट रेडियो को हम सब्सक्रिपशन रेडियो भी कहते हैं। क्योंकि इसको सुनने के लिए  हमको वार्षिक फीस देनी होती है। भारत में बीपीएल तथा टाटा द्वारा सर्विस उपलब्ध की गई है। जिसका सबसक्रिप्शन चार्ज रू. 1800 प्रतिवर्ष लगभग है। उपग्रह रेडियो का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। वर्ष 1992 में एफसीसी ने एस बैंड पर राष्ट्रव्यापी प्रसारण उपग्रह आधारित डिजीटल आडियो रेडियो सर्विस डीएआरएस के लिए लायसेंस के ऑफर प्रस्तुत किए और 1997 में सिर्फ दो कंपनी सिरियस सैटेलाइट रेडियो तथा एक्स एम. सेटेलाइट रेडियो को लायसेंस दिये गए। बाद में तीसरी कंपनी बर्ल्डस्पेस को भी लायसेंस प्रदान किया गया जो यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका में सेवा प्रदाता है।

 

6. डिजीटल रेडियो : डिजीटल रेडियो प्रसारण सेवा सर्वप्रथम यूरोप में शुरू हुई फिर इसके बाद यूनाइटेड स्टेटस में । यह सेवा यू.के. में 1995, जर्मनी में 1999 में आरंभ हुई। यूरोपियन सिस्टम में इसको डिजीटल ऑडियो ब्राडकास्टिंग नाम से तथा यूनाइटेड स्टेटस में एचडी रेडियो कहा जाता है ऐसा माना जाता है कि सन् 2015 से 2020 तक डिजीटल रेडियो कम से कम विकसित देशों में छा जाएगा।

 

7. स्काई रेडियो :  रेडियो जब जमीन पर इतना लोकप्रिय हो चुका है तो भला आसमां में उड़ान भरते समय इसे कैसे भूल सकते हैं? हवाई जहाज यात्रियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दुनिया में स्काई रेडियो नेटवर्क की शुरूआत हुई। दुनिया की कुछ बड़ी एयरलाइन कंपनी जैसे अमेरिकन, डेल्टा, नार्थवेस्ट, यूएस एयर, यूनाइटेड तथा अमेरिका बेस्ट अपने हवाई यात्रियों को स्काई रेडियो का आनंद उपलब्ध करवा रही हैं। स्काई रेडियो का उद्देश्य होता है अपने एक्सीक्यूटिव वर्ग उच्च व्यवसाय वर्ग यात्रियो की हवाई यात्रा को लाभप्रद जानकारियों से युक्त मधुर अनुभव में बदलना। इसलिए स्काई रेडियो सर्विस व्यवसाय , प्रौद्योगिकी,स्वास्थ्य संगीत और मनोरंजन से भरपूर कार्यक्रम पेश करती हैं। जिसमें उच्च कंपनी के सीईओ के साक्षात्कार उद्योगों की खास बातें बिजनेस में नए-नए चलन तथा विशेष रूचि के मुद्दों पर लगातार 24 घंटे हफ्ते के सात दिन कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। इनके श्रोतागण होते हैं प्रतिवर्ष 09 लाख से ज्यादा हवाई उड़ानों के लगभग 18.5 करोड़ हवाई यात्री।

 

8. इंटरनेट रेडियो : इंटरनेट की मदद से आडियो  प्रसारण करने वाली सेवा ही इंटरनेट रेडियो है। जिसको बेबकास्टिंग कहना ज्यादा उपयुक्त होगा क्योंकि हम इंटरनेट पर व्यापक रूप से तारों की सहायता से प्रसारण न करकेवर्ल्ड वाइड बेब पर आडियो सामग्री को डालते हैं। इंटरनेट रेडियो स्टेशन को हम दुनिया में कहीं से भी सुन सकते हैं। बस आपके पास इंटरनेट कनेक्शन होना चाहिए। इंटरनेट पर परंपरागत रेडियो के समान टयूनिंग करना संभव नहीं होता है। अत: हम विभिन्न रेडियो प्रसारणों को सर्च इंजन की सहायता से ढूंढते है इंटरनेट रेडियो पर शास्त्रीय संगीत,खेल, संवाद चौबीस घंटे हंसी मजाक के कार्यक्रम राक संगीत इत्यादि विविध रेडियो कार्यक्रम सुने जा सकते हैं। 

 

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि भोपाल के दृश्य-श्रव्य अध्ययन केंद्र मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया पाठ्यक्रम के समन्वयक हैं ।

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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