एक नई दुनिया बना रहा है रेडियो
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संजय कुमार
मीडिया
के बढ़ते कोलाहल के बीच इसके विभिन्न आयामों का हल्लाबोल जारी है। रेडियो के बाद
टेलीविजन की दुनिया और उसके बाद खबरिया चैनलों (सेटेलाइट टीवी) के जन्म,
फिर संचार क्रांति ने इंटरनेट की दुनिया स्थापित कर मीडिया को
व्यापक बनाते हुए उसे सहज और आम कर दिया है। तो वहीं मीडिया के नए आयामों के
आने से दूसरे के दबे जाने की बात भी उठी। कहा जाने लगा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया
के तेवर के सामने प्रिंट मीडिया का प्रभाव कम हो जाएगा। उसी तरह रेडियो के बारे
में भी सवाल उठे। बल्कि लोगों ने मान भी लिया कि रेडियो की मौत हो गई?
हालांकि हकीकत कुछ और ही है। रेडियो कल भी था और आज भी है। हां,
थोड़े देर के लिए यह स्वीकार किया जा सकता है कि जिस तरह नई खोज
या चीजें जब सामने आती हैं तो पुरानी चीजों पर से लोगों की नजरें कुछ समय के
लिए हट जाती है। और यही रेडियो के साथ भी हुआ। मीडिया के विभिन्न आयामों ने
कुछ हद तक रेडियो को भी प्रभावित किया, लेकिन पूरी तरह
नहीं। क्योंकि इसका अपना खास वर्ग शुरू से साथ रहा है।
अब कहा जा रहा
है कि रेडियो की वापसी हो गई और रेडियो क्रांति का दौर जोरों पर है। दरअसल
मीडियम और शार्टवेव की इस मनोरंजन दुनिया में अब एफएम रेडियो मेट्रो शहरों में
परचम लहराते हुए जहां आम व खास सभी को रेडियो के करीब ले आया है,
वहीं छोटे शहरों में भी गिरफ्त में लेने की कवायद जारी है।
दूसरी ओर सरकार की अनुमति के बाद पिछले कुछ दिनों से सामुदायिक रेडियो भी पैर
पसारने की जुगत में है। बिहार में तो राज्य सरकार खुद हर प्रखंड स्तर पर एफएम
और सामुदायिक रेडियो स्थापित करने की दिशा में सक्रिय होने पर सोच रही है।
संचार क्रांति ने रेडियो को सेटेलाइट टी.वी. की तरह डी.टी.एच पर भी ला दिया है।
इससे टी.वी. सेट पर रेडियो का आनंद लिया जा रहा है।
एफएम के
धमाकेदार आगाज और सामुदायिक रेडियो के बढ़ते कदम से सवाल उठने लगा है कि
टेलीविजन के प्रभाव से दबे रेडियो की एक बार फिर से वापसी हो रही है। सच है कि
टेलीविजन और सेटेलाइट चैनलों ने कुछ हद तक रेडियो को अपने गिरफ्त में लिया
लेकिन पूरी तरह से नहीं। इसका प्रभाव केवल शहरी क्षेत्रों में ही देखा गया।
जहां रेडियो सेट डब्बे में बंद हो गए और टी.वी. सेट एवं इंटरनेट ने कब्जा जमा
लिया। वहीं,
ग्रामीण व कस्बाई क्षेत्रों में रेडियो अपने तेवर के साथ जमा
रहा और आज भी जमा है। हां, यह अलग बात है कि इन
क्षेत्रों में एफएम को अगर पहुंचा दिया जाए तो इसकी पहुंच संख्या खबरिया चैनलों
और टेलीविजन के टी.आर.पी. को यकीनन पछाड़ देगी। इसकी वजह यह है कि आज बीस रुपए
में भी एफएम रेडियो मिल रहा है। खासतौर से युवा इसे खरीद रहे हैं और रेडियो का
रसास्वादन कर रहे हैं। तो वहीं मोबाइल फोन पर भी एफएम रेडियो को बड़े पैमाने पर
सुना जा रहा है।
पिछले कई
वर्षों से रेडियो,
खासकर समाचार से जुड़े रहने के अनुभव ने मेरे भी पूर्वाग्रह को
तोड़ा कि लोग रेडियो नहीं सुनते हैं और सुनते भी हैं तो केवल गाने। दावे के साथ
कह सकता हूं कि ऐसा नहीं है। नौकरी के दौरान करीब तीन वर्ष पूर्र्वोत्तर के
सबसे संवेदनशील राज्य नागालैंड की राजधानी कोहिमा में रहा। आकाशवाणी कोहिमा में
कार्य करते हुए महसूस ही नहीं बल्कि देखा-सुना भी कि दुर्गम पहाड़ी व सुदूर गांव
में जहां मनोरंजन व सूचना पाने का कोई जरिया नहीं वहां के लोग रेडियो ही सुनते
हैं। और वह भी अपनी बोलियों में। दरअसल नागालैंड में 16
से ज्यादा जनजातियां है और वे एक दूसरे की बोलियां अक्सर नहीं
समझते हैं। ऐसे में रेडियो ही उनका एक मात्र सहारा है। आकाशवाणी कोहिमा
16 बोलियों में कार्यक्रम और प्रादेशिक समाचार का प्रसारण
रोजाना करता है। जनसाधारण और अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति को मनोरंजन व सूचना
पाने का एक मात्र माध्यम रेडियो की पहुंच केवल नागालैण्ड के लोगों तक ही सीमित
नहीं है। बल्कि देश के वे सभी ग्रामीण क्षेत्र शामिल हैं जहां टेलीविजन और
सेटेलाइट चैनलों की पहुंच नहीं है। अगर है भी तो गांवों में बिजली और गरीबी की
समस्या की वजह से वे जुड़ नहीं पाते। ऐसे में उनके लिए रेडियो ही एकमात्र सहारा
बचता है। हालांकि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीविजन और सेटेलाइट चैनल्स
पहुंचे हैं लेकिन अभी भी रेडियो सुनने वालों की संख्या ज्यादा है। भारत में
उपलब्ध जनसंचार के माध्यमों से रेडियो प्रसारण सबसे सशक्त माध्यम है। जहां कई
प्रकार की विभिन्नताएं विद्यमान हैं और अभी भी अखबारों या टी.वी. चैनलों की
पहुंच बहुत कम है। ऐसे में रेडियो ही लोगों को सूचना देने के साथ-साथ शिक्षित
करने में अहम भूमिका निभा रहा है।
जहां तक बिहार
का सवाल है तो यहां के गांवों में कल भी रेडियो की धूम थी और आज भी है। खासकर
चौपाल और प्रादेशिक समाचार सुनने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। शाम
7.30
बजे ही गांव घर के चौपाल व दलानों पर रेडियो से प्रादेशिक समाचार बुलेटिन की
गूंज सुनाई पड़ने लगती है। यही हाल देश के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों का है। गांव
घर के लिए आज भी रेडियो ही एक मात्र समाचार, मनोरंजन
एवं सूचना पाने का सरल और सहज माध्यम बना हुआ है। और तो और पिछले दिनों बिहार
के वैशाली जिले में एक युवक ने खुद का रेडियो चैनल ही खोल डाला और गांव वालों
को उनकी पसंद के गाने सुनाने लगा। देखते ही देखते उसकी लोकप्रियता बढ़ गई।
हालांकि बिना अनुमति से इस प्रसारण को सरकारी हस्तक्षेप से बंद करवा दिया गया।
कहने का तात्पर्य यह है कि रेडियो की मांग बरकरार है ऐसे में एफ.एम. एवं
सामुदायिक रेडियो मैदान में आते है तो ये यकीनन अन्य माध्यमों पर भारी पड़ेंगे।
दूसरी ओर सवाल उठ रहा है कि रेडियो की एक बार फिर वापसी हो रही है। तो यहां
सबसे बड़ा सवाल यह है कि रेडियो की तो कभी मौत हुई ही नहीं बल्कि इससे और ज्यादा
विस्तार पा लिया है। प्राइमरी चैनल के बाद रेडियो को और ज्यादा व्यापक धारदार
बनाने के लिए एफ.एम. ने आकर इसके स्वरूप को ही बदल दिया है। मनोरंजन के साथ-साथ
समाचार व सूचना ने आम खास लोगों को प्रभावित किया। वहीं सामुदायिक रेडियो एक
अलग इतिहास रचने की फिराक में हैं।
मीडिया के
बाहरी चकाचौंध ने हकीकत को दरकिनार कर दिया है। जहां ग्रामीण क्षेत्रों में
रेडियो की पकड़ कायम रही,
वहीं एफ.एम. क्रांति ने मेट्रो के श्रोताओं को अपनी ओर खींचने
में जबरदस्त कामयाबी पाई। आंकड़े बताते हैं कि आधुनिक होते मीडिया के बीच रेडियो
का जलवा बरकरार है। देश भर में अकेले आकशवाणी 91.42
प्रतिशत क्षेत्र और 99.13 प्रतिशत जनसंख्या को कवर करता
है। इससे बड़ा जनसंचार का माध्यम शायद ही कोई दूसरा है। वहीं सरकारी आकड़ों के
अनुसार देश में रेनबो और गोल्ड एफ.एम. की पहुंच 14 करोड़
लोगों से भी ज्यादा है और एक दिन में श्रोताओं की संख्या 4
करोड़ से ज्यादा है। देश भर में आकाशवाणी के प्राइमरी चैनल शहरी और ग्रामीण
क्षेत्रों में कुल 56 प्रतिशत लोगों को कवर करते है।
रेडियो सुनने
वालों की संख्या कम नहीं हो रही है। बल्कि दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। अकेले
दिल्ली में 47.7
प्रतिशत लोग रेनबो, 52.5 प्रतिशत गोल्ड,
48.8 प्रतिशत मिरची, रेड एफ.एम.
26 और रेडियो सिटी को 42 प्रतिशत लोग
सुनते हैं। उसी तरह मुंबई में रेनबो-51.2, गोल्ड
44.2, मिरची 45.8, रेड एफ.एम.
22.6, रेडियो सिटी 27.4, प्रतिशत लोग
सुनते हैं। देश भर में एफ.एम. रेनबो सुनने वालों का प्रतिशत अकेले 42
है जबकि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई
एवं चेन्नई में 27.9 प्रतिशत लोग गोल्ड सुनते हैं।
आम और खास का
सशक्त माध्यम रेडियो का पहला विश्व प्रासरण
1916
में हुआ था। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव के बारे में खबर समाचार
पत्रों में छपने से कई घंटे पहले ही ध्वनि तरंगों में बदलकर लोगों तक पहुंचाया
गया। इस प्रयोग ने हर ओर तहलका मचा दिया। पहली बार ऐसा हुआ कि छपने से पहले खबर
लोगों तक पहुंची। देखते ही देखते प्रोपेगेंडा खबरों में तब्दील हो गया और
रेडियो तरंगों का इस्तेमाल खबरों के प्रसारण के लिए किया जाने लगा। 1919
में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में एक निगम 'रेडियो
कारपोरेशन ऑफ अमेरिका' बना। बाद में पिट्सवर्ग में
ब्रॉडकास्टिंग की स्थापना हुई, और इस तरह से 21
दिसम्बर 1922 को विश्व के प्रथम रेडियो प्रसारण का जन्म
हुआ।
प्रथम
पंचवर्षीय योजना तक देश के लगभग एक तिहाई क्षेत्र तक आकाशवाणी की पहुंच थी।
रेडियो स्वदेशी सेवा के तहत
46
विदेशी सेवा के तहत 16 भाषाओं में 72
समाचार बुलेटिनों का प्रसारण करने लगा था और रेडियो सेटों की
संख्या 10,29,816 हो गई थी। 03
अक्टूबर, 1957 को रेडियो से संगीत कार्यक्रम विविध
भारती सेवा का प्रसारण किया गया जो रेडियो सिलॉन के मुकाबले के मद्देनजर था।
इसी वर्ष ऑल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर आकाशवाणी कर दिया गया। दूसरी पंचवर्षीय
योजना के दौरान आकाशवाणी का प्रसारण देश के हर भाग तक पहुंचने लगा था। इसी
दौरान 15 सितम्बर 1959 को
दूरदर्शन की प्रायोगिक सेवा शुरू हुई।
यों तो
आकाशवाणी के प्रसारणों में कृषि एवं ग्रामीण,
समाचार मनोरंजन, शिक्षा एवं जानकारी
कार्यक्रम प्रमुख है। लेकिन आकाशवाणी का सबसे मजबूत पहलू है समाचार प्रसार,
जो अन्य प्रसारणों की तुलना में एक अलग पहचान रखता है। जैसा कि
शुरूआती दौर में रेडियो तरंग का इस्तेमाल प्रोपेगेंडा के तहत किया गया था और
खबर लोगों तक पहुंचाई गई थी। ठीक वैसा ही भारत में भी हुआ। हालांकि आकाशवाणी
शुध्द रूप से सरकारी है और सरकारी भोंपू के नजरिए से भी देखा जाता है। लेकिन
इसमें भी बदलाव आया है। खासकर जब से प्रसार भारती बना।
आकाशवाणी का
समाचार सेवा प्रभाग प्रतिदिन लगभग
360
समाचार बुलेटिन 81 भारतीय भाषाएंबोलियों में प्रसारित
करता है। दिल्ली, क्षेत्रीय समाचर इकाईयों और विदेश
प्रसारण प्रभाग से करीब 44 घंटे समाचार बुलेटिन
प्रसारित किए जाते हैं। भारतीय भाषाओं में बुलेटिनों की संख्या 84
है। दिल्ली से हिन्दी में 31 और
अंग्रेजी में 20 समाचार बुलेटिन प्रसारित होते हैं।
दिल्ली से 43 क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार बुलेटिन
प्रसारित होते हैं। जबकि 58 विदेशी समाचार बुलेटिन
प्रसारित होते हैं। क्षेत्रीय समाचार इकाईयों की संख्या 45
है। प्रतिदिन 66 क्षेत्रीय भाषाओं व
बोलियों में 225 समाचार बुलेटिन प्रसारित होते हैं।
इसमें एम.एफ, रेनबो और एफ.एम. गोल्ड पर प्रसारित समाचार
हेडलाइन भी हैं। आकाशवाणी के क्षेत्रीय केंद्रों से क्षेत्रीय भाषाबोलियों में
समाचारों का प्रसारण होता है। साथ ही 24 घंटे फोन पर
प्रमुख समाचार सुनने की व्यवस्था कई केंद्रों पर है। मसलन चेन्नई से तमिल में,
हैदराबाद से तेलगू, मुंबई से मराठी में
तो पटना से हिन्दी में फोन नम्बरों पर प्रमुख समाचार सुना जा सकता है। भारत में
केवल आकाशवाणी तक ही श्रोता बंधे नहीं है। बड़े पैमाने पर बी.बी.सी. वायस ऑफ
अमेरिका, रेडिया जर्मन, जापान
सहित कई विदेशी रेडियो प्रसारण से भारतीय श्रोता जुड़े हुए हैं।
बहरहाल,
भारतीय प्रसारण की धरती पर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भावना
को लेकर रेडियो जो कंसेप्ट लेकर आया था, वह आज भी कायम
है। जहां सरकारी प्रसारण अंतिम कतार में खड़े लोगों तक सूचना एवं मनोरंजन पहुंचा
रहा है। वहीं संचार क्रांति से जुड़कर गैर सरकारी संगठन व संस्थाएं एफ.एम. और
सामुदायिक रेडियो को स्थापित कर एक नई दुनिया बनाने की दिशा में सक्रिय हो गए
हैं।
संजय कुमार-लेखक
आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार एकांश में सहायक समाचार संपादक हैं
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