Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

असली भारत का अपना माध्यम

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सच्चिदानंद जोशी

 

क्या आप किसी समाचारपत्र, पुस्तक या पत्रिका को स्पर्श किए बिना पढ़ने की स्थिति में सहज हो सकते हैं? क्या आप चलते फिरते, अपना कोई दूसरा काम करते, मसलन कम्प्यूटर पर काम करते, खाना बनाते, वाहन चलाते किसी पुस्तक या अखबार को पढ़ने की कल्पना कर सकते हैं? या इसी प्रकार की दूसरी स्थितियों पर भी जरा गौर कीजिए। क्या आप बिना आवाज के सिर्फ तस्वीरें देखकर टेलीविजन देख सकते हैं या बिना तस्वीर के सिर्फ आवाज की मदद से टेलीविजन या फिल्म देख सकते हैं? हां, मूक फिल्मों के दौर में शायद यही होता होगा, लेकिन आज टेक्नालॉजी के इतने विस्तार के बाद क्या ऐसी बातों की कल्पना भी संभव है? हम पुस्तकें, अखबार, टेलीविजन या फिल्म तक की अपनी कल्पनाओं को सीमित न रखकर सम्प्रेषण माध्यमों के तमाम प्रकारों पर अपनी वैचारिक तरंगे दौडाएं सभी सम्प्रेषण माध्यम आपकी एक से अधिक इंद्रियों को घेरते हैं, जब आप उनका उपयोग कर रहे होते हैं या उनका आस्वाद ले रहे होते हैं। टेलीविजन को म्यूट करके देखने तक की बात पर भी हम यदि गौर करें तो क्या हम इस तरह दृष्ट-श्राव्य माध्यम मानकर उसका आनंद ले सकते हैं। इन सब में संभवत: रेडियो ही एक मात्र ऐसा माध्यम होगा जो एक समय में आपकी एक ही इंद्रिय को घेरे रखता है और बाकी इंद्रियों को स्वतंत्र रहकर यदि आवश्यकता हो तो कोई दूसरा काम करते रहने की छूट प्रदान करता है। यह रेडियो की सबसे बड़ी शक्ति है और इसके निरंतर बलवती होने का कारण भी है।

 

दरअसल रेडियो एक ऐसा माध्यम है जो आपके व्यक्तित्व को अपने जाल में फंसाकर संक्रमित करने की बजाय आपसे मित्रता कर आपके व्यक्तित्व को फलने फूलने में मद्द देता है और संभावनाओं के चिंतन के कल्पनाओं के अनेक द्वार खोल देता है। रेडियो की इसी क्षमता के कारण यह जनमाध्यमों की दौड़ में अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये हुए है और देर से ही सही इसके महत्व को नये सिर से पहचाना जाने लगा है। रेडियो सुनते हुए आप पुस्तक या अखबार पढ़ सकते हैं, वाहन चला सकते है, कम्प्यूटर पर काम कर सकते हैं, खाना बना सकते हैं, गरज ये कि अधिकांश काम आप कर सकते हैं।

 

मनुष्य अपने स्वभाव से जिज्ञासु होता है और नित नई चीजों की ओर भागता है। हर पल कुछ नया, कुछ अलग करना चाहता है, पाना चाहता है। नित नए आविष्कार जीवन में नई चेतना और ऊर्जा का संचार करते हैं। यही कारण है कि एक समय पत्रों के सहारे महीनों-महीनों के समाचार पाने पर संतुष्ट रहने वाला मानव आज मोबाईल के युग में हर पल के दसवें हिस्से की खबर पाने के लिये बैचेन है। एक जमाने में ट्रंककाल यानि खतरे की घंटी माना जाता था, फोन पर बातचीत यदाकदा होती थी और आज जमाना ऐसा है कि हर कदम पर बातचीत की सुविधा के बावजूद बेचैनी है।

 

ऐसी ही मानव जिज्ञासा तथा आतुरता ने कुछ समय के लिए रेडियो को भुला दिया था और मानव मन ज्यादा चकाचौंध, चमक दमक वाले माध्यमों की ओर कुलांचे मारने लगा था। यह वह समय था जब टेक्नालॉजी ने अपने नये शिखरों की खोज की थी और ऐसी सारी बातें संभव दिखाई पडने लगी थीं जो कुछ समय पहले तक सिर्फ सपना हुआ करती थीं। रूपहले पर्द पर तामझाम और काफी मशक्कत के बाद दिखाई देने वाली आकृतियां घर के छोटे से डिब्बे में जाकर स्थान बनाने लगी थीं और कभी कभार छठे चौमासे सपनों की उस रूपहली दुनिया में चक्कर लगाने वाला आदमी अब चौबीसों घंटे उस दुनिया में अनेकानेक सतरंगी छटाएं बिखरने वाले रूपहले जाल में उलझता चला जा रहा था। यह वह समय था जब प्राय: लोग रेडियो को भुला चुके थे। पीढ़ियों इसे अजायबघर या संग्रहालय की वस्तु मानकर कभी कभार उस पर धूल झाड़ने का काम कर रही थीं। ज्यादातर लोग रेडियो को दरकिनार कर दूसरे माध्यमों की ओर मुड़ चले थे और रेडियो सुनना पिछड़ा होने या बिलो डिग्निटी होने की सीमा तक तिरोहित हो गया था। लेकिन यह इस माध्यम की उपादेयता और विस्तीर्ण अक्षांश का ही परिणाम है कि आज फिर रेडियो हमारे सामने है और ज्यादा धमाकेदार, जोरदार, पुरजोर ढंग से सामने है।

 

यूं देखा जाए तो रेडियो की यात्रा भी बहुत पुरानी नहीं है। यह यात्रा 19वीं शताब्दी से शुरू होती है। जब सन 1860 के आसपास जैम्स सी मैक्सवैल जो कि एक स्कॉटिश भौतिक शास्त्री थे ने रेडियो तरंगो के अस्तित्व का पता लगाया था। ट्रांसमीटर से पहले प्रसारण की सफलता मिली सन 1919 में मार्कोनी को। तभी से रेडियो के प्रसारण में अनेकानेक सुधार जुड़ते गए और यह एक लोकप्रिय संप्रेषण माध्यम के रूप में हर दिल अजीज बन गया। रेडियो समूचे विश्व में प्रसारण का पहला ऐसा माध्यम बना जिसके द्वारा समूचा विश्व सूचनाओं तथा मनोरंजन के लिए एक सूत्र में बांधता चला गया। सूचना, मनोरंजन, ज्ञान शिक्षा इन सबके लिए यह एक छोटा सा डिब्बा समूचे विश्व को अपने अंदर समेटने वाला ऐसा माध्यम बना जो सहज, सरल, सुलभ और सुगम था।

 

इतने वर्षों की रेडियो की यह यात्रा हार्डवेयर और साफ्टवेयर दोनों में हुए क्रांतिकारी परिवर्तनों की यात्रा है। एक बक्सानुमा रेडियो और जाली वाले लम्बे से एरियल से गुजरती हुई लघु और लघुत्तम होते हुए ट्रांजिस्टर सेट की यात्रा है। ध्वनि तरंगों के जरिए एक छोटे से क्षेत्र में सीमित प्रसारण से लेकर एक शक्तिशाली ट्रांसमीटर के जरिए असीमित प्रसारण क्षेत्र की पहुंच बनाने और फिर लौटकर एक सीमित क्षेत्र में जन जन एक व्यापक पहुंच बनाने तक की यात्रा है। मीडियम वेव, शार्टवेव से लेकर एफ.एम. तक पहुंचने की यात्रा है। आज रेडियो सुनना इतना आसान तथा सुलभ हो गया है कि मोबाईल सेट में भी आप सहजता से रेडियो सुन सकते हैं। जिस प्रकार रेडियो के हार्ड वेयर में परिवर्तन हुए हैं उसी प्रकार साफ्टवेयर में भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। रेडियो और अधिक जनोन्मुखी तथा अद्यतन होता जा रहा है। इसके कारण रेडियो की स्वीकार्यता और मांग दोनों ही बढ़ गई है। कई सारे चैनल्स की भरमार हो गई है तथा केन्द्रों की संख्या में असाधारण वृध्दि हुई है। आज रेडियो में समाचार, मनोरंजन, खेल, शिक्षा और न जाने कितनी प्रकार के चैनल्स हैं।

 

वैसे तो सभी संचार माध्यमों का अपना विशेष महत्व एवं स्थान है तथा उनका अस्तित्व किसी प्रतिस्पर्धा के बगैर शाश्वत है। फिर भी समय के साथ-साथ माध्यमों की पसंद और प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं। इन सबके बीच रेडियो जिन कारणों से अपनी श्रेष्ठता के साथ महत्व का स्थान बनाए रखता है, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। रेडियो का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह व्यक्ति की सिर्फ एक ही इंद्रिय को व्यस्त रखता है- श्रवण इंद्रिय। व्यक्ति रेडियो सुनने के साथ अपने अन्य क्रियाकलापों को सहजता से कर सकता है। कई बार रेडियो महत्वपूर्ण क्रियाकलापों में सहयोगी की भूमिका भी निभा देता है। मार्शल मैकलूहान के अनुसार कान, ऑख की तुलना में अति संवेदनशील है। कान, असहनशील, बंद तथा वैयक्तिक है, बकि आंख खुली, नैसर्गिक तथा सम्मिलनवादी है।

 

रेडियो श्रोता की कल्पना करने की शक्ति और रचनात्मकता को बढ़ावा देने में बहुत सहायक होता है। रेडियो पर सिर्फ वर्णन सुनने को मिलता है। इसलिए उस वर्णन के आधार पर मन में उस वर्णन के अनुकूल चित्र का रेखांकन करने के लिए कल्पनाशीलता और रचनात्मकता की आवश्यकता होती है, जो श्रोता में अपने आप ही विकसित होती चली जाती है। जिस आवाज को श्रोता सुनता है, उस आवाज के स्वामी की आकृति बनाने की सहज मानवीय प्रवृत्ति कल्पनाशीलता का विकास करती है। यह कल्पनाशीलता सिर्फ आकृति तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि उसके आधार पर उसके व्यक्तित्व के रेखांकन तक विस्तार पाती है। यह एक ऐसा गुण है जो किसी भी व्यक्ति को उसके व्यावहारिक जीवन में काफी सहायता प्रदान करता है। रेडियो सूचना, समाचार, ज्ञान का सबसे तेज माध्यम है। इसके जरिए सूचना का सम्प्रेषण जितनी जल्दी हो सकती है, उतनी जल्दी आज भी और कोई माध्यम संदेशों का सम्प्रेषण नहीं कर सकता। इसी के साथ रेडियो की एक और विशेषता यह है कि इसके लिए किसी विशेष तामझाम की जरूरत नहीं होती। यहां तक कि यह बिना बिजली के भी इसे बड़ी आसानी से सुना जा सकता है। बड़ी आसानी से किसी भी स्थान पर ले जाया जा सकता है। आर्थिक दृष्टि से देखा जाऐ तो इतना सस्ता सम्प्रेषण माध्यम शायद दूसरा और कोई नहीं हो सकता। कुछ दिन पहले खिलौनों की दुकान पर एफ.एम. रेडियो देखने को मिला जिसकी कीमत थी मात्र पचहत्तर रूपये। हो सकता है कुछ लोगों को इससे भी सस्ते रेडियो सेट उपलब्ध हो जाएं।

 

रेडियो का एक लाभ और है कि इसके लिए विशेष अक्षर ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। निरक्षर और कम पड़े लिखे लोग भी आसानी से इसका लाभ उठा सकते हैं। साफ्टवेयर तैयार करना भी अन्य माध्यमों की तुलना में कम खर्चीला और कम समय में तैयार होने वाला है। आजकल तो कम्प्यूटर की मदद से साऊण्ड रिकार्डिंग और अधिक आसान हो गई है। अब बहुत अधिक सुसाित तथा संभ्रांत स्टूडियो की भी आवश्यकता रिकार्डिंग के लिए नहीं पड़ती। अपनी इस अपेक्षाकृत कम खर्चीली व्यवस्था के कारण रेडियो व्यक्ति को अपने अधिक निकट का माध्यम लगता है। आजकल तो टेलीफोन लाइन के जरिए श्रोता भी कार्यक्रमों में बराबर की भागीदारी करता है। रेडियो का यह भी एक महत्वपूर्ण लाभ है कि यह सुलभ भागीदारी पूर्ण माध्यम है।

 

रेडियो जितना सार्वजनिक है, उतना ही व्यक्तिगत भी है। यह एक ऐसा अदभुत माध्यम है जो अंर्तव्यैक्तिक तथा अंतराव्यैक्तिक दोनों ही प्रकार के सम्प्रेषणों के अवसर एक साथ सहज उपलब्ध कराता है। जहां यह लाखों लोगों से एक साथ बात करता है, वहीं यह किसी एक से सीधी बात भी करता है। स्थान, सीमा, समय, संसाधन किसी भी प्रकार के बंधन इसके व्यापक विस्तार को कम नहीं कर पाते।

 

रेडियो के जरिए ब्राडकास्टिंग भी संभव है तथा नैरोकास्टिंग भी। इसलिए यह जितना व्यापक होता है, उतना ही व्यक्तिगत भी रह जाता है। हाल के समय में आई कुछ हिंदी फिल्मों में रेडियो के इसी दोहरे लाभ को बहुत खूबसूरती से फिल्माया गया है। इन फिल्मों के माध्यम से रेडियो की उपादेयता एक बार फिर सिध्द हुई है। पहले सलाम नमस्ते और फिर बाद में लगे रहो मुन्नाभाई जैसी फिल्मों ने रेडियो की ब्राडकास्टिंग तथा नैरोकास्टिंग दोनों की समानांतर क्षमता सिध्द की है।

 

रेडियो के नये प्रयोगों जैसे वर्ल्ड स्पेस रेडियो ने संगीत उद्योग में क्रांतिकारी हलचल पैदा कर दी है। वर्ल्ड स्पेस रेडियो के आगमन ने संगीत उद्योग खासकर कैसेट और सी.डी. उद्योगों को विचार के दोराहे पर खड़ा कर दिया है। लेकिन इसके कारण संगीत उद्योग में आय अभूतपूर्व उछाल भी जनमानस के श्रवण माध्यम के प्रति निरंतर बढ़ते रूझान का परिचायक है। इस बारे में यदि गइराई से सोचा जाए कि अचानक ही सभी टी.व्ही. चैनलों पर संगीत से जुड़े रियलिटी शोज की बाढ़ क्यों आ गई है, तो शायद हमें इसके मूल में भी इस श्रवण माध्यम की बढ़ती लोकप्रियता ही उत्तर के रूप में मिलेगी।

 

रेडियो के महत्व को रेखांकित करते हुए मार्शल मैकलूहान ने टिप्पणी की थी, रेडियो सूचनाओं की ऐसी तरंगे पैदा करता है जो दूसरे माध्यमों को भी गति प्रदान करती है। यह निश्चित रूप से विश्व का एक ग्राम के रूप में सिमटा देता है। भारत के रेडियो के महत्व के बारे में मैकलुहान ने सन 1964 में टिप्पणी की थी, भारत में रेडियो सम्प्रेषण का एक प्रमुख माध्यम है जहां एक दर्जन से अधिक राजकीय भाषाएं हैं और उतने ही अधिकृत रेडियो नेटवर्क हैं। संभवत: उस वक्त उनका आशय भाषाई रेडियो सेवाओं से रहा होगा. भारतीय परिवेश, सामाजिक परिस्थितियां, भौगोलिक परिस्थितियां आदि का यदि हम विचार करें तो हम पायेंगे कि इन सबके मद्देनजर रेडियो ही एक सर्वस्वीकार्य माध्यम के रूप में उभरता है। भारतीय जनमानस के भावनात्मक पक्ष का विचार करने पर भी हम यही पाते हैं कि भारत के अतिभावुक एवं अतिसंवेदनशील जनमानस की प्रवृत्ति पर रेडियो जैसा माध्यम ज्यादा माफिक बैठता है।

 

आज समूचा विश्व रेडियो के नए विस्तार का साक्षी है। भारत में भी जिस तरह रेडियो का विस्तार हो रहा है, विशेषकर एफ.एम. रेडियो के माध्यम से , उससे इस माध्यम की लोकप्रियता एक बार पुन: शिखर पर पहुंचेगी ऐसी आशा करना गलत नहीं होगा।

 

लेखक कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति हैं।

 

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