दुनिया में यूं गूंजा आवाज का सफ़र
---------------------------------
डॉ. रंजन
सिंह
रेडियो
के विकास की जड़ मूलत: टेलीग्राफ टेलीफोन और वायरलेस से जुड़ी है। टेलीग्राफ और
टेलीफोन में एक छोर से दूसरे छोर तक संदेश भेजने का जरिया तार था। तार से जुड़े
यंत्र की समस्या यह थी कि उसे इधर-उधर खिसकाना भी हो तो तार फैलाना पड़ता था।
इससे निजात पाने के लिए वायरलेस की उत्पत्ति हुई। वायरलेस की अपनी सीमाएं हैं।
रेडियो के विकास कथा इन्हीं अविष्कारों से जुडी है। जैसा कि सुप्रसिध्द
वैज्ञानिक उक्ति है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। रेडियो की जरूरत इसलिए
महसूस की गई कि व्यक्ति सूदूर अन्य नगर में स्थित अपने व्यक्ति संबंधी या
रिश्तेदार को संदेश भेज सके,
और उनका हाल जान सके। इसके लिए किसी को लंबा सफर तय करने की
जरूरत ही न पड़े। टेलीफोन का आविष्कार सन् 1856 में हो
चुका था। संप्रेषण जगत के जादूगर एफबी मोर्स ने 1844 ई.
में टेलीग्राफ का आविष्कार कर सभी को चमत्कृत कर दिया था।
मोर्स मूलत: एक चित्रकार थे फिर भी विद्युत उपकरणों में उनकी
रूचि थी। यांत्रिक विधि से संदेश संचार संबंधी टेलीग्राफी के संदर्भ में उनके
सहयोगी अल्फ्रेड बेल ने उनकी आर्थिक सहायता की। सन् 1835-36
में दोनों ने मिलकर 17 सौ फीट लंबे
तार के माध्यम से संदेश प्रेषण का कार्य किया। सन् 1844
ई. में विज्ञान कांग्रेस की आर्थिक सहायता के फलस्वरूप वाशिंगटन से वाल्टीमोर
तक टेलीग्राफ संदेश संचालित किया गया। सन् 1866 में
साइट्स फील्ड के नेतृत्व में समुद्रपारीय केवल बिछाया गया। उसी समय अमेरिका से
यूरोप को मोर्स कोड संदेश भेजा गया, जो त्वरित
अंतर्राष्ट्रीय संचार का एक प्रारंभिक चरण था। विद्युत तारों से कोड संदेश के
संचार की सफलता के बाद मनुष्य की आवाज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने
की चर्चा प्रारंभ हुई सन् 1861 में जर्मनी के वैज्ञानिक
फिलिप्स रीड्स, शिकगो के वैज्ञानिक एलिशा ग्रे ने बोलते
तार की संकल्पना की। सन् 1874 में वेस्टर्न यूनियन
कंपनी ने सर्वप्रथम पेटैंट हासिल करने में सफलता प्राप्त की और टेलीफोन शब्द का
प्रयोग हुआ 14 फरवरी, सन्
1876 को अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने यूनाइटेड स्टेट्स
पेटेंट आफिस में बोलते टेलीफोन के रजिस्ट्रेशन हेतु आवेदन प्रस्तुत किया। बेल
टेलीफोन कंपनी ने रेडिया को जन्म दिया, जो संचार जगत का
एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिध्द हुआ। सन् 1895 में इटली के
इलेक्ट्रानिक इंजीनियर गुग्लिएमों मारकोनी ने अपने शहर बोलोग्नो में स्थित छोटी
सी पहाड़ी पर बेतार का संदेश भेजा। दूसरी तरफ मारकोनी भाई ने वह संदेश प्राप्त
किया। इससे मारकोनी के प्रयोग ने यह सिध्द कर दिया कि संदेश बिना तार की सहायता
से भेजे जा सकते हैं। मारकोनी के इस अविष्कार में इटली की सरकार ने रूचि नहीं
दिखाई लेकिन उसने स्वयं के प्रयासों से अपने शोध कार्य को जारी रखा था। इसके
बाद वे इंग्लैंड जाने का फैसला लिए और इंग्लैंड चला गया। यहां मारकोनी को काफी
उत्साहित मिला। साथ ही उपकरण विकास के लिए उन्हें जरूरी धन भी उपलब्ध कराया
गया। सन् 1901 तक उन्होंने अपने इस उपकरणों में काफी
सुधार कर लिया। अब वह अटलांटिक के उस पार इंग्लैंड से कनाडा बेतार का संदेश
भेजने के लिए तैयार हो चुके थे। अटलांटिक महासागर के उस पार जाने वाला यह पहला
संदेश था मारकोनी का उपकरण केवल ध्वनि संकेत ही भेज सकता था। इसलिए अटलांटिक के
उस पार जाने वाला यह संदेश अंग्रेजी का एस अक्षर मोर्स कोर्ड के रूप में भेजा
गया। सन् 1909 में मारकोनी को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार
प्राप्त हुआ।
तार के माध्यम से ध्वनि प्रेषण के बाद जैम्स क्लर्क मैक्सबेल
ने बेतार के संदेश पहुंचाने का प्रयास किया। सन् 1888
में हेनरिक हट्र्ज ने बेतार तरंगों के अस्तित्व को सिध्द किया। उन्होंने बताया
कि रेडियो तरंगे भी प्रकाश की तरंगों के समान परावर्तित की जा सकती है। जिसे
आगे बढ़ाने में मारकोनी का नाम स्वर्णक्षरों में अंकित है। उसने हट्र्ज की
प्रसारण विधि मोर्स की प्रयोग विधि को समन्वित कर एन्टीना द्वारा रेडियो
ट्रांसमिशन को संभव बनाया। सन् 1896 को मारकोनी को
वायरलेस टेलीग्राफ रेडिये ट्रांसमिशन को संभव बनाया। सन् 1906
ई. में एफिल टॉवर के ऊपर से ध्वनि प्रसारण का सूत्रपात हुआ।
डी.फारेट ने 1906 ई. में एफिल टॉवर के ऊपर से ध्वनि-
संगीत का प्रसारण कर यह सिध्द किया कि हवा में तैरते स्वर को यथा संभव रूप दे
सकते हैं। सन् 1916 ई में डेविड सरनाथ ने प्रसारण को
व्यावसायिक रूप देने से सफलता प्राप्त की तथा रेडियो म्युजिक बाक्स समाचार और
जनसंचार का प्रभावशाली माध्यम बन गया। सन् 1918 में ली
द फोरेस्ट ने न्यूयार्क के हाइब्रिज क्षेत्र में विश्व का पहला रेडियो स्टेशन
प्रारंभ किया। कुछ दिनों बाद ही पुलिस को खबर लग गयी और रेडियो स्टेशन बंद कर
दिया गया। एक साल बाद ली द फोरेस्ट ने सन् 1919 में सैन
फ्रांसिस्को में एक और रेडियो स्टेशन प्रारंभ कर दिया गया। नवंबर, 1920
ई. में नौसेना के रेडियो विभाग में काम कर चुके फैंक कानार्ड
को दुनिया में पहली बार कानूनी तौर पर रेडियो स्टेशन प्रारंभ करने की अनुमति
मिली। रूस में प्रतिवर्ष 7 मई को रेडियो दिवस के रूप
में मनाया जाता है।
सन्
1900 से सन् 1904
तक एलेक्जेंडर पोपोव ने रसियन कानफे्रंस आफ इलेक्ट्रिक्ल
इंजीनियरिंग के समक्ष मानव स्वर का प्रसारण किया। 1910
में रसियन रेडियो ब्राडकास्टिंग कंपनी स्थापित हुए 21
अगस्त 1922 ई. को मास्को में एक रेडियो टेलीग्राफ
स्टेशन ने कार्य शुरू किया तथा 28 जुलाई 1924
ई. को फ्रीडम आफ ब्राडकास्टिंग ला की स्थापना हुई। पिट्सवर्ग
में सन् 1920 ई. में प्रसारण केंद्र स्थापित हुआ,
किंतु 1920 को चेम्सफोर्ड से मारकोनी
कंपनी ने सर्वप्रथम प्रसारित किया। प्रसारण का नियमित स्वरूप जॉन ीथ के
निर्देशन में बीबीसी द्वारा नवंबर 1920 में निर्धारित
एवं प्रसारित हुआ। इसके पश्चात कनाडा, ब्राजील,
फ्रांस इटली आदि देशों ने भी प्रसारण को बढ़ावा दिया और
राष्ट्रीय उपयोगिता के अनुसार रेडियो को विस्तृत स्वरूप दिया। भारत में पोस्ट
एवं टेलीग्राफ विभाग ने द टाइम्स आफ इंडिया के सहयोग से संगीत के कार्यक्रम का
प्रसारण बंबई से अगस्त 1921 में किया। प्रसारण केंद्र
से 175 किमी दूर पूना के अपने निवास स्थान पर तत्कालीन
गवर्नर ने इस अद्भुत प्रसारण को सुना तथा इसके विस्तार की कामना की। मद्रास
प्रेसीडेन्सी क्लब के नाम से 16 मई 1924
ई. को प्रसारण प्रांरभ हुआ। कुछ ही
सालों में देखते ही देखते विश्वभर में सैकड़ों रेडियो स्टेशनों ने काम करना
प्रारंभ कर दिया।
लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता
विवि, भोपाल के पत्रकारिता विभाग में प्रवक्ता हैं । मीडिया और सामयिक विषयों
पर लिखते हैं ।
lll