आवाज के जादू का आरोह-अवरोह
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रमेश नैयर
विश्व
के प्रत्येक देश में ज्ञान,
जानकारी, मनोरंजन और मेल-मिलाप में
वाचिक परंपरा की भूमिका सर्वाधिक प्राचीन और महत्वपूर्ण रही है। जब लिखित शब्द
नहीं था, चित्र भी नहीं था तो सूचना का प्रमुख माध्यम
बोला गया शब्द था। बोले गए शब्द को अधिक से अधिक व्यक्तियों तक पहुंचाने के लिए
ध्वनि-विस्तारकों की लम्बी श्रृंखला का अविष्कार हुआ। रेडियो इसी
अविष्कार-श्रृंखला की संतान है। रेडियो आवाज का जादूगर है। भारत में छह दशकों
से अधिक समय तक विशाल जन-समूहों को रेडियो की आवाज का जादू सम्मोहित करता रहा
है। रेडियो की एक बड़ी उपयोगिता यह है कि वह निरक्षर व्यक्तियों के लिए भी उतना
ही उपयोगी होता है जितना पढ़े-लिखे लोगों के लिए। यह भी एक कारण है कि समाचार
पत्रों की प्रसार संख्या खूब बढ़ जाने और टेलिविजन चैनलों के दर्शकों में
बेहिसाब इजाफा होने के बावजूद रेडियो के श्रोताओं की संख्या आज भी विपुल मात्रा
में है। यह बात और है कि प्रचार के माध्यम के रूप में रेडियो का उतना प्रभाव
नहीं रह गया है जो बीसवीं सदी के सातवें दशक के अंत तक था।
भारत में
रेडियो की विकास यात्रा बीसवीं सदी के दूसरे दशक से शुरू हो गई थी,
अमेरिका में प्रथम रेडियो प्रसारण के लगभग एक दशक बाद। विश्व
में रेडियो का प्रथम प्रसारण केंद्र अमेरिका के ईस्ट पिट्सबर्ग में खुला और
उसके मात्र दो वर्ष बाद ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन (बी.बी.सी.)
अस्तित्त्व में आ गया। बी.बी.सी. की तर्ज पर भारत में 1926
में ब्रिटिश सरकार की अनुमति से इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की
स्थापना हुई। वैसे उससे दो वर्ष पूर्व 1924 में मद्रास
रेसिडेंसी में एक रेडियो क्लब गठित हो चुका था। उस समय उत्तर भारत में
पत्रकारिता जनसंचार और साहित्यिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र लाहौर था। मद्रास
के बाद दूसरा बड़ा रेडियो क्लब लाहौर में ही खुला था। रेडियो प्रसारण के क्षेत्र
में यह एक प्रयोग था, जिसमें शीघ्र ही मुंबई (तब बंबई)
और कोलकाता (उन दिनों कलकत्ता) भी जुड़ गए। यह निजी क्षेत्र का एक उद्यम था जो
अधिक समय तक टिक नहीं पाया। अंतत: 1930 में ब्रिटिश
सरकार ने इस उद्यम को अपने हाथों में लेकर इंडियन ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के नाम
से रेडियो प्रसारण सेवा शुरू की जिसे 1936 में ऑल
इंडिया रेडियो का नाम दे दिया गया।
देश के आजाद
होने के बाद ऑल इंडिया रेडियो का नाम आकाशवाणी रखा गया। यह एक सुपरिचित पौराणिक
नाम था। वैसे प्रसारण सेवा के लिए आकाशवाणी का पहली बार उपयोग मैसूर रियासत
द्वारा 1935
में खोले गए रेडियो केंद्र के लिए किया गया था। इस दौरान
रेडियो का व्यापक विस्तार तो हुआ, परंतु उसके बुनियादी
चरित्र में बहुत परिवर्तन नहीं हुआ। वह सरकारी प्रचार का सशक्त माध्यम बना रहा।
वह जानकारी देने और मनोरंजन करने का भी शालीन माध्यम रहा है। रेडियो की अत्यंत
प्रभावी भूमिका रही है साहित्य-संस्कृति के संरक्षण एवं लोकव्यापीकरण में।
पिछले कम से कम आठ दशकों से रेडियो शास्त्रीय, सुगम और
फिल्मी संगीत का सशक्त संरक्षक-संवर्द्धक बना हुआ है। लोकसंगीत और शास्त्रीय
संगीत को सर्वाधिक प्रश्रय और प्रसार रेडियो ने प्रदान किया है।
स्वतंत्रता से
पूर्व लाहौर और कलकत्ता ने संगीतकारों,
गायकों तथा गीतकारों को नाम, दाम और
सम्मान दिया-दिलाया। बड़े से बड़ा गायक और संगीतकार ऑल इंडिया रेडियो और फिर
आकाशवाणी से जुड़ा रहा। कुंदनलाल सहगल, मुहम्मद रफी और
लता मंगेशकर जैसे शाश्वत ख्याति के गायक रेडियो के कलाकार रहे। बीती सदी के
सातवें दशक के अंत तक आकाशवाणी-कलाकार होना किसी के लिए गौरव की बात हुआ करती
थी। उदीयमान गायक तो अपने आपको रेडियो-आर्टिस्ट कहने और कहलाने में गर्व अनुभव
किया करते थे। उनके कार्यक्रमों के विज्ञापन में लिखा रहता था 'रेडियो
आर्टिस्ट।'
सुखद तथ्य यह
है कि आकाशवाणी सदैव शास्त्रीय संगीत और सुरुचिपूर्ण लोकसंगीत को अपने दैनंदिन
प्रसारणों में महत्व देती रही है। इसके साथ ही प्राय: प्रत्येक आकाशवाणी केंद्र
द्वारा महत्वपूर्ण संगीतज्ञों के कार्यक्रम भी आमंत्रित श्रोताओं के समक्ष
प्रस्तुत किए जाते हैं। पुरानी रियासतों की समाप्ति के पश्चात संगीत को प्राप्त
राजाश्रय की समाप्ति से जो शून्य निर्मित हुआ था,
उसे भर सकने में आकाशवाणी काफी हद तक सफल रही है। आज भी
शास्त्रीय एवं लोकसंगीत को सम्मानपूर्वक स्थान केवल आकाशवाणी द्वारा दिया जा
रहा है।
सातवें दशक से
टेलिविजन के भारत में विस्तार से रेडियो के प्रभाव का क्षरण भले ही हुआ हो,
पर उसकी उपयोगिता का तिरोहण कभी नहीं हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों
में आकाशवाणी के श्रोता कम नहीं हुए। टेलिविजन के मनोरंजन चैनलों ने नगरों और
बड़े कस्बों में आकाशवाणी का समय छीन लिया। उसके श्रोताओं के एक वर्ग को अपना
मूकदर्शक बना लिया, परंतु स्वस्थ तथा सुरुचिपूर्ण
मनोरंजन के परीक्षित माध्यम के रूप में आकाशवाणी के कद्रदान समाप्त नहीं हुए।
यदि आकाशवाणी पर शासकीय नियंत्रण को शिथिल किया जा सकता तो समाचारों के क्षेत्र
में उसकी साख विविध टेलिविजन चैनलों के प्रवेश के पश्चात इस कदर प्रभावित न
होती। वस्तुत: दूरदर्शन के समाचार कार्यक्रमों की विश्वसनीयता को भी इसी शासकीय
नियंत्रण के कारण बट्टा लगा।
विश्वसनीयता
का प्रश्न : रेडियो के विषय में इस अप्रिय तथ्य को रेखांकित करना आवश्यक है कि
ऑल इंडिया रेडियो का समाचार प्रभाग अपने लम्बे इतिहास के दौरान कभी भी
बी.बी.सी.,
रेडियो जर्मनी या वॉयस ऑफ अमेरिका जैसी विश्वसनीयता नहीं बना
पाया। शुरू से अनुभव किया जाता रहा कि समाचारों के मामले में रेडियो को शासकीय
अंकुश से मुक्त कराया जाना चाहिए। आजादी से पहले और आजादी के बाद भी निरंतर
रेडियो को सरकारी हस्तक्षेप से यथासंभव मुक्त करने की मांग उठाई जाती रही।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने रेडियो को शासकीय दबाव
से मुक्त करने की आवाज बुलंद की थी। बार-बार यह भी कहा जाता रहा कि सब कुछ
केंद्रीय सत्ता के निंयत्रण में नहीं रखा जाना चाहिए। राज्यों को अपने ढंग से
रेडियो प्रसारण तय करने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
28 जून, 1947 को डॉ. बी. पट्टाभि
सीतारमैया ने यूनियन पावर कमिटी को लिखे एक पत्र में ऑल इंडिया रेडियो के
विकेंद्रीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि
ग्रामीण विकास और शिक्षा संबंधी प्रसारणों का स्वरूप तय करने का अधिकार राज्य
सरकारों को दिया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि जब इन दोनों विषयों को राज्य
सरकारों को सौंपा जाना है तो उनके प्रचार का दायित्व भी उन्हें ही निभाने देना
चाहिए। चूंकि रेडियो उस समय प्रचार का अत्यंत सशक्त माध्यम था,
इसलिए राज्यों में रेडियो स्टेशनों के संचालन एवं
कार्यक्रम-निर्धारण में वहां की सरकारों को महत्व दिया जाना चाहिए। इस तथ्य को
भी शिद्दत के साथ रखा गया कि रेडियो पर केंद्र का पूर्ण नियंत्रण उसके स्वस्थ
संचालन में बाधक होगा। यह आशंका भी व्यक्त की गई थी कि केंद्रीय नियंत्रण से
भारत में प्रसारण अभियान को भी अपेक्षित गति नहीं मिल पाएगी। परंतु स्वतंत्रता
मिलने के पश्चात् इस प्रकार के समस्त सुझावों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया
गया। विडम्बना तो यह है कि जहां अंग्रेजों के जमाने में भी कुछ सूबों तथा
रियासतों को अपने रेडियो स्टेशन चलाने की अनुमति दी गई थी,
वहीं संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद रेडियो
पूर्णतया केंद्रीय सत्ता के नियंत्रण में कर दिया गया। नतीजतन आकाशवाणी के
समाचार प्रसारणों की विश्वसनीयता इस हद तक कम हुई कि उसे सरकारी भोंपू की
संज्ञा दी जाने लगी। उनकी विश्वसनीयता शून्य हो जाने का आलम श्रीमती इंदिरा
गांधी के प्रधानमंत्रित्त्वकाल, विशेषकर इमरजैंसी में,
देखा गया। 'ऑल इंडिया रेडियो'
का जनसामान्य में नाम पड़ गया-ऑल इंदिरा रेडियो और 'इंदिरा
वाणी।' आकाशवाणी की विश्वसनीयता के क्षरण का अंजाम यह
भी हुआ कि राजनीति के नाजुक लम्हों में जनता विश्वस्त खबरों के लिए अन्य
माध्यमों पर भरोसा करने लगी। आपात्काल के दौरान तो स्थिति यह हो गई थी कि शातिर
अफवाहें तक आकाशवाणी के समाचारों से अधिक भरोसेमंद मानी जाने लगीं।
भारत में रम
गए बी.बी.सी. के प्रतिष्ठित संवाददाता मार्क टली ने आपात्काल के अपने संस्मरणों
में लिखा था कि बी.बी.सी. द्वारा प्रसारित समाचारों पर जनता का विश्वास इस कदर
जम गया था कि जो समाचार बी.बी.सी. ने प्रसारित नहीं किया होता था,
उसे भी बी.बी.सी. का हवाला देकर जनता में प्रचारित कर दिया
जाता था। जन-सामान्य तो उस प्रचार पर विश्वास करता ही था,
पर कई बार उस प्रचार को लेकर सरकारी अधिकारी बी.बी.सी. से
कैफियत तक मांग बैठते। ऐसे ही एक प्रसंग का सन् 1982
में प्रकाशित अपने लेख 'पेसेज टु इंडिया'
में उल्लेख करते हुए मार्क टली ने लिखा, ''एक
घटना इमरजैंसी की शुरूआत में हुई और वह लगभग सर्वज्ञात है-मुहम्मद यूनुस ने
इंदर गुजराल को फोन पर कहा कि मार्क टली की पतलून उतार कर उसके... पर लात जमा
कर उसे जेल में ठूंस दो। उसने ऐसा क्यों कहा? क्योंकि
मार्क टली ने रिपोर्ट किया कि स्वर्णसिंह घर में नजरबंद हैं। इंदर गुजराल ने
सारी रिपोर्टों का परीक्षण किया-मुझे मालूम है कि भारत सरकार बी.बी.सी. का बहुत
सावधानीपूर्वक परीक्षण करती है। गुजराल को ऐसी किसी भी रिपोर्ट का कोई साक्ष्य
नहीं मिला। परंतु लोग किसी अफवाह को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए कह देते
हैं यह उन्होंने बी.बी.सी. पर सुना। .... कई बार राजनीतिज्ञ भी अपने दावे को
दमदार बनाने के बी.बी.सी. का नाम खपा देते हैं। मसलन एक चुनाव के दौरान पश्चिम
बंगाल कांग्रेस के नेताओं ने अपने भाषणों में कहा कि बीबीसी ने उनकी पार्टीकी
उजली संभावनाएं अपने सर्वेक्षण में व्यक्त की हैं और कहा है कि कांग्रेस जीत
रही है.... सच यह है कि बी.बी.सी. ने ऐसा कोई पूर्वानुमान प्रसारित ही नहीं
किया था।''
कहने का आशय
यह है कि आकाशवाणी (और दूरदर्शन) का समाचार प्रभाग अपेक्षित विश्वसनीयता अर्जित
नहीं कर पाया। प्रसार भारती का गठन किए जाने के बाद आकाशवाणी को कुछ खुली सांस
लेने की सुविधा तो मिली,
परंतु सत्ताधारी इस प्रभावी प्रसारण तंत्र को अपने नियंत्रण
में रखने के लोभ का संवरण नहीं कर पाये। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)
के शासनकाल में भी आकाशवाणी और दूरदर्शन शासकीय नियंत्रण से बहुत मुक्त नहीं हो
पाये थे, फिर भी उस दौरान समाचारों के प्रसारण के
दौरान कुछ अच्छे प्रयोग किये गये थे। समाचार प्रभात में मुख्य खबरों पर प्रमुख
पत्रकारों और राजनीतिक समीक्षकों की त्वरित टिप्पणियां भी ली जाती थीं।
तत्कालीन सरकार के प्रखर आलोचक समझे जाने वाले वामपंथी पत्रकारों और कांग्रेस
समर्थकों की टिप्पणियां भी प्रसारण में शामिल की जाती थीं। उससे उस प्रसंग
विशेष के विविध पहलुओं की कुछ हद तक निष्पक्ष जानकारी श्रोताओं को मिल जाती थी।
गैर सरकारी मंतव्य की कोई खिड़की खुला करती थी। दुर्भाग्यवश यूपीए सरकार ने
सत्ता में आते ही उसे समाप्त कर दिया। अब चूंकि घटनाओं की भरपूर पड़ताल करने
वाले निजी क्षेत्र के अनेक माध्यम बाजार में आ गए हैं,
इसलिए आकाशवाणी को भी दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ने के लिए आंखों के साथ ही
दिल-दिमाग को भी खोलना चाहिए।
सकारात्मक
भूमिका : कुछ क्षेत्रों में आकाशवाणी की भूमिका तुलनात्मक रूप से अधिक
सकारात्मक रही है। ज्ञान-विज्ञान,
शिक्षा, साहित्य,
जन-स्वास्थ्य और चरित्र-निर्माण पर आधारित कार्यक्रमों के
निर्माण एवं प्रसारण में आकाशवाणी का महत्वपूर्ण योगदान आज भी बना हुआ। साहित्य,
विशेषकर आंचलिक और लोकसाहित्य, जब
प्रिंट मीडिया और टेलिविजन चैनलों द्वारा हाशिये के भी बाहर ढकेल दिया गया है
आकाशवाणी का उनसे सरोकार बना हुआ है। ताजा उदाहरण है प्रथम स्वाधीनता संग्राम
के 150वें वर्ष पर देश की समस्त भाषाओं में स्वतंत्रता
आंदोलन पर केंद्रित रूपकों, परिचर्चाओं आलेखों आदि की
लंबी श्रृंखला का आकाशवाणी द्वारा प्रसारण। जिस विकास पत्रकारिता से समाचार
पत्रों का सातवें दशक के अंत तक कुछ सरोकार बना रहा था,
वह निजी क्षेत्र के मीडिया से अब निष्कासित कर दी गई है। प्रिंट मीडिया में
विकास की बातें सामान्यत: विज्ञापनों में प्रकाशित होती हैं। केवल आकाशवाणी में
ही उसके लिए कुछ स्थान बचा हुआ है। स्वस्थ मनोरंजन और शास्त्रीय संगीत को
संरक्षण प्रोत्साहन देने की आकाशवाणी की भूमिका की चर्चा पहले ही की जा चुकी
है। इस बात की गुंजाइश अवश्य बनी हुई है कि आकाशवाणी की प्रस्तुतियों में
गुणवत्ता लाई जाए। गुणवत्ता अक्सर प्रतिस्पर्धा की कोख से पैदा होती है। एफ.एम.
रेडियो के मुक्त बाजार में उतरने से स्पर्धा के द्वार खुल रहे हैं। लेकिन
समाचार प्रसारणों को अभी भी इन चैनलों से बचाकर रखा गया है। इस विषय पर कुछ
विस्तार से विवेचन आवश्यक है। परंतु उससे पहले कुछ संक्षिप्त चर्चा उस दौर की
स्मृतियों की जब रेडियो सम्मान और प्रभुता के शिखर पर था।
1930-35 से 1980 तक के दौर को रेडियो
का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। उद्धोषक की आवाज का जादू सिर पर चढ़ कर बोलता था।
शब्दों में इतनी चित्रात्मकता होती थी कि रेडियो-प्रसारण आंखों के सामने सजीव
दृश्य प्रस्तुत कर देता था। जिन्हें 15 अगस्त,
1947 के स्वाधीनता समारोह के रेडियो प्रसारण की याद है वे इस
तथ्य की तस्दीक कर सकते हैं कि वह आंखों देखा हाल सुनते हुए देश के करोड़ों
श्रोता कुछ ऐसा अनुभव कर रहे थे जैसे वे दिल्ली में सारे समारोह को अपनी आंखों
से देख रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस पर पं. जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक भाषण
'ट्रायस्ट विथ डेस्टिनी' की
अनुगूंज आज भी सुनाई पड़ती है।
महात्मा गांधी
की अंतिम यात्रा का
'लाइव
ब्रॉडकास्ट' करोड़ों श्रोताओं को देश-विदेश के कोने-कोने
से अपनी आवाज के पवनहंस पर बिठाकर दिल्ली में बिड़ला हाउस से राजघाट तक सिसकती
सुबकती शोकाकुल भीड़ के पास पहुंचा गया था। यदि मैं गलत नहीं हूं तो गांधी जी की
शवयात्रा के जीवंत प्रसारण अंग्रेजी में मेल्विल डिमेलो और हिंदी में देवकीनंदन
पाण्डेय कर रहे थे। प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की गांधी जी के अवसान पर
प्रसारित हदयस्पर्शी श्रद्धांजलि चिरकाल तक स्पंदित करती रहेगी। मई 1964
में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के महाप्रस्थान
पर मेल्विल डिमेलो और अशोक वाजपेयी के स्वरों में प्रसारित आंखों देखा वृतांत
बोले गए शब्द की शक्ति और दीर्घजीविता का प्रमाण है।
आजादी से पहले
और आजादी के बाद भी काफी समय तक रेडियो स्टेशन साहित्यकारों और कलाकारों के
तीर्थस्थल जैसे बने हुए थे। उर्दू और हिंदी के ख्यातिनाम लेखक आजादी से पहले
लाहौर रेडियो स्टेशन और विभाजन के बाद जालंधर तथा दिल्ली आकाशवाणी केंद्रों से
जुड़े रहे थे। अनेकानेक दिग्गज साहित्यकारों ने रेडियो के लिए रूपक,
नाटक और वार्ताएं लिखीं। उनकी परिचर्चाओं और काव्य-गोष्ठियों
में हिस्सेदारी की। रेडियो के लिए साठ वर्षों से भी अधिक समय तक रूपक और नाटक
लिखते आ रहे मूर्धन्य साहित्यकार विष्णु प्रभाकर सौभाग्य से हमारे बीच हैं। ऐसे
लोग भी जीवित हैं जो रेडियो के उत्कर्ष-काल के साक्षी रहे हैं। रेडियो कैसे
मुल्कों की सरहदों को फलांग कर अपनी आवाज का तिलिस्म फैला देता था,
उसका एक उदाहरण था रेडियो सीलोन का फिल्मी गीत-कार्यक्रम,
जिसके एक-एक पायदान पर चढ़ते गीत के बोल करोड़ों-करोड़ों दिलों
में हिलोरें उत्पन्न करते थे। पहले सुनील दत्त और फिर अमीन सयानी जैसे आवाज के
जादूगर की खनक आज भी स्मृतियों में रची हुई है। रेडियो से देवानंद,
बलराज साहनी जैसे महान कलाकार जुड़े रहे। वह एक अलग आलेख का
विषय बन सकता है। रेडियो ने अनेक राज्यों की लोकभाषाओं के प्रसारणों के माधम से
क्षेत्रीय आभामंडल तैयार किए। उत्तरप्रदेश के रमई काका,
बिहार के लोहासिंह और छत्तीसगढ़ के बरसाती भैय्या (स्व. केशरी बाजपेयी) जैसी
अनेक हस्तियां रेडियो के माध्यम से ही अपने-अपने इलाके में लोकप्रियता के शिखर
पर स्थापित हुईं। ऑल इंडिया रेडियो द्वारा प्रसारित 'सरदार
पटेल मेमोरियल लैक्चर' श्रृंखला राष्ट्र की बौद्धिक
संपदा की अनमोल धरोहर है। रेडियो के ज्ञानवाणी जैसे नये प्रभाग शिक्षा के
विस्तार में उपयोगी भूमिका निभा रहे हैं। जिस प्रकार से अमेरिका और यूरोपीय
देशों में टेलिविजन के भरपूर विस्तार के बाद भी रेडियो का वजूद बना रहा है,
बल्कि रेडियो का सम्मान इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से
पुनर्स्थापित हुआ है, उसी प्रकार भारत में एफ.एम.
रेडियो की आवाज के जादू का भी फैलाव होने लगा है। जैसे-जैसे टेलिविजन का फूहड़पन
बढ़ रहा है और सचेत लोगों के पास टेलिविजन के सामने बैठे रहने का समय सिमट रहा
है, वैसे-वैसे एफ.एम. रेडियो की लोकप्रियता बढ़ रही है।
एफ.एम. रेडियो के कार्यक्रम कहीं भी, घर में,
दूकान में, कार में,
बगीचे में, एकांत में और सैर-सपाटे में
भी सुने जा सकते हैं। इस सदी की शुरूआत में एफ.एम. रेडियो चैनल की जब शुरूआत
हुई तो शायद ही किसी को अनुमान रहा होगा कि यह इतनी जल्दी लोकप्रिय हो जायेगा।
निजी क्षेत्र के लिए जब एफ.एम. रेडियो को खोला गया, तो
बड़ी संख्या में निजी कंपनियों ने एफ.एम. चैनल के प्रति उत्साह दिखाया। आज
स्थिति यह है कि एफ.एम. 400 करोड़ रुपए का वार्षिक
व्यवसाय कर रहा है, जो आगामी तीन-चार वर्षों में
चौदह-पंद्रह सौ करोड़ का हो जाने का अनुमान है।
इस अवधि में
एफ.एम. चैनलों की संख्या
300 तक
पहुंच सकती है। वह बड़े शहरों और कस्बों को पार करके ग्रामीण क्षेत्र में भी
प्रवेश कर रहा है। मीडिया से जुड़े अनेक संस्थानों ने एफ.एम. चैनल प्राप्त किए
हैं। इतने सारे एफ.एम. चैनलों के अस्तित्व में आने का लाभ रेडियो के क्षेत्र
में प्रतिभाओं को मिल रहा है। एफ.एम. चैनलों से जुड़ती प्रतिभाओं को बेहतर वेतन
और सुविधाएं मिलने लगी हैं। अलबत्ता इन कंपनियों को कर्मचारियों को वैसी
सुरक्षा नहीं मिल सकती, जो सरकार नियंत्रित आकाशवाणी
में उपलब्ध हैं। एफ.एम. चैनल मुख्यत: मनोरंजन प्रधान कार्यक्रमों का निर्माण और
प्रसारण करते हैं इसलिए अपने व्यवसायिक हितों के संवर्द्धन के लिए वे सस्ते
मनोरंजन को प्रमुखता देते हैं। लिहाजा श्रोताओं को शिक्षित,
प्रेरित और दीक्षित करने की भूमिका के निर्वहन की उम्मीद इनसे
नहीं करनी चाहिए। एफ.एम. रेडियो की स्पर्धा में आकाशवाणी की विविध भारती के लिए
भी आकाश खुला हुआ है। यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई पांच दशक पहले विविध भारती के
बंबई केंद्र ने गीतमाला के प्रसारणों के साथ श्रोताओं को जिस प्रकार से आकृष्ट
किया था, वह अब भी दोहराया जा सकता है। अमीन सयानी की
पांच दशक पुरानी बिनाका गीतमाला को पिरोने वाली मोहक आवाज कुछ दशकों के अवरोह
के बाद एक बार फिर से सम्मोहित कर रही है। उनकी आवाज का जादू प्रोत्साहित कर
रहा है नये उद्धोषकों को मनोरंजन के इस क्षेत्र को आजीविका बनाने के साथ ही
लोकप्रियता की बुलंदियों की ओर बढ़ने के लिए। एफ.एम. के माध्यम से रेडियो के
सुनहरे भविष्य के द्वार खुल रहे हैं।
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