क्रांति नहीं पुनर्जन्म हुआ है रेडियो का
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राजीव रंजन
प्रसाद
आवाज
की अपनी दुनिया है,
अपना असर है। मेरी आवाज ही पहचान है ऐसा गीत था जिसने बहुत
प्रभावित किया था। मेरी आवाज कुछ खास अच्छी तो थी नहीं लेकिन उसे पहचान बनाने
को मेरी तत्परता बेहद थी। बात बहुत पुरानी है, तब में
स्कूल में था, शायद कक्षा पांचवीं की बात है। बस्तर के
छोटे से नगर बचेली में उन दिनों अखबार तक बासी पढा जाता था। उन दिनों
दीन-दुनिया और उस नगर के बीच एक बडा सेतु था-रेडियो। आकाशवाणी जगदलपुर से
''बालवाडी'' क़ार्यक्रम प्रसारित
हुआ करता था, जिसमें अक्सर मेरी सहभागिता रहा करती। जिस
दिन कार्यक्रम का प्रसारण होता उस दिन पूरा मोहल्ला घर के आगे इकट्ठा हो जाता।
एक स्टूल पर रेडियो बाहर रखा जाता, फुल वाल्यूम पर...
और फिर जब तक कार्यक्रम प्रसारित होता सारे कान आवाज की दिशा में होते थे। मेरे
लिये यह बडा प्रोत्साहन था।
धीरे धीरे
तकनीक ने आवाज के साथ दृश्य जोड दिए। रेडियो पीछे छूटने लगे और रामायण और
महाभारत जैसे धारावाहिकों की ऑधी में मृत प्राय भी। विविधभारती और बिनाका गीत
माला को दूरदर्शन का चित्रहार निगलने लगा।... और समाचार के लिए कान में चिपके
रहने वाले डब्बे बीते दौर की बात हो गए। मेरी स्मृतियों में अब भी है कि उस युग
का छैला,
केवल अपने बेलबाटम से ही नहीं जाना जाता था,
बल्कि कान में रेडियो सटा हो जिस पर कोई रोमांटिक गीत
खर्र-खर्र की आवाज के बीच भी बज रहा हो और गर्दन दायें-बायें,
कदमों के साथ हो रही हो तब जनाब की पहचान थी। विविधता इतनी थी
कि कुन्दन लाल सहगल की आवाज से सुबह होती (और भोर ही भोर ''सो
जा राज कुमारी सो जा'' के साथ शुभ प्रभात) तो सिलोन
समाचार शुरू करता और हमारे स्कूल के बस्ते कंधे पर टंगे जाते। दोपहर स्कूल से
लौटते ही हवामहल में रेडियो एकांकी और प्रहसन तो शाम युववाणी। गाने तो खैर कई
कार्यक्रमों की प्रमुखता थी ही, जिसमे से फौजी भाईयों
के लिये कार्यक्रम विविध भारती पर फिल्मी सितारे प्रस्तुत किया करते थे,
जिसे सुनने के लिए घर के कई आवश्यक कार्य गैर वरीयता प्राप्त
हो जाते। सिबाका गीत माला का तो एैसा इंतजार होता कि आज की गृहणियां,
धारावाहिक सास भी कभी बहू थी का क्या करती होंगी। क्रिकेट और
हॉकी की कमेंट्री का तब जो आनंद और स्तर था...।
फरीदाबाद में
पोस्टिंग हुई और मैंने अपनी कार में स्टीरियो लगवा लिया। कार स्टीरियो में
रेडियो भी होता है यह मेरे लिए नई बात थी। रेडियो ही मेरे लिए अटपटा शब्द था,
आज के युग में और रेडियो? यह अभी
जिन्दा है? इसी जिज्ञासा में ऑफिस आते जाते रेडियो चला
लेता कि देखें आखिर क्या कार्यक्रम आते हैं। पहले तो यही चौंकने के लिए काफी था
कि रेडियो कही रेड एफ-एम है तो कहीं मिर्ची। कार्यक्रम प्रस्तोता अब रेडियो
जॉकी हो गये हैं और अंदाज भी प्रसारण का बदल गया है। विज्ञापन भी रेडियो पर खूब
बरस रहे हैं और एस.एम.एस. भी। गाने ही गाने.. आफिस जाने और आने के बीच एफ.एम.
के कई चेनल्स... और बोरियत बिलकुल नहीं, चूंकि रफी से
ले कर हिमेश रेशमिया तक जिसका जब मन हो किसी न किसी चेनल पर हाजिर हैं। इसके
अलावा किस रास्ते में कहां जाम लगा है, आज किस सड़क से
जाएं किस से न जाएं। रेडियो और गाडी एक दूसरे का सुन्दर पर्याय हो गये हैं (आटो
भी.... इस शान की सवारी में रेडियो नहीं तो कुछ नहीं) महीनों सुनने के बाद में
इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रेडियो तो पुनर्जीवित हो चुका है किन्तु एक क्रांति
की तरह नहीं। मनोरंजन का एक और सशक्त माध्यम। मैं यदि अपनी मनोदशा की ही
विवेचना करूं तो कार के अलावा रेडियो की घर पर आवश्यकता कभी महसूस ही नहीं हुई।
इस उधेडबुन ने यह जानने पर विवश किया कि रेडियो की पहुंच कहां -कहां तक है।
मैंने अंतरजाल से आंकड़े जुटाने की जगह एक सर्वे करना अधिक उपयोगी समझा और यह
इसलिए भी कि पके-पकाये आंकड़े तो सर्वसुलभ हैं किंतु कितने सच्चे हैं और कितने
व्यंजन बनाए गये हैं इसकी कोई परख संभव नहीं। एक जैसे लोगों से भी एक तरह की
सोच मिल पाती तो मैंने घूम भटक कर चर्चायें परिचर्चाएं करने की सोची।
सुबह सुबह कार
में मिर्ची सुनता हुआ (खाने वाली मिर्ची
21 वीं
सदी में उतनी तीखी नहीं रही) निकला और मेरा निशाना थे मेरे एक अभियंता मित्र।
घर पहुंचा और चाय की फरमाईश के साथ ही कुछ प्रश्न दाग दिए। मित्र हमारे
बुध्दिजीवी जो ठहरे सो रेडियो पर बहुत अधिक जानकारी न रखने की झेंप उन्हें
मिटानी ही थी। बोले ''यार कार तक तो रेडियो और हमारा
गहरा रिश्ता है किंतु इसके आगे नहीं। रेडियो वहीं स्पेस पा सकता है जो मीडिया
और मनोरंजन के अन्य साधनों ने छोड़ दिया हो। आप ही बताईये कि समाचार समसामयिक
कार्यक्रम और मनोरंजन के कार्यक्रम में घर-घर पहुंचे टेलीविजन से क्या इसकी होड
हो सकती है? आजकल वैसे भी देखने वाले गाने ज्यादा बनते
हैं और उन्हें मजबूरी में ही सुना जाता है जब हम कार में होते हैं (इस वाक्य के
साथ उनके ठहाकों को मैं सही शब्द नहीं दे सका।) लेकिन यह आरंभ है,
लोगो के पास निरंतर समय की कमी होती जा रही है इससे मुझे लगता
है कि आने वाले समय में रेडियो महत्वपूर्ण माध्यम होगा। समय नहीं है समाचार
देखने का तो सुन ही लिया जाए, दौड़ते भागते,
गाने समय बताते रहें और बीच- बीच में संजीव कपूर खाने के खजाने
परोसें... सास....बहू के झगड़े सुन कर कामकाजी महिलाएं आनंदित होंगी। टीवी ले कर
तो आप हर जगह जा नहीं सकते, लेकिन मोबाईल हर पर्स और
जेब की वस्तु बन गया है। मोबाईल में एफ-एम रेडियो होना आम बात है। रेडियो की
महत्ता तब समझ में आती है जब सचिन की बैटिंग चल रही हो और आप ऑफिस में हों। कान
में इयर फोन ठूसिये और सेंचुरी तक बॉस को अनसुना कर दीजिये। पर एक बात में
जोडना चाहूंगा मित्र ने पकोडे क़ा पूरा आनंद लेते हुए कहा ''रेडियो
कमेंट्री में वो पुराना वाला स्तर रहा नहीं। इतनी सुस्त कमेंट्री करते हैं कि
मजा किरकिरा हो जाता है।
मेरा मानना है
कि पान और रेडियो एक दूसरे के पूरक की तरह विकसित हुए हैं। सोचा कि खई के पान
बनारस वाला किसी चौरसिया जी से रेडियो पर चर्चा की जाए। फरीदाबाद में गुटखा
खोरों की अच्छी खासी तादाद है लेकिन पान की दूकान उस मात्रा में दृष्टिगोचर
नहीं होती। पान की दूकानें मिलीं भी लेकिन रेडियो कईयों में नदारद थे । हां कई
पानवालों ने छोटा सा टीवी जरूर अपनी गुमटी में रख लिया था। कारण पूछा तो पता
चला यह भी मार्केटिंग स्ट्रेटजी है। क्रिकेट मैच के दौरान या किसी चेनल के
चलाये स्टिंग आपरेशन के समय भीड़ खींचने के लिये बुध्दुबक्सा बहुत कारगर है। और
रेडियो क्यों नहीं?
इस प्रश्न पर पान हमारे हाथ में थमाते हुए काबिले गौर उत्तर
दिया गया ''साहब जमाने के साथ चलना पड़ता है''।
यानी आपके अनुसार अभी रेडियो का दौर आया नहीं है, मेरा
प्रश्न सीधा सा था, ना में सिर हिला दिया गया।....।
दूसरा पान खाने की नौबत आ गयी थी चूंकि जहां चाह होती है वहं राह होती है। शान
से रेडियो बज रहा था। पहले सियार के रोने जैसी कुछ आवाज आयी,
गाड़ी धीमे की और कानों पर जोर दिया तो हमारी बॉछें खिल गयी।
हिमेश रेशमिया जी का गीत रेडियो पर स्पीकर की सहनशक्ति से परे बज रहा था। हमने
पूरा इंटरव्यू ले डाला। जनाब रेडियो के बहुत बड़े मुरीद निकले। बोले ''साहब
जो रेडियो की काबलियत है वह और किसी मीडियम में नहीं। ये रेडियो आप देख रहे हैं
हमको दहेज में मिला था और तभी से हमारा साथी हो गया है''
मैंने सोचा कि समय के साथ रेडियो पर हुए बदलाव पर उनकी राय भी
ले लें। उत्तर बडंा समसामयिक था। पहले टाईम बंधा था गानों का और बार- बार
रेडियो का कान उमेठना पडता था। आजकल तो साहब इतने एफ.एम. चैनल हैं कि जो लगा
दीजिए दिन भर गाना देते हैं। एक बार तो हम फोन भी किये थे रेड एफ.एम. वाली पूजा
जी को। उसी में पिक्चर का टिकट जीते थे। पी.वी.आर. का टिकट था,
हम तो कुर्सी में बैठते ही निहाल हो गए।
हमारी श्रीमती
तो रेडियो सुनती नहीं इस बात की हमारी जानकारी पुख्ता थी (संभावना है,
पतियों के ज्यादातर दावे गलत निकलते हैं)। फिर भी दो -चार फोन
घुमाने पर हमारे एक मित्र की रेडियो प्रिय पत्नी जी से मुलाकात (बाकायदा
एप्वाईटमेंट लेकर) हो ही गयी। बोली ''भाईसाहब ये तो दिन
भर घर में रहते नहीं तो रेडियो घर का सूनापन दूर कर देता है। आजकल इतने अच्छी
तरह से कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं कि जमाना हो गया स्टीरियो पर कोई गाना
सुने। गाहे-बगाहे मैं रेडियो ऑन कर लेती हूं, संपूर्ण
मनोरंजन''। मैंने अपनी सर्वे रिपोर्ट सामने रख दी। गाने
छोड क़र कोई प्रोडक्टिव फायदा मेरे सामने अब तक नहीं आया था। वे पुन: बोल पडी
''भाई साहब आप अपनी रूचि की हर चीज यहां पा सकते हैं।
मेरे लिये मेकप टिप्स से ले कर नयी रेसेपी की जानकारी तक सहज उपलब्ध है रेडियो
पर खेती बाडी ज़ैसे बोरिंग कार्यक्रम भी यदा-कदा मैंने चैनल बदलते हुए सुने हैं।
बहुत कुछ उपलब्ध है रेडियो पर, यह आपके केलिबर पर है कि
कहॉ और क्या ,साथ ही किस चैनल पर ढूंढ रहे हैं। ठीक
वैसे ही जैसे आज तक पर समाचार ही मिलेंगे और जी टीवी पर सीरियलस। दूरदर्शन पर
तो आप जानते ही हैं...'' मैने आटो पर सवारी करने की
सोची। उपसंहार के लिए इससे बेहतर तो कुछ था नहीं। बाकायदा सजी धजी,
रंग-बिरंगी, शेर-शायरी से परिपूर्ण एक
आटो मुझे मिल भी गयी जिस पर रेडियो सुशोभित था। ''रेडियो
होने से साहब नया केसेट नहीं खरीदना पडता, वेराईटी हर
समय मिल जाता है। गाना ही साहब हमारे लिए तो थकान मिटाने का जरिया है और सवारी
भी खुश हो जाता है'' सपाट सा उत्तर। रेडियो पर बहुत सी
और बहुतों से मैंने चर्चा की और निष्कर्ष तो यही है कि रेडियो क्रांति जैसी कोई
बात अभी नजर नहीं आती। हॉ रेडियो का पुनर्जन्म जरूर हुआ है। रेडियो ने माध्यमों
की क्रांति से गुजर रहे इस युग में अपनी ठोस उपस्थिति दर्ज करायी है। अभी वही
चल रहा है जहां स्वयं को स्थापित करने के लिए जन-प्रिय कार्यक्रम ही प्रस्तुत
किये जाऐं। कई स्थापित कार्यक्रमों का स्तर भी घटा है। किंतु संभावनाएं अपार
हैं।
राजीव रंजन प्रसाद-
कवि एवं साहित्यकार हैं। इंटरनेट पर भी सक्रिय । इन दिनों फरीदाबाद हरियाणा में
रहते हैं ।
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