पब्लिक ब्राडकॉस्टिंग और जनसंपर्क
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कृष्णचंद्र
मौलि
भारत
में रेडियो प्रसारण मई,
1924 में एमेच्यूर रेडियो क्लब के रूप में प्रारंभ हुआ था। कई
वित्तीय कठिनाईयों और परेशानियों से गुजरता हुआ अलग-अलग नामकरणों के बाद वर्ष
1936 में ऑल इंडिया रेडियो के नाम से देश में नियमित
रेडियो प्रसारण होने लगा। आल इंडिया रेडियो का हिन्दी नाम वर्ष 1927
से ही ''आकाशवाणी'' रख दिया गया
था। यही नाम आजतक चलन में है।
तत्कालीन
ब्रिटिश सरकार के लिए तो
''आकाशवाणी''
कभी पब्लिक ब्राडकॉस्टर नहीं था, ना ही
उन्हें इस की आवश्यकता थी। ब्रिटिश सरकार के लिए आकाशवाणी विश्वयुध्द के दौर
में अपने प्रोपगेंडा और सेना का मनोबल बनाए रखने का एक साधन मात्र था। चाहे
सूचनाएं हों या टिप्पणियां या आलोचना सभी संदेश विश्वयुध्द में भारत को झोंकने
और इस निर्णय के औचित्य और समर्थन में केवल प्रोपागाण्डा ही था। स्वाभाविक ही
है कि इस दौर में आकाशवाणी पब्लिक ब्राडकॉस्टर नहीं बन पाया।
आजादी के बाद
ही आकाशवाणी को पब्लिक ब्राडकॉस्टर (लोक प्रसारक) का जामा पहनाया जा सका
क्योंकि आजादी के बाद भारत सरकार को जन-जन तक पहुंचना था और उनकी भागीदारी से
देश को नई ऊंचाईयों तक ले जाना था। ठीक यही समय था जब भारत सरकार के सूचना
प्रसारण मंत्रालय द्वारा रेडियो (आकाशवाणी) को अन्य कार्यक्रमों के साथ -साथ
पब्लिक ब्राडकास्टर की भू्मिका निभाने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। यही दौर
था जब रेडियो जनसम्पर्क के उपकरण के रूप में न केवल उपयोग में आने लगा बल्कि
लोकप्रिय भी हुआ।
रेडियो की
लोकप्रियता,
विस्तार और उस की दूरस्थ अंचलों तक पहुंच के कारण राज्य
सरकारों ने इस माध्यम का सर्वाधिक उपयोग किया। वैसे भी रेडियो के विस्तार के
आरंभिक दौर में राज्यों के राजधानियों के साथ प्रमुख आंचलिक शहरों में भी
आकाशवाणी केन्द्र खुले। इससे गांव-गांव में सस्ते और गुणवत्ता के एसीडीसी
ट्रांजिस्टर सेट की सरल उपलब्धता ने दूरस्थ ग्रामों में लक्ष्य समूह तक सरकार
की नीतियों, योजनाओं, घोषणाओं
और विभिन्न सामाजिक सरोकारों के निर्णयों से लगातार सूचित करने और
प्रचार-प्रसार को सुगम बना दिया।
शीघ्र ही छवि
निर्माण के साथ-साथ रेडियो लक्ष्य समूहों को सूचित,
शिक्षित, संचारित करने और फीड बैक
प्राप्त करने का एक सशक्त माध्यम बन गया। भारत सरकार द्वारा रेडियो को पब्लिक
ब्राडकास्टर का उत्तरदायित्व सौंपा जाना सोने में सुहागा साबित हुआ। रेडियो एक
आकर्षक, लोकप्रिय, विश्वसनीय शत
प्रतिशत सकारात्मक और रचनात्मक तथा विषय परक माध्यम के रूप में राज्य सरकारों
के हाथ लग गया।
देखते-देखते
रेडियो समाचारों,
समायिक चर्चाओं तथा मनोरंजन माध्यम के अलावा राज्य सरकारों की
आवाज को जन जन तक पहुंचाने का एक प्रभावी साधन बन गया। समाचार बुलेटिनों की
संख्या बढ़ी। अब औसतन दिन भर में चार-चार बुलेटिन प्रसारित होने लगे। सरकारी
समाचारों और कल्याणकारी सूचनाओं के विश्लेषण और निष्कर्षों के लिए वार्ताएं
आयोजित होने लगीं। समाचारों पर आधारित न्यूजरील (समाचार पत्रिकाएं) प्रसारित
होने लगीं। इन प्रसारणों में आवश्यकतानुसार वाइस, बाइटस
तथा साउन्ड एफेक्टस का भी प्रयोग होने लगा। राज्य सरकारों की योजनाओं,
घोषणाओं, नीति संबंधी प्रस्तावताओं और
विकास की गति पर आधारित सूचनाओं को लक्ष्य समूह तक पहुंचाने के लिए सामयिक
विषयों पर ''आजकल'' कार्यक्रम
होने लगे। दिल्ली से राष्ट्रीय प्रसारण में राज्यों की चिट्ठियां और प्रादेशिक
स्तर पर जिले की चिट्ठियां प्रसारित होने लगीं। इन सभी कार्यक्रमों ने राज्य
सरकारों को अपने जनसम्पर्क गतिविधियों के लिए एक बहुत बड़ा केनवास उपलब्ध करा
दिया।
इधर भारत
सरकार और राज्य सरकारों ने देश में शिक्षा,
कृषि, स्वास्थ्य,
सिंचाई, पेयजल,
उद्योग, महिला बाल विकास,
बच्चों और युवा उत्थान, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति
कल्याण और समूचा ग्राम विकास को अपने राजनैतिक मेनिफेस्ट्रो (घोषणा पत्र) तथा
सरकारी एजेण्डा में प्रमुखता और वरीयता देने का फैसला किया तो आकाशवाणी क्यों
पीछे रहे? आकाशवाणी केन्द्र और राज्य सरकारों की इस
भावना के अनुरूप अनेकों नए कार्यक्रम आरंभ कर दिए।
ऐसे
कार्यक्रमों में से प्रमुख रूप से स्कूल ब्राडकास्टिंग,
उद्योग जगत, ग्रामीण विकास,
कृषि पशु पालन एवं घर गृहस्थी, महिला
विकास, बाल विकास, युववाणी आदि
हैं जो आकाशवाणी के लोकप्रिय कार्यक्रम बने। राज्य सरकार अब अपनी बात को
उपरोक्तानुसार वर्गीकृत लक्ष्य समूह तक पहुंचाने में अधिक सफल हुई। राज्य
सरकारों की उपलब्धियों पर रेडियो डाक्यूमेन्टरियों का प्रसारण के साथ-साथ
मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों,
विकास कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने वालों की वार्ताओं और लक्ष्य समूहों से
सीधी बात जैसे कार्यक्रम आयोजित होने लगे।
यह सब कुछ
राज्य सरकारों के जनसम्पर्क कार्यक्रमों और अभियानों के लिए वरदान साबित हुआ।
सरकारी माध्यम होते हुए भी प्रसारणों की विषय परखाता के कारण विश्वसनीयता भी
बढ़ी और कायम रही। जनसंपर्क के इतिहास में पब्लिक ब्राडकॉस्टर आकाशवाणी (रेडियो)
की प्रभावी भूमिका अपने आप में न केवल शोध का एक दिलचस्प विषय ही है बल्कि
रेडियो जनसंपर्क कर्म में एक अनिवार्य उपकरण के रूप में स्थापित हो गया है।
लेखक
अपर संचालक, जनसंपर्क तथा म.प्र.सरकार में संचार सलाहकार रहे । पब्लिक रिलेशन्स
सोसायटी ऑफ इंडिया भोपाल चेप्टर के अध्यक्ष हैं तथा माखनलाल चतुर्वेदी
पत्रकारिता विवि, भोपाल में विजिटिंग फेकल्टी है ।
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