रेडियो है भरोसेमंद और दोस्ताना - अंबरीन हसनात
(अमेरीका के
रेडियो सलाम नमस्ते की वाइस प्रेसीडेंट अंबरीन हसनात से जयप्रकाश मानस की
बातचीत)

अमेरीका के
रेडियो 'सलाम-नमस्ते'
की वाइस प्रेसीडेंट अबरीन हसनात गाने,
अभिनय करने, कुकिंग और नए दोस्त बनाने में रूचि रखती
हैं। 28 नवंबर उनका जन्मदिन है और उन्होंने जनसंचार की
पढ़ाई की है। अपने परिवार और दोस्तों से प्यार करने वाली हसनात को अच्छे खाने और
अच्छी कंपनी में रहने में आनंद आता है। भगवान में भरोसा रखने वाली हसनात का
संदेश है जियो और जीने दो। आबूधाबी और डलास में वे बहुत सारे रेडियो शो कर चुकी
हैं। हसनात ने डेढ़ सौ से ज्यादा रेडियो और टीवी प्रोग्राम का निर्माण,
लेखन और निर्देशन किया है। इन दिनों वे रेडियो सलाम-नमस्ते के
माध्यम से अमेरीका में एशिया मूल के लोगों को स्वस्थ्य मनोरंजन प्रदान करने तथा
उनमें
सामुदायिक एकता का विकास करने में लगीं हैं।
सृजनगाथा
डॉट कॉम के संपादक जयप्रकाश मानस ने उनसे खास बातचीत की।
बातचीत में खास रूप से सहयोग दिया अमेरिका के चर्चित हिंदी सेवी
आदित्य प्रकाश सिंह
ने । इसी
चर्चा के अंश :-
अमेरिका जैसे पश्चिमी माहौल वाले देश में हिंदी रेडियो (रेडियो
सलाम नमस्ते) लांच करने के पीछे आपकी सोच क्या थी?
इसके मूल में व्यावसायिकता थी या हिंदी का विस्तार या वैश्विक
अनुसमर्थन या कुछ और ही?
-रेडियो सलाम नमस्ते के लांच का मुख्य कारण डैलास की
कम्युनिटी में एकता पैदा करना था और साथ ही साथ यह भी चाहते थे कि देश से दूर
परदेश में रहने वाली देशी जनता के पास उनकी तफरीह (मनोरंजन) का कोई सामान
मुहैया किया जा सके। हमारा मकसद था कि दक्षिण एशियाई इस चैनल के जरिए अपनी भाषा
सुन सकें और हिंदुस्तानी संगीत के जरिए अपनी संस्कृति को याद रखें । बात यह है
कि समुदाय और स्थानीय व्यवसाय का समर्थन और हमारी टीम की मेहनत की वजह से हमें
ना सिर्फ वित्तीय कामयाबी मिली बल्कि अंतर्राष्ट्रीय शोहरत भी मिली।
अमेरिका से वैश्विक रेडियो लांच करते समय आपने रेडियो के समक्ष
विद्यमान चुनौतियों को किस तरह मूल्यांकित किया?
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किसी भी नए व्यवसाय की तरह रेडियो सलाम नमस्ते को भी बहुत सी
चुनौतियों का सामना करना पड़ा । मसला न सिर्फ पैसों का था बल्कि अच्छी कला का भी
था। क्योंकि डैलास में रहने वाले ज्यादातर देशी यूनाइटेड स्टेट्स में काम की
तलाश में आते हैं। सभी की पृष्ठभूमि गैर मनोरंजनात्मक क्षेत्र से होती है जिसकी
वजह से अच्छे कलाकारों की कमी बहुत ज्यादा महसूस होती है। कहने का आशय स्तरीय
और योग्य कलाकारों को प्राथमिक दौर में तलाशना हमारे लिए बहुत मुश्किल था। इन
कलावंतों की पहचान और संपर्क साधने की बात भी थी। इसके अलावा सिर्फ चंद लोगों
के साथ इतनी बड़े व्यवसाय की बुनियाद रखना नामुमकिन नहीं लेकिन मुश्किल जरूर है।
आप स्वयं समझ सकते हैं कि हिंदी रेडियो की उपलब्धता और आम हिंदी भाषियों में
उसकी पहुंच बनाने में हमें किन-किन रास्तों से गुजरना पड़ा होगा। ऊपर से कानूनी
औपचारिकताओं और मापदंडों में भी हमें खरा उतरना पड़ा होगा,
पर हमने हिम्मत नहीं हारी और अपने काम में डटे रहे।
रेडियो सलाम नमस्ते की रणनीतियों में रेडियो की वापसी और उसकी
प्रतिष्ठा जैसे उद्देश्यों को कैसे तरजीह देती है?
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रेडियो सलाम नमस्ते की शुरूवात प्रकारांतर से रेडियो की वापसी
ही है। अमेरिका और पश्चिमी देशों में लोग टीवी से लगभग ऊबने लगे हैं। उन्हें अब
टीवी चिढ़ाने सा लगा है। रेडियो वहां पहले से था पर एक दौर ऐसा आया था जब ये
इलेक्ट्रानिक मीडिया एक तरह से रेडियो को लीलने लगा था। शहरी वातावरण से रेडियो
गायब होने लगा था किंतु अब रेडियो अधिक भरोसेमंद और दोस्ताना लगने लगा है। फिर
यह मनौवैज्ञानिक रूप से सच है कि रेडियो के प्रति आम परिवार में उतनी चिढ़
नहीं है उतना चिढ़ टीव्ही के प्रति है। ऐसी परिस्थिति में रेडियो सलाम नमस्ते से
यदि किसी तरह रेडियो की वापसी जैसी कोई स्थिति बनती है तो यह एक योगदान हो सकता
है। हम रेडियो को पुर्नप्रतिष्ठित करने के लिए ही इसे इंटरनेट पर ऑनलाइन भी रख
रहे हैं ताकि यह विश्व के श्रोताओं तक रेडियो के रूप में अलख जगा सके। एफएम
पर तो यह है ही। आने वाले दिनों में हम कुछ ऐसे खास आयोजन भी करने वाले हैं
ताकि लोगों में रेडियो के प्रति आस्था बढे।
रेडियो सलाम नमस्ते को बहुभाषीय चैनल बनाने के पीछे कौन सा
लक्ष्यबोध है?
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जैसा कि आप हमारे रेडियो के नाम से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि
यह रेडियो किसी एक मजहब या जाति को प्रमोट नहीं करता बल्कि यह परदेश में रहने
वाले तमाम साउथ एशियन देशी लोगों के लिए है। हिंदुस्तान,
पाकिस्तान, बांग्लादेश,
नेपाल और श्रीलंका में कुल मिलाकर तकरीबन 25
भाषाएं बोली जाती हैं और हमारे ख्याल में ये बहुत जरूरी है कि
हम ज्यादा से ज्यादा इन भाषाओं को प्रोत्साहित करें। वर्ना कहीं ऐसा न हो कि
देश से बाहर आने वाली नयी नस्ल कहीं अपना पहचान ना खो दे। चैनल को बहुभाषीय
स्तर पर प्रतिष्ठित करने के मूल में भाषा सेतु बने,
उन्हें लेकर मन में भेद न रहे। वैश्वीकरण के इस दौर में एक ही भाषा अर्थात्
अंग्रेजी के वर्चस्ववादी दीवारों के बीच भारतीय भाषाओं को वैश्विक परिवेश में
ढालने की पहल के रूप में भी रेडियो सलाम नमस्ते को देखा जा सकता है। किंतु
इसका दावा करना हमारे लिए अविनम्र कदम भी हो सकता है,
सो हम इसे भविष्य में आंकना चाहेंगें। अभी इसे दृढ़ता से कहना अवैज्ञानिक और
अतिश्योक्ति होगी।
रेडियो में हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं और लोकभाषाओं को
वैश्विक बनाया जा सकता है?
इसकी संभावना को आप कैसे देखती हैं ?
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हिंदी, ऊर्दू,पंजाबी
और बहुत सी दूसरी भाषाएं अब मुख्यधारा में भी पहचानी जाने लगी हैं और एक साउथ
एशिएन मीडिया चैनल होने की वजह से ये हमारा फर्ज है कि हम इन भाषाओं का प्रचार
करें और इन्हें लाइमलाइट में लें। भारतीय भाषाएं ही नहीं विश्व की कई भाषाएं
व्यवहार के अभाव में काल के गर्त में जा चुकी हैं। यह सभी को विदित है कि आज
जिस तरह की भाषायी राजनीति विश्व बाजार में अपनी ताकत का विस्तार कर रही है वह
कम खतरनाक नहीं। यह प्रकारांतर से किसी एक भाषा की दुनिया को गढ़ने जैसा कदम
साबित होने वाला है। क्या इसके पीछे अन्य भाषा की समाप्ति के ध्वस्तीकरण की
चालाकियां हैं। भाषायी विविधता को बचाए बिना वैश्वीकरण बेकार है। यह ज्ञान,
तकनीकी विरासत, संस्कृति की विविधता को
भी खत्म करने जैसा हो सकता है। अब जबकि वैश्वीकरण में भी गुंजायश है-खासकर
सूचना और संचार की प्रविधियों में जहां प्रिय और स्थानीय भाषाओं को विस्तारित
करना ज्यादा कठिन नहीं रह गया है। तो रेडियो सलाम नमस्ते जैसे प्रयासों से
विभिन्न संस्कृतियां, अभिरूचियों और मन की संवेदना को
बचाया जा सकता है । जाहिर है भाषाएं इनके मूल में हैं। आप इंटरनेट को ऐसी
सकारात्मक दिशा में देख सकते हैं।
क्या पश्चिम और खासकर अमेरिका में रेडियो की वापसी हो रही है?
क्या रेडियो की वापसी पूर्णत: संभव है?
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इसमें कोई शक नहीं है कि एफएम के आने से रेडियो बहुत तरक्की कर
रहा है और हम चाहते हैं कि बढ़िया कार्यक्रम के जरिए हम उसे बहुत आगे ले जाएं।
हमारी आशा है कि ऊपरवाले की दया से और हमारे सुनने वालों की मदद से हम जल्द ही
यूएसए के कई दूसरे शहरों तक पहुंच जायेंगे और वह दिन दूर नहीं जब रेडियो सलाम
नमस्ते का नाम दुनिया के दूसरे देशों में भी सुना जा सकेगा।
अत्याधुनिक
तकनीलॉजी वाले वैश्विक परिवेश में जहां बहुवैकल्पिक मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं
रेडियो के प्रति विभिन्न वर्ग के श्रोताओं का रूझान कैसा है?
अंतरजाल यानी इंटरनेट की भूमिका इसमें किस तरह उपयोगी साबित हो
रही?
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आज के दौर में जब बच्चे-बूढ़े और जवान सभी कम्प्यूटर का
इस्तेमाल आसानी से कर लेते हैं, हमारी ऑनलाइन
ब्राडकास्टिंग की वजह से सिर्फ यूएसए की दूसरी स्टेट के श्रोता ही नहीं बल्कि
दुनिया के कई दूसरे देशों में हमें सुना जाता है। हमारी आनलाइन सर्विस के जरिये
लोग डैलास या न्यूयार्क में बैठे-बैठे गीतों के माध्यम से अपने मुहब्बत भरे
संदेश भारत में रहने वाले अपने परिवार तक पहुंचा सकते हैं। हमारी आनलाइन सर्विस
को सभी सुनने वाले बहुत पसंद करते हैं क्योंकि इसके जरिये रेडियो की कवायद
नहीं होती, यदि उनके पास इंटरनेट की सुविधा है तो वे
आसानी से सलाम नमस्ते का मजा ले सकते हैं।
हिंदी के वैश्वीकरण में रेडियो की भूमिका को आप किस तरह
देखती हैं?
इस दिशा में सरकार, समाज और
मीडियाकर्मियों से क्या अपेक्षाएं हैं?
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हमारा मकसद है कि हम भारतीय भाषाओं और संस्कृति को जितना हो
सके उन्नत बनाएं क्योंकि अमेरिका में पलने वाली इस नयी नस्ल के लिए अपनी जड़ों
की पहचान कराना बहुत जरूरी है। जहां तक हिंदी के वैश्वीकरण का प्रश्न है और
इसमें रेडियो की भूमिका को लेकर मेरे मन में सकारात्मक विचार हैं। हिंदी के
वैश्वीकरण में रेडियो बहुत रसमय और आकर्षक श्रव्य माध्यम साबित हो सकता है।
इसमें आप कई ऐसे रेडियो का नाम जानते हैं ही हैं जिनके हिंदी प्रसारण समूचे
दुनिया में प्रसिध्द हैं। यह केवल समाचारों या मनोरंजनात्मक चीजों का ही
प्रसारण नहीं है अपितु हिंदी की ताकत और उसमें विद्यमान शक्ति और संस्कृति का
भी प्रसारण है। हिंदी के वैश्वीकरण में जैसा कि हम सभी जानते हैं आज इंटरनेट
सबसे कारगर भूमिका में है और जिसके माध्यम से हिंदी भाषा,
साहित्य, गीत,
संगीत, संस्कृति आदि समूचे विश्व के लिए एक क्लिक पर
उपलब्ध होने लगा है। आन लाइन पाठय सामग्री और आनलाइन दूरदर्शन के बनिस्बत,
रेडियो या आनलाइन रेडियो ऐसा घटक है जिसे किसी अन्य कार्य के
साथ भी सुन सकते हैं। यहां श्रोताओं का भावबोध कहीं अधिक कारगर हो उठता है।
संक्षेप में कहें तो रेडियो हिंदी सहित अन्य भाषाओं की वैश्विक स्थापना के लिए
अति महत्वपूर्ण तकनीक है। जाहिर है विश्व बाजार में ऐसे रेडियो चैनलों की
स्थापना को लेकर संबंधित देशों को अधिक उदार होना होगा ताकि उस देश के विविध
भाषाभाषियों के लिए मनोरंजन सह ज्ञान का श्रव्य साधन भी उपलब्ध हो। विदेशों में
भाषिक आधार पर संरक्षण का पाठ भी है। मीडियाकर्मियों को ऐसे कला माध्यमों को
सकारात्मक दृष्टि से स्वीकारना चाहिए। खासकर उन्हें जो दृश्य माध्यमों के
ग्लैमर और नोटों की वर्षा में नहा रहे हैं। यह दृश्य माध्यमों की विकृतियों से
भाषायी समाज या समुदाय को बचाने जैसी भी उदारता होगी और इसकी जरूरत में समझती
हूं इस समय अधिक है।
भारतीय रेडियो चैनलों के बारे में आप क्या सोचते हैं
? इस
दिशा में सुधार के कदम किस तरह उठाये जा सकते हैं खासकर सरकारी नीतियों में किस
तरह अधिकतर खुलापन लाया जा सकता है?
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यूएसए में ज्यादा देशी रेडियो चैनल्स लोग शौकिया शुरू करते हैं,
बिना किसी योजना के, ना उनके पास सही
वित्तीय समर्थन होता है ना ही अच्छे कलाकार। जिस वजह से सुनने वाले उनकी मेहनत
का उतना फायदा नहीं उठा सकते और निम्न व्यावसायिक योजना के कारण से उनका
व्यापार या स्टेशन आखिरकार बंद हो जाता है। मैंने सुना है कि भारत में भी
स्थानीय स्तर पर रेडियो चैनलों की स्थापना पर जोर दिया जा रहा है और वहां
नीतिगत उदारता भी है। रेडियो चैनलों की शुरूआत के लिए कानून यदि अधिक
प्रजातांत्रिक और सरल हों तो भारत जैसे देश के लिए सुखद कारगर कदम होगा।
सामुदायिक रेडियो का विस्तार ग्रामीणों के उत्थान के लिए आवश्यक है इस दिशा में
भी वहां, निर्णय लिया जाना चाहिए । रेडियो चैनलों की
स्थापना के लिए प्राथमिक शुल्क को किस तरह कम किया जाए,
यह भी सोचने का विषय हो सकता है ताकि एक घराने के स्थान पर कुछ क्रियाशील समूह
भी ऐसे रेडियो स्टेशनों की शुरूआत करने की हिम्मत जुटा सकें।
अन्य सभी माध्यमों के बीच रेडियो अपना भविष्य किस तरह
निर्धारित करेगा?
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टीवी का मजा उठाने के लिए देखने वाले को सब काम छोड़कर एक जगह
बैठना होता है जबकि रेडियो के लिए सिर्फ कान की दरकार है। जिसकी वजह से
रेडियो हर जगह लोगों के साथ रहता है। आजकल की तेज रफ्तार जिंदगी में लोगों के
पास वक्त कम होता जा रहा है और वो कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा हासिल कर
लेना चाहते हैं । इसी वजह से रेडियो मनोरंजन अधिक सुविधाकारी है। दूसरा यह कि
टी.वी. पर आये दिन नये कार्यक्रम और नये कलाकार आते हैं जिनके साथ देखने वाले
का कोई संबंध नहीं बन पाता। जबकि रेडियो के प्रस्तोता को अपने सुनने वाले से
आवाज का एक अनदेखा पर बहुत ही करीब का रिश्ता होता है। सो हमें टीवी चैनल्स से
कोई डर नहीं... रेडियो कल भी था, आज भी है और कल भी
रहेगा, सलाम नमस्ते।
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