रेडियो ने जीवित रखी छत्तीसगढ़ की अस्मिता
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डॉ.सुधीर
शर्मा
रेडियो को मैं
देववाणी मानता हूं। धार्मिक ग्रंथों में देवी-देवताओं ने जिस संचार माध्यम का
सहारा लिया वह आज के रेडियो के जैसा ही था। कल्पनाओं के समयानुसार साकार रूप
ग्रहण किया और रेडियो भी इसमें एक महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत के आकाशवाणी की
समूची परिकल्पना और परिणित योजना देववाणी से किसी भी स्थिति में कमतर नहीं है।
आकाशवाणी ने न केवल हिन्दी के माध्यम से भारतीय अस्मिता को जीवित रखा अपितु
उसने लोकभाषाओं के उन्नयन में सार्थक भूमिका का निर्वाह कर क्षेत्रीय अस्मिता
की भी रक्षा की। आकाशवाणी के माध्यम से रेडियो की यह दैवीय कृपा आज भी निरंतर
जारी है। वस्तुत: रेडियो आम आदमी विशेषकर गरीबों और किसानों के लिए देवदूत बनकर
आज भी उनसे निरंतर आत्मीय संबंध बनाए हुए है। इसी प्रक्रिया के चलते रेडियो ने
छत्तीसगढ़ी भाषा के गौरव और अस्मिता को बनाए रखा।
बचपन में जब
सुबह-सुबह आकाशवाणी रायपुर से आवाज आती थी - ये आकाशवाणी का रायपुर केंद्र है।
मैं लाल रामकुमार सिंह। तो लगता था कि ये मधुर सी आवाज का मालिक कौन है। आज
श्री लाल रामकुमार सिंह का सानिध्य मिलता है तो अपने आपको बड़ा महसूस करने लगता
हूं। आकाशवाणी रायपुर का रेडियो वस्तुत: छत्तीसगढ़ी के लिए रचा-बुना गया। चौपाल
से हुई शुरूआत आज अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से गांव-गांव में छत्तीसगढ़ी के इस
रेडियो को पहुंचा रही है। छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के लिए इस रेडियो ने प्राणतत्व
का कार्य किया है। आज छत्तीसगढ़ी का लोक-गीत-संगीत दुनिया भर में लोकप्रिय है तो
उसके पीछे इसी रेडियो की मेहनत है। आप मन के गीत के लोकप्रियता से आप सब वाकिफ
हैं। आज पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र,
लक्ष्मण मस्तुरिया, दानेश्वर शर्मा,
विमल पाठक, रामेश्वर वैष्णव जैसे
चर्चित नाम छत्तीसगढ़ी की आकाशवाणी में आत्मसात होकर चलने के कारण लोकप्रिय हैं।
ऐसे सैकड़ों कवि-साहित्यकार, संगीतकार,
शिक्षाविद, वैज्ञानिक हैं जिन्हें
आकाशवाणी रायपुर ने स्थापित किया।
एक समय था जब
आकाशवाणी रायपुर की तूती बोलती थी। दिनभर गली,
मुहल्ले और पान ठेले में ही नहीं समृध्द घरों में रेडियो के
सहारे आकाशवाणी रायपुर गूंजता रहता था। बरसाती भैया,
बिसाहू भैया, मिर्जा मसूद, ममता
चंद्राकर, तीजन बाई, केदार यादव,
जैसे नाम उस समय लोकप्रिय थे। युववाणी ने हम जैसे अनेक युवाओं
को रेडियो से जोड़ा। घर आंगन और अन्य अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की
महिलाओं का रेडियो से रिश्ता बना।
नई सदी की
संचार क्रांति ने दूरदर्शन को जन्म दिया और आज टीवी चैनलों ने अपना कब्जा जमा
लिया है। इस रेलमपेल में श्रोता और दर्शक अब अब रहे हैं यही कारण है कि रेडियो
की वापसी हो रही है। यह वापसी एफएम रेडियो से हो रही है। इसके आगे बात अब
इंटरनेट रेडियो तक आ पहुंची है। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं रह सकता। तीन-चार
प्रायवेट एफएम रेडियो रायपुर से प्रारंभ होने की तैयारी में हैं। इंटरनेट
रेडियो के लिए भी कार्य हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के रेडियो के लिए जर्मनी के
डॉयचे वेले की तरह कार्य करने की जरूरत है। इस दिशा में जयप्रकाश मानस
क्रियाशील हैं। डायचे वेले ने
15
अगस्त, 1964 से हिन्दी में रेडियो कार्यक्रमों की
शुरूआत कर दी थी। प्रतिदिन 45 मिनट को दो कार्यक्रम
हिन्दी में प्रसारित होते हैं। हिन्दी श्रोताओं के लिए विश्व के महत्वपूर्ण
घटनाक्रमों से लेकर विविध कार्यक्रम दिनभर प्रसारित होने की आवश्यकता है। निजी
क्षेत्रों के रेडियो के लिए भी श्रोताओं का विशाल समुदाय उपलब्ध है। बाजार और
अन्य जरूरतों को देखते हुए छत्तीसगढ़ी स्वतंत्र रेडियो के लिए सक्षम है। देश की
दूसरी लोकभाषाओं को देखें तो भोजपुरी एसोसिएशन आफ अमेरिका ने इंटरनेट रेडियो की
शुरूआत भोजपुरी में की है। यह न केवल भारत बल्कि मारीशस,
नेपाल, फिजी,
टिनीडीह, सिंगापुर, इंग्लैंड,
मलेशिया और युगांडा जैसे देशों में सुना जा रहा है। शैलेश
मिश्रा इसके अध्यक्ष हैं। भोजपुरी के इस इंटरनेट रेडियो से छत्तीसगढ़ी को
प्रेरणा लेनी चाहिए।
रेडियो के
विशेषज्ञ लाल रामकुमार सिंह इस दिशा में आशावादी हैं,
वे कहते हैं कि इतिहास और वर्तमान छत्तीसगढ़ी रेडियो के लिए
सुखद था और भविष्य भी उज्जवल है। वे आकाशवाणी रायपुर में आत्मसात छत्तीसगढ़ी के
बारे में कहते हैं कि समूचा रायपुर केंद्र और बाद में स्थापित केंद्र छत्तीसगढ़ी
के सहारे लोकप्रिय हैं। इन केंद्रों की स्थापना के पीछे
भी क्षेत्रीय कार्यक्रमों को प्रसारित करना था । लोकसंगीत, लोकगीत और न जाने
कितनी विधाओं ने आकाशवाणी के जरिये राष्ट्रीय ख्याति पाई ।
यही ख्याति
बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची। तीजनबाई,
देवदास बंजारे, हबीब तनवीर की सफलता
में रेडियो का महत्वपूर्ण योगदान है। श्री सिंह कहते हैं कि अब नया युग रेडियो
की ओर देख रहा है। नई तकनीक के साथ रेडियो फिर लोकप्रिय हो रहा है। लोकभाषाओं
और राज्य भाषाओं के लिए सभी विकल्प खुले हुए हैं। छत्तीसगढ़ी का पृथक रेडियो
स्टेशन आज के समय की प्रबल आवश्यकता है। सरकार को भी इस दिशा में प्रयास करना
चाहिए। अगर सरकारी इस स्तर पर रेडियो स्टेशन बने तो भी कोई बुरी बात नहीं है।
छत्तीसगढ़ी
लोकाक्षर के संपादक नंदकिशोर तिवारी भी कुछ इसी तरह के विचार रखते हैं । उनके
अनेक छत्तीसगढ़ी नाटक आकाशवाणी रायपुर के माध्यम से लोकप्रिय हुए हैं । वे
छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने के लिए संघर्षरत हैं । छत्तीसगढ़ी रेडियो की
परिकल्पना और भविष्य के प्रति वे सजग हैं और कहते हैं कि राज्यभाषा बनने के बाद
अपने आप में इस दिशा में प्रगति होगी । छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी की अस्मिता के
लिए रेडियो सचमुच में देववाणी साबित होगी । बहरहाल छत्तीसगढ़ी ने रेडियो के
माध्यम से जन-जन की आवाज का प्रतिनिधित्व किया है । इंटरनेट और नए जमाने के
एफ.एम. रेडियो के लिए भी छत्तीसगढ़ी समय अनुसार तैयार है । आज साहित्य के
क्षेत्र में नित नए प्रयोग हो रहे हैं । छत्तीसगढ़ी साहित्य नवीन समाज की
चुनौती के साथ मुखर होकर प्रस्तुत हो रहा है ऐसे में रेडियो में छत्तीसगढ़ के
नूतन प्रयोग की गुंजाइश है और इस दिशा में प्रयासरत लोगों की तपस्या से लगता है
कि भविष्य सुनहरा है ।
लेखक
छ.ग. के महत्वपूर्ण साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी हैं । संपर्क-द्वारा वैभव
प्रकाशन, अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती, रायपुर,
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