शुरु हुई आवाज की रेटिंग की जंग
---------------------------------
डॉ. सोनाली
नरगुंदे
अपने
जन्म के प्राथमिक सालों में इसका आकार कुछ इस तरह का था कि उसे उठाना,
रखना सहज नहीं था। बिजली से चलने वाला एक बड़ा सा उपकरण जिसे
खरीदना-रखना महंगा हुआ करता था। लेकिन आज यही रेडियो सेल से चलता है,
मोबाइल में भी बजने लगा है। इंटरनेट पर चलने वाला रेडियो
दुनिया में बदलाव की नई कहानी कह रहा है। यही रेडियो अब उतर पड़ा है रेटिंग की
लड़ाई में। रेडियो चैनलों की संख्या में हुए इजाफे से रेडियो चैनलों में
'अव्वल कौन' की स्पर्धा ने जोर पकड़
लिया है और इस तरह छिड़ गयी है आसमान में आवाजों की एक जंग। बेस्ट आरजे जैसे
पुरस्कार स्थापित होंगे और आरजे की नई कौम श्रोताओं के कानों में नवरस घोलती
रहेगी।
रेडियो लफ्ज
सुनते ही कानों में अपने आप रस घुलने लगता हे। रेडियो के साथ कुछ कल्पनाएं पहले
दिमाग में आया करती थीं,
जिनकी जगह अब कुछ और दृश्य आ गए हैं। रेडियो का आगाज भारत में
आकाशवाणी से हुआ। तब इसके इतना लोकप्रिय होने की किसी ने कल्पना भी नहीं की
होगी। जब मार्कोनी ने रेडियो का आविष्कार किया तब उन्हें नहीं पता था,
उनका बनाया एक उपकरण दुनिया भर में तहलका मचा देगा। रेडियो ने
सूचना जगत में अपने कदम रखे तो यह मात्र सूचना के प्रसारण का सहयोगी था। आज
रेडियो मनोरंजन की दुनिया में अपनी जीत का परचम फहरा रहा है। आज इसकी जीत में
कई आयाम हैं। रेडियो ने जो धमाल किया है वह सर्वविदित है। सूचना जगत में
क्रांति तब आई जब माध्यमों का विस्तार हुआ। यह विस्तार आज टीआरपी की लड़ाई तक जा
पहुंचा। लेकिन यह टीआरपी की लड़ाई महज टेलीविजन माध्यमों में चल रही है। लेकिन
वह समय दूर नहीं है जब यह लड़ाई रेडियो में भी चलने लगेगी। अभी सिर्फ रेडियो
लोकप्रियता के दायरे में युध्दरत है। लेकिन कुछ समय बाद दृश्यों के साथ चलने
वाली पहले हक की लड़ाई आवाज की दुनिया में भी अपनी जगह बना लेगी। आवाज की दुनिया
में भी एक होड़ चलेगी और 'पहले कौन'
के दावों के साथ नई जंग का आंगाज होगा। यह वर्तमान चैनलों की
संख्या और हाल ही में हुए सर्वेक्षणों के निष्कर्षों के बाद कहा जा सकता है।
रेडियो चैनलों की संख्या कुछ ही सालों में हजारों में होगी और इसी के साथ
प्रारंभ होगा आवाज की दुनिया में रेटिंग का महायुध्द। सेटेलाइट के साथ ध्वनि
तरंगों में भी अपने आप को साबित करने का जबर्दस्त संघर्ष चलेगा। इसे सिध्द करने
के लिए यह काफी है कि सन 2010 तक रेडियो में
1200 करोड़ तक का निवेश होगा। आगामी 24
माह में रेडियो में डेढ़ करोड़ का निवेश होगा। यहां रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इस
क्षेत्र में 700 नए चैनल आएंगे और उनमें 80
हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। इन लोगों के वेतन लाखों में
रहेंगे। इससे अधिक आश्चर्यजनक सत्य क्या हो सकता है। आवाज की दुनिया एक ऐसे
मुकाम पर जाएगी जिसकी कल्पना मार्कोनी ने नहीं की थी। मार्कोनी ने कहा था कि यह
माध्यम जिंदा रहेगा। यही सच भी हुआ। माध्यमों और इंटरनेट ने जब संचार जगत में
खलबली मचाई तो लगा कि रेडियो को अब कौन सुनेगा। लेकिन यह तो और भी ताकत के साथ
उभरकर सामने आया और लोगों के दिलों में बैठ गया। यह बिलकुल तुलसीदास जी की
'रामायण' की तरह है। उन्होंने
जब रामभक्ति में 'रामचरित मानस'
की रचना की होगी तब उन्हें अहसास नहीं था कि उनकी रचना लोगों के जीवन को चलाने
में मददगार हो जाएगी। रेडियो भी बिलकुल वैसा है। सूचना के माध्यम से प्रारंभ
हुई इसकी यात्रा आज मनोरंजन की दुनिया के मुकाम चढ़ती जा रही है।
कम्युनिटी
रेडियो से प्रारंभ हुआ रेडियो समाज की बेहतरी करने के साथ संपूर्ण विश्व को
अपने आगोश में ले चुका है। रेडियो की दुनिया में निजी चैनलों के आने से रेडियो
को नया जन्म मिला है। रेडियो सामाजिक बदलाव का ऐसा माध्यम था जो उपेक्षित था।
उसे श्रोताओं को जुटाना पड़ रहा था। वहीं रेडियो आज निजी हाथों में जाने से
मनोरंजन का सरताज बन बैठा है।
'लगे
रहो मुन्ना भाई' से विद्या बालन की 'गुड
मार्निंग मुम्बई...' ने लोगों में जो जोश भरा,
उसने रेडियो को पुनर्स्थापित करने में मदद की। इसके साथ खास
बात यह है कि एक माध्यम ने दूसरे माध्यम को ऐसा सहारा दिया कि वह बिना किसी
प्रयत्न के लोकप्रिय हो गया। रेडियो पहले भी देश की धड़कन था और आज भी है। फर्क
सिर्फ इतना है कि निजी चैनलों ने आज यह स्थान ले लिया है। उनकी कार्यशैली और
मापदंड भले ही अलग हो लेकिन रेडियो की लोकप्रियता ने सभी को एक सुर में बांध
लिया है। रेडियो के परवाज के बारे में सभी के मत साफ और सकारात्मक हैं। किसी भी
माध्यम को जनता से सकारात्मक और इतने बड़े पैमाने पर कभी भी साथ नहीं मिला।
फिल्में और टेलीविजन आज भी अपनी आलोचना को सह रहे हैं। लेकिन रेडियो के समक्ष
आलोचना के नजारे कम ही रहे।
आकाशवाणी की
पहुंच भारत के
99.13 प्रतिशत हिस्से में है। रेडियो को स्थापित करने में
आकाशवाणी ने जो योगदान दिया, उसे बढ़ाने के लिए आज निजी
चैनलों की बाढ़ आ गई है। एडलैब्स, साउथ एशिया कॉल
रेडियो, एनिल, रेडियो सिटी,
माय एफएम, बेग फिल्म्स,
जी सेंचुरी, थांथी टुडे,
मिड डे, एचटी पॉजीटिव,
राजपट, रेड एफएम,
बिग एफएम, गो एफएम,
रेडियो मिर्ची, विसाखा,
आमार एफएम, पावर एफएम आदि चैनल निजी
क्षेत्रों के हैं। 40 निजी चैनल रहेंगे जो वर्तमान में
चल रहे सात चैनलों को टक्कर देंगे। महानगरों के साथ 70
अन्य शहरों में नए रेडियो चैनल खोले जाएंगे। रेडियो के साथ यह तथ्य भी है कि
भारत में विज्ञापन पर होने वाले कुल व्यय का 2 प्रतिशत
सिर्फ रेडियो में दिए जाने वाले विज्ञापन का हिस्सा है। सरकारी प्रयासों में
ज्ञानवाणी एक शैक्षणिक चैनल है।
इनमें कार्य
करने के अपने लाभ हैं। लेकिन रेडियो ने चैनलों की दौड़ में सरकारी से निजी तक और
निजी से समुदाय का जो सफर तय किया है,
उसमें एक व्यक्ति बहुत नामचीन हो रहा है। वह है रेडियो जाकी।
आगे आने वाला समय रेडियो जाकी का ही होगा। एक रेडियो जाकी को लाखों की संख्या
में वेतन दिया जा रहा है। निखिल, समीर,
चारू जैसे कितने ही नाम हैं जिनकी आवाज ही उनकी पहचान है। सभी
आरजे आज बड़े-बड़े कार्यक्रमों की शान बढ़ाते हैं। इन्हें इनकी आवाज के कारण
बुलाया जाता है। आरजे की आवाज और शैली उनके अस्तित्व की स्थापना के साथ चैनल को
स्थापित करने में सहायक हो रहा है। अपने विशिष्ट प्रस्तुतिकरण के साथ रेडियो
जाकी श्रोताओं में इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि उन्हें अपने घर के सदस्य की तरह
माना जाने लगा है। उनकी सलाह पर लोग निर्णय लेने लगे हैं। सिटी बस में बैठे हों
या फिर टैक्सी में, रेडियो जाकी की आवाज श्रोताओं को
सफर के दर्द से बचाने के साथ एक नई दुनिया में ले जाती हे। दिनभर आवाजों की
खट्टी-मीठी, चरपराहट सुनने से लोगों का दिन अच्छा
गुजरने लगा है। रेडियो जाकी की अवधारणा के साथ ही रेडियो सुनने वालों की पसंद
में भी अंतर आया है। रेडियो ऐसा माध्यम है जिसे न अंधेरों की परवाह है न ही
रोशनी की जरूरत। रेडियो की मदभरी आवाज आपको अंधेरे में मदहोश करने के लिए काफी
है।
रेडियो जाकी
भले ही एक नाम हो लेकिन अब चैनलों की स्पर्धा में इन्हें अपनी आवाज को बुलंदी
पर ले जाने के लिए कई नए मुकाम पार करने होंगे। अब होगा आवाज का युध्द,
जिसमें ऐसा रेडियो जाकी सफल होगा जिसकी आवाज को सर्वाधिक पसंद
किया जाएगा। आवाज की दुनिया में रेडियो जाकी को एक नया आसमान दिया है। इसमें वह
अपनी आवाज के माध्यम से जगह बनाएगा। रेडियो के माध्यम से लोगों से बातें करने
वाले जाकी सभी शहरों में अपनी पैठ बना चुके हैं। देश के किसी भी कोने में चले
जाइए, रेडियो जाकी आपका अपना लगेगा। वह आपके मन की बात
करता हुआ मिलेगा। यही एकरूपता आवाज की दुनिया में नई जंग का ऐलान कर रही है।
ऐसा रेडियो जाकी सबका चहेता होगा, जो अपनी स्टाइल
विकसित कर सकेगा। ऐसा रेडियो जाकी लोगों के दिलों में उतरकर उन्हें अपना बना
सकेगा। रेडियो जाकी श्रोता को अवचेतन जगत में ले जाने का साक्षी बनता है। आवाज
की दुनिया के ये बाजीगर सारी दुनिया पर अपनी आवाज के दम पर राज करेंगे। लेकिन
यह आने वाले कल के हाथ में बंद है कि कौन रहेगा अव्वल आरजे?
लेखिका देवी अहिल्या विवि इंदौर में पत्रकारिता
एवं जनसंचार विभाग में प्राध्यापक हैं । मीडिया और सामयिक विषयों पर समय-समय पर
टिप्पणियां प्रकाशित होती रहती हैं ।
lll