आकाशवाणी प्रसारणों की कथ्य संरचना
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डॉ. महावीर
सिंह
आत्मा बुध्दय
समेत्यार्थान मनो युङक्ते विवक्षया
मन:
कायागि्माहन्ति स प्रेरयति मारूतम्॥
॥ पाणिनि॥
आकाशवाणी
वाचिक परमपरा (श्रुति-स्मृति) का वह विकसित माध्यम है,
जो मनुष्य को अपने प्राप्य की ओर प्रेरित करता है। प्रसारण
प्रक्रिया में वर्ण्य-विषय या कथ्य की विशिष्ट भूमिका है क्योंकि प्रसारण का
ध्येय सांसारिक सत्य को नाना आकर्षक विधाओं में श्रोताओं तक संप्रेषित करना है।
यह कठिन कार्य तभी सम्पन्न हो सकता है जब कथ्य की सही पहचान कर ली गई हो।
आकाशवाणी क्योंकि जनसेवा-प्रसारणों की पक्षधर है, अत:
यहां विषयवस्तु के सम्यक् निरूपण पर अधिक ध्यान दिया जाता है। विषयवस्तु एवं
उसे प्रस्तुत करने वाले विधारूपों में सतत संघर्ष चलता है। विषयवस्तु नितांत
अनगढ़ होने के कारण अपने रूप-सौंदर्य के लिए कला-कौशल पर निर्भर करती है। लेकिन
इस निर्भरता के कारण वह अपने अस्तित्व को समर्पित नहीं कर सकती। सटीक विषयवस्तु
के अभाव में सौंदर्योपासना की प्रक्रिया अधिक सार्थक नहीं लगती क्योंकि कोरा
रूप-सौंदर्य, जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं है। कथ्य,
प्रकृति और जीवन के यथार्थ का आधार है जिसे कलात्मक रूप में
प्रस्तुत करना प्रसारणकर्ता का धर्म है। सुंदर आकार और आस्वाद के अभाव में
विषयवस्तु अधिक लोकग्राह्य नहीं हो सकती। कथ्य और शैली का संघर्ष ही जीवन का
वास्तविक संघर्ष है। तुलसीदास भी दोनों में से किसी एक का समर्थन करना अपराध
मानते हैं :
को बड़ छोट कहत
अपराधू,
सुनि गुनि भेद समुझिहहिं साधू।
कहियत नाम
(कथ्य) रूप आधीना,
रूप ज्ञान नहिं नाम विहीना॥
प्रसारण
कर्म : आयोजन एवं विन्यास : आकाशवाणी सामान्य रूप से श्रोता को सूचना,
शिक्षा तथा मनोरंजन उपलब्ध कराती है लेकिन उसका मुख्य ध्येय
श्रोता की अंतश्चेतना को विकसित करना तथा उसे वास्तविक आनंद की अनुभूति कराना
है। यह कार्य चुनौतीपूर्ण है अत: इसे सम्पादित करने के लिए सुविचारित योजना
तैयार की जाती है। प्रथम चरण में उस क्षेत्र विशेष के श्रोताओं की सामाजिक,
आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति का अध्ययन किया जाता है तथा दूसरे
चरण में श्रोताओं की आकांक्षाओं और क्षमताओं का आकलन किया जाता है। जनसमुदाय की
परंपराओं और विश्वासों का आकलन भी इस प्रक्रिया का एक भाग है। इस जानकारी के
आधार पर आकाशवाणी केन्द्र का एक स्थायी कार्यक्रम प्रारूप (फिक्स्ड पाइंट
चार्ट) निर्धारित किया जाता है। यह प्रारूप 6 माह के
लिए तैयार किया जाता है तथा केन्द्र की संस्कृति,
आकांक्षाओं, सामाजिक गतिविधियों तथा अन्य क्रिया-कलापों
को प्रदर्शित करता है। निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए केन्द्र के
विभिन्न कार्यक्रम-अनुभाग अपनी विभागीय योजनाओं का निर्धारण करते हैं,
जिन्हें हम त्रैमासिक कार्यक्रम अनुसूची के रूप में जानते हैं।
स्वतंत्रता
प्राप्ति के समय हमारे राष्ट्र के समक्ष भूख,
गरीबी, महामारी,
अशिक्षा आदि समस्याएं अपने विराट रूप में उपस्थित थीं। भारत
सरकार, रेडियो के माध्यम से ही आम आदमी को संबोधित कर
सकती थी। समस्याओं के समाधान के लिए भारतीय संविधान में कल्याणकारी राज्य की
रूपरेखा निर्धारित की गई। प्रजातंत्र,धर्मनिरपेक्षता और
समाजवादी समाज की संरचना को प्राथमिकता दी गई तथा नागरिक के मूल अधिकार एवं
राज्यों के नीति निर्देशक तत्व निर्धारित किए गए। आकाशवाणी ने अपने कार्यक्रमों
में संविधान के निर्देशों एवं भारत सरकार के कार्यक्रमों को अपने प्रसारण का
आधार बनाया तथा राष्ट्र निर्माण की दिशा में सार्थक योगदान दिया।
आकाशवाणी का
रोचक इतिहास महत्वपूर्ण घटनाओं से भरा पड़ा है। प्रसारणों का प्रारंभ छिट-पुट
रूप से 1923
में हो चुका था लेकिन व्यवस्थित रूप से यह कार्य 1
जनवरी, 1936 से शुरू हुआ। बीबीसी से आए
भारत के प्रथम प्रसारण नियंत्रक लियोनल फील्डन के कुशल नेतृत्व में आल इंडिया
रेडियो की नींव रखी गई जिसका नाम बाद में आकाशवाणी पड़ा। प्रात: काल की सभा में
समय और 'मूड' के अनुरूप वंदना,
चिंतन, सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत
के सुंदर कार्यक्रम प्रसारित किए गए और कुछ समय बाद मानस गान का आकर्षक पाठ
प्रारंभ किया गया जो आज भी लोकप्रिय है। विभिन्न भाषाओं के श्रेष्ठ कवियों की
रचनाओं को संगीतबध्द किया गया तथा श्रोताओं को सार्थक मनोरंजन देने का यत्न
किया गया। रेडियो को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनाने में स्व. श्री बालकृष्ण
विश्वनाथ केसकर का विशेष योगदान है। उनके 10 वर्ष के
कार्यकाल (1952-62) को आकाशवाणी का स्वर्णकाल कहा जा
सकता है। उस दौरान सुगम संगीत की साहित्यिक प्रस्तुति ने फिल्म संगीत तक को
फीका कर दिया था। यह प्रतियोगिता आज भी चल रही है। श्रोताओं के संगीत प्रेम एवं
विज्ञापनों के लोभ के कारण एक स्वतंत्र चैनल विविध भारती का गठन 1957
में करना पड़ा था। देश के अनेक श्रेष्ठ कवियों को लोकप्रियता
तथा कवि सम्मेलन और मुशायरों की प्रसिध्दि का श्रेय पूर्णरूप से आकाशवाणी को
दिया जा सकता है। अनेक युवा संगीतकारों और गायकों को आकाशवाणी का संरक्षण
प्राप्त हुआ। जिनकी कला-गंध श्रोताओं को अनुप्राणित करती रही है।
कार्यक्रम
प्रबंधन : विगत
75
वर्षों के प्रयासों का यह सुफल है कि आकाशवाणी के केन्द्रों का
कार्यक्रम-प्रबंधन अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से सुसंगठित हो चुका है। विषयवस्तु एवं
प्रस्तुति विधाओं के अनुसार प्रसारण कार्य को अनेक अनुभागों में वर्गीकृत किया
गया है जिनका संचालन प्रशिक्षित विशेषज्ञों और सुयोग्य कलाकारों द्वारा किया
जाता है। अस्तु, वार्ता विभाग,
वृत्त विभाग, नाटक अनुभाग,
शास्त्रीय- लोक -सुगम तथा पाश्चात्य संगीत विभाग, खेल
अनुभाग, विज्ञान विभाग, शैक्षिक
कार्यक्रम विभाग, परिवार कल्याण विभाग,
समाचार विभाग आदि विभाग प्रमुख हैं। इसी प्रकार विशेष
श्रोता-समूहों के आधार पर खेती-गृहस्थी, महिला एवं बाल
विभाग, युववाणी, वरिष्ठ
नागरिकों का कार्यक्रम, श्रमिक भाइयों का कार्यक्रम,
सैनिक भाइयों के लिए कार्यक्रम,
विज्ञापन एवं विपणन विभाग आदि अनुभाग स्थापित किए गए हैं। इनके अतिरिक्त एफएम
प्रसारण, स्थानीय प्रसारण आदि के लिए पृथक व्यवस्था है।
कार्यक्रमों का निरीक्षण-संचालन केन्द्र के वरिष्ठ अधिकारी,
मौलिक सूझबूझ और रचनात्मक क्षमता के अनुरूप करते हैं।
आकाशवाणी-केन्द्र ज्ञान, संवेदना,
लौकिक अनुभव और आध्यात्मिक चेतना का ऐसा चैतन्य स्थल है जो
प्रेय और श्रेय दोनों ही सम्पदाओं की अनुभूति सुधी-श्रोताओं को कराने में समर्थ
है। यह ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान का अनूठा साम्य बिन्दु है।
कथ्य की गरिमा पर आकाशवाणी विशेष ध्यान देती है लेकिन संवेदनात्मक सक्रियता और
गहरी रसानुभूति इसके प्रसारणों का प्राण है। मानव की अद्भुत कल्पनाओं,
सपनों, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं
को मूर्त रूप देने के लिए आकाशवाणी के प्रसारण, मनुष्य
की क्षमताओं और आशंसाओं को जागृत करने और उसके पुरुषार्थ को नित्य नया उन्मेष
देने की च्येष्टा करते हैं।
विषय-सामग्री
का चयन एक कठिन कार्य है। कोई एक स्रोत पर्याप्त नहीं है। अत: पुस्तकालय,
समाचार पत्र-पत्रिकाएं, इंटरनेट,
विषय विशेषज्ञ, कलाकार,
खिलाड़ी, रचनाकार आदि के साथ संपर्क
बनाए रखना मुख्य आधार है। सामग्री को श्रोताओं की आवश्यकता के अनुरूप ढालने के
लिए रचनाकार, लेखक, समीक्षक,
कलाकार आदि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि विषय सामग्री
की प्रस्तुति आकर्षक नहीं है तो सारा प्रयास व्यर्थ हो सकता है। अत: विषयवस्तु
की प्रस्तुति के लिए नई शैली और विधा-रूपों की खोज भी आवश्यक है। यह
कंठ-माधुर्य का माध्यम है, अत: उच्चकोटि के उद्धोषक,
गायक, वादक,
नाटयकर्मी आदि की खोज, उनका प्रशिक्षण,
श्रेणीकरण आदि की प्रक्रिया भी प्रसारण-प्रबंधन का एक भाग है
समय-समय पर 'ऑडीशन' का आयोजन
किया जाता है ताकि नए कलाकार इससे जुड़ते रहें।
प्रचलित
कार्यक्रम विधाओं को चार प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है-
1. वार्ता विधाएं-
वार्ता, साक्षात्कार,
परिचर्चा, समीक्षा,
आंखों देखा हाल, समाचार बुलेटिन,
समाचार आधारित कार्यक्रम, रेडियो रपट,
फोन-इन, बॉक्स पॉप,
स्थल रिकार्डिंग, सजीव प्रसारण आदि।
2. रेडियो वृत्तांत-
रूपक लघु रूपक, फार्मेटमिक्स आदि।
3. नाटक-
झलकी, रेडियो,
कार्टून, सीरियल्स, विशेष नाटक
(ऐतिहासिक, पौराणिक, पारिवारिक,
युध्द, प्रेम प्रसंग,
मनोविज्ञान, सामाजिक आदि)।
4. संगीत-
शास्त्रीय संगीत (कर्नाटक हिन्दुस्तानी) उपशास्त्रीय संगीत,
सुगम संगीत, फिल्म संगीत,
लोक संगीत, पाश्चात्य संगीत आदि।
विधाओं को
ध्यान में रखकर लेखक या रचनाकार अपने विषयों के आलेख तैयार करते हैं,
जिनका सम्पादन एवं परीक्षण अनेक स्तरों पर सम्पन्न होता है।
आवश्यक संशोधन किए जाते हैं तथा आलेखों को प्रसारण उपयोगी बनाया जाता है।
प्रस्तुति के समय रिहर्सल की व्यवस्था की जाती है ताकि उत्पाद की गुणवत्ता
सुनिश्चित हो सके। तकनीकी गुणवत्ता के लिए अभियंताओं का दल हर स्तर पर जागरुक
रहता है। आलेखों में अधुनातन ज्ञान, वैज्ञानिक सोच तथा
यथार्थ को महत्व दिया जाता है। ज्योतिष, अंधविश्वास,
भूत-प्रेत या परी कथाओं को सावधानी से प्रस्तुत किया जाता है
ताकि किशोरों में भ्रांतियां न फैले। ध्वनि माध्यम होने के कारण रेडियो
प्रसारणों में ध्वनि संकेतों का उपयोग बड़े अनुपात में किया जाता है जो मंच
सज्जा, मूड कथ्य, वातावरण,
घटनाओं आदि के बोध में सहायक होते हैं। इन ध्वनि संकेतों के
द्वारा श्रोता अपनी कल्पना से कथ्य के अनकहे आयामों को समझ लेता है।
त्रैमासिक
कार्यक्रम अनुसूचियों में विभिन्न विभाग अपने कार्यक्रम से संबंधित विषयों,
वार्ताकारों, प्रस्तुति-विधाओं आदि का
विवरण तैयार करते हैं। यह विवरण विशेषज्ञों से परामर्श के बाद तैयार किया जाता
है। इस प्रक्रिया को औपचारिक रूप देने के लिए पूरे केन्द्र की एक कार्यक्रम
सलाहकार समिति होती है, जिसे सूचना एवं प्रसारण
मंत्रालय अंतिम रूप देता है। अन्य विभागों जैसे खेती-गृहस्थी,
शैक्षणिक कार्यक्रम, विज्ञान प्रसारण,
परिवार कल्याण आदि के लिए अलग से विशेषज्ञ समितियां गठित की
जाती है। समीक्षा एवं सुझावों को कार्यक्रमों की योजना में स्थान दिया जाता है।
आलेखों के लिए जो अनुबंध पत्र लेखकों को भेजे जाते हैं,
उनमें भी विषय से संबंधित दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। आलेखों में मौलिक एवं
अधुनातन जानकारी की अपेक्षा की जाती है। आलेखों में शिष्ट एवं श्लील भाषा के
उपयोग को प्राथमिकता दी जाती है। अश्लीलता के लिए कोई स्थान आकाशवाणी में नहीं
है। हास्य-व्यंग्य से भरपूर कार्यक्रमों में भी यह तथ्य प्रमुख होता है।
प्रसार भारती
ने अपने 10
वर्षों के कार्यकाल में आधुनिक तकनीकी साधनों का विस्तार किया
है। हर आकाशवाणी केन्द्र पर कंप्यूटर, इंटरनेट,
फैक्स, डिजिटल रिकॉर्डिंग,
स्टीरियो, एफएम प्रसारण,
सेटेलाइट लिंक, मोबाइल फोन,
सराउंड साउण्ड, एमपी-3
म्यूजिक, सीडी,
डिजिटल एडिटिंग, आधुनिक स्तर के माइक्रोफोन आदि की
सुविधाएं बढ़ी हैं। स्टूडियो, कंट्रोल रूम,
ट्रांसमीटर आदि की व्यवस्था में निरंतर सुधार हो रहा है,
जिसके कारण फोन-इन तथा अंतर्क्रियात्मक प्रसारणों का प्रतिशत
बढ़ा है तथा प्रसारण की तकनीकी गुणवत्ता में वृध्दि हुई है। श्रोताओं के साथ
सार्थक संवाद में भी वृध्दि हुई है। भविष्य में वेब रेडियो तथा डिजिटल रेडियो
प्रसारण की संभावना प्रबल लगती है। निजी एफएम चैनल के साथ प्रतिस्पर्धा के कारण
भी प्रसार भारती के प्रसारणों में सुधार की आशा है। रेडियो ने राष्ट्रीय स्तर
पर अखिल भारतीय प्रसारणों द्वारा राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ किया है।
राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत चैनल्स में इंद्रप्रस्थ,
राजधानी, एफएम रेनबो तथा एफएम गोल्ड प्रमुख हैं जिनके
अधिकांश कार्यक्रम देश के अन्य भागों में भी रिले किए जाते हैं। अखिल भारतीय
प्रसारण कार्यक्रमों का प्रसारण 1952 में प्रारंभ किया
गया था जो आज भी निरंतर जारी है। अस्तु, वार्ताओं का
अखिल भारतीय कार्यक्रम (हिंदी-अंग्रेजी) रूपकों का अखिल भारतीय कार्यक्रम,
नाटकों का अखिल भारतीय कार्यक्रम,
संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम (हिंदुस्तानी-कर्नाटक),
मासिक श्रृंखला नाटक, रेडियो संगीत सम्मेलन,
सुगम संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम,
सरदार पटेल व्याख्यानमाला, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्मारक
व्याख्यान माला, सर्वभाषा कवि सम्मेलन,
आकाशवाणी साहित्य समारोह आदि-आदि।
आकाशवाणी
निदेशालय की पहल पर कुछ महत्वाकांक्षी कार्यक्रम श्रृंखलाएं भी प्रसारित की गई
हैं जिनमें श्रोताओं का पंजीकरण भी किया गया था तथा कुछ कार्यक्रमों में
प्रतियोगिता आयोजित कर पुरस्कार भी वितरित किए गए थे।
क्र. श्रृंखला का नाम-प्रसारण वर्ष-कार्यक्रम संख्या-प्रसारण क्षेत्र
1. रामचरित मानस-1986-87-
65 घंटा (अवधि)- उत्तरी राज्य
2. निसर्ग सम्पदा-1987-88-
13 कार्यक्रम- राष्ट्रीय नेटवर्क
3. जीवन सौरभ (किशोर)-1988-13
कार्यक्रम-उत्तरी भारत
4. विज्ञान विधि (छात्र)-1988-89-13
कार्यक्रम- राष्ट्रीय नेटवर्क(क्षेत्रीय भाषाओं में भी)
5. रेडियो डेट (किशोर)-1989-90-30
कार्यक्रम-राष्ट्रीय नेटवर्क
6. जीवन सौरभ (द्वितीय भाग) -1989-13
कार्यक्रम-राष्ट्रीय नेटवर्क
7. चीयर्स (बच्चों के लिए) 1992-93-26
कार्यक्रम-4 राज्य
8. तिनका-तिनका सुख (किशोर)-1996-97-104
कार्यक्रम-7 राज्य
9. यह कहां आ गए हम (पर्यावरण) 1997-98-52
कार्यक्रम-2 राज्य
10. मानव का विकास-1991-94-144
कार्यक्रम-राष्ट्रीय नेटवर्क
11. दहलीज (जनसंख्या शिक्षा)- 1994-95-52
कार्यक्रम-7 राज्य
पिछले 75 वर्षों में आकाशवाणी से अनेक
संगीतकार, कवि, लेखक,
अभिनेता, विषय-विशेषज्ञ,
राजनेता, प्रशासक,
पत्रकार, खिलाड़ी अादि अपने विचार
व्यक्त करते रहे हैं। अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर विशेषज्ञों
की समीक्षाएं, वार्ताएं और परिचर्चाएं प्रसारित हुई
हैं। देश के सभी आकाशवाणी केन्द्रों से लगभग 10 लाख
स्त्री-पुरुष एवं बाल कलाकार प्रसारणों में भागीदारी करते हैं। इसी प्रकार
संविदा पर कार्य करने वाले उद्धोषक, कम्पीयर,
समाचार वाचक, नाटय कलाकार,
गायन एवं वादकों की संख्या भी लाखों में है। युवा शक्ति के लिए
रोजगार के पर्याप्त अवसर यहां उपलब्ध हैं। कलाकार, लेखक,
पत्रकार, विशेषज्ञ और राजनेताओं की
सूची देना संभव नहीं है तथापि कुछ प्रसिध्द वार्ताकार-रचनाकारों के नाम
आकाशवाणी से जुड़ गए हैं।
कवि,
कथाकार एवं लेखक : जे.सी.माथुर,
गिरिजाकुमार माथुर, कृष्णचंदर,
सआदत हसन मंटो, के.एस. दुग्गल,
इस्मत चुगताई, सुमित्रानंदन पंत,
कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव,
दुष्यंत कुमार, विष्णु प्रभाकर,
रामावतार त्यागी, डॉ. नगेन्द्र,
अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा,
शिवसागर मिश्र, डॉ. नामवर सिंह,
जोश मलीहाबादी, फिराक गोरखपुरी,
श्रीनारायण चतुर्वेदी, रामधारी सिंह
दिनकर, महादेवी वर्मा, डॉ.
रामकुमार वर्मा, डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन,
सच्चिदानंद वात्सायन अज्ञेय, रामेश्वर
शुक्ल अंचल, रघुवीर सहाय,
निर्मल वर्मा, हरिवंशराय बच्चन,
धर्मवीर भारती, नागार्जुन,
शमशेर बहादुर सिंह, विद्यानिवास मिश्र,
डॉ. भगवत शरण उपाध्याय, भवानी प्रसाद
मिश्र, सोम ठाकुर, नीरज,
हरिशंकर परसाई, मंगलेश डबराल,
कैलाश वाजपेयी आदि।
रेडियो नाटक-रूपक लेखक एवं प्रस्तुतकर्ता :एस.एस.एस.
ठाकुर,
चिरंजीत, सत्येन्द्र शरद,
मधु मालती, निर्मला अग्रवाल,
दीनानाथ, भीष्म साहनी,
रेवती रमण शर्मा, लक्ष्मीनारायण लाल,
रामकुमार वर्मा, अमृतलाल नागर,
विष्णु प्रभाकर, एफ.सी. माथुर,
गंगाप्रसाद माथुर, वी.पी. दीक्षित बटुक,
मुद्राराक्षस, विनोद शर्मा,
नंदलाल शर्मा, विनोद रस्तोगी,
के.पी. सक्सेना, राजेश्वर नाथ,
विजय बैनर्जी, इस्लामुद्दीन,
सआदत हसन मंटो, भृंग तुपकरी,
उग्रसेन नारंग, लोचन बख्शी,
उपेन्द्र नाथ अश्क, डॉ. मोहम्मद हसन,
शम्भूनाथ, राम अवतार शर्मा,
कृष्ण कुकरेजा, रमानाथ अवस्थी,
उर्मिल थपलियाल, के.एस.
दुग्गल, सलाम मछली शहरी,
बी.एस. भटनागर, गोपाल कृष्ण कौल,
उदयशंकर भट्ट, राजेन्द्र सिंह बेदी आदि
अनेक प्रतिष्ठित नाम।
संगीतकार :
पं. रविशंकर,
टीके जयराम अय्यर, पं. पन्नालाल घोष,
गुलाम अली, अनिल विश्वास,
उस्ताद विलायत हुसैन खां, सतीश भाटिया,
उस्ताद फैयाज खां, उस्ताद अली अकबर खां,
उस्ताद नजाकत अली सलामत अली, उस्ताद
अल्लारखा खां, उस्ताद रईस खां,
उस्ताद अहमद जान तिरूकवा, पंडित भीमसेन जोशी,
पंडित जसराज, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां,
मल्लिकार्जुन मंसूर, गंगूबाई हंगल,
बेगम अख्तर, शामता प्रसाद,
किशन महाराज, उस्ताद जाकिर हुसैन,
गुलाम मुस्तफा खां, पंडित ब्रजभूषण
कावरा, शिशिर कणाधर चौधरी, एन.
राजन, एम.एस. गोपाल कृष्णन,
ध्रुव घोष, उस्ताद अमजद अली खां,
कृष्णाराव, शंकर पंडित,
किशोरी अमोनकर, मालिनी राजूरकर,
परवीन सुल्ताना, शरण रानी,
सुल्तान खां, राजन मिश्र साजन मिश्र,
सिंह बंधु आदि।
लोकप्रिय
उद्धोषक एवं समाचार वाचक : सिब्ते हसन राजहंस,
मेलविल डिमेलो, कौशल्या माथुर,
शीतांशु भादुड़ी, मधु मालती,
विद्या गुंजू, केशव पांडे,
पुष्पा नटराजन, लोतिका रत्नम,
प्रेम मेहरा, देवेन्द्र सक्सेना,
एम.के धर्मराजा, राधानाथ चतुर्वेदी,
इन्दुवाही, विनोद कश्यप,
उषा अल्बूकर्क, रिनी खन्ना,
सुनीत टंडन, अशोक वाजपेयी,
देवकीनंदन पांडे, सरला माहेश्वरी,
सुरजीत सेन, जसदेव सिंह,
रोशन मेनन, रामानुज प्रसाद सिंह,
हरि कपूर, निर्मला मथान,
हरीश अवस्थी आदि-आदि।
प्रसिध्द
कांमेंट्रेटर : मेलविल डिमेलो,
जसदेव सिंह, डिकी रत्नाकर,
स्कंध गुप्त, विजय मर्चेन्ट,
टिलेयर खान, महाराज विजयनगरम,
जे.पी. नारायणन, सुशील दोषी,
अनुपम गुलाटी, डॉ. नरोत्तम पुरी,
हर्ष भोगले, सुनील गावस्कर,
रवि शास्त्री, गुरुदेव सिंह,
रवि चतुर्वेदी, सुरजीत सेन,
चारू शर्मा, शरदेन्दु सान्याल,
वी.एम. चक्रपाणि, वैरी सर्वाधिकारी,
संजय मांजरेकर, आनंद शीतलवाड़,
राजेन्द्र मल्होत्रा आदि अनेक प्रसिध्द नाम।
क्षेत्रीय
भाषाओं के लेखक,
साहित्यकार, कलाकार तथा विशेषज्ञों की
एक लम्बी सूची है। उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत की संगीत शैली में भिन्नता
होने के कारण शास्त्रीय संगीत अनेक विविधताओं से भरा हुआ है। वादक कलाकारों तथा
संगति करने वाले कलाकारों की संख्या भी लाखों में है। इन रचनाकारों,
कलाकारों तथा लेखकों के अप्रतिम योगदान के कारण आकाशवाणी अपने
श्रोताओं के लिए ज्ञान और भावनात्मक समृध्दि की अजस्र स्रोत बनी हुई है। कथ्य
के भावनात्मक पहलू को आकाशवाणी उद्धाटित करने की चेष्टा करती है ताकि श्रोता का
भावुक हृदय अपने संसार की सघन अनुभूति के रस का पान कर सके। अभाव भरे जीवन में
श्रोता अपनी मधुर कल्पनाओं का आस्वाद आकाशवाणी से प्रसारित संगीत और नाटकों के
द्वारा प्राप्त करता है। श्रोता के जीवन को आशा और उत्साह से परिपूर्ण करने का
दायित्व आकाशवाणी सफलतापूर्वक निभा रही है। यह अंतहीन यात्रा है जिसे पूरी
निष्ठा और तन्मयता के साथ पूरा करना है। इसीलिए कहा गया है :
चरथ भिक्खवे
चारिक
बहुजन हिताय,
बहुजन सुखाय।
लोकानुकम्पाय,
अत्थाय,
हिताय,
सुखाय देव मनुस्सान॥
- बुध्द वचन
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