Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

रेडियो प्रसारण का इतिहास एवं विकास

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डॉ. गोपा बागची

 

विश्व में सबसे अधिक विश्वसनीय मीडिया की बात करें तो उसमें रेडियो का नाम सबसे ऊपर आता है। समाचार पत्रों के प्रारंभिक विकास की कहानी से अलग रेडियो का प्रारब्ध काफी दिलचस्प है। जनसामान्य में रेडियो का आगमन किसी दैविक घटना से कम नहीं है। विज्ञान जगत की सबसे रोचक घटना को जन्म देने वाले मैक्सवेल, हर्त्ज तथा मारकोनी तब इलेक्ट्रानिक प्रयोगों में काफी रूचि ले रहे थे। इन वैज्ञानिकों की रूचि का ही परिणाम था कि सबसे पहले विद्युत चंबकीय तरंगों और रेडियो संचार का इस्तेमाल समुद्र में फंसे नाविकों ने अपने बचाव के लिए करना शुरू कर दिया था। यही वह समय था जब ध्वनि तरंगों को विद्युत तरंगों में और विद्युत तंरगों को ध्वनि-तरंगों में परिवर्तित करने का प्रयोग तेजी से चल रहा था।

 

प्रथम विश्व युध्द की घटना में रेडियो संचार का इस्तेमाल गुप्त सूचनाओं के प्रेषण में किया जाने लगा। 1916 में विश्व का पहला रेडियो समाचार बुलेटिन प्रसारित हुआ ध्वनि तरंगों की ताकत का अहसास इससे हो गया था कि प्रिंट माध्यमों से भी कई गुना रफ्तार से रेडियो के जरिए लोगों तक खबरें पहुंचाना ज्यादा हितकर है। बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के इस माध्यम की शक्ति जानने के बाद 1919 में संयुक्त राज्य अमेरिका में एक निगम की स्थापना की गई और इसका नाम दिया गया रेडियो कार्पोरेशन ऑफ अमेरिका अब बारी थी इसके अधिकारिक प्रसारण की और यह शुरूआत ईस्ट पिट्सबर्ग में रेडियो ब्राइकास्टिंग स्टेशन की स्थापना के साथ हो सकी। अन्तत: 21 दिसंबर, 1922 को विश्व के पहले रेडियो प्रसारण केंद्र की ऐतिहासिक नींव रखी गई। दूसरी तरफ ब्रिटेन में भी 1922 में ही एक प्रसारण कंपनी का आगाज हुआ जिसका नाम आगे चलकर 1927 में ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशन (बीबीसी) पड़ा।

 

भारत में रेडियो प्रसारण:भारत में रेडियो प्रसारण की स्थितियां तैयार करने के लिए अंग्रेज व्यापारी इफ.ई.रोशर की महत्वपूर्ण भूमिका है। 1922 में रोशर ने तत्कालीन भारत में अंग्रेजी सरकार के समक्ष प्रसारण केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। नवंबर 1923 में रोशर ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सहयोग से रेडियो क्लब ऑफ बंगाल के नाम से प्रसारण प्रारंभ किया जबकि बंबई रेडियो क्लब की शुरूआत जून, 1924 में हुई। श्री सीबी.कृष्णास्वामी चेट्टी ने 16 मई, 1924 को मद्रास प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब की स्थापना की। क्लब ने सबसे पहले 31 जुलाई,1924 से हास्य विनोद के मनोरंजन की दृष्टि से कार्यक्रमों का प्रसारण प्रारंभ किया। मद्रास में शार्टवेव पर दस किलोवाट और मीडियम वेव पर 14 किलोवाट के ट्रांसमीटर लगाए लेकिन यह प्रसारण आर्थिक दिक्कतों के कारण आगे नहीं बढ़ सका।

 

प्रसारण की दुनिया में कदम रखने वाले कुछ लोगों ने मिलकर इंडियन ब्राडरकास्टिंग कंपनी लिमिटेड की स्थापना कर डाली। इस कंपनी ने भारत सरकार से लाईसेंस प्राप्त कर मुंबई तथा कलकत्ता में डेढ़ डेढ़ किलोवाट क्षमता वाले मीडियम वेव ट्रांसमीटर लगाए। जिससे पचपन किलोमीटर के दायरे में कार्यक्रमों को सुना जा सकता था। इसके बंबई केंद्र का उद्धाटन 23 जुलाई, 1927 को भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इर्विन ने किया जबकि कलकत्ता केंद्र का उद्धाटन इसी वर्ष 26 अगस्त को बंगाल के गवर्नर सर स्टेनले जैक्सन ने किया। इस बीच लाहौर (अब पाकिस्तान में) भी यंगमेन क्रिश्चयन एसोसिएशन के रेडियो क्लब ने एक ट्रांसमीटर स्थापित किया जो काफी छोटा था। रेडियो ब्राडकास्टिंग कंपनी को अपनी आय के लिए लायसेंस से प्राप्त आय पर ही निर्भर रहना पड़ता था। कंपनी इस आर्थिक भार को ज्यादा दिन चला सकने की स्थिति में नहीं थी। अंतत: कंपनी ने भारत सरकार को आर्थिक सहायता के लिए कहा। भारत सरकार ने कंपनी के आग्रह पर प्रसारण को अपने उद्योग एवं श्रम विभाग के नियंत्रण में लिया और इसका नाम बदलकर इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस कर दिया किंतु सरकार के इन प्रयासों के नतीजे कुछ खास नहीं रहे। सरकार का नियंत्रण होने के बावजूद प्रसारण का आर्थिक संकट दूर नहीं हुआ। जिसके कारण यह प्रसारण 9 अक्टूबर, 1931 को बंद हो गया।

 

सरकार द्वारा प्रसारण बंद किए जाने को लेकर इसके श्रोताओं में कड़ी प्रतिक्रिया हुई और प्रसारण की पुन: शुरूआत के लिए सरकार ने अपनी वित्तीय मदद बढ़ाते हुए पी. जी.एडमन्डस को उसका कन्ट्रोलर आफ ब्राडकास्टिंग नियुक्त किया और 1932 में प्रसारण पुन: शुरू कर दिया गया। लेकिन इसके बाद प्रसारण पर सरकार का सीधा नियंत्रण स्थापित हो गया। सरकार ने 1934 में दिल्ली में रेडियो स्टेशन की स्थापना के लिए ढाई लाख रूपये की स्वीकृति प्रदान की। रेडियो प्रसारण को लेकर सरकार की दिलचस्पी अब दिखाई देने लगी थी। बीबीसी का सहयोग प्राप्त कर सरकार ने प्रसारण का दायरा बढ़ाने की नीति तैयार की और अगस्त 1935 में बीबीसी से लियोनेल फिल्डेन की सेवाएं प्राप्त कर उन्हें कन्ट्रोलर आफ ब्राडकास्टिंग का पद सौंप दिया। फिल्डेन के लिए भारत में प्रसारण को विस्तार देने के लिए काफी कठिन परिस्थितियां थीं, इसके लिए उन्होंने बीबीसी के अनुसंधान विभाग के एक अधिकारी एच.एल. किर्की की सेवाओं की मांग की। श्री किर्की के भारत आने पर उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया और पूरे देश में मीडियम वेव ट्रांसमीटर लगाने का सुझाव दिया। श्री किर्की अपना सुझाव देकर वापस इंग्लैंड लौट गये। फिर उनके स्थान पर एक दूसरे विशेषज्ञ सी डब्ल्यू गोयडर को भारत बुलाया गया। श्री गोयडर ने देश का दौरा किया और मीडियम वेव के साथ शार्ट वेव लगाने का सुझाव दिया गोयडर के सुझावों के अनुसार प्रसारण को विस्तार मिलते गया। भारत में प्रसारण की विधिवत स्थिति 1936 में तैयार हो सकी और इसी वर्ष पहली जनवरी से आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र से प्रसारण शुरू  हुआ। इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस के नाम बदलकर आल इंडिया रेडियो रखा गया। आल इंडिया रेडियो का यह नाम लियोनेल फिल्डेन के सुझाव पर तत्कालीन वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने मंजूर किया था। नई दिल्ली में रेडियो से समाचार प्रसारण के लिए सेंट्रल न्यूज आर्गनाइजेशन का गठन किया गया और श्री चार्ल्स बान्स ने 9 सितंबर, 1937 को आल इंडिया रेडियो के समाचार संपादक का पद भार संभाला। इस बीच  रेडियो प्रसारण की सफलता का यह चरण काफी उपयोगी रहा जब स्कूली बच्चों और ग्रामीण श्रोताओं के लिए आवश्यक कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाने लगा। दिल्ली, मुंबई और कलकत्ता की शार्ट वेव क्षमता बढ़ता गई। अक्टूबर, 1939 तक अंग्रेजी के अतिरिक्त हिंदुस्तानी, बंगला, तमिल, तेलगू, गुजराती, मराठी और पश्तो भाषाओं में समाचार बुलेटिन प्रसारित होने लगे थे। दिसंबर में दिल्ली से फारसी में भी समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू हो गया था। इस समय तक रेडियो का इस्तेमाल जन सूचनाओं तथा  प्रेरणा देने के लिए किया जाने लगा था। 15 दिंसबर, 1939 को तत्कालीन वायसराय लार्ड लिनिलिथगो ने प्रांतों में संवैधानिक संकट पर अपना भाषण प्रसारित किया।

 

1939 में दूसरे विश्व युध्द होने के बाद सरकार ने रेडियो का भरपूर उपयोग युध्द की खबरें देने तथा लोगों का हौसला बनाए रखने के लिए किया। प्रतिदिन समाचार सेवा जारी रखी गई। युध्द की खबरों को लेकर सरकार का दृष्टिकोण और टिप्पणियां प्रतिदिन की वार्ताएं रेडियो समाचार का प्रमुख विषय होता था। युध्द समाप्त होने के बाद भारत में राष्ट्रीय आंदोलन ने तेज गति पकड़ ली थी। 1942 के आंदोलन ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। 1940 में फिल्डन के भारत छोड़कर चले जाने के बाद रेडियो प्रसारण का विस्तार बाधित होने लगा था। फिल्डेन के स्थान पर प्रोफेसर ए.एस.बुखारी को डायरेक्टर जनरल के पद पर बिठाया गया। यह पद कन्ट्रोलर आफ ब्राडकास्टिंग का ही था जिसे बदलकर डायरेक्टर जनरल कर दिया गया था। लेकिन पहले चरण के विकास का यह बडा पहलू था कि नई दिल्ली में ब्राडकास्टिंग हाऊस का निर्माण हो चुका था। प्रो. बुखारी ने ब्राडकास्टिंग हाऊस में लगभग छ: वर्षों तक अपनी सेवाएँ दी और विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए।  15 अगस्त, 1947 के पूर्व की घटनाओं में विभाजन के संबंध में लार्ड माउंटबेटन, पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा मोहम्मद अली जिन्ना के वक्तव्यों का प्रसारण आल इंडिया रेडियो से किया गया।

 

देश की स्वतंत्रता के पश्चात भारत के पहले सूचना प्रसारण मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल बने। सरदार पटेल ने रेडियो प्रसारण का विस्तार करने के लिए महती योजना बनाई और प्रत्येक राज्य में रेडियो स्टेशन की स्थापना का लक्ष्य रखा। पहली पंचवर्षीय योजना बनने के बाद प्रसारण नीति को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में काफी ठोस आधार प्रदान किया गया। इसी के साथ अखिल भारतीय और क्षेत्रीय स्तर पर प्रसारण की शुरूआत की गई। पहली पंचवर्षीय योजना के समाप्त होने तक कई राज्यों को प्रसार का लाभ मिलने लगा था, साथ ही रेडियो प्रसारण का महत्व सूचनाओं, समाचारों के प्रसारण से लेकर जीवन के प्रत्येक पहलुओं में दिखाई पड़ने लगा था। इसको ध्यान में रखकर अगली पंचवर्षीय योजनाओं में भी इसे विस्तार दिया गया। तीसरी पंचवर्षीय योजना में विविध भारती सेवा प्रारंभ की गई। कला, साहित्य, संस्कृति, भाषा समसामयिकी वार्ताओं के लोकप्रिय कार्यक्रमों का प्रसारण करके रेडियो ने जनसंवाद का विश्वसनीय माध्यम बनने में अहम भूमिका निभाई। 1961 में आल इंडिया रेडियो ने अपना रजत जयंती वर्ष मनाया। 1965 तक आल इंडिया रेडियो के सभी केंद्रों से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष कार्यक्रम प्रसारित किये जाने लगे थे। फ्रीक्वेन्सी मॉडयूलेशन ट्रांसमीटर (एफएम) जुलाई, 1977 में चालू किया गया। विदेश सेवा प्रभाग प्रतिदिन चौबीस भाषाओं में प्रसारण करता है। आकाशवाणी से अब प्रत्येक घंटे समाचार बुलेटिन प्रसारित हो रहे हैं। प्रसार भारती बनने के बाद रेडियो देश का सशक्त जनसंचार माध्यम के रूप में सामने आया। मार्शल मैक्लूहान के अनुसार रेडियो सूचनाओं का ऐसा संग्रह प्रदान करता है जो दूसरे माध्यमों में भी गति उत्पन्न कर देता है। यह निश्चित रूप से विशाल विश्व को एक गांव के आकार में बदल देता है।

 

यह कहा जा सकता है कि संचार के नए युग में हालांकि टीवी चैनलों की चकाचौंध वाली धमक ने रेडियो प्रसारण के सामने नई चुनौतियां जरूर रखी हैं लेकिन रेडियो आज भी लाखों करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिलों की धड़कन है। विद्वान संचारविद् डॉ. अर्जुन तिवारी का मानना है कि टेलीविजन की चमक-दमक और चपलता के बावजूद रेडियो की सरसता, सहजता और मधुरता के शाश्वत स्वर की अनुगूंज श्रोताओं के मन को अपना स्नेहिल स्पर्श सदैव देती रहेगी।

 

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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