Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

सुनहरा है सामुदायिक रेडियो का भविष्य

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डॉ. देवव्रत सिंह

 

दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि जनसंचार माध्यमों में बड़े औद्योगिक घरानों के पदार्पण के बाद व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा निरंतर तीखी होती जाती है, जिसकी परिणिति आखिरकार मीडिया पर चंद बड़े समूहों के एकाधिकाकार के रूप में होती है बाजार की इस होड़ में मीडिया ना केवल बड़ी हस्तियों पर केंद्रित होता जाता है बल्कि वो समाज के व्यापक सच के नाता तोड़ कर बाजार की एक कठपुतली बनकर रह जाता है। दरअसल,यही वजह है कि वैकल्पिक एवं सामुदायिक मीडिया की आवश्यकता  महसूस होने लगती है। अधिकांश जनमाध्यम तकनीक के मामले में काफी महंगे है जो सामुदायिक मीडिया के सामने सबसे बड़ी समस्या भी है। लेकिन रेडियो एक ऐसा माध्यम है जो ना केवल तुलनात्मक रूप में सस्ता है बल्कि सामुदायिक विकास की अधिकांश जरूरतों पर खरा उतरता है। नये सिध्दांतकारों का मानना है कि लोकतंत्र पर जिस प्रकार बाजार की शक्तियां तेजी से हावी हो गयी हैं उससे जनहित में लोकतंत्र की भूमिका सिमटती जा रही है ऐसे में नागरिकों को स्वयं जागरूक होकर अपने हितों में मीडिया का उपयोग करना होगा। नागरिक वैकल्पिक माध्यमों के उपयोग से बाजार की बेलगाम गतिविधियों पर लगाम कस सकते हैं। राजनीति में हस्तक्षेप कर सकते हैं और सामाजिक तानेबाने को अधिक मजबूत एवं सुरक्षित बना सकते हैं। विश्वभर में उपेक्षित, अल्पसंख्यक, मुख्य धारा से अलग-थलग समुदायों के लोग रेडियो का उपयोग अपनी विशेष आवश्यकताओं को पूरा करने में कर रहे हैं। इस प्रकार सामुदायिक रेडियो विभिन्न संस्कृतियों को संरक्षित कर विविधता को बनाये रखने में मदद कर रहा है और कमजोर एवं दबी कुचली आवाजों को बुलंद करके बेहतर नागरिक समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

 

अवधारणा : सामुदायिक रेडियो का अर्थ है कि एक समुदाय विशेष की आवश्यकताओं के मुताबिक छोटे भूभाग पर रेडियो प्रसारण करना और इस प्रकार प्रसारित होने वाले कार्यक्रम तैयार करने में उस समुदाय विशेष की भूमिका होनी चाहिए। यानी दूसरे अर्थों में समुदाय द्वारा समुदाय की जरूरतों को पूरा करने के लिए समुदाय का प्रसारण। व्यावसायिक रेडियो चैनलों की तुलना में इसके मूल उद्देश्यों में भिन्नता है। विकास की आवश्यकताओं के अलावा सामुदायिक रेडियो स्थानीय विधाओं के जरिए मनोरंजन का भी अच्छा माध्यम बन सकते हैं।

 

भारत में विकास :-

वैसे तो आजादी से पहले भी देश में अनेक सामुदायिक रेडियो काम कर रहे थे। जैसे 1935 में इलाहाबाद स्थित कृषि संस्थान  अपना रेडियो स्टेशन चलाता था। आजादी के बाद भी पतंनगर कृषि विश्वविद्यालय को प्रायोगिक रूप से रेडियो चलाने की अनुमति दी गयी। सन् 1956 में पूना के आसपास के गांवों में रूरल फोरम स्थापित किए गए लेकिन बाद में सरकार ने सामुदायिक  रेडियो की अनुमति निजी संगठनों को नहीं दी और आकाशवाणी से ही स्थानीय स्तर पर अनेक इलाकों में लोकल प्रसारण किया जाता रहा। हालांकि सही मायने में इसे सामुदायिक रेडियो नहीं कहा जा सकता। सन् 1995 में सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद जिसमें उसने हवाई तरंगों पर सरकार के एकाधिकार को गलत बताया था, स्वयं सेवी संगठनों ने सामुदायिक रेडियो खोलने की अनुमति देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना आरंभ कर दिया। सरकार ने इस पर आतंकवादी संगठनों एवं अन्य समाज विरोधी तत्वों द्वारा गलत इस्तेमाल की बात कही लेकिन आखिरकार सरकार ने सामुदायिक संगठनों को अनुमति देने का मन बना लिया। 2 फरवरी 2004 में अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई ने देश का पहला कैंपस रेडियो स्टेशन खोला। इसके बाद अनेक विश्वविद्यालयों ने अपने कैंपस रेडियो स्टेशन खोले और एक के एक बाद एक अनेक सामुदायिक रेडियो चैनल देश में खुलने लगे।

 

सामुदायिक रेडियो के प्रयोगः-

नम्म ध्वनि : कर्नाटक के कोलर जिले में स्वयंसेवी संगठन वॉयसिस द्वारा संचालित सामुदायिक रेडियो स्टेशन नम्म ध्वनि (हमारी आवाज) काफी सफल परियोजना रही है। इसे देश का पहला स्वतंत्र सामुदायिक स्टेशन माना जाता है। यूनेस्को की मदद प्राप्त ये रेडियो स्टेशन ग्राम अंचल में सशक्तिकरण का एक सफल माध्यम बना है। लोगों ने इसके माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने हकों के लिए लड़ाई लड़ी है। स्कूली छात्रों के गीत, देहाती, चुटकुले, लड़कियों की आपस में दहेज प्रथा और लड़कों द्वारा छेड़खानी के खिलाफ बातचीत, ग्रामीण महिलाओं के रसोई के राज, बैंक खाता खोलने की विधि, किसानों के खेती-बाड़ी के बारे में अनुभव इत्यादि सभी कुछ इस रेडियो पर सुना जा सकता है। ये एक केबल रेडियो स्टेशन है। सारे गांव में एक  तार बिछा दी गयी है जिसके जरिए रेडियो का केबल प्रसारण किया जाता है। श्रोता अपने रेडियो सेट पर केबल कनेक्शन लगाकर कार्यक्रम सुनते हैं।

 

कुंजल पंछी कच्छ जी : कच्छ महिला विकास संगठन द्वारा चलाया जा रहा ये सामुदायिक रेडियो ग्रामीण महिलाओं में खासा लोकप्रिय है। वैसे तो ये संगठन इस इलाके में लगभग दो दशक से काम कर रहा है। लेकिन अब सामुदायिक रेडियो के माध्यम से शिक्षा,स्वास्थ्य, बचत बाजार में खरीददारी, पंचायती राज इत्यादि विषयों पर महिलाओं को जागरूक बना रहा है। ये संगठन पहले उजास नामक एक सामुदायिक समाचार पत्र भी निकालता था। जल्दी ही संगठन ने महसूस किया कि ग्रामीणों के लिए रेडियो भी दमदार माध्यम साबित हो सकता था। इस  सामुदायिक रेडियो पर अधिकतर महिलाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाया जाता है जैसे भ्रूण हत्या, महिला शिक्षा, बेटा पैदा करने का दबाव, दहेज प्रथा इत्यादि।

 

चलो हो गांव में : झारखंड के पालमू जिला में नैशनल फाउंडेशन आफ इंडिया की मदद से एड-बिहार द्वारा चलाये जा रहे इस प्रोजेक्ट के तहत गांव के लोग पहले रेडियो कार्यक्रम बनाते हैं और उसके बाद स्थानीय आकाशवाणी चैनल पर उसे प्रसारित किया जाता है विशेष बात ये है कि गरीब अनपढ़ किसानों को स्वयं टेप रिकार्डर और अन्य उपकरणों को चलाना सिखाया गया और वे अपने कार्यक्रम खुद बनाते हैं कार्यक्रमों के माध्यम से बाल मजदूरी, बाल विवाह, बंधुआ मजदूरी, दहेज प्रथा, अंधविश्वास, शराबखोरी, भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, सामंती आचार-विचार, रूके पड़े सामाजिक कार्यों और संस्थाओं के बारे में जागरूकता फैला जाती है।

 

आंध्रप्रदेश के प्रयोग : मेडक जिले के जहीराबाद इलाके में दलित महिला संगठन- संगम द्वारा चलाए जाने वाले इस रेडियो स्टेशन को स्थापित करने में यूनेस्को ने मदद की है। यहां तेलंगाना के अति पिछड़े इलाकों में डेक्कन विकास  संगठन लंबे अरसे से काम कर रहा है। रेडियो की मदद से दलित महिलाएं अपना काम अधिक मजबूती से कर पा रही हैं। रेडियो कार्यक्रम महिलाएँ स्वयं तैयार करती हैं इसके लिए उनके पास अपना एक छोटा सा स्टूडियो डबिंग रूम और अन्य जरूरी सुविधाएं हैं। इस प्रसारण में स्वास्थ्य शिक्षा, स्थानीय संस्कृति, लैंगिक न्याय, अन्न सुरक्षा इत्यादि विषयों पर कार्यक्रम सुनाये जाते हैं।

 

उत्तरांचल के प्रयोग : सन् 2001 से उत्तरांचल के पहाड़ी इलाकों में अनेक सामुदायिक रेडियो स्टेशन काम कर रहे हैं यूनेस्को की मदद से एक गैर सरकारी संगठन हिमाचल ट्रस्ट ने पहले एक छोटी सी शुरूआत की थी। अब वहां एक दर्जन रेडियो स्टेशन काम कर रहे हैं। ये स्टेशन लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मंच मुहैया करा रहे हैं। हिमालय की गोद में टिहरी गढ़वाल की हेवल घाटी में हेवलवाणी और पौढ़ी गढ़वाल में मंदाकिनी की आवाज आज वहां जनता की आवाज बन चुके हैं। इन सामुदायिकि रेडियो चैनलों की स्थानीय पहाड़ी संस्कृति को संरक्षित करने में विशेष भूमिका है। प्रदीप नामक एक रेडियो चैनल ने चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आम लोगों को इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन का उपयोग करना सिखाया।

 

सामुदायिक रेडियो की समस्याएं : सामुदायिक रेडियो स्थापित करने में सबसे बड़ी समस्या जागरूकता की है। अधिकांश पिछड़े समुदायों में अपने अधिकारों के प्रति जानकारी का अभाव है। निरक्षरता और गरीबी इस हालत के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। अभी तक अधिकांश सामुदायिक रेडियो किसी ना किसी स्वयं सेवी संगठन की पहल से चलाये गये हैं। बड़े पैमाने पर सामुदायिक रेडियो के विस्तार के लिए चाहिए कि इस बारे में सही जानकारी का प्रचार-प्रसार किया जाए। उदाहरणस्वरूप सरकार ने घोषणा कर दी है कि ग्रामीण पंचायतें और संगठन अपनी आवश्यकतानुरूप रेडियो स्टेशन चला सकते हैं। लेकिन देहात में लोगों के इस बारे में जानकारी नहीं है और अगर ग्रामीण चाहते भी हैं तो उनकी सबसे बड़ी समस्या ये है कि सामुदायिक रेडियो कैसे स्थापित किया और चलाया जाए। प्रसार भारती के इंजीनियरों ने मिलकर बेसिल नामक एक संगठन बनाया है। ये संगठन रेडियो स्टेशन स्थापित करने में शुरू से अंत तक मदद करता है। स्टेशन के लिए आवेदन से लेकर स्थापना और रेडियो प्रशिक्षण तक का काम बेसिल कंसल्टैंसी फीस लेकर करता है। इसके अलावा साऊथ एशिया वन नामक  संगठन भी रेडियो के जरिए विकास गतिविधियों को प्रोत्साहित  करने के काम में जुटा है। छोटे पैमाने पर अनेक दूसरे संगठन और समूह भी इस समय सक्रिय हैं जो बहुत कम खर्चे यानी दो से तीन लाख रूपये में भी सामुदायिक रेडियो स्थापित करने में मदद करते हैं। दूसरी बड़ी समस्या आर्थिक है अमूमन एक सामुदायिक रेडियो स्थापित करने में पांच से दस लाख रूपये तक का खर्च आता है। इसके अलावा कार्यक्रम निर्माण में आने वाला खर्च अलग है। अनेक स्वयं सेवी संगठनों के पास इतनी धन राशि नहीं है कि वे अपनाा रेडियो स्टेशन चला सकें।  आर्थिक संसाधनों को जुटाने के लिए इच्छुक संगठन यूनेस्को समेत अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की मदद ले सकते हैं। यूनेस्को इन दिनों जोर-शोर से रेडियो स्टेशन यूनेस्को की मदद से ही चल रहे हैं। तीसरी समस्या मानव संसाधन की है। रेडियो स्टेशन चलाने के लिए प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता जरूर पड़ती है लेकिन ये उतनी बड़ी समस्या नहीं है। क्योंकि रेडियो चैनल चलाना इतना सरल है कि थोड़े से प्रशिक्षण के बाद कम पढ़े लिखे ग्रामीण युवा भी इस काम को आसानी से कर लेते हैं आवश्यकता है उत्साह और लगन की अंतिम समस्या रेडियो कार्यक्रमों के निर्माण की है। जिसके लिए एक सोची समझी योजना आवश्यक है क्योंकि रेडियो चैनल आरंभ करना तो आसान है लेकिन उसे निरंतर चलाना और आम लोगों की पसंद और रूचि के मुताबिक कार्यक्रमो का निर्माण करना एक दुरूह कार्य है जिसके लिए निरंतर लोगों से संपर्क  रखना और उनकी रायशुमारी करनी होती है। लेकिन ग्रामीण श्रोताओं को एक बार रेडियो में शामिल कर लिया जाए तो ये काम भी आसान हो जाता है। इसके लिए उनके इंटरव्यू आधारित कार्यक्रम बनाये जा सकते हैं। उन्हीं से सलाह ली जा सकती है कि उन्हें क्या पसंद है। अनेक सामुदायिक रेडियो चैनलों का अनुभव बताता है कि एक बार श्रोताओं को रेडियो अभियान में जोड़ लिया गया तो फिर वे उससे अपने आप जुड़ते चले जाते हैं।

 

विकास में भूमिका : सैध्दांतिक रूप से सामुदायिक रेडियो लोकतंत्र का ही विस्तार है। आम लोग सामुदायिक रेडियो को अपनी अभिव्यक्ति का साधन बना रहे हैं। साथ ही ये मुख्यधारा के व्यावसायिक मीडिया से हटकर एक वैकल्पिक माध्यम के रूप में भी सामने आ रहे हैं। व्यावसायिक दबाव में मुख्यधारा का मीडिया गरीब और अलग-थलग पडे समाज के उपेक्षित समुदाय की आवश्यकताओं को उचित एवं पर्याप्त स्थान नहीं देता। सामुदायिक रेडियो ऐसे तबके को अपनी समस्याओं से जूझने में मदद करता है उनके बीच आपसी संवाद को बेहतर बनाता है। सामुदायिक रेडियो नम्म ध्वनि चलाने वाले संगठन वायसिस के निदेशक आशीष सेन कहते हैं कि सामुदायिक रेडियो की भूमिका भारत जैसे देश में जहां गरीबी और निरक्षरता है, विभिन्नताएं बिखरी पड़ी हैं, काफी महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी हो सकती है। वर्तमान में भारत में सामुदायिक रेडियो के विकास पर एक नजर डालें तो ये कहा जा सकता है कि सामुदायिक रेडियो अभी शैशव काल से गुजर रहा है। भारत की विशालता और विविधता की तुलना में अभी की सामुदायिक रेडियो चैनलों की संख्या ऊंट के मुंह में जीरा ही है। पिछले दिनों  दिल्ली में सामुदायिक रेडियो विषय पर साऊथ एशिया वन वर्ल्ड के बैनर तले एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें अनेक मीडिया विद्वानों और स्वयं सेवी संगठनों के लोगों ने हिस्सा लिया था। इसी प्रकार के विमर्श और आयोजन देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न स्तरों पर हो रहे हैं। सैध्दांतिक रूप में सामुदायिक रेडियो की उपयोगिता को अब स्वीकारा जाने लगा है। भारत में अनेक स्वयं सेवी संगठन तेजी से अपने रेडियो चैनल चलाने की या तो योजना बना रहे हैं अनेक संगठनों ने इसके लिए सरकार के पास आवेदन भी कर दिया है। निसंदेह विविधता भरे भारतीय माहौल में सामुदायिक रेडियो का भविष्य काफी सुनहरा होने की उम्मीद की जा सकती है। 

 

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में व्याख्याता हैं।

 

 

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