स्वागत कीजिए रेडियो की वापसी का
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बसंत कुमार
तिवारी
उन
दिनों मैं,
माडल हाई स्कूल, जबलपुर का अंतिम वर्ष
का छात्र था। हम चार पांच मित्र रोज की तरह एक साथ वापस लौट रहे थे। रास्ते में
शहर का सुप्रसिध्द घण्टाघर था। हमारे बीच घण्टाघर को लेकर तरह-तरह की कहानियां
चलती थीं।
''घण्टाघर में चार घड़ी
चारों में
जंजीर लगी
जब घण्टा बजता
है तब
खड़ा मुसाफिर
हंसता है''
ये चार
पंक्तियां बहुत कही-सुनी जाती थीं। यहीं से शहर और बाजार शुरू होता था। उस दिन
सब कुछ रोज की तरह सामान्य नजर नहीं आया। किसी मुसाफिर के हंसने की बात तो दूर,
एक अजीब सा सन्नाटा नजर आ रहा था। दुकानें धड़ाधड़ बंद हो रही
थीं। वहीं पास की एक रेडियो मरम्मत की दुकान में भारी भीड़ थी। हम भी इसमें
शामिल हो गए। तब पता चला कि दिल्ली में महात्मा गांधी की हत्या हो गई है और
रेडियो में रूक-रूककर समाचार आ रहा है। शायद कोई मरम्मत किया हुआ रेडिया था या
वैसी ही तकनीक थी, आवाज बार-बार कट रही थी। बार-बार इसी
आवाज में सुनाई पड़ा कि 5 बजकर,
पांच मिनट पर महात्मा गांधी को प्रार्थना सभा में जाते समय गोली मार दी गई।
कर्फ्यू की तरह सन्नाटा फैलता देख हम जल्दी-जल्दी घर पहुंचे। पहली बार रेडियो
से सुना 'कर्फ्यू' था। उस दिन
उसका सही स्वरूप देखने को मिला। बाद में जीवन में कई बार देखा पर बस कर्फ्यू का
माखौल जैसा।
दूसरे दिन
गांधी जी की शव यात्रा का आंखों देखा हाल रेडियो से प्रसारित होना था। हमारे घर
में रेडियो नहीं था । वह मंहगा होता था इसलिए संपन्न लोगों के घर ही रहता था।
हमारे सभी परिवार जन निकट के एक रिश्तेदार के घर जमा हुए। शव यात्रा का विवरण
सुनने लोगों की भीड़ रेडियो के नजदीक जगह-जगह जमा थी। एक दुकान ने तो स्पीकर लगा
कर आवाज सड़क तक पहुंचा दी थी। भीड़ में,
हमारे परिवार में, लोगों को हमने रोते,
सिसकते, आंसू पोछते देखा। गांधी जी से
जुड़ी भावनाओं के कारण आंसू निकल रहे थे। पर असली तो वह आवाज जो रेडियो से
निकलकर आपकी भावनाओं को आंसू बनाकर बाहर निकाल रही थी,
ताकतवर थी। छात्र थे ज्यादा तो समझ नहीं आया पर यह अवश्य समझे कि रेडियो की
कितनी बड़ी शक्ति है जो बिना दिखाए आपको हंसा और रूला सकती है। इंदिरा गांधी का
तीन दिन शव और यात्रा टीवी पर दिखी पर वैसे आंसू नहीं निकले जैसा रेडियो की
आवाज ने सन् 48 में निकाले थे। रेडियो में कल्पना शक्ति
थी, टीवी में नहीं।
इस शव यात्रा
के विवरण की दो आवाजें और उनके नाम याद हैं। हिन्दी के
'देवकीनंदन
पांडे' अंग्रेजी के 'मेलवेल डी
मैलो'। इन्हीं ने उस दिन सबको रूलाया था। एक दो नहीं
पूरे देश को। बाद में फिल्म संगीत को रेडियो सीलोन से सुनाने वाले अमीन सयानी
को भी लोग कभी नहीं भूल पाएंगे। स्वाधीनता संग्राम के दौर में और उसके बाद लगभग
दो दशक तक संचार और संवाद का सबसे सशक्त माध्यम रेडियो ही था। सबके पास नहीं
होता था पर सुनते सब थे। रेडियो के लगभग सभी सैट विदेशी ही होते थे। 'मारकोनी'
नाम सबसे ज्यादा प्रचलित था।
1951-52 में जब मैं पत्रकारिता में आया उस समय रायपुर एक छोटा
सा कस्बानुमा शहर था। यही कोई 150 या 200
टेलीफोन थे और किट-किट करने वाला टेलीग्राफ आफिस। तार का मजमून
हाथ से लिखा जाता था। 'नम्बर प्लीज'
पूछकर आपरेटर फोन लगाता था। समाचार पत्रों के लिए रेडियो से
समाचार लेना बाधित था पर हर समाचार पत्र रेडियो से समाचार लेता था। प्रथम पृष्ठ
के सम्पादक की टेबिल पर रेडियो का होना लगभग लाजमी था। छत्तीसगढ़ के प्रथम दैनिक
समाचार पत्र महाकोशल में हम भी रेडियो से ही समाचार लेते थे क्योंकि रायपुर तक
टेलीप्रिंटर पहुंचा ही नहीं था। हमने रेडियो से 'चोरी'
से लिए समाचारों को 'साहूकारी'
से छापने के लिए प्रदेश की राजधानी नागपुर से पीटीआई से तार
द्वारा समाचार लेना शुरू कर रखा था। अखबार में छपे समाचार से कहीं ज्यादा वजन
रेडियो से सुनने का था। उस समय बिना बिजली के रेडियो की कल्पना ही नहीं थी। फिर
ट्रांजिस्टर का दौर आया और बिजली से चलने वाला रेडियो हाशिए में चला गया। मेरे
पास भी सन् 60 का खरीदा मैट्स 'एमजीजेडएस'
का एक रेडियो अभी भी है अब वह हमारी बैठक में अतीत के प्रतीक
के रूप में धरोहर की तरह है। समय धीरे-धीरे बदल गया। विज्ञान ने उस सभी
कल्पनाओं को सम्भव बना दिया जो कभी सोची नहीं गई थीं।
आज जब रेडियो
की वापसी की चर्चा चल निकली है तब रेडियो की वह सब ताकत याद आती है।
30
जनवरी, 1948 गांधी की शव यात्रा, 15
अगस्त, 1947 को नेहरू की वह आवाज,
'जब दुनिया सो रही है, तब हम जाग रहे
हैं' आज भी सुनाई देती है। विज्ञान भी यही ताकत है कि
वह इतिहास की सबसे बड़ी ताकतों, शक्तियों को हाशिऐ में
करता चलता है। वहीं कुछ रेडियो के साथ हुआ पर जैसा कि समय अपने को दोहराता है।
लगता है कि रेडियो की वापसी हो सकती है।
कहा जाता है
कि जिस सरकार ने रेडियो को अपना माध्यम बनाया वही अब उसकी वापसी नहीं होने दे
रही है। यह कहने में शायद ठीक लगे पर यह भी है कि वह रेडियो अब उस रूप में वापस
शायद ही आए। जैसा कि होता आया है कि वापसी किसी की नहीं होती,
कुछ वापस आता भी है तो परिष्कृत स्वरूप में। रेडियो की वापसी
आधुनिक बाजार की जरूरत के लिए ही हो रही है। निजी क्षेत्र में सैकड़ों एफएम चैनल
शुरू हो रहे हैं पर इनका वह उपयोग शायद ही सम्भव है जो भावनाओं के हंसाने और
रूलाने की शक्ति रखता था। गांव-गांव तक बाजार को पहुंचाने और उपभोक्ता को
आधुनिकता से पागल बनाने में शायद यह पहले से कहीं ज्यादा शक्तिशाली बनकर आ रहा
है। रेडियो हर जगह है। वह चलित है, मोबाइल है। टेलीविजन
आज भी एक जगह स्थिर है।
टेलीविजन और
रेडियो की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। एक दृश्य और श्रव्य दोनों है और दूसरा
केवल श्रव्य। एक आखों से दिमाग और दिल तक जाता है तो दूसरा केवल कानों से दिल
और दिमाग तक। भारतीय मानस में भावनाओं की संवेदना तब तक जीवित और जीवंत है जब
तक रेडियो प्रभावी है। पर यदि पूरा जीवन क्रम व्यवसायी हो गया तो कुछ समय तक
टीवी और बाद में रेडियो दोनों ही निष्प्रभावी होकर रह सकते हैं। टीवी जिस तरह
अपसंस्कृति फैला रहा है। रेडियो वैसा न तो कर रहा है न ही शायद कर सकता है।
विलासिता,
यौन, टीवी से दिखाकर मानसिकता बदल सकता
है। रेडिया की कितनी भी उत्तेजक आवाजें वह नहीं कर सकतीं। दरअसल रेडियो की
तकनीकी वापसी और टीवी को खदेड़ने जैसी कोई बात हो ही नहीं सकती। विज्ञान आज जहां
है वहां से वह आगे बढ़कर कहां जाएगा यह कल्पना रेडियो युग ने नहीं की थी। वैसे
ही हम यह नहीं जान सकते की टीवी कहां तक ले जाएगा।
दरअसल जरूरत
है,
खासतौर पर भारत जैसे देश में इन सशक्त माध्यमों की रचनात्मकता
विकसित करने की। युध्द में एक बम जिनती सभ्यता बरबाद नहीं करता उससे कही ज्यादा
सभ्यता समाप्त टीवी कर रहा है। रेडियो भी कर सकता है पर उसकी मारक क्षमता कम
है। रेडियो की वापसी हो या टीवी का और परिष्कृत होना,
दोनों ही व्यक्ति और समाज को रचनात्मक बना सकते हैं। सत्ता से यह उम्मीद नहीं
की जानी चाहिए। समाज तो अपनी अंतर निहित शक्तियों से बनता है वह शासन और सत्ता
की उजागर शक्तियों से नहीं। रेडियो की वापसी हो रही है तो उसका स्वागत किया
जाना चाहिए पर कुछ शर्तों के साथ शर्ते वहीं होंगी जो समाज को सही लगें।
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