Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

आकाशवाणी और क्रिकेट स्कोरिंग

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बापू देशपांडे

 

भोपाल के बाबे अली स्टेडियम पर 1969 के क्रिकेट सत्र की उस खुशनुमा सुबह दर्शकों की भीड़ इकट्ठा होने के पीछे पर्याप्त कारण थे। स्वर्गीय नवाज इफ्तिखार अली पटौदी स्मृति अखिल भारतीय क्रिकेट स्पर्धा का पहला फाइनल खेला जाने वाला था और उसमें भारतीय क्रिकेट के चमकते सितारे शिरकत करने वाले थे। स्वयं टाइगर पटौदी, जो उस समय भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे, अपने दल का नेतृत्व कर रहे थे। सलीम दुर्रानी, अशोक मांकड़, करसन घावरी, यजुवेन्द्र सिंह, जयसिम्हा इत्यादि नामी खिलाड़ी मैदान पर अपने जौहर दिखाने वाले थे।

 

मैदान के पैवेलियन छोर पर लगभग दस-बारह फुट की ऊंचाई पर आकाशवाणी ने अपना तम्बू लगाया और यहीं से मीडियम और शार्ट वेब पर इस मैच का सीधा प्रसारण किया। डाक और तार विभाग की टेलीफोन लाइन पीछे बेनजीर की ओर से तम्बू तक बराबर पहुंच गई। क्रिकेट प्रसारण का यह पहला अवसर था भोपाल के लिए। इतिहास रचने वाले कामेन्ट्रेटर्स थे जेपी नारायणन, हसनात सिद्दीकी और राजेन्द्र मल्होत्रा। इस टीम में जेपी ने अंग्रेजी में आंखों देखा हाल सुनाया तो हिंदी में बारी-बारी से हसनात और राजेन्द्र ने पहली बार क्रिकेट का आंखों देखा हाल सुनाया। मैंने और रमेश दीक्षित ने स्कोरिंग का कार्य किया। यह बड़ा ही रोचक अनुभव रहा हम सभी के लिए। यहीं से मेरा रेडियो के लिए स्कोरिंग करने का अध्याय शुरू हुआ। आकाशवाणी के निदेशक थे शुंगलु साहब। परंतु मजे की बात तो यह थी कि कोई नहीं जानता था उस रोज कि आगे चलकर जेपी तथा राजेन्द्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कामेन्ट्रेटर्स बनेंगे और छा जाएंगे भारतीय क्रिकेट के क्षितिज पर। प्रादेशिक स्तर पर हसनात सिद्दीकी ने न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज की, उन्होंने अपनी भाषा में स्थानीय प्रभाव जतन किया और लोकप्रियता अर्जित की। मैंने भी उन तीनों के साथ स्कोरर का कार्य किया और खेल का आनंद लिया। इन तीनों महान प्रसारणकर्ताओं की अब यादें भर शेष हैं। एक छोटे से अंतराल से तीनों का असामयिक निधन हम सबके लिए अपूरणीय क्षति ही कही जा सकती है। आकाशवाणी ने इन्हें जनता के सामने लाया था। उन्हें कितना गहरा आघात लगा होगा, आकाशवाणी के कर्ताधर्ता भलीभांति जानते होंगे। पहले वर्ष की सफलता से प्रेरित होकर हम सभी इस अखिल भारतीय क्रिकेट स्पर्धा की प्रतीक्षा करते रहे। टाइगर पटौती ने अगले मौके पर बेरी सर्वाधिकारी को भोपाल आने का न्यौता दिया। हम सभी के लिए बेरी दा का भोपाल आना वरदान की तरह ही था। मैं क्रिकेट की स्कोरिंग परंपरागत तरीके से बराबर करता था लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि रेडियो कामेन्ट्रेटर्स के लिए इसे कैसे किया जाता है। बेरी सर्वाधिकारी ने मुझे यह सिखाया। दरअसल स्कोरर के दो कागज एक कामेन्ट्रेटर को अपनी जगह से एक नजर में खेल संबंधी आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराते हैं, जिसे वह वाक्य में रचते हुए प्रसारण को रोचक बनाता है। जैसे उदाहरण के लिए ''पचहत्तरवें ओवर की समाप्ति पर भारत पचहत्तर रन एक विकेट के नुकसान पर। तेंदुलकर खेल रहे हैं पैंतालिस रन पर और उनका साथ निभा रहे राहुल द्रविड़ खेल रहे हैं पांच रन के अपने व्यक्तिगत योग पर। आउट होने वाले बल्लेबाज हैं सौरभ गांगुली। सोलहवें ओवर की पहली गेंद लेकर तैयार हैं चामिण्डा वास और द्रविड़ मुकाबले के लिए तैयार।''

 

परंपरागत स्कोरिंग शीट का प्रारूप ऐसा है कि अक्षर छोटे ही लिखने पड़ते हैं, वह भी पेंसिल से। एक कामेन्ट्रेटर उड़ती हुई नजर से ज्यादा समय नहीं दे सकता स्कोअरर शीट के लिए। परंपरागत शीट पर किंतु आंखें गाड़नी पड़ेगी देर तक तब ही जाकर कोई जानकारी मिल सकेगी। जहां तक आकाशवाणी का प्रश् है, वह कामेन्ट्रेटर और स्कोरर में भेदभाद नहीं करती। दोनों को एक समान पारिश्रमिक देते हैं। आकाशवाणी के इस तम्बू में याद रखने वाले कतिपय जुमले, प्रसंग दर पेश आते हैं। कुछ एक की चर्चा यहां उपयुक्त रहेगी। हम लोग ग्वालियर के कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम के बूथ से प्रसारण कर रहे थे। भारत और वेस्ट इंडीज के बीच एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मुकाबला चल रहा था। भोजन अवकाश के बाद जेपी नारायण ने मुझसे कहा, ''यू नो समथिंग बापू? दि बोर्ड हैज अपाइंटेड एसएमजी (सुनील गावस्कर) कैप्टन ऑफ इंडिया।'' मैंने कहा, ''सच तो अच्छी खबर है, हमारे श्रोता भी जानते हैं कि बोर्ड मीटिंग यहां ग्वालियर में हो रही है।''

''एक्जेक्टली, हम इस खबर को यहीं से दुनिया को सुना देंगे, क्यों अय्यर साहब?''

अय्यर साहब उस समय ग्वालियर के स्टेशन डायरेक्टर थे। उन्होंने साफ इंकार किया और कुछ समय बाद हमें एक 16-17 बिंदुओं वाला कोड आफ कण्डक्ट दिखाया, उसे पढ़ने के बाद स्थिति स्पष्ट हो गई। हम ऐसा नहीं कर सकते। हम सिर्फ दुखी हुए और लगे पुन: काम पर। एक मैच में चन्द्रशेखर गेंदबाजी कर रहे थे और उनकी गेंद बल्लेबाज के पैड पर लगी और जोर से अपील हुई। इधर प्रसारण कक्ष में राजेन्द्र मल्होत्रा माइक पर थे, उन्होंने तुरंत मामले के विशेषज्ञ लाला अमरनाथ की ओर माइक सरकाया और फिर देखा तो लाला जी को झपकी लगी थी संभवत:, उनकी गर्दन झुकी हुई थी। उन्हें स्पर्श से जगाया गया और उन्होंने एक दृष्टि में भांप लिया कि क्या हुआ होगा। और उन्होंने अपने चिर परिचित कसे हुए अंदाज में बिना रुके कहा, ''And that typical Chandra Gogly was quick and low and whould have consumed the best of the batsman in the world'' यह प्रसंग बरसों हमारे चर्चा का विषय बना रहा।

 

खेल की बारीकियों की समझ और वाक्चातुर्य इस संदर्भ में टाइगर पटौदी का हाथ पकड़ने वाले मुश्किल से मिलते हैं। ईरानी फाइनल का वाकया है। बल्लेबाज ने फाईन लेग की दिशा में हुक किया और गेंद सीमा पार हो गई छ: रन के लिए। कामेंट्रेटर ने कहा ''...और ये बेहतरीन छक्का फाईन लेग पर खड़े क्षेत्ररक्षक देखते रह गए... इस पर हमारे विशेषज्ञ टाइगर पटौदी।'' पटौदी के साथ यह जोखिम कभी नहीं उठानी चाहिए। वह आपकी हां में हां कभी नहीं मिलाएंगे। और हुआ भी ऐसा ही। टाइगर ने कहा, ''इस बाउंसर के पहले फील्ड सजाई गई थी और लेग साईड पर जाल बिछाया गया था, बल्लेबाज भाग्यशाली रहे कि गेंद फील्डर के हाथ नहीं लगी, यह खराब शॉट था।'' यह दुर्भाग्य ही है कि पटौदी ने 'टाइगर्स रेल' के बाद कोई किताब नहीं लिखी। कभी कभी ऐसा भी होता है, गौर फरमाईए, प्रसारण चल रहा है, ''हिरवानी की अगली गेंद लेग स्टंप पर, ओवर पिच और एनपी सिंह ने उसे ड्राईव किया है ऑन साईड पर और वहां संजय गांधी ने उसे फील्ड किया और दे दिया विकेट कीपर प्रशांत को... कोई रन नहीं....''

 

दरअसल मिड ऑन पर संजय गांधी नहीं, संजय जगदाले थे। कभी-कभी ऐसा हो जाता है। एक अच्छे प्रसारण में स्कोअरर और कामेन्ट्रेटर का तालमेल अत्यंत महतवपूर्ण है। स्कोअरर की नजर दोनों अंपायरों पर बराबर होती है। और इसके फलस्वरूप उनके संकेत और जटिल अवसरों के लिए ज्यादा मुस्तैद होता है। स्पिन आक्रमण के दौरान जब विकेट कीपर और अन्य फील्डर बल्लेबाज को घेरे किसी भी संभावना को लपकने के लिए तैयार होते हैं, ऐसे में पब्लिक का शोर खिलाड़ियों की जोरदार अपील कामेंट्रेटर को असमंजस में डाल सकता है। खासकर जब निर्णय एलबीडब्ल्यू का है या कॉट बिहाइंड का? यह प्रश् कभी-कभी अंतिम रूप से अंपायर ही ऑफिशियल स्कोअरर के पास जाकर देता है। स्कोअरर इन सभी संकेतों को पढ़ लेता है और फिर प्रविष्टि करता है। यदा-कदा स्क्वेयर लेग अम्पायर नो बाल का संकेत देता है। कामेन्ट्रेटर कभी यह संकेत न देख पाने की भूल कर सकता है।

 

मैं आकाशवाणी का ऋणी हूं। आज भी मेरे मन में आकाशवाणी के प्रति आदर भाव बराबर बना हुआ है। क्रिकेट, इस खेल को समझने में जितना योगदान मैदानी अनुभव का रहा है, उतना ही रेडियो को श्रेय जाता है। आकाशवाणी की कृपा से इनमें दिग्गजों को रेडियो पर सुना है। बॉबी तास्यारखान, विजय मर्चेन्ट, डिकी रत्नाकर, डि-मेलो, सुरजीत सेन, सरतेन्दु सान्याल, देवराज पुरी, वीएम चक्रपाणि, आनंद सितलवाद, जेपी नारायणन आदि। काफी लंबी है यह सूची। जो नाम इस समय याद आ रहे हैं, लिखे हैं। हिंदी में सुशील दोषी ने मील के पत्थर का काम किया है। स्कंद गुप्त, सुनील वैद्य अच्छे लगते हैं।

 

माना कि बहुत काम हुआ है लेकिन यह भी सच है कि अभी बहुत कुछ बाकी है। ऊपर सोच में बदलाव की जरूरत है। आप कैसे बिना स्कोअरर, कामेन्ट्रेटर के दल को काम पर भेज सकते हो, जैसा 1993 में भारत के श्रीलंका दौरे पर किया। आकाशवाणी ने समय-समय पर कार्यशालाएं भी आयोजित की हैं। परंतु उनके निष्कर्षों पर अमल होता दिखाई नहीं देता। ऐसा कैसे हो सकता है कि जिस प्रणाली ने अच्छे-बुरे की सही पहचान की हो, वह लगातार सुरेश सरैय्या को पाबंद करती है। और सबसे बड़ी बात कि चुनौतियों का उत्तर सृजनशील होकर आधुनिकीकरण से पूरे समर्पण से देने के स्थान पर अपनी पकडं निरंतर ढीली की जा रही है। यह गलत है। आज भी ऐस लाखों लोग हैं जो भारतीय रेल में सफर करते हैं और स्कोर नहीं सुन सकते। क्यों? जो ट्रांजिस्टर सेट्स सामान में ले जाते हैं, उन्हें सिवा घरघराहट के कुछ नहीं सुनाई देता। ये सभी लोग कामेन्ट्री के साथ-साथ चार विज्ञापन भी सुन लेंगे। जरूरत है सकारात्मक सोच की, युवा ऊर्जा की और कभी न हार मानने की। एक समय था जब आकाशवाणी शक्ति के केन्द्र में थी। क्या आकाशवाणी पुन: हमारा चहेता माध्यम बन सकेगी?

 

बापू देशपांडे- टीटीआई भोपाल में सीनियर विजुलाइजर रहे, इन दिनों माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में प्रसारण पत्रकारिता विभाग से जुड़े हैं । संपर्क- मा.ला.चतुर्वेदी पत्र.विवि.शाहपुरा, भोपाल, मध्यप्रदेश

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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