Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 5, सित. - नवंबर, 2007)

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आवरण कथा

 

 

इंटरनेट पर रेडियो का नया अवतार

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बबिता अग्रवाल

 

1920 में अल्टेरशन मॉडयूलेशन रेडियो (AMR)ने अपने पंख तौलकर जैसी उड़ान भरी थी, कुछ-कुछ वैसा ही रोमांस इन दिनों इंटरनेट रेडियो को लेकर फिजाओं में है। पूरी दुनिया को एक सूत्र में बांध देने का ाज्बा लेकर शुरू हुए इस रोमांच का जन्म बड़े विद्रोही तेवर से हुआ है। अस्तित्व में आते ही इन्टरनेट रेडियो को भारी भरकम व्यावसायिक घरानों की चुनौती स्वीकारनी पड़ी है। क्यों न हो, अरबाें डालर के संगीत (श्रव्य उत्पादों) के बाजार पर छह बड़े नामों का कब्जा है- कोलंबिया, आरसीए, कॉर्नर, पॉलीग्राम, कैपिटॉल और एमसीए के षट्चक्र को भेदकर संगीत साम्राज्य में सेध लगाना कोई मामूली बात तो नहीं।

 

इंटरनेट रेडियो का जन्म मूलत: संगीत की वजह से हुआ। कम्प्यूटर पर नीरस गणनाएं करते-करते लोगों को लगा कि सुरताल साथ-साथ चलता रहे तो क्या बात है। लिहाजा ऑडियो फाइल्स की तरह-तरह से गीत संगीत को दर्ज करके सुनने का चलन शुरू हुआ। जैसे-जैसे फाइलों को कम्प्रैस करने की नई विधियां खोजी गईं वैसे आडियो डाटा की स्वचलता भी आसान होती गई। फिर एक दिन वह आया जब रिकोर्डेड (ध्वन्योक्ति) संगत को कम्प्यूटर के जरिए सुनना फैशन बन गया। एम.पी.-3 के आगमन के बाद सारा परिदृश्य बदल गया है और आज तो रिकाडर्ेड संगत का जखीरा लिए युवा अपने मोबाइल लीड प्लेयर्स पर झूमते थिरकते आसानी से देखे जा सकते हैं। पर बहुत सुमीते से भरा होने के बावजूद इसमें भरा हुआ कलेवर बासी (स्टेल) और (दुहरावपूर्वक) (रिपीटीटिव) होता है। इसमें अंत: क्रिया (इन्टरएक्टिविटी) की गुंजाइश भी न के बराबर। इन सभी कमियां से निजात दिलाता है- इंटरनेट रेडियो।

 

सन 1960 में जब इंटरनेट की खोज हुई तो दशकों तक किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह विश्व मीडिया के सर्वग्राही रूप में तब्दील हो जाएगा। अमेरिका के शैक्षिक, प्रशासनिक और सुरक्षा परिदृश्य तक अपने को सीमित रखने वाला इंटरनेट में विस्तार के पंख www के आगमन के साथ ही लग पाए। सन्  89-90 की अवधि में टिन वर्नर्स ली ने तीन डब्लू के जरिए विश्व भर के निवासियों को आपस में जुड़ने की बेहतरीन कीमिया  उपलब्ध करा दी। बस इसके दो साल बाद ही एमपी-3 का उद्भव हो गया। मध्य 90 के दशक तक इंटरनेट रेडियो भी शुरू हो गए थे। लेकिन बैंडविथ की सीमाओं की वजह से इनकी प्रसारण गुणवत्ता हास्यास्पद थी। चूंकि इंटरनेट पर देशों और सरकारों के बंधन बहुत ढीले-ढाले थे इसलिए उस पर जमे रेडियो के कलेवर को बांध पाना मुश्किल हो गया। बस यही अदा लुभावनी थी और इंटरनेट का रेडियो बहुत कुछ स्वतंत्र रूप लेने लगा।

 

इन्टरनेट रेडियो ने बड़े घरानों के स्वामित्व को तोड़ा और अभिव्यक्ति को नए आयाम दिए। हालत यहां तक पहुंची कि सन् 1998 आते-आते प्रेसिडेन्ट किल्न्टन को डिजिटल मिलेनियम अधिनियम पर हस्ताक्षर करने पड़े। उसमें डिजिटल रेडियो के जरिए प्रसारित होने वाली सामग्री पर भी कॉपीराइट का विस्तार कर दिया गया। इसके बावजूद इंटरनेट रेडियो ने अपनी मौलिक विशेषताओं को नहीं खोजा। आज हजारों की संख्या में उपलब्ध इन क्रांतिकारी रेडियो स्टेशनों पर दोनों शैलियों का कथ्य मौजूद है। लाइव और आर्काइव। इसमें शक नहीं कि खगोलीय रेडियो (टेरेस्टेरियल) से इन्टरनेट की कई जगह प्रतिद्वंद्विता है लेकिन कई जगह वह उनका पूरक भी है और जैसे-जैसे कम्प्यूटर आधारित डिवासेस (उत्पादन) सस्ते और सुलभ होते जाएंगे। वैसे-वैसे कनेक्टिविटी की बाधाएं कम होती जाएंगी, वैसे-वैसे इंटरनेट रेडियो का नया अवतार अपनी चमत्कारी भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहा है।

 

लेखिका माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में व्याख्याता हैं।

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