सबसे पुराने माध्यम का स्वर्णिम इतिहास
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अखिलेश सिंह
मयंक
राजकुमार
हीरानी निर्देशित फिल्म
'लगे
रहो मुन्ना भाई' में एफएम रेडियो जॉकी विद्या बालन ने
जिस जबरदस्त तरीके से मुंबई के जनमत को प्रभावित किया,
संजय दत्त ने जिस तरह अपनी गांधीगिरी के प्रसार के लिए रेडियो को जरिया बनाया,
उससे यह एहसास हुआ कि रेडियो अभी भी पहले जितना ही जनमत
निर्माण का सबल माध्यम है। रेडियो हमारे देश में आजादी के बाद से ही एक सशक्त
माध्यम था, लेकिन बीती सदी के अंतिम दशक में आई
इलेक्ट्रानिक चैनलों की बाढ़ ने एकबागरी इसके अस्तित्व पर ढेरों सवालिया निशान
खड़े कर दिए। किंतु अब सामुदायिक रेडियो के बढ़ते प्रचलन और एफएम क्रांति ने इसके
दिन बहुरा दिए हैं। अतीत में रेडियो की महत्ता की बात करें तो पहले रेडियो का
मतलब था आल इंडिया रेडियो। देश आजाद होने पर 14 अगस्त
की आधी रात को आल इंडिया रेडियो पर आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित
जवाहर लाल नेहरू के राष्ट्र के नाम प्रथम संबोधन, 1948
में महात्मा गांधी की हत्या, चीन और पाकिस्तान से भारत
के युध्द, बांग्लादेश का गठन,
आपातकाल, आपातकाल हटने के बाद आमचुनाव के बाद जनता
पार्टी सरकार का गठन, इंदिरा गांधी का जेल जाना,
मध्यावधि चुनाव की बाद उसकी सत्ता में वापसी,
अमेरिकी स्काईलैब का प्रशांत महासागर में गिरना,
आपरेशन ब्लू स्टार, इंदिराजी की हत्या
और उनकी अंत्येष्टि, राजीव गांधी का असामयिक निधन और
उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ा विदेशी नेताओं का सैलाब (वैसे तब तक टीवी की पहुंच
दूरदराज तक होने लगी थी। को देश के जनमानस ने रेडियो की ही आंखों से देखा।
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर क्रमश: लाल किले और राजपथ पर होने वाले
कार्यक्रमों की कमेंटरी को भी लोग आल इंडिया रेडियो पर ही सुनते थे।
1975 में देश में टेलीविजन प्रसारण की विधिवत शुरूआत तक लोग
खबरों के लिए पूरी तरह रेडियो पर ही निर्भर थे। अखबार चूंकि अगले दिन आते थे और
दूरदराज के क्षेत्रों और समाज के हर वर्ग तक उनकी पहुंच नहीं थी इसलिए रेडियो
ही समाचार प्राप्ति का प्रथम माध्यम था। भारत में रेडियो प्रसारण की शुरूआत
1927 में मुंबई और कलकत्ता में दो प्राइवेट
ट्रांसमीटरों के प्रसारण से शुरू हुई। 1930 में ब्रिटिश
सरकार ने इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया। बाद में इसका नाम आल इंडिया रेडियो
(एआईआर) किया गया। 1957 में इसे आकाशवाणी नाम दिया गया
(अंग्रेजी में इसे अभी भी आल इंडिया रेडियो कहा जाता है) आल इंडिया रेडियो की
सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसकी पहुंच देश के लगभग शत-प्रतिशत आबादी तक है। लगभग
शत-प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच के साथ ही इससे जुड़ा एक नकारात्मक पहलू यह था कि
इस पर सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का नियंत्रण है,
जिसके चलते इसकी विश्वसनीयता असंदिग्ध नहीं थी। परंतु जनता के
पास रेडियो का कोई विकल्प भी नहीं था। बीबीसी और वॉयस आफ अमेरिका से इसे जरूर
चुनौती मिल रही थी, जिसकी चर्चा आगे करेंगे।
टेलीविजन आया
तो पर वह आम लोगों की पहुंच से दूर था। पूरे शहर में एक कालोनी में एक-दो घर
में ही टेलीविजन होते थे।
1982
में दिल्ली में एशियाई खेलों के आयोजन के साथ देश में कलर टेलीविजन शुरू हुए,
वहीं 1986 में रामानंद सागर निर्देशित
'रामायण' सीरियल ने टेलीविजन
मार्केट में भारी बूम ला दिया और इसके साथ ही खत्म होने लगी रेडियो की हनक।
बीती सदी के अंतिम दशक में केबल टीवी का संजाल बढ़ने के साथ ही रेडियो के
दुर्दिन आ गए। अब देश में सैकड़ों एफएम सेंटरों के अस्तित्व में आने के साथ
रेडियो फिर लोगों के दिलों के करीब पहुंच गया है।
अतीत में आम
आदमी से गहराई से जुड़ा रेडियो। रेडियो समाचार बुलेटिनों के अलावा
'हवा
महल', 'युववाणी' और सुगम संगीत
कार्यक्रम श्रोताओं को बेहद पसंद आते थे। रेडियो पर महिलाओं,
युवाओं और किसानों के अपने-अपने कार्यक्रम होते थे। महिलाओं
में 'गृहलक्ष्मी' जैसे
कार्यक्रम पसंद किए जाते थे तो किसानों में 'चौपाल',
'किसानों के लिए' जैसे प्रोग्राम।
'विविध भारती' सबसे लोकप्रिय
कार्यक्रम था। यह ऐसा कार्यक्रम था, जिसे सबसे ज्यादा
विज्ञापन मिलते थे। यह कार्यक्रम लगभग सभी राज्यों के श्रोताओं से गजब का
आत्मिक लगाव होता था। वह चाहे दिल्ली के राजपथ से कमेंटरी करने वाले स्व.
कमलेश्वर हों या आवाज के जादूगर अमीन सयानी, लोग इनकी
आवाज हजारों में पहचान लेते थे। इसके अलावा तमाम क्षेत्रीय कार्यक्रमों के
प्रस्तुतकर्ताओं का श्रोताओं से बेहतरीन तादात्म होता था। इसके प्रमाण होते थे
इन कार्यक्रमों को लेकर आने वाले श्रोताओं के सारगर्भित और सुझावों से भरे पत्र,
जो उतनी दूरदराज तक से आते थे, जितनी
दूर तक आकाशवाणी की पहुंच थी। अर्थात महानगरों से लेकर सीमांत क्षेत्रों तक से
श्रोताओं के पत्र आते थे। सीमाओं पर तैनात फौजियों के पत्र भी इसमें शामिल होते
थे। ये पत्र कार्यक्रम से संबंधित कार्यक्रम अधिकारियों और प्रस्तुतकर्ताओं के
लिए किसी प्रशस्ति पत्र से कम नहीं होते थे। आकाशवाणी का एक ही नकारात्मक पक्ष
था उसका सरकारी नियंत्रण में होना। उसे अकसर बीबीसी और वायस आफ अमेरिकी से
चुनौती भी मिलती थी। बीबीसी के समाचार को लोग आकाशवाणी के समाचार से अधिक
विश्वसनीय मानते थे। अखबारों में दैनिक संपादकीयों (अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर
संपादकीय) या विश्लेषणों को लिखने वाले डेस्क इंचार्ज बीबीसी और वायस आफ
अमेरिका सुनने के बाद ही लिखते थे। ये किसी भी एजेंसी के टेलीप्रिंटर से भी तेज
माध्यम थे। पत्रकारों में यह आम मान्यता थी कि आकाशवाणी के मुकाबले इनके
अंतर्राष्ट्रीय समाचार गुणवत्ता में बेहतरीन होते हैं। अमेरिकी स्काईलैब के
प्रशांत महासागर में गिरने और इंदिरा जी की मृत्यु के समाचार को सुनते समय
लोगों ने बीबीसी को अधिक तरजीह दी।
आकाशवाणी के
मुकाबले बीबीसी की बेहतरीन साख का एक उदाहरण देखना समीचीन होगा। पूर्व
रक्षामंत्री बाबू जगजीवन राम बीमार थे और दिल्ली के एक अस्पताल में भरती थी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जब विदेश यात्रा पर रवाना होने वाले थे तभी
आकाशवाणी ने खबर दी कि बाबू जगजीवन राम का निधन हो गया। राजीव गांधी ने अपनी
विदेश यात्रा स्थगित करनी चाही,
तभी पुन: खबर प्रसारित की गई कि बाबू जगजीवन राम जीवित हैं,
उनके बारे में गलत समाचार प्रसारित हो जाने का हमें गहरा खेद
है। इस घटना पर 'नवभारत टाइम्स'
के पहले पेज पर छपा कार्टूनिस्ट काक का कार्टून काफी चर्चित रहा (बाद में
बीबीसी की हिन्दी सेवा ने अपनी स्मारिका प्रकाशित करने पर उसमें उस कार्टून को
प्रकाशित किया था)। कार्टून यह था कि राजीव गांधी विदेश जाने के लिए रनवे पर
खड़े हवाई जहाज पर चढ़ने के लिए खड़े हैं। तभी उनके पास खड़े उनके सेक्रेटरी के हाथ
में ट्रांजिस्टर पर बाबू जगजीवन राम के मरने की खबर आती है। इसके तुरंत बाद
उसका खंडन भी आ जाता है। इस पर परेशान राजीव गांधी अपने सेक्रेटरी से कहते हैं
'बीबीसी लगाओ'। सरकार की लगाम
के नकारात्मक पहलू को छोड़ दिया जाए तो यही कहा जाएगा कि वह दौर रेडियो का
सुनहरा दौर था। लगभग हर प्रसारण केंद्र से क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रसारित होते
थे, जो सेंट्रलाइज्ड कार्यक्रमों से अलग और अधिकाधिक
स्थानीय पुट लिए होते थे। देसज भाषा, बोली बाहुल्य इन
कार्यक्रमों से दर्शकों की संख्या का सीधा संबंध था। नियमित कार्यक्रम के
अलावा साप्ताहिक प्रहसनों और रेडियो रूपकों का एक अलग श्रोतावर्ग था,
जो इनका बेसब्री से इंतजार करता था। आकाशवाणी ने अनेक लेखकों
को मंच प्रदान किया। तमाम कवियोंकलाकारों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। कई
समाचार वाचक अपना नाम बोलने से पहले 'यह आकाशवाणी है'
कहते ही श्रोताओं द्वारा पहचान लिए जाते थे। अंतर्राष्ट्रीय
क्रिकेट मैचों की कमेंट्री लोग घरों के अलावा सड़क पर पान-चाय की दुकानों पर
सुनते थे। भारतीय टीम का कोई खिलाड़ी जब चौका या छक्का मारता तो लोग उस खुशी में
पान का एक-एक अतिरिक्त बीड़ा साथियों को खिलाते और खाते। मेल्कम मार्शल की
खतरनाक गेंदों को खेलते हुए गावस्कर को लोगों ने टीवी पर कम देखा,
रेडियो पर अधिक सुना। इसी तरह गुंडप्पा विश्वनाथ,
प्रसन्ना और बिशन सिंह बेदी की तिकड़ी की गेंदबाजी के कर को
लोगों ने रेडियो से ही सुना-समझा। कई रेडियो रूपकों में अलग-अलग क्षेत्रीय
केंद्रों ने अलग-अलग प्रयोग किए। ये प्रयोग सफल रहे। परंतु टेलीविजन पर
'फ्री टू एअर' और 'पेड'
चैनलों की भीड़ ने रेडियो को गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया।
अब एफएम क्रांति ने इसे फिर मुख्य धारा में ला दिया है।
यह और ज्यादा
संतोष की बात है कि अब पत्रकारिता के नए-नए शिक्षकण,
प्रशिक्षण संस्थान, रेडियो पत्रकारिता
की एक नई और बेहतरीन पीढ़ी गढ़ रहे हैं। ये रेडियो के लिए रिपोर्टिंग और लेखन के
साथ ही साउंड इफेक्ट्स, डिजिटल आडियो मिक्सिंग,
माइक्रोफोन टेक्नीक्स आदि भी बताते हैं। इसके अलावा समाचारों
को पढ़ना, उसमें फुटेज का इस्तेमाल,
इफेक्टिव वायस-साउंड के साथ होस्टिंग और प्रोडक्शन तक की
टेक्नीक सिखा रहे हैं। ये संस्थान छात्रों को यह मूलभूत बात अच्छे ढंग से समझा
दे रहे हैं कि रेडियो के लिए लेखन की भाषा इतना अलग है कि वह अपने में स्वतंत्र
विधा है। आने वाले दिनों में रेडियो पत्रकारों की एक बड़ी और मजबूत फौज हमारे
सामने खड़ी होगी, जिसके अंदर रचनात्मकता और आधुनिक सोच
का अपूर्व मिश्रण होगा। ऐसे में चुक-चुके रेडियो का भविष्य उतना ही उज्जवल नजर
आ रहा है, जितना उज्जवल इसका अतीत था।
लेखक अमर उजाला गोरखपुर के
संपादकीय विभाग में कार्यरत हैं।
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