संपादकः सत्ता और महत्ता
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विश्वनाथ सचदेव
आठ-दस
साल पुरानी बात है शायद । टाइम्स ऑफ इंडिया के मुंबई कार्यलय में मैं टाइम्स के
तत्कालीन स्थानीय संपादक डेरिल डिं मोंटे के साथ बरामदे में खड़ा कुछ बातचीत कर
रहा था। संयोग से हम जहां खड़े थे वहीं विश्व प्रसिद्ध काटूनिस्ट आर.के.
लक्ष्मण का केबिन था। पता नहीं हमारी आवाज सुनकर वे बाहर निकले, या वैसे ही, पर
हमें वहाँ
खड़े देखकर उन्होंने पूछा था, हम दोनों वहां क्यों खड़े हैं। डेरिल
ने बताया कि हमें जनरल मैनेजर से मिलने जाना हैं, तय समय में कुछ वक्त
बाकी था, तो इसलिए हम यहीं खड़े हो गए। यह सुनना था कि लक्ष्मण जोर से हंसने
लगे । हम हैरान थे कि वे हंस क्यों रहे हैं। कारण पूछा जो उत्तर मिला, वह आसानी
से भुला देने वाला नहीं था, इसलिए आज भी याद है। लक्ष्मण ने कहा था, उन्हें
हंसी यह देखकर आयी कि टाइम्स के दो वरिष्ठ संपादक एक मैनेजर से मिलने के इंतजार
में खड़े हैं। फिर उन्होंने बताया था कि एक जमाना था कि जब मालिक सम्पादकों से
मिलने के लिए समय लिया करते थे।
आर.के. लक्ष्मण
अपनी रेखाओं के सहारे बोलते हैं, अक्सर एक वाक्य में इतना कुछ कह जाते हैं जो
हजार शब्द के पूरे सम्पादकीय में नहीं कहा जाता । वे जब कुछ बताते हैं तो सिर्फ
बता नहीं रहे होते, बहुत ही धारदार टिप्पणी भी कर रहे होते हैं । इस दिन बरामदे
में गूंजी उनकी हंसी और उस जमाने को याद करना जब अखबार के मालिक संपादक से
मिलने के लिए समय मांगा करते थे, सिर्फ कुछ बताना नहीं था । वस्तुतः वे पांच
दशकों में इस देश की पत्रकारिता में आए एक बहुत ही महत्वपूर्ण परिवर्तन पर तीखी
और सार्थक टिप्पणी कर रहे थे । इन पांच दशकों में यानी आजादी के बाद की देश की
पत्रकारिता में जो बदलाव आए हैं उनमें एक बदलाव संस्थान में संपादक की स्थिति
से भी जुड़ा हुआ है । एक जमाना था जब संपादक पत्रकारिता की धुरी हुआ करते थे ।
अखबार का सारा कार्य-संसार उनके आसपास घूमता था । खबर और विचार दोनों के माध्यम
से संपादक ही सामाजिक बदलाव के उन उद्देश्यों की पूर्ति किया करते थे, जिनके
लिए अखबार निकलते थे । धीरे-धीरे यह उद्देश्य बदलता गया । अखबार निकलना-चलना
व्यवसाय बनता गया । पत्रकारिता, जो कभी जीवन का उद्देश्य हुआ करती थी,
जीवन-यापन का साधन बनती गयी । पत्रकारों के लिए जिनमें संपादक भी सम्मिलित हैं,
पत्रकारिता आज एक जीविका बनती जा रही है और पत्र मालिकों के लिए दुधारू गाय
जैसा एक व्यवसाय । इस समूची प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण बात
संपादक की स्थिति में आया परिवर्तन है ।
पत्रकार शिरोमणि
बाबूराव विष्णु पराडकर ने आज से लगभग अस्सी-बयासी वर्ष 1925 में वृंदावन हिन्दी
साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से भविष्य के अखबारों के
‘प्राणहीन
होने’
की आशंका जतायी थी। साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी भी की थी ।
उन्होंने कहा था
‘पत्रों
की नीति देशभक्त’
अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति नहीं होगी । इन गुणों से
संपन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जायेंगे। संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी
नहीं होगी। वेतनभोगी संपादक मालिक का काम करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे
। पर आज भी हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त है, वह उन्हें न होगी।
इस बात पर
आश्चर्य हो सकता है कि पराडकरजी ने आने वाले सुदूर कल को किस तरह देखा होगा,
लेकिन आज पत्रकारिता में संपादक की जो स्थिति है उसे देखकर आश्चर्य नहीं होता ।
लगता है यह तो होना ही था। जिस तरह पत्रकारिता के उद्देश्य बदले, जिस तरह
पत्रकारिता मनोरंजन का एक लाभदायक उद्योग बनती जा रही है, उसे देखते हुए ऐसा तो
होना ही था। होना ही था वाली बात अपनी जगह सही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है
कि जो हुआ या हो रहा है वह सही है। संपादक की मह्त्ता का कम
होना
अथवा उसकी स्थिति का लगातार कमजोर होते जाना, कुल मिलाकर पत्रकारिता
की
समूची अवधारणा में आते जा रहे एक अप्रीतिकर और दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तन का
संकेत है। ऐसे कहने का एक ही अर्थ है और वह यह कि मैं पत्रकारिता
को
मात्र व्यवसाय नहीं दायित्वों के चलते पत्रकार की, विशेषकर संपादक की, भूमिका
महत्वपूर्ण हो जाती है। मालिक संपादक से मिलने के लिए समय मांगे अथवा संपादक को
अपनी सुविधा, आवश्यकता से अपने पास बुलाए यह अपने आप में विशेष बात नहीं है, यह
विशेष बात तब बनती है जब रिश्तों में मालिक और नौकर का भाव आता है और जब मालिक
संपादक को मशीन का एक पुर्जा मात्र समझ लेता है। संपादक की स्थिति को लेकर
पत्रकारिता
का यह संकट इसी
समय का परिणाम है। इस संकट पर विचार करने से पहले, आइए, थोड़ा सा समझ लें कि
पत्रकारिता
में एक संपादक
की भूमिका क्या होती है, अथवा क्या होनी चाहिए।
इस देश की
पत्रकारिता के इतिहास में जिन संपादकों को याद किया जाता है, उनकी सूची में
शीर्ष पर गणेशशंकर विद्यार्थी, लोगमान्य तिलक, माखनलाल चतुर्वेदी, बाबूराव
विष्णु पराडकर जैसे नाम आते हैं। ये और ऐसे सारे नाम इसलिए वंदनीय है कि
क्योंकि इन्होंने जिन उद्देश्यों के लिए पत्रकारिता
की वे
किसी भी दृष्टि से व्यवसायिक नहीं कहे जा सकते । आजादी से पहले की हमारी
पत्रकारिता, कुल मिलाकर आजादी के लिए लड़ने की पत्रकारिता
थी ।
यदि ढर्रा वही बना रहता तो आजादी के बाद की पत्रकारिता
आजादी
के रक्षा अपने संपूर्ण अर्थों की पत्रकारिता
होनी
चाहिए था। तब शायद संपादक भी उसी परंपरा के होते जिसकी शुरूआत तिलक या गणेशशंकर
विद्यार्थी से होती है। लेकिन व्यवसायिकता के एक अविवार्यता की तरह पत्रकारिता
से जुड़ने पर समीकरण बदल गए । पहले अधिसंख्य संपादक मालिक हुआ करते थे अब मालिक
संपादक बन गये । पहले मालिक संपादक महत्ता और आवश्यता को समझते थे, अब यह
महत्ता और आवश्यकता मशीन के ऐसे पुर्जे के रूप में परिभाषित होती है, जिसे चाहे
तो स्पेयर पार्ट कह सकते हैं। पहले संपादक से पत्र पहचाना जाता था और अब पत्र
से संपादक जाने जाते हैं।
चूंकि पहले
संपादक पत्र को पहचान देते थे, उनकी योग्यता-क्षमता से पत्र की महत्ता आंकी
जाती थी, इसलिए वे प्रबंधक के लिए-भी महत्वपूर्ण होते थे। कहा जा सकता है कि वे
अपने कृतित्व-व्यक्तित्व से आदर अर्जित भी करते थे, लेकिन आज प्रबंधक के लिए
संपादक पी.आर.भी. अधिनियम के अंतर्गत संमाचारों के चयन के लिए उत्तरदायी वस्तु
बनता जा रहा है। जैसे अखबार एक वस्तु मान लिया गया है, वैसे ही संपादक भी। उसके
मुख्य काम है, कानूनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, अखबार को बिक्री योग्य वस्तु
बनाने में योगदान करना और प्रबंधन के दृष्टिकोण को सर्वोपरि समझना। सच तो यह है
कि आज प्रबंधन संपादक की आवश्यकता को ही खारिज कर रहा है। इसीलिए कोई भी
व्यक्ति संपादक बन सकता है। कोई भी संपादक किसी भी अखबार का संपादक बन सकता है।
प्रबंधक को यह लगता है कि संपादक उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए है, जबकि
होना यह चाहिए था कि संपादक पत्रकारिता के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता।
लेकिन फिर सवाल उठता है, पत्रकारिता के उद्देश्य क्या है
?
इसी प्रश्न से शुरू होती है, मिशन और व्यवसाय की बहस। आज भी स्थितियों में यह
बहस बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती । अब यह मान लिया जाना चाहिए कि मिशन इस
व्यवसाय का एक स्वरूप संतुलन जरूरी है। और इस जरूरत की एक शर्त संपादक नाम की
संस्था का सक्षम होना है। दुर्भाग्य से, हो इसका उल्टा रहा है।
एक ओर तो मालिक
यह मानने लगे हैं कि संपादक की आवश्यकता ही नहीं है और दूसरी ओर ऐसे मानने वाले
भी कम नहीं हैं जो यह मानते हैं कि कोई भी व्यक्ति संपादक बन सकता है। एक बड़े
अखबार-मालिक की तो पीड़ा है कि वे अपने ड्राइवर को संपादक नहीं बना पा रहे ।
किन्हीं भी
कारणों से सही, किसी मालिक का ड्राइवर भले ही अभी तक संपादक न बन पाया हो,
लेकिन सिने तारिकाओं को संपादक बनाकर अथवा किसी भी नेता, अभिनेता, खिलाड़ी को
अतिथि संपादक बनाकर इस बात को सत्यापित करने की कोशिश तो की ही जा रही है कि
संपादक किसी विशिष्ट चिड़िया का नाम नहीं होता । किसी को भी संपादक बनाया जा
सकता है। इस मान्यता के साथ एक और बात भी जूड़ गयी है। जहां एक ओर यह मान लिया
जाता है कि संपादक नाम की चिड़िया की कोई खास भूमिका नहीं होती, वहीं यह मान
लिया जाने लगा है कि संपादक को समाचार से ज्यादा बाजार की समझ होनी चाहिए।
बाजार की समझ यानी उसे यह भी पता होना चाहिए कि अखबार बिकता कैसे है और
विज्ञापन कैसे बटोरा जा सकता है। इसका मतलब है संपादक सिर्फ समाचार की भाषा ही
न समझता हो, न्यूज मेनेजमेंट भी समझे। अर्थात आज के मालिक को सिर्फ संपादक
नहीं, संपादक-मैनेजर चाहिए। ऐसे मैनेजर जो बाकी विभागों की भाषा समझे। आज किसी
अखबारी संस्थान में ये बाकी विभाग संपादकीय विभाग से कहीं ज्यादा मह्त्वपूर्ण
हो गए हैं, क्योंकि वे
‘प्रोफिट
सेंटर’
होते हैं । संपादक के लिए जरूरी हो गया है कि वह इन विभागों की जरूरतों को
समझे, उनके इशारों को समझे। विज्ञापन-विभाग का प्रमुख या वितरण विभाग का
कर्त्ता-धर्ता उसे समझा सकता है कि कैसी खबर छापनी चाहिए कि कैसे चित्र छपने
चाहिए, कि वैचारिक दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए । अर्थात प्रोफिट कैसे हो सकता
है, इसकी समझ ज्यादा जरूरी हो गयी है खबर की समझ से ।
बहरहाल, इस सब
का मतलब यह है कि एक तो संपादक की भूमिका बदलती जा रही है और दूसरे संपादक की
ताकत कम होती जा रही है। यूं तो गांधी जी ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा था कि
‘......
यह तो सिर्फ संपादक को ही पता है कि उसकी ताकत का दायरा उसके दफ्तर के दायरे
में शायद ही बाहर जाता हो, लेकिन अब तो दफ्तर के दायरे से भी कुल मिलाकर उसकी
ताकत कम ही हुई है। उसके अधीनस्थ जानते हैं कि उसे अक्सर प्रबंधन की भाषा बोलनी
पड़ती है। था एक जमाना जब संपादक यह तय करता था कि अखबार में क्या छपना चाहिए
और क्या नहीं, ।
‘आज’
अखबार के मालिक शिवप्रसाद गुप्त का एक किस्सा काफी मशहूर है। उन दिनों आज के
संपादक पराडकरजी थे। उन्होंने एक संपादकीय लिखा। मालिक शिवप्रसाद उनके विचारों
से सहमत नहीं थे। उन्होंने चाहा कि उनकी असहमति भी संपादकीय पृष्ठ पर दर्ज हो।
पराडकर जी ने उनकी बात छापने से इनकार कर दिया । अंततः अखबार के मालिक
शिवप्रसाद गुप्त को अपनी बात अपने ही अखबार में विज्ञापन के रूप में छापनी
पड़ी। और उन्होंने संपादक को निकाला भी नहीं था । क्या ऐसी कोई कल्पना आज के
माहौल में हम कर सकते हैं
?
संपादक की
भूमिका का बदलना और उसकी ताकत का कम होना, दोनों किसी जनतांत्रिक व्यवस्था में
चिंता की बात होनी चाहिए। भले ही आज पत्रकारिता सिर्फ मिशन न हो, लेकिन
व्यावसायिक ईमानदारी का भी तकाजा है कि समाज को
‘सूचित
करने और शिक्षित करने’
वाली पत्रकारिता नागरिक के लिए साफ-साफ देखने की स्थितियां पैदा करने में तो
सहायता करे। यह कार्य स्पष्ट और सकारात्मक चिंतन के धनी संपादक के बिना नहीं हो
सकता । ऐसा नहीं है कि आज ऐसे संपादक हैं ही नहीं । धर्मवीर भारती, रघुवीर
सहाय, राजेन्द्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, गणेश मंत्री जैसे विचारों के
धनी संपादक हमारे ही समय के हैं। यह एक संयोग ही है कि इन सब नामों के साथ अब
स्वर्गीय लिखा जाता है, लेकिन इनकी परंपरा के कुछ संपादक आज भी हैं। हां, उनकी
संख्या कम होती जा रही है, ताकत भी कम होती जा रही है। इसलिए जरूरत है संपादन
की इस परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश की जाए. यह कार्य पत्रकारिता के बड़े
व्यवसायिक संस्थान नहीं करेंगे। यह कार्य ऐसे संपादकों को स्वयं और जागरूक समाज
को करना होगा। इस बात का सीधा सा मतलब यह है कि स्वयं संपादकों को अपने पेशे और
समाज में अपनी स्थिति के प्रति ईमानदारी बरतनी होगी । अंधेरा पसर रहा है, लेकिन
दीया जलाने की संभावनाएं तो समाप्त नहीं हुईं । व्यक्ति चाहे तो अपने भीतर की
आग से यह दीया जला सकता है। प्रबंधन की व्यावसायिक मानसिकता को बदलना असंभव की
सीमा तक मुश्किल है, लेकिन व्यक्ति अपनी मानसिकता को सकारात्मक बनाए रखने की
कोशिश तो कर सकता है। सारे दबावों के भीच काम करते हुए भी यह असंभव नहीं कि कुछ
ऐसा न किया जा सके जो सामाजिक हित से जुड़ा हो। एक संपादक से हम इसी
‘कुछ’
की अपेक्षा करते हैं। यह
‘कुछ’
बहुत कुछ कर सकता है। यह सही है कि आज संपादक की स्वाधीनता कम होती जा रही है।
सीमित होती जा रही है। लेकिन इस सीमित स्वाधीनता की रक्षा के लिए भी तो
हाथ-पांव मारने होंगे। हाथ-पांव मारने का यह अहसास हर पत्रकार में जगना चाहिए,
तभी संपादक नाम की संस्था जिंदा रह पाएगी।
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(विश्वानाथ सचदेव
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देश के वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक,
नवभारत टाइम्स, मुंबई और धर्मयुग
के संपादक रहे। संप्रति नवनीत हिन्दी
डाइजेस्ट के संपादक हैं कई समाचार
पत्रों में स्तंभ लेखन।
संपर्क : संपादक, नवनीत, भारती विद्या भवन, के एम. मुंशी मार्ग, मुंबई)
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