एक संपादक के बतौर रघुवीर सहाय
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विष्णु राजगढ़िया
“अकसर
लेखकों को दोस्त और दुश्मन तो ठीक-ठाक मिल जाते हैं, लेकिन अच्छे संपादक मिलना
किस्मत की बात होती है और अगर यह किस्मत लेखकों की शुरूआत में ही कृपालु हो जाए
तो इसे बिलकुल दुर्लभ संयोग कहना चाहिए।”
यह कहना है प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी का। दैनिक
‘जनसत्ता’
में अपने चर्चित स्तंभ ‘कभी-कभार’
में श्री वाजपेयी लिखते हैं- “लेखक
तो अच्छा बुरा मैं जैसा बना, वैसा बना, लेकिन आज भी कम कम-से-कम तीन संपादकों
के प्रति विशेष कृतज्ञता अनुभव करता हूं, जिन्हें बहुत कम उम्र में भी मुझमें
कुछ प्रतिभा होने का संदेह हुआ था और जिन्होंने मेरी कविताएं, कच्ची-अधपकी,
अपनी पत्रिकाओं में प्यार और प्रोत्साहन से प्रकाशित की थी।”-1
इन तीन
संपादकों में श्री वाजपेयी ने हरिशंकर परसाई, रघुवीर सहाय और लक्ष्मीचन्द्र जैन
का उल्लेख किया। श्री सहाय ने 1958 में
‘कल्पना’
के दो अंकों में अशोक वाजपेयी की तीन कविताएं छापी थी। इस संबंध में श्री
वाजपेयी लिखते हैं- “दूसरे
संपादक थे कवि रघुवीर सहाय, जो उन दिनों
‘कल्पना’
में संपादक थे । इस पत्रिका की बड़ी प्रतिष्ठा थी। उसमें छपने का अर्थ होता था
कि आप विचारणीय होने की परिधि के अंदर आ गए हैं। मैं 17 वर्ष का था । जनवरी और
फरवरी 1958 के दो अंकों में लगातार उन्होंने मेरी तीन कविताएं छापी थीं। हिन्दी
में उस समय नई सर्जनात्मकता का अद्भुत उन्मेष हो रहा था और
‘सागर’
जैसे छोटे शहर में रहने वाला एक तरुण कवि सिर्फ अपनी अपरिपक्व कविता के बल पर
उसमें शामिल हो सकता था।”-2
‘कल्पना’
में छपने का क्या अर्थ है, इसका पता श्री वाजपेयी को तब चला, जब फरवरी 1958 में
पहली बार दिल्ली में जिस शाम नरेश मेहता और श्रीकांत वर्मा से मिला, उस शाम
दिल्ली शिल्पी-चक्र में रामकुमार के नए चित्रों की प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ
था जहां मैं उन दोनों के साथ गया । वहीं सबसे पहले अनेक लेखकों से मुलाकात हुई,
जिनमें निर्मल वर्मा भी थे। उनकी कहानियों की उन दिनों बहुत धूम थी। वे बोले-
‘अगर
आप परसों आते तो बड़ा अच्छा होता। हम लोग घंटे भर तक आपकी
‘कल्पना’
वाली कविताओं पर बात कर रहे थे।’
मुझे दिल्ली की भारी ठंड में लगभग पसीना आ गया। एक अज्ञात कुलशील की कविता पर
दिल्ली में ऐसे लेखक बात कर सकते हैं, ऐसा मैंने सोचा भी नहीं था।”-3
नए लेखकों,
पत्रकारों तथा अपने सहयोगियों के प्रति एक संपादक के बतौर रघुवीर सहाय का रवैया
क्या हुआ करता था, इस पर चर्चा से पहले वर्तमान परिवेश को समझने के लिए किसी
वास्तविक प्रसंग की बजाय अविनाश की ‘हंस’
में सद्य प्रकाशित कहानी ‘गुरुदेव’
के एक अंक का उल्लेख पर्याप्त होगा।
पहले के दौर में एक नए पत्रकार को मिले प्रारंभिक
अवसर के संदर्भ का उल्लेख करना पर्याप्त होगा।
पहले के दौर में एक नए पत्रकार को मिले प्रारंभिक
अवसर के संदर्भ में कथा लेखक बताता है कि
“उस
समय अखबारों में जो लोग काम करते थे, उनमें आज की तरह का दर्प नहीं था । वे कम
ही प्रतीक्षा करवाते थे और आगंतुकों से आदमी की तरह मिलते थे। फिर वह आगंतुक
नौकरी के सिलसिले में ही क्यों न आया हो।”-4
इस संदर्भ में
सुरेश शर्मा के अनुभव काफी रोचक और अविस्मरणीय हैं। वह लिखते हैं-
“1972-73
की बात होगी। मैं अपने गांव से दिल्ली आया था। राजनैतिक और सामाजिक रूप से
जागरुक युवाओं के लिए उन दिनों ‘दिनमान’
एक आदर्श पत्र था। रघुवीर सहाय उसके चर्चित संपादक थे। मैं छात्र था लेकिन
राजनीति और साहित्य की दुनिया में पूरी तरह सक्रिय था। मेरी हरी साइकल के
हैंडिल में ‘दिनमान’
का नया अंक हमेशा ही फंसा होता था। बहुत से लोगों की तरह मैं भी
‘दिनमान’
के संपादक और कवि रघुवीर सहाय से उनके केबिन में पहली बार मिला । लेख और फाइलों
से उनका टेबल भरा था। वे कोई लेख संपादित कर रहे थे। उन्होंने इशारे से बैठने
के लिए कहा। लेख के संपादक का काम पूरा करके वे मेरी ओर मुखातिब हुए । बहुत
आत्मीयता से मिले जैसे वर्षों से मुझे जानते हों। उनके पास ज्यादा वक्त नहीं
था। फिर भी उन्होंने अनेक अनौपचारिक और व्यक्तिगत बातें भी कीं। अंत में
उन्होंने कहा कि ‘दिनमान’के
लिए लिखिए । ‘दिनमान’
के लिए जो वे चाहते थे वह लिखने का मैं”
समय नहीं जुटा सका। लेकिन समय-समय पर कुछ घटनाओं को लेकर मैंने प्रतिक्रियाएं
जरूर भेजीं, जिन्हें उन्होंने ‘दिनमान’
में छापा।”-5
सुरेश शर्मा
के अनुसार पत्रकार के रूप में रघुवीर सहाय के बड़प्पन का सबसे बडा कारण नई
खबरों से उनका असाधारण लगाव था। लिखने वालों से अधिक उनके लिए यह महत्वपूर्ण था
कि वे क्या लिख रहे हैं। लेखकों के प्रति सम्मान में वे किसी तरह का भेदभाव
नहीं करते थ। नया-से-नया लेखक उनके लिए पुराने लेखकों जैसा ही महत्वपूर्ण था।
एक दिन मैं चकित रह गया, जब हल्की-सी दस्तक के बाद मैंने अपने होस्टल के कमरे
का दरवाजा खोला तो सहाय खड़े थे। एक हल्की मुस्कान के साथ बोले,
“मैंने
आपको रपट लिखने के लिए कहा था। वह प्रेस में भेजने की तारीख आज ही है। इसलिए
सोचा आपसे लेता ही चलूं....।”-6
एक स्वतंत्र
लेखर के बतौर रामशरण जोशी के अनुभव भी उल्लेखनीय हैं। श्री जोशी बताते हैं-
“सहायजी
से मेरी पहली मुलाकात 1970 में हुई । तब मैं एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट था। सहायजी
ने मुझे पहला एसाइनमेंट प्रसिद्ध नर्तक शंभू महाराज पर दिया, जो काफी बीमार और
एम्स में भरती थे। मेरे लिए उलझन थी कि नृत्यकला से मेरा संबंध नहीं था । मैं
तो एक राजनीतिक पत्रकार था। रघुवीर सहाय मेरी पृष्ठभूमि जानते थे। इसेक बावजूद
उन्होंने मुझे यह काम दिया तो मैंने आग्रह किया कि मेरा नृत्य से लेना-देना
नहीं । इस पर उन्होंने कहा- यही चुनौती है। आप उनके घर जाएं । उनके दोस्तों से,
उनके छोटे बाई बिरजू महाराज से, उनके समकालीनों से मिलकर स्टोरी करें। मैंने
स्टोरी की । उस समय प्रयाग शुक्ल कला पृष्ठ देखते थे। दो पेज की स्टोरी छपी तो
सहाय जी ने काफी प्रसंशा की । वे इसे आवरण कथा बनाना चाहते थे, लेकिन उसी समय
एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के निधन के कारण नहीं बना पाए।”-7
कृष्ण कुमार
के लेख ‘उन्हें
याद रखने का मतलब’
में एक प्रसंग मिलता है। वह लिखते हैं-
“डी-स्कूलिंग
सोसायटी के लेखक इवान इलिच की याद आती है। इस पुस्तक से मेरा परिचय रघुवीरजी ने
ही कराया था। इलिच कुछ दिन बाद दिल्ली आने वाले थे। मुझे
‘दिनमान’
में लिखते मुश्किल से एकाध वर्ष हुआ था, पर इलिच से इंटरव्यू लेने का जिम्मा
रघुवीरजी ने मुझे मेरी लाख हिचकिचाहट के बावजूद सौंपा। कोई पांच साल बाद इलिच
से एक और इंटरव्यू लेने का मौका मुझे विदेश मेंमिला ।”-8
नए लेखक को एक
महत्वपूर्ण लेखक के इंटरव्यू का जिम्मा सौपना और उसकी पूर्व तैयारी के लिए उस
लेखक की पुस्तक के बारे में जानकारी देना-ऐसे मार्गदर्शक संपादक निश्चय ही नई
पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण माने जाएंगे। यही कारण है कि कृष्ण कुमार ने श्री सहाय
के योगदान को इन शब्दों में याद किया है-
“रघुवीर
सहाय का ‘दिनमान’
एक शिक्षा-संस्थान था। मैं मानता हूं कि उसका शैक्षिक संस्कार अपने समय के समाज
और उसके संघर्षों के अनुरूप ढालने का काम रघुवीर सहाय ने किया, अज्ञेय ने नहीं।
मेरे सरीखे हजारों नौजवान उससे जुड़कर अपने कॉलेज या विश्वविद्यालय की जूठन से
उबरे और आत्मविश्वास की दवा से उन घातक कुंठाओं से मुक्ति पा सके, जिन्हें
हिन्दी-अंग्रेजी के भी बंटे अपने इस देश की लचर शिक्षा अनिवार्यतः पैदा करती
है। रघुवीर सहाय ने अपनी पत्रिका को एक पत्राचार विश्वविद्यालय बना डाला (जिसके
सामने लंदन की ओपन युनिवर्सिटी क्या ठहरेगी) और देखते-ही देखते उस प्रयोग की
सफलता का नशा- सा उन्हें आने लगा।”-9
रघुवीर सहाय
से पहली मुलाकात के एक प्रसंग को एक नए कवि के बतौर केदारनाथ सिंह ने याद किया
है। ‘मेरे
समय के शब्द’
में प्रकाशित साक्षात्कार में श्री सिंह बताते हैं कि 19952 में वे किसी
कार्यवश बनारस आए थे। मैं तब एक मामूली विद्यार्थी था। लेकिन उनको परिस्थितिवश
मेरे पास आना पड़ा। बनारस के किसी व्यक्ति का पता उनके पास नहीं था। सिर्फ मेरा
पता था उनके पास, जो उन्होंने ‘प्रतीक’
से लिया होगा। मैं छात्रावास में रहता था। वे रात में आए। उनको मैं
‘प्रतीक’
के संपादक और कवि के रूप में जानता था। उनका आना मेरे लिए एक महत्वपूर्ण घटना
थी। यह वह समय था, जब मैं अपनी जमीन तलाशने की कोशिश कर रहा था।-10
एक संपादक के
बतौर श्री सहाय की कार्यशैली की चर्चा करते हुए प्रयाग शुक्ल बताते हैं-
“किसी
छोटी-सी खबर में भी कुछ और देख लेना रघुवीर सहाय की विशेषता थी । 1970 के दशक
की शुरूआत की एक घटना है । हायर सेकेंड्री की परीक्षाओं के परिणाम निकलते तो
दिल्ली के अखबारों में मेरिट लिस्ट छपती थी । एक साल की मेरिट लिस्ट में दिल्ली
के किसी गांव की निम्न मध्य वर्ग की एक लड़की मेरीट लिस्ट में प्रथम आई । अखबार
में खबर सिर्फ इतनी ही थी । शाम का वक्त था और
‘दिनमान’
के लगभग सारे कर्मी जा चुके थे । अगले अंक की कवर स्टोरी भी तैयार थी । दफ्तर
में सिर्फ तीन लोग बचे थे । मैं, रघुवीर सहाय और जितेन्द्र गुप्त । रघुवीर जी
ने कहा- हम उस गांव में चलें और उस लड़की की सफलता पर कवर स्टोरी बनाएं । हम उस
में गांव गए, लड़की से मिले, उसके परिवार के लोगों से बात की और फिर उसे
‘दिनमान’
में आवरण कथा के बतौर प्रकाशित किया गया ।”-11
श्री सहाय से
जूड़ा़ एक अन्य किस्सा श्री शुक्ल सुनाते हैं । एक बार
‘दिनमान’
में बिहार या बंगाल के किसी पाठक ने एक पत्र भेजा । पत्र भाषा और व्याकरण के
मामले में काफी कमजोर था । लेकिन उसमें अपने इलाके की दर्दभरी कहानी थी ।
रघुवीर सहाय ने कहा कि ‘दिनमान’
के आवरण पृष्ठ पर इस पत्र को छापना है । संपादकीय विभाग के सारे लोग हैरान रह
गए क्योंकि आवरण पृष्ठ पर तो प्रायः तसवीर छपती थी । लेकिन श्री सहाय ने एक
प्रयोग किया और उसकी काफी सराहना हुई ।-12
प्रयाग शुक्ल
बताते हैं कि रघुवीर सहाय अपने सहयोगियों को रचनात्मक कार्यों के लिए काफी
स्वतत्र और सहज परिवेश उपलब्ध कराते थे । एक घटना याद करते हुए श्री शुक्ल कहते
हैं- एक बार नार्वे से प्रसिद्ध चित्रकार अंबादास आए । मैंने सोचा कि उनका
साक्षात्कार कर लूं । इस संबंध में बात करने लिए मैंने सहाय जी से फोन पर
संपर्क करने का कई बार प्रयास किया, लेकिन बात नहीं हो पाई । मैंने साक्षात्कार
ले लिया । बाद में श्रीराम सेंटर में सहाय जी से मुलाकात होने पर मैंने उन्हें
बताया तो उन्होंने छूटते ही कहा कि इसमें पूछने की क्या बात थी । श्री शुक्ल
के अनुसार अगर सहाय जी ने अपने सहयोगियों को समुचित स्वतंत्रता नहीं दी होती तो
इतने मौलिक एवं रचनात्मक काम भी नहीं हो पाते।-13
श्री सहाय के
इस पहलू को रेखांकित करने वाले और भी हैं । संजय द्विवेदी के अनुसार
–
“जिन
लोगों ने रघुवीर सहाय के साथ काम किया वे मानते हैं कि उनमें गजब का
‘सेंस
ऑफ ह्यूमर’
था, ज्ञान के प्रति अद्भुत जिज्ञासा थी । चीजों को वे बिलकुल नए ढंग से देखना
चाहते थे । एक संपादक के रुप में ‘दिनमान’
को उनकी देन अत्यंत महत्व की है । उनके कार्याकाल में
‘दिनमान’
हिन्दी पत्रकारिता का गौरव बन गया । वे पत्रकारिता को एक रचनात्मक चुनौती के
रुप में स्वीकार करते थे । उनके समय का
‘दिनमान’
न सिर्फ अपनी
देन के चलते
महत्वपूर्ण बना, वरन् वहां से तेजस्वी पत्रकारों का निर्माण भी हुआ। जिनमें
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा, प्रयाग शुक्ल, योगराज थानी, जितेन्द्र
गुप्त, जवाहर लाल कौल, शुक्ला रूद्र, बनवारी, विनोद भारद्वाज, सुषमा पाराशर,
रामसेवक श्रीवास्तव, आलोक मेहता जैसों के नाम गिनाए जा सकते हैं । रघुवीर जी
साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच गहरी असमानताओं के तेज विवादों एवं बहसों में
भी एकत्व के बिन्दु तलाश लेते थे । उनका कहना था कि-
“दोनों
यदि घटनाओं के भीतर छिपे अर्थ नहीं खोजते तो दोनों असफल रहते हैं । जो पत्रकार
निरी सूचनाएं जमा करके उन्हें सजा देता है, वह उसी साहित्यकार के समान है जो
मात्र भावनाएं जमा करके उन्हें सजा देता है ।”
वे कहते हैं “पत्रकार
एवं साहित्यकार दोनों नए मानव संबंध की तलाश करते हैं । दोनों दिखाना चाहते हैं
कि दो मनुष्यों के बीच नया क्या बना ?”-14
श्री द्विवेदी
के अनुसार 1970 के “दशक
के बाद का ‘दिनमान’
और उसके साथ घटनाओं के पीछे छिपे अर्थ की तलाश ही रघुवीर सहाय को सदी का असरदार
पत्रकार बनाती है । तब का ‘दिनमान’
उसकी रिपोर्टिंग एवं लेखन न केवल रघुवीर सहाय की पत्रकारिता की तेजस्विता का
प्रमाण है वरन वह आज की एक बड़ी पत्रकार पीढ़ी के लिए
‘पत्रकारिता
का स्कूल’
रहा है । सहाय जी के कुशल संपादन में इस पत्रिका की जनधर्मी भूमिका के चलते न
सिर्फ पाठकों तक सूचनाएं पहूंची, वरन वे जागृत हुए एवं अनेक चीजों के समझने और
उस प्रतिक्रिया करने का साहस भी आया । कला, संस्कृति से लेकर गांवो-कस्बों में
चल रही गतिविधियों का ‘दिनमान’
गवाह बना और हर प्रसंग पर उसकी बेबाकी ने जनता का प्रबोधन किया ।”-15
श्री सहाय के
साथ वर्षों कर चुके रामसेवक श्रीवास्तव बताते
है-
“आजादी
के जमाने के एक शिक्षक थे श्याम लाल गुप्त, जिन्होंने
‘झंडा
ऊंचा रहे हमारा...’गीत
लिखा था । उन्हें मिलने वाली पेंशन बंद हो गई थी । इसकी जानकारी मिली तो रघुवीर
सहाय ने तत्काल कहा- यह तो बहुत गलत है । यह सरकार की निष्क्रियता है,
स्वेच्छाचारिता है । इस पर लिखा जाना चाहिए । इसके बाद रघुवीर जी ने मुझे
(रामसेवक श्रीवास्तव को) भेजकर इस पर स्टोरी कराई । इस पर सरकारी हलके में हलचल
हुई और उनकी पेंशन प्रारंभ हो गई । रघुवीर जी को जब भी ऐसी चीजों की जानकारी
होती थी, तब वे इन्हें उठाने का प्रयास करते थे ।”-16
श्री सहाय की
द्वितीय पुत्री हेमा भी एक संपादक के बतौर उनकी कार्यशैली की कायल हैं । हेमा
के शब्दों में- “कामकाज
में वह स्वतंत्रता किस तरह देते थे, इसका एक रोचक प्रसंग याद आता है । मैंने
‘गंगामाटी’
नामक एक नाटक लिखा था । उसका मंचन हुआ । उन दिनों सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
नाटक-समीक्षा लिखते थे । उन्होंने नाटक देखने के बाद पापा से कहा कि वह नाटक तो
खराब था, उसकी क्या समीक्षा लिखूं ?
इस पर पापा ने कहा कि आप समीक्षा लिखिए, खराब था तो वैसा ही लिखिए । इस पर
सर्वेश्वर जी ने कहा कि इसमें हेमा बिटिया ने काम किया है। इस पर पापा ने कहा-
तो क्या हुआ, आप वैसा ही लिखिए जैसा देखा । इसके बाद उस नाटक की समीक्षा में
आलाचना हुई ।”-17
एक संपादक की
सत्ता का उपयोग रघुवीर सहाय की नजर क्या था, यह बात उनसे लिए गए एक साक्षात्कार
में सामने आती है। लोठार गुट्से ने रघुवीर सहाय के साथ विभिन्न पहलुओं पर लंबी
बातचीत की थी। अंतिम सवाल इस प्रकार था-
“आप
मेरे सामने एक कवि के रूप में हैं और मेरी समझ में कवि के लिए सबसे महत्वपूर्ण
गुण है सर्जनशीलता और सच्चाई। लेकिन आप
‘दिनमान’
के संपादक भी है। यानी एक ऐसे व्यक्ति के नाते, जिसके पास सत्ता है। आपके
व्यक्तित्व में इन पक्षों का क्या स्थान है
?
दोनों आप किस तरह निबाहते हैं ?
क्या दोनों परस्पर विरोधी से नहीं हैं।”
इसके जवाब में
रघुवीर सहाय ने कहा था- “देखिए,
एक बहुत बड़ी मुश्किल जो मेरे सामने है, वह यह है कि शक्ति का या राजनीति का
इस्तेमाल मैं अपने रचनात्मक जीवन के लिए नहीं करता । मैं खुद राजनीति नहीं करता
। मैं मानता हूं कि अगर अपने देश के संदर्भ में देखें तो हमारे यहां जो शक्ति
का ढांचा बना हुआ है या हमारा जो राजनीतिक संगठन है, ऊपर से नीचे तक इस सबको,
यानी एक उद्देश्य के लिए नाकामयाब । उद्देश्य वही है- समता, मनुष्य और मनुष्य
के बीच की गैर-बराबरी को मिटाने के लिए यह व्यवस्था बिलकुल बेकार है। क्योंकि
हम यह मानते हैं। इसलिए मैं समझता हूं कि मनुष्य की नियति को बनाने, समाज को
मानवीय बनाने के उद्देश्य से उसे बदलने के लिए रचनात्मक कर्म की हैसियत से हो
सकता है। होना चाहिए। हुआ भी है बीच-बीच में। पर वह मेरा कर्म नहीं है। मेरा
कर्म, मैंने जैसा आपसे कहा, माना लिखना। या उसको आप अगर और बहुत दार्शनिक न
बताएं तो मतलब यह है कि सच्चाई को ढूंढना और पकड़ना, यह मैं उस अर्थ में,
आध्यात्मिक अर्थ में नहीं कह रहा हूं- एक शुद्ध मानवीय अर्थ में कह रहा हूं। यह
मेरा काम है। ऐसा काम करने वाला आदमी किसी समाज में उस वक्त अपने को बहुत असहाय
और अपूर्ण अनुभव करने लगता है जबकि राजनीति रचनात्मक रूप में खुलकर न हो रही
हो, अच्छी तरह राजनीति न हो रही हो, काफी राजनीति न हो रही हो । राजनीति से
मेरा मतलब उसी रचनात्मक कर्म से ही है। मेरा मतलब यह उखाड-पछाड़, कुर्सी के लिए
उलट-पलट, इस सबसे नहीं है।”-18
जाहिर है कि
एक संपादक की सत्ता का उपयोग श्री सहाय के लिए मनुष्य की नियति को बनाने और
समाज को मानवीय बनाने के उद्देश्य से उसे बदलने के लिए ही था। इस बात को अशोक
वाजपेयी ने इन शब्दों में लिखा है- “रघुवीर
सहाय के संसार में वे लोग ही प्रवेशे पा सकते हैं जिन्हें अन्याय के संदर्भ में
रखा जा सके। जिनको परिभाषित करने का अनिवार्य संदर्भ न्याय हो । या दूसरी तरह
से कहें तो ये वे लोग या शब्द हैं जो अन्याय-अर्थ की ओर बढ़ते रह सकें, भले ही
हिचकिचाते हुए, क्योंकि रघुवीर सहाय के संसार की नागरिकता की सबसे बड़ी अर्हता
ऐसे शब्द बनने में है जिसमें अपने ही अन्याय का चरम प्रत्यय हो जा सकने की
सामर्थ्य हो। जहां अन्याय पदार्थ और पद के बीच का अंतराल खत्म हो जाए।”-19
एक संपादक के
बतौर श्री सहाय की यात्रा की चर्चा करते हुए सुरेश शर्मा ने लिखा है-
“मार्च
1968 में ही रघुवीर सहाय समाचार संपादक होकर
‘दनमान’
में आ गए । इसी वर्ष में ‘दिनमान’
के संपादक सच्चिदानंद वात्स्यायन के विदेश चले जाने के कारण स्थानापन्न संपादक
के रूप में काम देखना शुरू किया । 1969 में वे इस साप्ताहिक के कार्यकारी
संपादक बने । 1970 में वे पूरी तरह संपादक बना दिए गए। संपादक बनते ही रघुवीर
सहाय ने दिनमान में अनेक परिवर्तन करके उसे नया रूप दिया। रघुवीर सहाय के
संपादक में निकले इस नए ‘दिनमान’
ने पत्रकारिता के नए मापदंड बनाए। प्रतिबद्ध पाठकों और पत्रकारों की एक नई
पीढ़ी तैयार की। रघुवीर सहाय ने यह काम खबर और पत्रकारिता के संबंध में अपनी
क्रांतिकारी धारणा के आधार पर किया । उनकी मान्यता थी कि खबर देने और लिखने का
काम सिर्फ पेशेवर पत्रकार ही करें, यह जरूरी नहीं। देश के दूरदराज इलाकों में
परिस्थितियों का सामना करते लोग ज्यादा जानकारी और अनुभव से गुजरी खबरें दे
सकते हैं। उनकी धारणा थी कि वही वास्तविक खबर होगी। देश के उपेक्षित हिस्सों का
हाल जानने के लिए उन्होंने अनेक संवाद प्रतियोताएं आयोजित की, जिनमें सैकड़ों
पाठकों ने हिस्सा लेकर अनुभव से निकली खबरें लिखीं।”-20
श्री शर्मा
के अनुसार रघुवीर सहाय ने स्तंभों या कॉलमों से निर्धारित पत्रकारिता को भी
बदला. ‘दिनमान’
में उन्होंने कॉलम के बंधन को ढीला किया । जब संबद्ध कॉलम के लिए कोई
महत्वपूर्ण सामग्री नहीं मिली तो कुछ और छापा। उनका पत्रकार अपने अखबार के लिए
कॉलम के हिसाब से विषय नहीं ढूंढता था। वह नए-नए विषयों के हिसाब से कॉलम बनाता
था। इसलिए उनके समय में ‘दिनमान’
के माध्यम से रघुवीर सहाय ने प्रतिबद्ध पत्रकारिता को भी एक नया रूप दिया। वह
दल संबद्ध पत्रकारिता नहीं थी। वह जनसंबद्ध पत्रकारिता थी। रघुवीर सहाय सहाय के
संपादक में ‘दिनमान’
की पक्षधरता आम लोगों के हित में थी । उन्होंने अपने संपादकीय में किसी भी घटना
का विश्लेषण आम आदमी के हित को केन्द्र में रखकर किया । 1970 से मार्च 83 तक
उन्होंने