Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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आवरण कथा

 

 

उठने लगे हैं सवालिया निशान

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विनीता श्रीवास्तव

 

संपादक मतलब मीडिया का संपूर्ण जानकर व्यक्ति, सही के लिए भले ही न हो लेकिन गलत खबर के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति । संवाददाता कैसी भी खबर लाए लेकिन प्रस्तुतिकरण, उस खबर की विश्वसनीयता, उसके प्रभावी प्रस्तुतिकरण के लिए जिम्मेदार, हर वर्ग के पाठकों की मानसिकता के हिसाब से समाचार लेख, संपादकीय देने में जो सक्षम हो वही सफल संपादक हैं । आज के समय में अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं की प्रसार संख्या बढ़ाने, इलेक्ट्रानिक चैनल पर खबरों को ज्यादा से ज्यादा श्रोता दर्शक जुटाने वाला व्यक्ति संपादक की श्रेणी में आता है ।

 

 रही सत्ता-महत्ता वाली बाद तो यह निर्भर करता है, उसके मार्फत विज्ञापन जुटाने, संस्थान के हर विभाग के कर्मचारियों की सेलरी जुटाने के दौर की बाद कर रही हूं जबकि लगभग दो दशक पहले स्थिति भिन्न थी, और स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान एवं उससे पूर्व कुछ और तब समाचार बिकता था, लेकिन कहा जाने लगा  है, आज विज्ञापन के जरिए समाचार खरीदे जाने लगे हैं ।

 

कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका की खूबियों, कमियों से लोगों को परिचित कराने में, खबरपालिका सर्वोपरि भूमिका निभाती है लेकिन आज रेटिंग बढ़ाने के चक्कर में इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया में बढ़ती स्पर्धा के चलते सिर्फ विचारवान व्यक्ति के चलते सिर्फ विचारवान व्यक्ति (संपादक) नहीं, वरन चार्मिंग आर्थिक बाजार पूंजीपतियों और खरीददारों की नब्ज पकड़ने वाला भी हो, आज खरी-खोटी लिखने वाले संपादक छोटे छोटे पत्र-पत्रकारिता से नहीं हैं उसका एक अलग वर्ग है।

 

जहां तक समाज और अखबारों को वैचारिक नेतृत्व देने की बात है पिछले एक दशक से उस पर सवालिया निशान लगाने लगे हैं, वे हिंसा, बलात्कार,मार-पीट राजनैतिक पार्टियों के आरोप-प्रत्यारोप में उलझ कर रह गए हैं। हालांकि समाज के एक बड़े वर्ग का वैचारिक नेतृत्व मीडिया ही कर रहा है, किसी व्यक्ति विशेष, के विरुद्ध या पक्ष में माहौल बनाने का काम भी संपादक बखूबी कर जाता है लेकिन चार बड़े अखबारों के संपादक उस व्यक्ति विशेष या खबर को चार तरह से पाठकों के बीच पेश कर अपना पाठक वर्ग बनाने में लगे हैं। बड़े व्यावसायिक का मीडिया में प्रवेश संपादक के जरिए अपने व्यावसायिक की खूबियों खामियों को उजागर या छिपाना भी है, हम इसे कानून की कमजोरी भी मान सकते हैं कि वो विवश हो जाता है बड़े व्यवसायी सरकार को चलाने में भी महती भूमिका निभाते हैं। आम आदमी से किसी को बहुत सरोकार नहीं है, बहुत से मामलों में संपादक, मालिक और पाठकों के बीच धुरी है तो बहुत से मामलों में बाजार की प्रभुता बचाए रखना उसकी मजबूरी है।

 

आजादी के बाद से जिस तरह से भ्रष्टाचार बढ़ा है उसमें महती भूमिका संपादक की रही है क्योंकि न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका की गल्तियों-कमियों को ठीक ढंग से उजागर करने में मीडिया अक्षम रहा है या उसने ऐसा करना नहीं चाहा । एक अखबार का संपादक चोर द्वारा की चोरी का फालोअप बखूबी देता है, लेकिन एक पार्टी या नेता के भ्रष्टाचार का फालोअप बिक जाता है, ऐसे ढेरों उदाहरण हैं लेकिन सभी विवश है क्योंकि आज संपादक की मानसिकता गिरवी रखी है।

 

वैचारिक सत्ता का एक बड़ा भाग संपादकों के पास है समाज भिन्न मगर समाज के अभिन्न हिस्से की जिम्मेदारियां भी उसे महत्वपूर्ण बनाती हैं। राष्टों के वास्तविक मूल्यांकन का आधार उसकी आर्थिक नहीं बैद्धिक सम्पत्ति होती है। सत्ता एक वृहद शब्द है जिससे अधिकार की गंध आती है और संचालन का भी एहसास होता है एक संपादक को शासन के समकक्ष रखा जाना उसके साथ ज्यादती है। मगर सामाजिक घटनाओं के संचालन और प्रस्तुतिकरण में उसकी भूमिका की तुलना किसी से नहीं की जा सकती । संपादक जो विश्लेषण करता है बहुधा वही एक बड़े वर्ग की मानसिकता की दिशा तय करता है। संपादक की महत्ता इसी बात में निहित है कि वह किस स्थिति से घटनाओं को देखता है । किसी भी पत्र/पत्रिका का स्वभाव या नीति समझने उसकी संपादकीय समानता जरूरी है शेष रचनाएं तो सहायक पात्र की भूमिका निभाती हैं। रचनाओं का चयन और उसके प्रस्तुतिकरण कर ढंग भी एक महत्वपूर्ण संपादकीय कार्य है जो यह आभास कराता है कि संपादक की सो जिसे सत्ता कहा जा सकता है किस तरह की है। पाठकों की संख्या वितरण और प्रभाव यह तय करता है कि संपादक की वास्तविक पहुंच कहां और कितनी और किस तरह के लोगों पर है। आम आदमी को प्रभावित कर पाना एक सफल संपादक की पहचान है।

 

हालिया नृशंस निठारी कांड में अपराधियों को तो सभी ने समाजिक रूप से दोषी ठहराया और पुलिस की लापरवाही की जमकर आलोचना की मगर अपवाद स्वरूप भी किसी संपादक ने इस तथ्य की तरफ ध्यान नहीं दिया कि मां-बाप की गलती भी इस मायने में हैं जो बच्चों के सावधानी पूर्ण लालन पालन पर खरे नहीं उतरे । विचारों का बहाव झरने की तरह न होकर उर्ध्वाकार होना चाहिए। सत्ता पलटने से लेखन में आक्रमक तीव्रता जिसे वर्गमूल भाषा में कहा जा सकता है, ही पर्याप्त नहीं बल्कि बदलाव के बिंदु खास मायने रखते हैं, जिन्हें बार-बार अलग मात्रा की तरीकों से दोहराया जाना चाहिए । सिद्धांतों से ज्यादा महत्वपूर्ण पाठकीय उत्तरदायित्व होते हैं इसलिए सफल संपादकों को समय के हिसाब से सिद्धांत बदलने में दिक्कत महसूस नहीं होती। यह बदलाव उसकी महत्ता बढ़ाता है जबकि आम आदमी की धारणा यह है कि इससे मह्त्व कम होता है। अपने लिखे-किए का आकलन करना एक संपादक की महती जिम्मेदारी है नकारात्मक प्रभाव वाले विचारों को तुरंत हटाना जरूरी है तो सकारात्मक प्रभाव कराने वाले विचारों की संख्या में वृद्धि इससे भी ज्यादा जरूरी है। संपादक का जीवन विविधता के बाद भी रूटीनी होता है इसका प्रभाव भी संपादक पर दिखता है यही प्रभाव उसे विवश करता है कि यह वैचारिक रूप से अपने आपको थोपता रहे इस पर नियंत्रण जरूरी है।

 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संपादक नाम के जिस प्राणी को हम विशिष्ट दृष्टि से देखते हैं वह भी अधिकार मूलतः एक आम आदमी होता है इसलिए आलोचकों की संख्या भी ज्यादा नहीं होना चाहिए। निष्पक्षता के चलते ही कोई भी संपादक अपनी सत्ता व महत्ता कायम कर सकता है किसी भी तरह के भेदभाव की कीमत उसे पाठक वर्ग को खोने की शर्त पर ही चुकाना पड़ती है यानी किसी दल, जाति वर्ग पर घटित विशेष के प्रति अनुराग संपादकीय महत्व को खोने की निर्णायक वजह है। अहंकार व पूर्वाग्रह स्वाभाविक संपादकीय गरिमा को नष्ट कर देता है। आज भी बात करें तो संपादक शुद्ध विचार बेचता है इनमें मिलावट होगी तो न सत्ता चलेगी न महत्ता रहेगी।

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विनीता श्रीवास्तव - कई समाचार पत्रों से जुड़ी रहीं । इन दिनों वुमेन्स मीडिया जर्नलिस्ट एसोसिएशन की मध्यप्रदेश की अध्यक्ष हैं । भोपाल से तुलिका नामक पत्रिका निकालती हैं  स्त्री विमर्श से जुड़े मुद्दों पर निरंतर लिखती रहती हैं । संपर्कः तूलिका फ्लैट न.-5, अदिति अपार्टमेंट-1, प्लाट न. 28-29, त्रिलंगा, भोपाल

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव,संपादक-भूमिका द्विवेदी. संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह. गोपा बागची.पवित्र श्रीवास्तव.

प्रवंध संपादक-चंदशेखर बघेल. उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही. वेब नियोजन-संजय द्विवेदी,जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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