'भारत' के
जुझारू संपादक नंददुलारे बाजेपयी
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विजय
बहादुर सिंह
इंदौर
से प्रकाशित होने वाले
‘चौथा
संसार’
के संपादक होकर आए हिन्दी के कवि डॉ. प्रभाकर माचवे से एक सहज मुलाकात में
मैंने यह जिज्ञासा की थी कि आजादी के बाद की पत्रकारिता के चरित्र के बारे में
उनकी राय क्या है ?
तब उन्होंने जैसे पहले से मेरे लिए सहेज कर रखा एक वाक्य रख दिया था। मुझे याद
है, उनके अगल-बगल दो चार संवाददाता भी बैठे थे और वह उनके सम्मान में आयोजित एक
चाय पार्टी थी । मेरी जिज्ञासा के प्रत्युत्तर में उनके होठों पर एक विडम्बना
ग्रस्त मुस्कान-सी खिल गई और मेरे कानों ने सुना-
“विजय
बहादुर जी। आजादी के पहले की पत्रकारिता एक मिशन थी, अब यह कमीशन है।”
माचवे जी कवि
तो थे ही इसलिए उनके जवाब में मिशन और कमीशन की छंदात्मकता और तुकांतता सहज
अपेक्षित थी किन्तु इस संगीतमयता के बावजूद यथार्थ का ऐसा तीखापन और
वस्तुस्थितियों की ऐसी अनुभवपूर्ण सच्चाई उस संगीत पर भारी पड़ रही थी।
हिन्दी
पत्रकारिता आज जिस दौर से गुजर रही है, उसके बारे में सोचना भी भयावह लगता है।
बाजार और बाजार, मुनाफा और मुनाफा, केवल पत्रकारिता के जीवन-मूल्य हो उठे हैं,
ऐसा भी नहीं। वे तो अत्याधुनिक ग्लोबल विश्व के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले
जीवन आदर्श हुए बैठे हैं। ऐसी स्थितियों में हम जब संपादक नामक संस्था के बारे
में सोचते हैं तो हमें इक्के-दुक्के अपवादों के अलावा दंग रह जाना पड़ता है।
पत्रकारिता चाहे वह अखबारों की हो या फिर दिव्य-दर्शन चैनलों की, संपादकों की
जगहों पर कथित तौर पर बैठे लोग विचारों और राष्ट्रीय जीवन के प्रति अपनी शायद
ही कोई जवाबदेही रेखांकित करते हों। हां, वे अपने नियोक्ताओं (मालिकों) के लिए
मुनाफा प्रबंधकों के रूप में जरूर सफल है। कहने और साबित करने की जरूरत नहीं कि
संपादक नाम की संस्था ने अपना क्या चरित्र विकसित कर लिया है। इसका कारण भी
छोटा-मोटा नहीं है। वे सारे जीवन-मूल्य और आदर्श हैं, जिनकी चपेट में अन्यों की
भांति यह संस्था भी आ चुकी ही। अब तो कई वरिष्ठ पत्रकारों के मुंह से यह दुखद
सच भी सुनाई दे जाता है कि पत्रकारिता की आधुनिक दुनिया को संपादक नामक संस्था
की कोई जरूरत नहीं है। जो प्रकाशक है वही संपादक भी है। अंततः सारे काम तो
कम्प्यूटर कर लेता है यह फिर मुनाफा प्रबंधक।
इस पृ्ष्ठभूमि
पर जब हम आजादी से पहले के पत्रकारों को देखते हैं तो निष्टावान समर्पित, निदाग
और उज्जवल चरित्रों वाले जुझारू पत्रकारों की नक्षत्र-पंक्तियां हमारी चेतना और
स्मृति में कौंधने और उभरने लगती है। माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश
शंकर विद्यार्थी या फिर पराडकर जैसे दिव्य चरित्र वाले उन दिनों जीते-जागते और
लोक पूज्य सत्यनिष्ठा से भरे हुए लोग । जमाना आज भी अपने इन यशस्वी सिद्धों को
भुला नहीं सका है। सचमुच ये तपस्वी किस्म के लोग थे और वह जमाना जिसके महानायक
गांधी थे, ये सब बाज के ढेर सारे चैनलों पर भारी पड़ते थे। भरोसेमंद और
श्रद्धेय तो खैर थे ही।
बीसवीं सदी के
इस
गांधी युग के चौथे दशक में उदार (लिबरल) राजनीति के समर्थकों ने लीडर जैसे
अंग्रेजी समाचार संस्थान का जब हिन्दी संस्कार शुरू करने का निर्णय लिया तो
उसका ‘भारत’
रखा । यह एक साप्ताहिक अखबार था जिसकी पृष्ठ संख्या लगभग दस-बारह के आस-पास थी।
संचालकों में सर वाईपी चिन्तामणि जैसे लोग थे और नीति थी कि विवादों और तीखी
सच्चाइयों से बचते हुए साप्ताहिक को चलाया जाए। उग्रता और आक्रामकता का
प्रदर्शन न किया जाए। निर्भीकता और समझौता में से अगर कभी चुनाव का मौका आ पड़े
तो समझौते को चुनते हुए अखबार चलाया जाए किन्तु
‘भारत’
के मालिकों (संचालकों) ने इसके लिए जब संपादक की खोज शुरू की तो उन्हें मिले
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अभी-अभी एम.ए. करके निकले हिन्दी के युवा आलोचक
नन्दुलारे वाजपेयी।
असली किस्सा
तो यह कि सर चिन्तामणि ने काशी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष से यह मदद
चाही थी कि वे उन्हें अपने पत्र के लिए किसी सक्षम का नाम सुझाएं और बाबू साहब
ने जो नाम सुझाया वह यही थी।
बाबू साहब
अपने इस शिष्य के व्यक्तित्व से बेखबर हों, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता । वे जानते
थे कि नन्दुलारे वाजपेयी अपने विश्वासों और जीवन आदर्शों के प्रति मर मिटने
वाला नौजवान है। मुनाफा और सत्य में से अगर कभी चुनना ही पड़े तो वाजपेयी सत्य
की पक्षधरता में मुनाफे के सारे प्रलोभन को लात मार दूर खड़ा हो जाएगा। वे यह
भी तो जानते थे कि उनके इस शिष्य का उठना-बैठना किस प्रकार के लोगों के साथ है।
यह भी कि इसकी दोस्ती निराला से है और आत्मीयता जयशंकर प्रसाद से। यह खुद भी तो
कवि, कहानीकार और आलोचक हैं।
तथ्य है कि
बाबू साहब की सलाह पर ही नन्दुलारे वाजपेयी जून 1930 में लीडर प्रेस की नौकरी
में आए और 1 सितम्बर 1930 से उसके सम्पादक का कामकाज देखने लग गए। यहां यह याद
करना जरूरी है कि श्री वाजपेयी के पिता पं. गोवर्धनलाल जी वाजपेयी बाद में
प्रथम राष्ट्रपति हुए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ जेल में थे। महात्मा गांधी
इन सबके चरित्र नायक थे। गांधी के महान आदर्शो और व्यावहारिक जीवन में अगर कोई
खासियत थी तो यही कि उनकी भाषा में आक्रमकता का अभाव था। कट्टरता की अनुपस्थिति
थी। आवेगों की क्षीणता कहें तो कह लें पर आवेगों की सच्चाई कहीं कम न थी। युवा
संपादक नन्ददुलारे वाजपेयी के स्वभाव में राष्ट्रीय मनोभावों को लेकर एक
कट्टरता तो थी, जिसके चलते इनकी भाषा जब-तब आक्रामक हो उठा करती । पर वे इसके
लिए कभी पछतावे पर इतराते हों, ऐसा कभी देखा नहीं गया । मित्र निराला ने ठीक ही
लिखा कि वाजपेयी न दैन्यं न पलायनम् के खरे प्रतीक हैं।
‘भारत’
पत्र का संपादन शुरू करने के कुछ ही महीनों बाद वह अपनी प्रसार संख्या में भी
वढ़ने लगा तथा अर्ध-साप्ताहिक हो गया । हिन्दी भाषी समाज इसे अपना सबसे ईमानदार
मुख-पत्र मानने लगा । इसका सबसे बड़ा प्रमाण इस समय मिला जब पं. जवाहरलाल नेहरू
की मां श्रीमती स्वरुप रानी नेहरु ने ‘भारत’
के संपादक को आनंद भवन में बुलाकर उनसे सहयोग मांगा । युग पुरुष नेहरू से
संबंधित कुछ वैयक्तिक संस्मरणों को लिखते हुए अपने जीवन के प्रौढ़तम दिनों में
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने याद किया
–
“सन
1930-31 में भारत का संपादन करते हुए मुझे उनके इलाहाबाद स्थित आनंद भवन में
जाने का अवसर अवश्य मिला था । उन दिनों उनके पिता श्री मोतीलाल नेहरू का
देबावसान हो चुका था और नेहरू जी सरकारी जेल में चले गए थे । राष्ट्रीय आंदोलन
जोरों से चल रहा था और सारा नेहरू परिवार जेलवासी बन गया था । आनन्द भवन में
केवल उनकी माता स्वरूप रानी जी रहती थीं । उन्होंने मुझे इसलिए बुलाया था कि
मैं ‘भारत’
के द्वारा सरकार को यह सूचना दूं कि नेहरू जी से जेल में मिलने के लिए कुछ उचित
सुविधाएं दी जाएं । स्वरूप रानी जी के शब्दों से यह झलक रहा था कि अपने पुत्र
के प्रति उनकी अगाध ममता है और वे उनसे जेल में मिलने की आवश्यक सुविधाएं चाहती
हैं । मैंने ‘भारत’
के उसी अंक में इस विषय पर एक छोटी-सी टिप्पणी लिखी थी ।
‘भारत’
संपादक नन्ददुलारे वाजपेयी यदि एक और गांधी और नेहरु की रीजनीतिक दृष्टियों के
समर्थक थे तो दूसरी ओर उन शहीदों के प्रति भी गहरे अपनत्व और उनके राष्ट्रीय
महत्व के प्रति सजग थे। यद्यपि भारत जैसे उदार अर्ध-साप्ताहिक में क्रांतिकारी
गतिविधियों और अतिवादी राजनीति की सिफारिश संभव न थी फिर भी सपांदक वाजपेयी है-
पूज्य मालवीय जी इन फांसियों से स्तब्ध हो गए हैं और अपने शोक को व्यक्त करने
के लिए उन्हें शब्द नहीं मिले । राष्ट्रपति (तब यह शब्द कांग्रेस सभापति के लिए
प्रयुक्त होता था-लेखक) जवाहरलाल जी को जैसे काठ मार गया हो, वे सन्न हो गए हैं
। सरदार पटेल ने ब्रिटिश कानून के मिथ्या दंभ को खोलकर दिखाया है । अंत में
महात्मा जी ने कहा है कि सरदार भगत सिंह और उनके साथियों ने फांसी पर लटककर जो
आत्माहुति दी है वह उनके अमर किरीट की भांति शोभन होगी । वाजपेयी दो-एक वाक्यों
के बाद यह लिखने पर आमादा हो उठते हैं कि यह सरकार की गुण्डावृत्ति है ।
चर्चिल आदि
ब्रिटिश राजनयिकों के प्रति तीक्ष्णतम शब्दों और विचारों का प्रकाशन भी संपादक
वाजपेयी के लिए अत्यंत सहज था । वे इतनी निडर थे और आत्मविश्वासी भी कि
उन्हें लगा करता था कि वर्तमान या तात्कालिक सफलताएं भले ही उनकी न हों किन्तु
सच्चाईयों का इतिहास तो उन्हीं जैसे लोगों को याद किया करेगा । इसलिए उनकी
गतिविधियों का रूप और चेहरा महान राष्ट्रिय आदर्शों और जातियों तथा भाषाओं की
एकता और अखण्डता के प्रति समर्पणशील था ।
1930-31 और 32
के संपादक वाजपेयी यह तो जानते ही थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद भारत को कितने
टुकड़ों में बांटकर अपने शोषण के चक्र को बनाए रखना चाहता है । इसीलिए वह
भाषाओं और धर्मों के आपसी रिश्तों के बीच इतनी दरारें पैदा कर देना चाहता है
कि राष्ट्रीय स्वाधीनता का आंदोलन धीमा और कमजोर हो उठे । एक जुझारू पत्रकार के
रुप में वाजपेयी भी इस चाल को समझते थे । पर झींकने या गरियाने की जगह उन्होंने
यह प्रबोधित करना कहीं जरूरी समझा कि-
‘ये
महान जातियां अपने भविष्य ढूंढ रही हैं । दोनों महान हैं, दोनों अद्भुत विलक्षण
हैं... यह नहीं कि दोनों पूर्व और पश्चिम की भांति एक-दूसरे परांगमुख हो नहीं ।
दोनों एक-दूसरे की अपेक्षिणी हैं, पूरिका हैं । दोनों मिलकर जगत को रहने योग्य
बना सकती हैं .... ।’
यही संपादक
वाजपेयी आगे लिखते हैं- ‘जिन्हें
चिरकाल तक एक स्थान पर एक साथ निवास करना है, एक ही पड़ोस में रहकर आनंद में
अथवा विषाद में काल-यापन करना है, वे अपने काल्पनिक कुछ भेदों को मिटाकर एक हो
जाएं, इसमें आश्चर्य क्या है....’
‘हमें
एक साथ मिलकर रहना है- सौ वर्ष नहीं, हजार वर्ष नहीं अनंत वर्ष । हम झगड़ा करने
के लिए नहीं पैदा हुए। हमारे जीवन का लक्ष्य इतना नीच नहीं हो सकता।’
भारत की एकता
और अखण्डता के इस जुझारू प्रहरी ने जब यह महसूस किया कि सर डॉ. मुहम्मद इकबाल
जैसे महान शायर की राजनीति फिरकापरस्ती की ओर बढ़ने लगी है तब उसने इस या उस
जाति या धर्म के प्रति निरपेक्षता बरतते हुए राष्ट्रीय सार्वभौमता के पक्ष में
यह लिखा कि- वे डॉक्टर इकबाल ही थे जिन्होंने एक बार कहा था-
‘यूनान-मिस्त्र-रोम
सब मिट गए जहां से, बाकी रहा है अब भी नामोनिशां हमारा।’
आज देश के नवयुवक उन्हीं की कविता को चरितार्थ करने के लिए भविष्य में भी
हिन्दुस्तान का नाम बाकी बचाए रखने के लिए जी-जान से प्रयत्न कर रहे हैं और यह
अत्यंत अफसोस की बात है कि डॉक्टर सर इकबाल अब अपनी ही पंक्तियों का अर्थ नहीं
समझते। वाजपेयी व्यंग्य की आक्रामक शैली में निडर हो लिखते हैं-
‘सर
लग जाने से बुद्धि में कमी तो न आनी चाहिए ।’
क्या वाजपेयी ऐसा लिखते हुए यह भूल गए होंगे कि
‘भारत’
के संचारकों में भी एक-दो ‘सर’
उपाधिधारी थे। इतने बेहोश तो वे कभी भी नहीं थे। विपरीत इसके वे जरूरत से कुछ
ज्यादा ही होश वाले सम्पादक थे। उनकी निगाह सिर्फ ब्रिटिश वायसरायों और
कूटनीति-उस्ताद चर्चित पर ही नहीं थी, उन देसी राजाओं-महाराजाओं और सामंतों पर
भी थी जो अपनी खिसकती और निरंतर क्षीण होती जाती सत्ता को बचाए रखने के लिए
अंग्रेजी सत्ता के समक्ष घुटने टेक चुके थे । उनका निजी चरित्र भारत की जनता
के हितों और अपने स्वार्थों के द्वंद्व के बीच कैसा आचरण करता था इसे
‘लगान’
फिल्म में दुबारा भी प्रदर्शित किया गया है। अफसोस अब इनमें से अधिकांश इस या
उस सत्ता-राजनीति के सुविधा –समय
में है और भरपूर सुख-दोहन कर रहे हैं।
‘भारत’
संपादक वाजपेयी ने अपने लेखन में इनके चेहरों की असलियत भी उजागर की।
ब्रिटिश
साम्राज्यवाद से उनके लड़ने का एक नमूना उनके द्वारा लिखे गए संपादकीय 15 मई
1931 के ‘गोरे
पत्र’
शीर्षक में मिलता है जिसमें वे कहते हैं-
‘भारत
में रहने वाले यहां के गोरे (यानी अंग्रेजी भाषा वाले) पत्र-पत्रिकाएं भी जी
तोड़ परिश्रम करके गांधी, कांग्रेस, समझौता आदि को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष
रीति से खूब कोस रहे हैं । वे हिन्दू-मूस्लिम एकता को फूटी आंखों नहीं देखना
चाहते.... ये भेदनीति के हिमायती हमारे आपस के मतभेद से फूले नहीं समाते....
कलकत्ते का ‘स्टेट्समैन’
अपने अग्रलेख में महात्मा जी की सहयोग नीति की निंदा करता हुआ लिखता
है...परन्तु भारत को यह स्पष्ट कह देना है, उसे ऐसे-ऐसे हितैषियों की आवश्यकता
नहीं है।’
अपने इस लेख
के मार्फत श्री वाजपेयी ने अंग्रेजी भाषा में निकलते उन
‘गोरे’
अखबारों का राष्ट्र विरोध और आजादी विरोधी चेहरा बेनकाब किया है। उनकी स्पष्ट
सोच थी कि भले ही ये अखबार दो या दस-पांच प्रतिशत अपने को अति उच्च और
बुद्धिजीवी मानने वालों के बीच प्रतिष्ठित हों, किन्तु भारत की विशाल
जन-बिरादरी को तो ऐसे अखबरों की जरूरत है जो उनकी अपनी बोली-बानी में हों। जो
आसपास की सच्चाइयों को सामने लाते हों। बेलाग हों और भारतीय समाज के होतों के
पक्षधर हों। संपादक वाजपेयी को अपने संचालकों के बीच कभी यह सच कहने के लिए
संकोच नहीं करना पड़ा कि हिन्दी भाषा के पत्र सामान्य जनता तक पहुंचते हैं। अतः
लीडर की नीति जैसी भी हो, भारत में सामान्य जनता की भावनाओं का प्रतिबिंब होना
ही चाहिए। आज ऐसा सोचने वाले संपादक नहीं होंगे-यह कैसे कहा जा सकता है, पर
उनकी संख्या नगण्य ही होगी। सामान्य जनता के प्रति अपने सम्पादक की पक्षधरता के
चलते उन्हें कई बार चेतावनियां मिलीं । और वह दिन भी आया, जब वे बगैर किसी झिझक
के भारत से अलग भी कर दिए गए। निश्चय ही इसमें कुछ जाने-माने समझौतेपरस्त
पत्रकारों की भी भूमिका थी पर उनकी भी कुछ कम नहीं जिन्हें वाजपेयी जैसे युवा
सम्पादक की तेजस्विता और प्रखरता बेहद खल रही थी। साहित्यिक विवाद और झगड़े भी
इन्हीं दो-सवा दो बरसों में खूब उभरे थे और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और
प्रेमचन्द जैसे महान लेखक युवा-आलोचक वाजपेयी के तीखे तर्कों से स्वयं को आहत
महसूस करने लगे थे। आचार्य पद्मसिंह शर्मा और
‘विशाल
भारत’
के पण्डित बनारसीदास तो बिफरे हुए थे ही, पर बेफिक्र बाजपेयी को कहां किसकी
चिंता थी। वे अपने विश्वासों और आदर्शों की रक्षा के लिए कहीं तक भी जाने को
तैयार थे। आगे के दिन बताते हैं कि अपने आदर्शों और विश्वासों की कीमत उन्होंने
किस-किस रूप में चुकाई। इस कीमत को चुकाने से पहले उन्हें अपने ऊपर कितना भरोसा
था-इसे हम अगर आज महसूस करना चाहें तो 10 नवम्बर 1932 को लिखे उनके अंतिम
संपादकीय ‘अवसर-ग्रहण’
की इन पंक्तियों को पढ़ें । शायद हमें भी कोई ताकत इन्हें पढ़कर मिले। छब्बीस
साल की उम्र में इलाहाबाद की सड़कों पर बेरोजगारी का स्वागत करने वाले मूड के
बावजूद संपादक वाजपेयी लिखते हैं-
“दो
वर्षों से अधिक ‘भारत’
के संपादकीय पद पर काम करने के उपरांत आज मैं अवसर-ग्रहण कर रहा हूं । कारण
?
कारण कि इस विश्व-वैचित्र्य में क्या कमी है। किन्तु मुझे ये सब कारणों के तार
टूटे हुए से, खिन्न-खिन्न बोलते से जान पड़ते हैं । मैं यह स्वर नहीं चाहता
जिसमें ये अशेष कार्यकारिणी के तार एकाकार होकर बजते हैं, मुझे तो यह विश्ववीणा
अच्छी लगती है। उस एक अशेष को लेकर शेष की मैं चिन्ता नहीं करता ।
मेरी राजनीति
मेरे परिस्थिति की उपज है। उसे मैंने जीवन की आवश्यकता समझ कर अर्जित किया है ।
भारत द्वारा मैंने उसे जिस रूप में व्यक्त किया है, वह पत्र की नीति के अनुकूल
था। मेरा मतभेद सदैव मेरे मन में रहा है। आज भी है।
जो कुछ मैं
सत्य समझता हूं उसके लिए मैं अकेला ही अपने को पर्याप्त पाता हूं......
दो वर्ष का
जीवन होता ही क्या ?
अभी तो मैंने अपना आरंभिक रेखाचित्र भी पाठकों को भेंट नहीं किया ।”
राजनीति या
दूसरे शब्दों में सम्पादक की राजनीति काया होती है, अगर इसे लेकर सवाल मन में
उठे तब वाजपेयी का जवाब है कि यह कोई सुविधा या जन्मजात चीज नहीं हैं। प्रत्येक
सम्पादक को इसे अपने कर्मक्षेत्र में अपने
‘पौरुष’
के बल पर अर्जित करना होता है। और इस अर्जन का चरम ध्येय है-सत्य की रक्षा और
लोकहित में इसकी प्रतिष्ठा । अगर यह संभव न किया जा सके तो संपादक की कुर्सी से
उतरकर पेट पालने और बाल बच्चों पढ़ाई-लिखाई के लिए दूसरे ढेर सारे धंधे किए जा
सकते हैं । सम्पादक की गरिमा फिर भी बनी रहनी चाहिए और इसके लिए जितनी संभव
कीमतें हों, चुकाई अवश्य जानी चाहिए । हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अपने प्राणों
का बलिदान कर देने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी की
‘वीरगति’
पर लिखते हुए 2 अप्रैल 1931 को बाजपेयी जी ने लिखा था-
“सम्पादक
तो सभी होते हैं.... पर विद्यार्थी जी की तुलना इस धरातल पर करना अपनी मूर्खता
और कृतघ्नता साबित करना है।....हमें अल्पप्राण और महापुरुष का अंतर समझना चाहिए
। सब सम्पादक शिरोमणि अस्त हो जाएंगे, तब भी विद्यार्थी जी की ज्योति अमिट
रहेगी, क्योंकि गंगा-यमुना की भांति जो पवित्र धाराएं महापुरुषों के अंतर में
बहा करती हैं, वे शाश्वत हैं।”
गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलल चतुर्वेदी, बाबूराव विष्णुराव पराडकर जैसे
सम्पादक ही वाजपेयी के आदर्श थे। व्यक्ति-व्यक्ति की स्वाधीनता और उसके अपने
हिस्से का न्यायपूर्ण लोकतंत्र ही उनका सपना था। वे सचमुच यही थे।
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विजय बहादुर सिंह
-हिन्दी
के प्रख्यात आलोचक, कवि और बुद्धिजीवी।
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