Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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विचारार्थ

 

मीडिया के जरिए विद्रूप होती संस्कृति

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 सच्चिदानंद जोशी

 

लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में हाल ही में एक मजेदार बात देखने को मिली। केभीसी के तीसरे संस्करण को और अधिक आधुनिक तथा युवाओं के लिए ज्यादा सहज बनाने की दृष्टि से (शायद) इसे बहुत औपचारिक तथा मित्रवत बनाया जा रहा है। इसी कारण जो खिलाड़ी खेल को भीच में छोड़कर जाना चाहता है, उसे क्विट करने की बजाय कहना पड़ता है,  ‘शाहरुख मुझे गले लगा लो । जाहिर है शाहरुख के गले मिलने की चाहत अधिकांश प्रतियोगियों में होती ही होगी । कुछ दिन पूर्व नवी मुम्बई की एक शिक्षिका जब कार्यक्रम छोड़ना चाहती थी तो उसने खुशी-खुशी न सिर्फ यह कहा किशाहरुख मुझे गले लगा लो, बल्कि यह भी जोड़ा कि  ‘यह मेरे लिए उन पच्चीस लाख रुपयों से भी ज्यादा कीमती है जो आप मुझे ईनाम में दे रहे हैं । इसी एपीसोड के एक या दो दिन बाद जींद (हरियाणा) की एक शिक्षिका ने सामने भी ऐसा प्रसंग आया जब उसे कार्यक्रम छोड़कर जाना था । उसने बड़ी ही तल्खी से कहा, मुझे आपसे गले मिलने का कोई शौक नहीं है, लेकिन मुझे उत्तर नहीं आता, लिहाजा मैं कार्यक्रम छोड़ना चाहूंगी । उसकी तल्खी और साफगोई से शायद शाहरुख भी हक्का-बक्का रह गए और अंततः वे उस प्रतिभागी की मां से गले मिले और मां को ही पुरस्कार का चैक भेंट कर दिया ।

 

दोनों ही प्रतिभागी महिला थी, पेशे से शिक्षिका थीं । लेकिन दोनों की सोच और व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर था । यह उनकी व्यक्तिगत रुचि, अभिरुचि का अंतर हो सकता है । लेकिन इस बात से इंकार करना उनका शायद मुश्किल होगा कि इस अंतर का एक प्रमुख कारण उनका वह परिवेश भी रहा होगा जहां से वे आईं थीं । विकसित राज्य के महानगरीय परिवेश और विकासशील राज्य के कस्बाई परिवेश में काफी अंतर है । यह अंतर वहां के रहन-सहन से लेकर विचारों तक में है । यही कारण है कि जहां नवी मुम्बई की एक शिक्षिका को शाहरुख से कैमरे और लाखों करोड़ों दर्शकों के सामने गले मिलना गर्व और सौभाग्य की बात लगती है, वहीं जींद की एक शिक्षिका को गले मिलने की बजाय दूर से नमस्कार करना अच्छा लगता है । हमारे देश के अधिकांश महानगरों और कस्बों में अभिवादन के सामान्य सांस्कृतिक प्रकारों में ऐसे गले मिलना शुमार नहीं है । वह तो हमारे मीडिया की ही कृपा है जो हमारा सामना ऐसे अभिवादन प्रकारों से हो रहा है ।

 

यह वाकया हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम मीडिया के जरिए कौन सी संस्कृति के जरिए कौन सी संस्कृति हमारे दर्शकों या पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं । वह जो हमारे यहां वर्षों से परंपरा के साथ चली आ रही है या फिर वह जो धीरे-धीरे उपभोक्तावाद तथा बाजारवाद के साथ हमारे देश में प्रवेश करती चली आ रही है ।

 

एक और कार्यक्रम का उदाहरण शायद बाद और ज्यादा स्पष्ट करेगा । टेलीविजन के कई चैनल्स पर गृहमंत्री,होम मिनिस्टर,  या गृहलक्ष्मी जैसे नामों से एक कार्यक्रम आता है, जिसमें गृहिणियों के लिए छोटी-छोटी प्रतियोगिताएं आयोजित कर कार्यक्रम के अंत में उन्हें पुरस्कार दिए जाते हैं । मराठी में होममिनिस्टर नाम से आने वाले इस कार्यक्रम में विजेता को  ‘पैठनी साड़ी जो काफी महंगी होती है, दी जाती है । अंत में विजेता गृहिणी उसे पहनकर लोगों की बधाइयां स्वीकार करती है और टाईटल रोल चलता है । इन बधाइयों में वह अपने पति की बधाई स्वीकार करती है, वह भी उससे हस्तांदोलन (शैक हैण्ड) करके । जो महिलाएं इस कार्यक्रम में भाग लेती हैं वे जाहिर हैं निम्न मध्यम वर्ग या अधिकतम मध्यम वर्ग की होती हैं, जिनके लिए  ‘पैठनी साड़ी खरीदकर पहनना भी एक स्वप्न ही होता है । ऐसे घरों में महिलाओं द्वारा हस्तांदोलन किए जाने की परंपरा शायद नहीं है और अपने से  तो निश्चित ही नहीं । ऐसे में उनका अपने पति से किया जा रहा निर्जीव हस्तांदोलन बहुत अवास्तविक और हास्यास्पद लगता है । जाहिर है कि वह हमारी संस्कृति का मूल हिस्सा नहीं है । वह हमारे ऊपर लादी गई या हमारे ऊपर चिपकाई गई या हमारे द्वारा नकल की जा रही संस्कृति का हिस्सा है। यह वह संस्कृति है, जो बाजार के दबाव में पश्चिम से आयातित है और हमारे आधुनिक होने के स्वांग को ऊपरी तौर पर तुष्ट करती है ।

 

हम लोग टेलीविजन पर बड़े-बड़े सितारों से सज्जित अवार्डस कार्यक्रम देखते हैं । प्रायः हर बड़े चैनल, हर बड़ी पत्रिका द्वारा कोई न कोई प्रायोजक पकड़कर अवार्डस दिलवाए जाते हैं । अवार्ड तो गौण रह जाते हैं लेकिन दर्शक इसमें शामिल होने वाले सितारों उनके द्वारा अपनाई जाने वाली फैशन, उसमें होने वाले नाच-गाने के कार्यक्रम तथा कई अन्य चटखारेदार बातों का खूब मजा लेते हैं । हिन्दी या क्षेत्रीय फिल्मों के लिए दिए जाने वाले अलार्डस में अवार्ड पाने वाले अधिकांश कलाकार ऑस्कर पुरस्कारों की नकल करते हुए अंग्रेजी में अपने अवार्ड के लिए अलग-अलग व्यक्तियों को धन्यवाद देते हैं और अवार्ड देने वाले तथा कार्यक्रम को एंकर करने वाले व्यक्तियों के गालों को चूमकर गले मिलकर चले जाते हैं । हमारे भारतीय संस्कारों में अभिवादन की शैली में गालों को चूमना या गालों को रगड़ना या लिपटकर गले मिलना शामिल नहीं है । खासकर उस वर्ग में तो बिल्कुल नहीं है जिसका बहुत बड़ा हिस्सा टेलीविजन का दर्शक है । लेकिन मीडिया से प्रेरणा लेकर उस वर्ग में अब यही शैली अपनाने का प्रचलन बढ़ा है । एक बार एक ऐसी पार्टी में जाने का अवसर मिला जिसके आयोजक स्वयं को मध्यम वर्ग से उच्च वर्ग में स्थापित करने की छटपटाहट में दिख रहे थे । लिहाजा वे दोनों हर आगंतुक से गले मिलकर उनके गाल चूमकर अभिवादन करना चाहते थे और इसमें वे स्त्री-पुरुष जैसा कोई भेद नहीं रखना चाहते थे । लेकिन चूंकि आमंत्रितों में अधिकांश अभी भी मध्यम वर्ग में ही थे और उसी में बने रहना चाहते थे, उन्हें अभिवादन का यह तरीका पसंद नहीं आया । एक अधेड़ महिला ने तो यहां तक कह दिया, अरी बहु, बड़ी हूं तुमसे, पैर छू मेरे, ये क्या गले मिल रही है । पार्टी के आखिर में आयोजक ने निश्चित हीमिडिल क्लास मैन्टेलिटी को जमकर कोसा होगा ।

 

कहा जाता है कि मीडिया समाज का दर्पण है, जैसा समाज में घटेगा वैसा मीडिया में दिखेगा । लेकिन आज उल्टी है । आज मीडिया समाज को अभिप्रेरित और उत्प्रेरित कर रहा है । समाज का चिंतन, सोच, रहन-सहन, दैनंदिन जीवन इन सबको समंजित करने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है । दुख की बात यह है कि इतनी अहम भूमिका होने के बावजूद मीडिया बाजार के हाथों खेल रहा है और उपभोक्तावाद की खुली नुमाईश बनकर प्रस्तुत हो रहा है । यही कारण है कि मीडिया के जरिए हमारे सामने हमारी अपनी जड़ों से कटी हुई एक बनावटी संस्कृति पेश की जा रही है ।

 

प्रश्न यह है कि क्या इस तरह की बनावटी संस्कृति, जो हमारे खून में, हमारी परंपराओं में रची बसी नहीं है, ओढ़कर हम क्या किसी मुकाम पर पहुंच पाएंगे या फिर एक ऐसी अधकचरी संस्कृति का विकास करेंगे जो न हमें घर का छोड़ेगी न घाट का । ऐसी ही एक मजेदार बात याद करके हंसी आती है । एक मित्र के यहां उनके बेटे के जन्मदिन की पार्टी थी । अवसर चाहे बेटे के जन्मदिन का हो, मित्र अपनी आधुनिकता का प्रदर्शन करने से जरा भी नहीं चूकना चाहते थे । इसलिए पार्टी में सारे इंतजाम थे । डीजे था, आधुनिक खेल थे, कुछ एडल्ट गेम भी थे । यहां तक कि शौकिनों के लिएअलग से भी इंतजाम था । पार्टी शबाब पर पहुंचने के बाद केक काटा गया और हैप्पी बर्थ डे का गीत गाया गया ।  उसके तुरंत बाद वहां एक बड़े से डोंगे में गोल-गोल पकौडे़नुमा चीज लाई गई थी । बर्थ डे ब्वाय को कुर्सी पर बैठाकर उनके ऊपर से वे पकौड़े जिन्हें  ‘गुलगुले कहा गया न्यौछावर किए गए । उस आधुनिकता मेंगुलगुले कहीं फिट होते दिखाई नहीं पड़ रहे थे । पता चला कि बेटा पूरे खानदान का इकलौता लड़का है, लिहाजा पुराने रस्मों रिवाज को निभाने की अम्माजी यानी मित्र की माता जी की सख्त ताकीद थी । एक तरफ  ‘आधुनिकता के नाम सेअलग से इंतजाम और दूसरी तरफइकलौते लड़के के नाम से  ‘गुलगुले के जरिए परंपराओं की दस्तक । कहां मेल बैठा पाएंगे हम इन सबका । मन हो रहा था पूछने का कि क्या  अलग से पीने पिलाने का इंतजाम करने की भी ताकीद अम्माजी ने ही दी है ।

 

आधुनिकता को परंपरा के साथ मिलाकर प्रस्तुत करने की जो भोंडी कोशिश हमारे माध्यमों के जरिए हो रही है, उस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है । हम शालीनता और संस्कारों की सीमाएं लांघते जा रहे हैं । हमारी मान्यताओं, परंपराओं और संस्कृति पर निरंतर आधुनिकता, बाजार और उपभोक्तावाद के नाम पर आक्रमण होते जा रहे हैं । भीच का रास्ता निकलता परंपरा और आधुनिकता का मिलाजुला एक विद्रूप चेहरा सामने आ रहा है । टीवी पर इन दिनों चल रहे एक मोबाइल फोन के विज्ञापन में, जिसमें नवविवाहिता जोड़ा मोबाइल फोल को लेकर छीना-झपटी कर रहा है, मिश्रित संस्कृति का वह भोंडा चेहरा बखूभी देखा जा सकता है । वर्षों पहले रुक्मिणी-रुक्मिणी गाने को अश्लील करार देने वाले हमारे समाज को अपरिहार्यता में ऐसे विज्ञापन भी देखने पड़ रहे हैं, जो दुर्भाग्यशाली, चिंताजनक और भविष्य के लिए विनाशकारी है । संस्कृति पर यह आक्रमण किसी भी बड़े आतंकवादी खतरे से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है और उसे रोका जाना चाहिए ।

 

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(सच्चिदानंद जोशी - माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के संस्थापक कुलसचिव रहे, इन दिनों रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि में कुलपति हैं । संपर्क -ठाकरे विश्वविद्यालय कोटा स्टेडियम, रायपुर, छत्तीसगढ़)

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