दुनिया और ईश्वर से नाराज एक लेखकः
विभु कुमार
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Oविनोद
शंकर शुक्लO
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वरिष्ठ
नाटककार, समांतर कथा आंदोलन के चर्चित कथाकार एवं
‘हस्ताक्षर’
पत्रिका के यशस्वी संपादक विभु कुमार का गत 14 जनवरी 2007 को रायपुर में
निधन हो गया। विभु कुमार अपने लेखन में नाटक और कथा विधा के पारंपारिक ढांचे को
तोड़ने वाले साहित्यकार थे। छत्तीसगढ़ में नुक्कड़ नाटक के प्रथम पुरुष विभु
कुमार की प्रमुख कृतियों में तालों में बंद प्रजातंत्र, अपरिभाषित, कहे ईसा
सुने मूसा, हवाओं का विद्रोह, मुन्नीबाई, बेदरोदीवार का इक घर बनाना चाहिए (सभी
नाटक) सही आदमी की तलाश, मेरे साथ यह तो दिक्कत है, मां तुम कविता नहीं हो
(कहानी संग्रह) शामिल हैं। मीडिया विमर्श के अंक : 2 में उन्होंने विशेष रूप से
एक टिप्पणी लिखी थी। मीडिया विमर्श परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाजंलि सहित
उनके मित्र विनोद शंकर शुक्ल का उन पर लिखा गया यह आलेख प्रस्तुत है।
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संपादक
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विभु से फोन
पर मेरी बातचीत प्रायः इस तरह होती थी-
-कौन
?
-अबे, मैं
विभु !
-बोल साले
?
-तेरे सारिका
में प्रकाशित व्यंग्य पढ़ा।
-कैसा लगा
?
-निहायत घटिया
!
तुम साले प्रगतिशील लोग कभी अच्छा लिख भी सकते हो
?
-और तुम साले
दुर्गतिशील लोग, नींद खुलते ही प्रगतिशीलों को गाली देने का बहाना खोजने लगते
हो।
-बेटा
!
साहित्य का जितना शीलहरण प्रगतिशीलों ने किया है उतना तो बालीवुड के सारे
खलनायकों ने मिलकर नायिकाओं का भी नहीं किया होगा
?
-साले,
तुम्हारी गालियां गवाह हैं कि तुम प्रगतिशीलों का लोहा मानने के लिए मजबूर हो।
तुम्हारी गालियां हमारा उत्साहवर्धन करती हैं।
-खच्चर की दुम
!
गालियां तो कम हैं, तुम लोगों से गोलियों से बात करना चाहिए।
-चल छोड़,
प्रगतिशील पर बमबारी !
बता फोन क्यों किया ?
- मुझे तेरी
ताजी और धांसू व्यंग्य रचना चाहिए, ‘हस्ताक्षर’
के लिए।
-अबे अधम
!
प्रगतिशील रचना से तेरी पत्रिका अपवित्र नहीं हो जाएगी
?
-बेटा तू रचना
भेज। ‘हस्ताक्षर’
की गंगा अधर्मियों के नहाने से मैली नहीं होती
!
और जब तक मैं
रचना नहीं भेज देता वह मेरे पीछे पड़ा रहता। सामने कभी उसने मेरी किसी रचना की
तारीफ नहीं की, पर पीठ पीछे जरूर वह मेरी गिनती अच्छे व्यग्यकारों में करता
रहा।
विभू मेरे
कॉलेज के दिनों का दोस्त था। हमारी दोस्ती दुश्मनी से शुरू हुई थी।
हुआ यह कि
कॉलेज में एक दिन मैंने उसे अपनी साइकिल से हवा निकालते पकड़ लिया। गुस्से से
मैंने उसकी कालर पकड़ ली और पूछा-यह क्या बदतमीजी है
?
वह डरा नहीं,
ढिठाई से बोला-कालर छोड़ो, यह तुम्हारी नहीं मुरारी की साइकिल है।
मैंने तेज
स्वर में कहा-क्या मैं अपनी साइकिल नहीं पहचानता
?
फिर किसी की भी साइकिल हो, हवा निकालना कौन सी शराफत है
?
विभु बोला-
हरामियों के साथ हरामीपन से ही पेश आना चाहिए। इससे शराफत को कोई नुकसान नहीं
पहुंचता ।
मैंने
कहा-क्या मतलब ?
क्या हरामीपन हुआ है तेरे साथ ?
बता । नहीं तो मैं तेरी हवा निकाल दूंगा
?
विभु
बोला-मुरारी ने आज फिर मुझे गाली दी। अष्टावक्र कहा। वह ब्राह्मण पारा का दादा
है। सीधे मैं उससे उलझ नहीं सकता, इसलिए हवा निकाल रहा हूं।
मुरारी
मिश्रा कॉलेज का प्रसिद्ध दादा था। छात्र-छात्राओं से सलामी लेना उसका प्रिय
शगल था। ऐसा न करने वाले पिटाई का शिकार होते थे। वह मुझसे भी एक-दो मुठभेड़ कर
चुका था । विभु ने भी शायद सलामी न देने का खामियाजा भुगता था।
हाथों की
विकलांगता के बावजूद विभु की यह साहसिकता मुझे भा गई। मैंने कहा-वाह, मेरे शेर
!
बदला लेने का तरीका बढि़या है। मुरारी की साइकिल मैं पहचानता हूं । चलो तुम हवा
निकालो, मैं सीट कव्हर निकालता हूं।
विभु
बोला-चुप्पी को मैं अत्याचार करने वालों का समर्थन मानता हूं। हरामियों का जैसे
भी हो प्रतिकार करना चाहिए।
इस प्रकार
दुश्मनी से हमारी दोस्ती शुरू हुई । विभु में एक बड़ी खासियत थी। शरीरिक
अशक्तता के बावजूद वह किसी से डरता नहीं था। दुश्मनों से बदला लेने का कोई न
कोई तरीका खोज ही लेता था । बाद में पता चला वह कवि भी है। मैंने भी उन्हीं
दिनों कहानियां लिखने की शुरूआत की थी। साहित्य प्रेम ने हमें ज्यादा निकट ला
दिया। हम जल्दी ही पक्के दोस्त बन गए। दोस्ती का यह सिलसिला अनेक उतार-चढ़ाव के
साथ मृत्यु तक चलता रहा।
विभु क्लास
में भी चुप नहीं बैठ सकता था। विरोध उसके व्यक्तित्व का अविवार्य हिस्सा था ।
वह अध्यापकों को भी नहीं बख्शता था। क्लास में सवाल यों उठता था जैसे विधान सभा
में प्रतिपक्षी विधायक उठाते हैं। एक बार हिन्दी के एक अध्यपाक से उसने
पूछा-प्रेम गीत लिखने के लिए क्या इश्कबाजी उठाते हैं।
सारी
कक्षा खिलखिलाकर हंस पड़ी थी। व्यख्यान में व्यवधान से अध्यापक नाराज हो गए थे।
उन्होंने विभु को फटकारते हुए कहा था-पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए जितना पढ़ाना
चाहता हूं, तुम्हारे बेतुके सवालों के कारण पढ़ा नहीं पता । इस प्रश्न का उत्तर
किसी कवि से जाकर पूछो।
एक बार
तुलसीदास पर विशेषज्ञता का दावा करने वाले एक अध्यापक से उसने पूछा था-सर
!
तुलसीदास ने रामकथा पूरी क्यों नहीं लिखी
?
उत्तरकांड में राम के राज्याभिषेक के बाद समाप्त क्यों कर दी
?
सीता वनवास, लवकुश जन्म, शम्बूक की हत्या जैसे प्रसंग तो उन्होंने छोड़ ही दिए
?
विशेषज्ञ अध्यापक ने परंपरागत उत्तर दुहरा दिया-भारतीय परंपरा सुखांत की है।
हमारे यहां रचना का अंत सुखद होता है। तुलसी ने इसी परंपरा का पालन किया है।
विभु
संतुष्ट नहीं हुआ। उसने कहा-यह महाकवि की चालाकी है। राम की पक्षधरता है।
उन्होंने उनके नायकत्व तक की कथा को महत्व दिया। सीता परित्याग और शम्बूक-वध
जैसे खलनायक के आचरण से उन्हें साफ बचा ले गए।
अध्यापक चिढ़ गए। बोले-बहुत बेहूदा सोच है। तुलसी जैसे महाकवि की प्रतिभा पर
शंका करते हो ?
ऐसे फालतू प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं है।
विभू अक्सर
झुंझला जाता था। क्लास छूटने पर कहता था- साले कुछ जानते नहीं और बन गए
प्रोफेसर !
एकाध दिन भरी क्लास में पूछ दूंगा कि किस गधे ने आपको प्रोफेसर बना दिया
?
हिन्दी में
एमए करते हुए विभु घनघोर कविताएं लिखने लगा था। साफ-सुथरे अक्षरों में कविताओं
से भरी उसकी डायरी देखकर डर लगता था। पता नहीं, डायरी से निकल कर कब कविताएं
बरसने लगें।
कभी-कभी उसे
फिल्मों में गीत लिखने की सनक भी सवार हो जाती थी। शैलेन्द्र के लिखे किसी गीत
की भनक पड़ते ही वह उन्मादी हो जाता था।
‘गर्दिश
में हूं आसमान का तारा हूं’,
‘बरसात
में हमसे मिले तुम’,
‘मैं
नदिया फिर भी मैं प्यासी’,
‘सब
कुछ सीख हमने न सीखी होशियारी’
जैसे गीतों पर दिलोंजान से फिदा था। कहता था- फिल्मी गीतकारों में अकेला
शैलेन्द्र है, जिसके गीतों में साहित्य महकता है।
मैं
मजाक करता- अबे उलूक शिरोमणि !
शैलेन्द्र प्रगतिशील है, उस पर क्यों कुर्बान हो रहा है
?
विभु कहता-जरूरी नहीं कि हर प्रगतिशील से मैं नफरत करूं। शैलेन्द्र जैसा
कोई-कोई प्रगतिशील मुझे प्यारा भी लगता है।
विभु एक नंबरी
कंजूस था। हाफ चाय के लिए भी मुश्किल से अंटी ढीली करता था । एक बार हमने उसकी
फिल्मी गीत लिखने की कमजोरी का फायदा उठाया। हमारे एक मित्र सचित पाध्ये ने
भिलाई के एक परिचित को फिल्म निर्देशक के रूप में उसके सामने खड़ा कर दिया।
कहा- ये रामचेतन हैं । फिल्म निर्देशक । बस्तर में लोकेशन की तलाश में आए हैं।
ये अच्छा गीतकार भी खोज रहे हैं। चलो, मेलरोज में बैठते हैं। वहीं चाय-नाश्ते
के साथ तुम अपने गीत भी दिखा देना।
विभु
तुरंत तैयार हो गया। हमने पहले जमकर जलपान किया। फिर विभु से गीत दिखाने कहा।
कथित रामचेतन ने डायरी से तीन गीत पसंद किए । कहा बाकी तीन साहिर से लिखवाना
है। बम्बई लौटते ही बुलावा भेजूंगा। गीतकार के रूप में आपका भविष्य उज्जवल है।
विभु
ने खुशी-खुशी भारी-भरकम बिल पटाया। फिर बोला-ऐतराज न हो तो घर चलें। कुछ
पीना-पिलाना भी हो जाए !
रामचेतन ने
कहा-नहीं, मुझे अपने घर जल्दी भिलाई लौटना है। विभु ने सशंकित दृष्टि से हमें
देखा । बोला-आप तो लोकेशन खोजने बस्तर जा रहे हैं
?
सचित ने
स्थिति संभाली। बोला-भिलाई में इनके अंकल रहते हैं। ये उनसे मिलकर बस्तर
जाएंगे। विभु आश्वस्त हो गया। वह इतना खुश था कि जैसे बैठे-ठाले जन्नत मिल गई
हो। वह उछल-उछलकर चारों दिशाओं में यह खुशखबरी बिखेरने लगा ।
तीसरे दिन
हममें से ही एक मित्र ने उसके सामने सत्य प्रकट कर दिया। सदमें से विभु बीमार
पड़ गया । हमने सुना तो मिजाजपुर्सी के लिए उसके घर पहुंचे । हमें देखते ही वह
खाट पर पड़े-पड़े चीखा- मैंने दोस्तों की सूची से तुम लोगं का नाम काटकर
दुश्मनों की सूची में लिख लिया है। फौरन दफा हो जाओ हरामियों । इस घटना के बाद
एक साल तक उसने हमसे बात नहीं की।
1978 में
मध्यप्रदेश के अशासकीय महाविद्यालयों के अध्यापकों की राज्यव्यापी हड़ताल हुई ।
कोषागार से वेतन भुगतान मुख्य मांग थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्र कुमार
सकलेचा ने बातचीत के लिए शिक्षक नेताओं को भोपाल आमंत्रित किया। प्रतिनिधि मंडल
में मैं और विभु भी शामिल थे।
सकलेचा
जी ने नियत समय पर हमें चेम्बर में बुला लिया । पर सामने खड़े शिक्षकों की ओर
नजर उठाकर देखा तक नहीं। वे फाइल देखने में मशगूल रहे। हम सभी बैठने के आग्रह
के इंतजार में सामने खड़े थे। दो मिनट की इंतजारी के बाद विभु उत्तेजित हो गया।
टेबल ठोककर उसने मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित किया और ऊंची आवाज में बोला-
कैसे मुख्यमंत्री हैं आप ?
शिक्षकों का सम्मान करना तक नहीं जानते
?
मुख्यमंत्री
ने तमतमाए चेहरे से विभु को देखा। मुश्किल से अपने को संयत किया और कहा-
बैठिए...बैठिए, मैं आपसे सम्मानपूर्वक बैठने का आग्रह करता हूं।
सकलेचा की
गिनती कड़े मुख्यमंत्रियों में होती थी। पूर्व मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद
मिश्र को लौह-पुरुष तो सकलेता को मजाक में उप-लौहपुरुष कहा जाता था। उस दिन
विभु न होता तो हमें देर तक मुख्यमंत्री के सामने अपमानित खड़े रहना पड़ता।
सकलेचा जी अपने मंत्रियों तक को कड़ा रखने के लिए कुख्यात थे। लौह-पुरुष कहलाने
के लोभ में उन जैसे कई सत्ताधीश सभ्यता को भी श्रद्धांजलि दे बैठते हैं।
विभु दुस्साहस
की किसी भी सीमा तक जा सकता था। एक बार हम जयस्तंभ चौक में टकरा गए। उसने
अबे-साले वाले स्वाभाविक संबोधन से मुझे बुलाया। बोला-आज मेरे राशिफल में किसी
प्रगतिशील से चाय पीने की बात लिखी है।
मैने कहा-आज
तो जैब खाली है। जो पैसे थे, उनसे पत्रिकाएं खरीद ली हैं।
विभू बोला-तुम
कामरेडों में यही बड़ा दुर्गुण है। कभी एक्स्ट्रा पैसे लेकर नहीं चलते। चलो आज
मैं चाय पिलाता हूं।
इस बीच एक
अंधे भिखारी ने हमारे सामने कटोरा बढ़ा दिया
‘अल्लाह
के नाम पर कुछ मिल जाए मालिक।’
विभु ने
अठन्नी कटोरे में डाल दी । यह पहला मौका था, जब उसने अपनी ओर से चाय का आमंत्रण
दिया था । भीख देते भी उसे आज मैंने पहली बार देखा था।
रेस्तरां से
चाय पीकर हम बाहर निकले तो पास ही पान दुकान से उसने दो गोल्ड फ्लैक की सिगरेट
मांगी। मैं चकित भाव से उसे देखते रहा गया। पूछा- पनामा से गोल्ड फ्लैक
?
आखिर आज माजरा क्या है ?
विभु
मुस्कुराया। बोला- बेटा सुनकर जल जाओगो। कल से मैं लेक्चरर के रुप में दुर्गा
कॉलेज ज्वाइन कर रहा हूं।
मैंने कहा- तू
और लेक्चरर ?
मतलब दुर्गा कॉलेज के बुरे दिन शुरु हो गए
!और
बेटा, इतनी बड़ी उपलब्धि और इतना छोटा जश्न?
विभु बोला-
साले बड़े जश्न तो तुम लोगों को करना पड़ेगा । वरना मुझे पता कैसे चलेगा कि तुम
लोग सचमुच खुश हो ?
पान वाले को
पैसा देते समय आठ आने कम पड़ गए। विभु बोला-कल ले लेना।
पानवाला बोला-
कल देने वाले दोबारा नहीं आते । पूरे पैसे दीजिए।
हम सिगरेट
सुलगा चुके थ। आने-जाने वाले किसी परिचित को ढूंढना चाहा पर कोई दिखा नहीं। ठीक
है, अभी देता हूं, कह कर विभु उस ओर बढ़ने लगा, जहां अंधा भिखारी अब भी खड़ा
था। विभु का इरादा भांपते मुझे देर नहीं लगी। वह कटोरे से अठन्नी उठाकर कह सकता
था- मैंने ही अभी दी थी । उधार ले रहा हूं । वापस कर दूंगा।
मैंने उस पकड़
लिया । कहा- साले पानवाले के मुंह पर यह हाथधड़ी मार देते हैं। पैसा चुकाकर ले
लेंगे । तू कोई ऐतिहासिक काण्ड मत कर !
पानवाला बोला-
बाबूजी, घड़ी-वड़ी की जरूरत नहीं। जब मर्जी हो पैसा दे जाइएगा।
विभु का मूड
बिगड़ गया था। वह सिगरेट फेंककर मुझसे बोला- तू इसका पैसा दे देना । आज के बाद
मैं इस दुकान पर मूतने भी नहीं आऊंगा।
विभु कुमार एक
बेचैन और विद्रोही लेखक था । समय और समाज की पैचीदगियों को समझे बिना उसे नहीं
समझा जा सकता था। उसके सहपाठी और वरिष्ठ कथाकार रमाकांत श्रीवास्तव ने ठीक लिखा
है- ‘विभु
ने अपनी शारीरिक कमी को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। बल्कि उसकी
क्षतिपूर्ति उसने एक तूफानी और बैबाक शख्सियत बनाकर की।’
बुनियादी तौर
पर वह एक नाराज लेखक था। पाखण्ड और पोंगापंथ की छीटी-छीटी खबरों से उद्विग्न हो
जाता था। उसकी बेबाक गालियां वर्तमान बीमार व्यवस्था और उसे स्वीकार करने वालों
की भीरू मानसिकता पर करारा व्यंग्य थी। बेबाक बयानी के कारण मित्रों से भी उसके
संबंध सहज नहीं रह पाते थे। आखिरी पांच-सात वर्षों में तो वह निरंतर अकेला होता
चला गया था। मौत के कुछ हफ्ते पहले वह मेरे पास आया था । सहज आदतवश मैंने उससे
कहा- आओ, छत्तीसगढ़ में नुक्कड़ नाटक के आदि पुरुष
!
और राज्य के साहित्य में अराजकता के प्रथम नागरिक
!
किंतु इस बार
पलटकर उसने उल्टा वार नहीं किया। निराशा भरे शब्दों में बोला- अब तो मैं
साहित्य का निर्वासित नागरिक हूं। दोस्तों ने भी दोस्ती से बदर कर दिया है।
संबंधियों को भी मरी जरूरत नहीं रही। भय, तनाव और असुरक्षा ने जरूर अभी मेरा
साथ नहीं छोड़ा है। सब तरफ अन्तर्रात्मा रहित लोग दिखाई पड़ते हैं। समझ नहीं
पाता कि ईश्वर ने दुनिया बनाई है या नर्क
?
वह गहरे अवसाद में था। उससे कुछ भी कहना व्यर्थ था । कुछ नहीं सुझा तो मैने
कागज पर चंद पंक्तियां लिखी और जेब में डालकर कहा- इन्हें घर जाकर पढ़ना। वे
ब्लेक नामक विदेशी कवि की पंक्तियां थीं-
मनुष्य बनाया
गया है, सुख और दुख के लिए
और जब हम यह
सत्य समझ लेते हैं
तो हमारी
सांसारिक यात्रा में असुरक्षा नहीं होती
सुख और दुख से
बना
यह सुंदर
वस्त्र है यह जीवन
हरेक दुख और
शोक के नीचे
छुपा है एक
सुख का सिल्कन धागा ।
पता नहीं उसने
पंक्तियां पढ़ी थीं या नहीं ?
क्योंकि कुछ ही दिनों बाद वह अनंत यात्रा पर अचानक निकल गया। शायद अपने तनावों
का ईश्वर से हिसाब मांगने या शायद ऐसी बेढंगी दुनिया और बेईंसाफ आदमी बनाने के
लिए ऊपर वाले से झगड़ा करने !
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विनोदशंकर शुक्ल -वरिष्ठ
व्यग्यकार,शासकीय
छत्तीसगढ़
स्त्रतकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी और पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष रहे हैं।
व्यंग्य की
अनेक पुस्तकें
प्रकाशित। संपर्कः 35, मेघ मार्केट के सामने, विवेकानंद वार्ड, कोतवाली
रोड, रायपुर, छत्तीसगढ
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