Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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मेरा समय

 

क्या भूलूं,  क्या याद करूं ?

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 स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी

 

पीछे मुड़कर देखता हूं तो समझ में नहीं आता कि क्या भूलूं क्या याद करूं । उस समय के दौर में और आज के दौर में जमीन-आसमान का अंतर है । लेकिन इसे लेकर मेरे मन में कोई मलाल नहीं । मैं इस बात से खुश हूं कि मैंने अपना काम बेहतर ढंग से किया। आज भी एक सार्थक जीवन जीने की कोशिश में लगा रहता हूं । नए लोगों को पढ़ता हूं और अपनी शुभकामनाएं देता हूं । मुझे संतोष है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस युग में भी पढ़ने-लिखने की संस्कृति बची हुई है । खैर ।

 

मेरे पूर्वज उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले से 180 वर्ष पूर्व रायपुर आए और फिर यहीं के होकर रह गए। पितामह शिवगोविंद त्रिवेदी रायपुर के नामवर व्यापारियों में एक थे । वे व्यायाम-प्रिय भी थे । धर्मप्राण भी थे । मेरे पिता श्री गयाचरण त्रिवेदी आर्य समाजी थे । उनमें प्रगतिशील चेतना कूट-कूट कर भरी हुई थी । राष्ट्रवादी तो खैर थे ही । 1930 को नमक सत्याग्रह में पं. रविशंकर शुक्ल, सेठ गोविंद दास, मंहत लक्ष्मीनारायण दास, पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र जैसी शख्सियतों के साथ मेरे पिता भी शरीक हुए थे । मेरे पिता उस समय के वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार कन्हैयालाल वर्मा के बाल सखा थे । उनकी संगत का असर पिताजी पर भी पड़ने लगा और पिताजी साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में गहरी रुचि लेने लगे । उस वक्त जब प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ा तो पिताजी अपने कुछ साथियों के साथ नयापारा मुहल्ले में रोज उस वक्त की महत्वपूर्ण खबरों को एक ब्लैक बोर्ड पर चस्पा कर दिया करते थे ।

 

जब मेरा जन्म हुआ तब देश स्वतंत्रता के लिए छटपटा रहा था । देश में  ‘स्वराज्य प्राप्त करने के लिए संघर्ष हो रहा था । जलियावाला कांड के कारण देश में जबर्दस्त गुस्सा था । तिलक जी का नारा  ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है मंत्र की तरह गूंज रहा था ऐसे समय में जब मेरा जन्म हुआ तो पिताजी ने मेरा नाम स्वराज्य रख दिया । एक दौर ऐसा भी आया जब लगा कि देश आजाद होने वाला है। उसी वक्त पिताजी की तीसरी संतान के रूप एक पुत्री का जन्म हुआ। तब उन्होंने उसका नाम स्वाधीन कुमारी रख दिया । चौथी संतान भी पुत्री हुई। उस वक्त गांधी-इरविन समझौता हुआ था। उस समय राष्ट्रीय आंदोलन स्थगित हो गया था तो पिताजी ने पुत्री का नाम शांतिकुमारी रख दिया। आज जब मैं अपने पिता की सोच को याद करता हूं तो रोमांचित हो उठता हूं । ऐसी राष्ट्रवादी भावना दुर्लभ है।

 

1931 में पिताजी नहीं रहे। तब मुझे लगा कि उन्होंने राष्ट्रीयता एवं साहित्य-सृजन की धरोहर मुझे सौंप दी है। मुझे उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना चाहिए। बस, यही सोचकर मैं धीरे-धीरे साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में कदम बढ़ाता गया। पिताजी के जाने के बाद मां का स्नेह मेरे साथ था। उन्होंने मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसके पीछे मेरी मां का अथक श्रम ही है।

 

मैं स्कूल के समय से ही सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय हो गया था। मंचों पर भाषण देने लगा था। तीसरी कक्षा में था तब मैंने शिवाजी पर भाषण दिया था। यह मेरे जीवन का पहला भाषण था। ऊंचाई कम थी इसलिए मुझे स्टूल पर खड़ा किया गया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरा भाषण सुनकर बड़े लोगों ने मुझे जी खोलकर शाबाशी दी थी। इसके बाद तो मैं अक्सर गणेशोत्सव और अन्य आयोजनों मे सक्रिय रूप से भाग लेने लगा। मुझे पुरस्कार भी मिलने लगे। मेरा हौसला बढ़ने लगा। लेकिन मैं पढ़ाई में भी अव्वल रहा। मैंने चौथी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी।

 

पिताजी राष्ट्रवादी थे । अंग्रेज सरकार यह जानती थी इसलिए मुझे किसी सरकारी स्कूल में प्रवेश नहीं मिला। तब पिताजी ने नगर निगम द्वारा संचालित लारी स्कूल (अब माधवराव सप्रे शाला) में भर्ती कर दिया। आठवीं की परीक्षा के दौरान पिताजी की तबीयत खराब हो गई तो मुझे उनकी देखभाल करनी पड़ी । फिर भी मैं प्रथम श्रेणी में पास हुआ।

 

पिताजी से साहित्य के संस्कार मिले ही थे। इसलिए बचपन से ही मैंने कविता लिखनी शुरू कर दी थी। जब मैं नवमी में था, तब एक कविता लिखी थी, जो नागपुर के साप्ताहिक हिंदवाणी में छप गई। इससे उत्साह द्विगुणित हो गया। फिर धीरे-धीरे देश की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं छपने लगीं। ऐसी दीवानगी थी कि कक्षा में बैठे-बैठे पढ़ाई नहीं, दिमाग में कविता उमड़ती रहती थी। उस वक्त रायपुर में उच्च शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। मैंने कानपुर सनातन धर्म कॉलेज में प्रवेश लिया। यहां मेरे साहित्यिक रूप में और ज्यादा निखार आने लगा। बात 1938 की है। तब रायपुर में योगानंदम जी ने छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना की तो मैं वापस रायुपर आ गया । और बीए में प्रवेश लिया । चार साल तक मैं इस कॉलेज में रहा और हर वर्ष प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण की। मेरी साहित्यिक रुचि देखकर कांग्रेस कमेटी ने मुझे अपने साप्ताहिक पत्र कांग्रेस पत्रिका के संपादन का मौका दिया। हिन्दी साहित्य मंडल की पत्रिका आलोकके संपादक मंडल में भी रहा। मुझे छत्तीसगढ कॉलेज के छात्र संघ का अध्यक्ष भी बनाया गया।

 

कॉलेज में छात्र राजनीति का अपना महत्व होता है। मैं छात्रों का नेता था । एक दिन एक छात्र और प्राचार्य के बीच विवाद हो गया । हड़ताल की नौबत आ गई । मैं छात्र संघ अध्यक्ष था । मुझे और कुछ साथियों को कॉलेज से निकाल दिया गया । बाद में समझौता होने पर दुबारा प्रवेश भी मिल गया लेकिन छात्र राजनीति एवं अन्य गतिविधियों में बेहद सक्रिय होने के कारण पढ़ाई पर विपरीत असर पड़ने लगा । 1942 में नागपुर विश्ववविद्यालय से बीए परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास की ।

 

गांधीजी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू कर दिया था । उस आंदोलन का इतना गहरा असर हुआ कि मैंने एमए हिंदी की पढ़ाई बीच में ही स्थगित कर दी और फिर पूरी तरह से आजादी के संघर्ष में ही कूद पड़ा । चाहता तो जमाजमाया व्यवसाय था । उसे देख सकता था लेकिन मन तो कहीं और था । 20 जून 1942 को केशबप्रसाद वर्मा जी ने साप्ताहिक अग्रदूत का प्रकाशन शुरू किया । मैं उससे जुड़ गया । एक महीने बाद ही सहायक संपादक के रूप में मेरा नाम प्रकाशित होने लगा । मेरे भीतर के लेखक-पत्रकार को दिशा देने में अग्रदूत की महत्वपूर्ण भूमिका थी । सामयिक विषयों पर मैंने अनेक महत्वपूर्ण टिप्पणियां लिखीं । कर्मवीर के प्रथम पृष्ठ पर भी मेरी एक कविता छपी ।

 

1942 के आंदोलन में मेरी भागीदारी थी । मैं अग्रदूत में लिखता भी था इसलिए एक बार मेरे घर की तलाशी लिगई । लेकिन किसी भी तरह की आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली । यह मेरी सावधानी का नतीजा था । लेकिन जब कुछ ज्यादा दबाव बनने लगा तो मजबूरी में रायपुर छोड़ना पड़ गया । और मैं सागर जाकर जैन हाई स्कूल में अध्यापन कार्य करने लगा । लेकिन यहां भी राष्ट्रवादी गतिविधियां जारी रहीं । ये और बात है कि मैं बेहद सतर्क होकर काम करता रहा इसलिए गिरफ्तारी न हो सकी । 1945 में रायपुर वापस आ गया और लारी हाई स्कूल में ही शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गई ।

 

उस दौर में प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी प. रविशंकर शुक्ल तब जेल में थे । जब वे बाहर निकले तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम साप्ताहिक महाकोशल का संपादन करो । अंधा क्या चाहे दो आंख । बस, मैंने शिक्षकीय पेशे को तिलांजलि दे दी और एकबार फिर पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हो गया । 1 जनवरी 1951 को महाकोशल दैनिक हो गया । तब भी संपादन किया । एक दिन प्रकाशन विभाग से मेरे पास प्रस्ताव आया कि आप जनसंपर्क अधिकारी का पद स्वीकार कर लें । मन में अंतर्द्वंद्व था कि क्या किया जाए लेकिन अंततः मैंने स्वीकार कर लिया । इसके साथ ही जीवन की दिशा ही बदल गई । कहां  ‘महाकोशल का बेबाक लेखन, कहां सरकारी नौकरी की अपनी सीमाएं । फिर भी मैंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया और उपसंचालक पद तक पहुंचकर 1978 को संवानिवृत्त हो गया ।

 

 मैं इसे सौभाग्य ही मानता हूं कि सरकारी सेवा से मुक्त होने के बावजूद मेरे लिए असरकारी सेवा के रास्ते खुले हुए थे । मैं एक बार फिर महाकोशल के संपादक के रुप में कार्य करने लगा । 1979 से 1982 तक महाकोशल का संपादन किया । 1983 में अग्रदूत दैनिक हो गया तो मैं सलाहकार संपादक के रुप में अग्रदूत से जूड़ गया । 1998 से 2002 तक ग्रदूत के भोपाल संस्करण से सम्बद्ध रहा । और सामयिक विषयों पर लिखते हुए अपने पत्रकारीय धर्म का निर्वाह करता रहा ।

 

नया  दौर....नई समझ....

इस तरह यह था मेरी पत्रकारीय जिंदगी का संक्षिप्त इतिहास । लेकिन पत्रकारिता के जीवन में रंग भरने के लिए मैंने साहित्य का सहारा भी खूब लिया । मेरी यह मान्यता रही है कि साहित्य और पत्रकारिता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । इन्हें अलग नहीं किया जा सकता । लेकिन आज की पत्रकारिता देखता हूं तो निराशा होती है । नए पत्रकार साहित्य से दूर भागते हैं । उन्हें पत्रकारिता में ही रस मिलता है । साहित्य को वे अछूत समझते हैं जबकि साहित्य के कारण लालित्यपूर्ण भाषा के स्वामी बन सकते हैं। लेकिन कोई समझे तब न । कोई सीखना ही नहीं चाहता । पुरानी पीढ़ी से मार्गदर्शन लेना अपनी तौहीन समझता है । इसका दुष्परिणाम सामने है । आज अखबारों में छपने वाली भाषा देखकर निराशा होती है। अब तो नई भाषा ही विकसित होने लगी है- हिंग्लिश। हद है यह । हिंदी में अंगरेजी की घुसपैठ हो रही है। आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना था। गाधी जी की वह कल्पाना तो साकार न हो सकी, उल्टे हिंदी को भ्रष्ट करने की कोशिश शुरू हो गई है। इस अपसंस्कृति के विरुद्ध एक वैचरिक संघर्ष शुरू कर सकें। नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली नौजवानों से तो आशा की जा सकती है, लेकिन उनकी उदासीनता देखकर निराशा होती है।

 

मैं अपने जीवन को सक्रिय और शुचितापूर्ण बनाए रखूं, यही बहुत है। आज मेरे पास अनुभव एवं सर्जना का खजाना है लेकिन यह किस काम का ? पचस से ज्यादा कहानियां हैं। सौ से ज्यादा गीत हैं। दो- तीन नाटक भी हैं। एक-डेढ हजार संपादकीय हैं जो मैंने महाकोशल और अग्रदूत में लिखे। माधुरी, कर्मवीर,शुभचिंतक और आलोक जैसी पत्रिकाओं में भी अनेक रचनाएं छपती रहीं । देवकुमार नाम से भी मैंने अनेक कविताएं लिखीं। वीर हरदौल (खंड काव्य) के साथ कविताओं की कुछ पांडुलिपियां भी हैं। अपनी एक कविता मुझे याद आ रही है। आँसू-

आँसू मन का पीर, व्यथा का छाया।

आँसू मन की तरह वेदना की सजीव-सी काया।

 

मेरे साथ दिक्कत यही थी कि अनेक रचनाओं की पांडुलिपियां मुझसे इधर-उधर हो गई।अघोर भैरव, शल्य कुमार और त्रिशूल जैसे छह्म नामों से मैंने अनेक व्यंग्य लिखे। कुछ की कटिंग तो शायद आज भी सुरक्षित है लेकिन कुछ रख-रखाव के अभाव में खो गईं। हालांकि सौभाग्य की बात है कि मेरी कुछ व्यंग्य रचनाओं का संकलन भाषण के पौधे हरियाए शीर्षक से प्रकाशित हुआ।

 

मुझे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे बड़े साहित्यकार के साथ काम करने का सौभाग्य मिला। वे महाकोशल का साहित्य संपादन करते थे। महाकोशल से विश्वनाथ वैशम्पायन भी जुड़े थे। वैशम्पायन जी चन्द्रशेखर आजाद के निकट सहयोगी रह चुके थे। महाकोशल और अग्रदूत में कार्य करते हुए मैंने पत्रकारिता की दुनिया को अपना श्रेष्ठ देने की कोशिश की। पुराने लोग मेरे कामों से परिचित हैं। नए लोगों को शायद इससे कोई मतलब भी नहीं कि कोई स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी नामक पत्रकार-साहित्यकार हमारे बीच मौजूद है। उसके पास जाएं और कुछ सीखने या जानने की कोशिश करें। बचपन में मुझे केशव प्रसाद वर्माजी का मार्गदर्शन मिला। महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी से भी दो-तीन बार भेंट हुई। पं. रविशंकरशुक्ल का भी मार्गदर्शन मिला। लेकिन अब नई पीढ़ी के लेखक-पत्रकार मार्गदर्शन लेने से बचते हैं। इसीलिए उनका समुचित विकास भी नहीं हो पाता।

 

पत्रकारिता के मूल्य...

वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारिता के चरित्र को देखता हूं तो निराशा होती है। पत्रकारिता का नैतिक दृष्टि से स्वर्णिम काल जैसे बीत चुका है। तकनीकी दृष्टि से विकास हुआ है लेकिन नैतिक पराभव साफ-साफ दीखता है। पं. श्यामाचरण शुक्ल जी अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके पिताजी के अखबार दैनिक महाकोशल की एक समय तूती बोलती थी। वह मुख्यमंत्री का अखबार था। लेकिन उसे सरकारी विज्ञापन नहीं मिलते थे। सत्ता और पत्रकारिता के उस वक्त के मूल्यों को इस उदाहरण से आसानी के साथ समझा जा सकता है। अब तो सारी मशक्कत विज्ञापन पाने के लिए ही होती है। विज्ञापन और दूसरे तरह के लाभ के लिए लालायित पत्रकारिता को देख कर निराशा होती है। केशव प्रसाद जी के समय कलम आग उगलती थी। कुमार साहू जैसे पत्रकार आज भी सक्रिय हैं। वे मेरे साथ काम कर चुके हैं।

 

पत्रकारिता में अब प्रबंध का सिक्का चलता है। यह स्वाभाविक है। जो पैसे लगाएगा, वह व्यवसायी ढंग अपनाएगा। पहले संपादक आल इन वन होता था लेकिन अब विशेषज्ञों का दौर है। हमने वह दौर भी देखा है, जब खुशवंत सिंह इलेस्ट्रेटेड वीकली के संपादक थे। एक दिन जब वे दफ्तर आए तो उनके कमरे के बाहर ताला लटका दिया गया था। खैर।

 

कितनी बातें याद करूं ? बहुत कुछ है कहने को । किस-किस बात का रोना रोऊं । मुझे बस इसी बात का संतोष है कि मैंने जब होश संभाला पत्रकार था। लेखक ता। अब मरते दम तक पत्रकार ही रहूंगा। नए लोगों के लिए बस यही कहना चाहता हूं कि तुम्हारे सामने दबाव है। चुनौतियां हैं लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता मत करो। परम्परा का आदर करो। तकनीकी विकास के साथ माननवीय मूल्य भी जीवित रहें। पत्रकारिता की वह परम्परा भी जीवित रहे, जिसे माखनलाल चतुर्वेदी, गांधी जी, विद्यार्थी जी जैसे मनीषियों ने आगे बढा़या । पत्रकार पतत् अध्ययनशील बनें। बस।

 

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।। स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी

जन्मः  21 मई 1920 शिक्षा : स्नातक  पत्रकारिता-लेखन : 1933 से अब तक जारी  कार्यक्षेत्र :  कांग्रेस पत्रिका (1939-40) में संपादन सहयोग।  अग्रदूत एवं महाकोशल का संपादन । मप्र शासन के जनसंपर्क विभाग में चौबीस वर्ष तक कार्य करने के बाद उपसंचालक पद से सेवानिवृत । सेवानिवृत्ति के बाद दुबारा महाकोशल एवं अग्रदूत का संपादन । कृतियां : 1. भूख (कविता संग्रह)  2. भाषण के पौधे हरियाए (व्यंग्य रचनाएं) । वीर हरदौल (खंड काव्य), कनेर के फूल (गीत संग्रह) समेत अनेक पांडुलिपियां अप्रकाशित । विशेष : पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी : व्यक्तित्व एवं कृतित्व विषय  पर डॉ. क्रांति कुमार सिन्हा को पीएचडी की उपाधि । सम्मान :1. मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल  2. लघु समाचार पत्र संघ, रायपुर 3. लाल बल्देव सिंह स्मृति सम्मान, भोपाल  4. मप्र समाचार संपादन लंघ द्वारा 5. झाबरमल शर्मा स्मृति सम्मान  6. प्रभास प्रकाशन, बिलासपुर 7. सृजन प्रकाशन, रायपुर आदि । परिवार : पिताश्री श्री गयाचरण त्रिवेदी माता श्रीमती कला देवी धर्मपत्नी श्रीमती शांतिदेवी त्रिवेदी भ्राता स्वतंत्र प्रसाद त्रिवेदी बहिनें शांति त्रिवेदी, पुत्र - डॉ. सुशील त्रिवेदी, सुधीर त्रिवेदी, सतीश त्रिवेदी, शैलेन्द्र त्रिवेदी पुत्रियां सरिता त्रिवेदी, सीमा द्विवेदी, स्व.शशि मिश्रा  । संपर्क : आफीसर्स कॉलोनी, देवेन्द्र नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़)

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रवंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

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