बनी रहेगी सामाजिक महत्ता
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डॉ. श्रीकांत सिंह
वह
व्यक्ति जो समाचार पत्र/पत्रिका में सभी सामग्री के चयन को नियंत्रित करता है,
संपादक कहलाता है। सुप्रसिद्ध विद्वान एवं चिंतक कार्लाइल ने कहा है कि
“पत्र
संपादक सच्चे सम्राट एवं धर्मोपदेशक होते हैं।”
कार्लाइल ने अपने विचार में जहां संपादक को सम्राट कहकर पद के गौरव की तरफ संकत
किया है, वहीं उसे धर्मोपदेशक की संज्ञा देकर उसके नैतिक अधिकारों एवं गुणों की
तरफ ध्यानाकर्षित किया है। पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने भी कहा कि
“संपादक
बनकर हम एक प्रकार से एक व्यक्ति से लेकर सम्पूर्ण समाज और एक गांव से लेकर
पूरे प्रदेश और देश की सेवा का व्रत लेते हैं जो केवल तप, त्याग और बलिदान की
भावना से ही पूर्ण हो सकता है।”
वरिष्ठ पत्रकार पं. विष्णु दत्त शुक्ल ने अपनी पुस्तक
‘पत्रकार
कला’
में संपादक के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है
“संपादक
का कार्य एक प्रधान सेनापति का सा कार्य है। जिस प्रकार प्रधान सेनापति अपनी
सेना का संचालन करता है, उसी प्रकार संपादक को अपने पत्र का संचालन करना पड़ता
है। जिस प्रकार एक योग्य सेनापति सेना के चलने-फिरने, खाने-पीने, लड़ने-भिड़ने
आदि पर अपनी निगाह रखता है, उसी प्रकार संपादक सेनापति भी अपने रिपोर्टर,
संवाददाता, उपसंपादक आदि सिपाहियों पर अपनी नजर रखता है। दोनों की जिम्मदारियां
भी करीब-करीब एक सी होती हैं। बड़ी सावधानी, जागरुकता की आवश्यकता होती है। जरा
भी भूले कि गए।”
भारत में पत्रकारिता के जनक जेम्स आगस्टस हिक्की जो
‘बंगाल
गजट’
और कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर के प्रकाशक एवं संपादक थे, ने अपने पत्र में लिखा था
कि “यद्यपि
मुझमें समाचार पत्र प्रकाशित करने की योग्यता नहीं है किन्तु मैं अपनी आत्मा की
स्वतंत्रता के लिए अपने शरीर को दास बनाना स्वीकार करता हूं।”
उपरोक्त
विद्वानों के वक्तव्यों से संपादक के पद की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं
उत्तरदायित्वों पर प्रकाश पड़ता है। हिक्की स्वयं समाचार पत्र के
संपादक-प्रकाशक और मालिक थे। आजादी के पूर्व कई संपादक ऐसे हुए हैं जो
अपने-अपने पत्रों के व्यवस्थापक भी थे। आजादी के पूर्व पत्रकारिता मिशन थी, यह
आज पूर्णतया लाभ कमाने का हथियार बन गई है। ऐसे में पत्रकारों एवं संपादकों के
कार्यों में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक है। इसी परिवर्तन का परिणाम है कि
मालिक स्वयं संपादक बनने जा रहे हैं और संपादक अपने दायित्वों को नौकरी करने तक
सीमित करते जा रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। आजादी के पूर्व भी बहुत से ऐसे
संपादक हुए हैं जिन्हें पूर्ण रूपेण संपादकीय स्वतंत्रता नहीं मिली थी किन्तु
वे अपने कर्त्तव्यों एवं दायित्वों का नैतिक मर्यादा में निर्वहन करते थे। इस
तथ्य की पुष्टि हमें बाबूराव विष्णु पराड़कर द्वारा सन 1925 ई. में वृंदावन
हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित प्रथम संपादक सम्मेलन में दिए गए
अध्यक्षीय भाषण से होती है। अपने भाषण में पराडकरजी ने कहा था, कि
“पहले
के संपादक जैसी स्वतंत्रता हमें उस समय भी प्राप्त नहीं हुई थी जब सन 1905 में
मैं ‘हिंदी
बंगवासी’
का सहकारी संपादक बनकर कलकत्ते गया था। मुद्रक और व्यवस्थापक की स्वतंत्र
दृष्टि हो गई थी और उसी परिणाम में संपादक परमुखापेक्षी बन गए थे।”
उन्होंने अपने उसी व्यखायान में आगे भी कहा था कि
“पत्र
निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनिकों और सुसंगठित कंपनियों के लिए ही
संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी,
मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धन चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता
होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की
संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा, पर पत्र प्राणहीन होंगे ।”
आज यह बहस का
विषय हो सकता है कि क्या हमारे समाचार पत्र पहले की तुलना में प्राणहीन हैं। आज
भूमण्डलीकरण के इस दौर में पत्रकारिता में भी पूंजी और व्यवसाय-बुद्धि का महत्व
निरंतर बढ़ता जा रहा है, जिस अनुपात में यह बढ़ता जा रहा है उसी अनुपात में
पत्रकार में पत्रकार की महत्ता और उसकी प्रतिष्ठा निरंतर कम होती जा रही है।
आजादी के
दौरान संपादक की मुख्यशक्ति उसकी आदर्श प्रेरणा थी। तब पत्रकारिता निष्ठावान
पाठकों को अपनी तरफ आकर्षित सत्ता से संघर्ष ही देश की जनता और पत्रकारिता
दोनों का लक्ष्य था। देश का प्रबुद्ध वर्ग जिसमें वरिष्ठ पत्रकार भी शामिल थे,
राष्ट्र के नवनिर्माण के स्वप्न संजो रहे थे। पत्रकारों के लिए सुख-सुविधा का
महत्व गौण था । लक्ष्य प्राप्ति ही उनका साध्य था। इस साध्य की प्राप्ति के लिए
विपरीत परिस्थितियों में भी वे अपनी भूमिका का निर्वहन करने से पीछे नहीं हटते
थे। इसके मूल में उनकी आत्मिक शक्ति थी ।
स्वतंत्र भारत
में भी कुछेक संपादक ऐसे हुए हैं, जिनके नाम से समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं की
पहचान होती थी। सच्चिदानंद हीरानंद वास्स्यायन
‘अज्ञेय’
एवं उनकी टीम से ‘दिनमान’
की पहचान बनी थी। धमवीर भारती के नाम से
‘धर्मयुग’
को जाना जाता था। ‘साप्ताहिक
हिन्दुस्तान’
मनोहर श्याम जोशी, ‘नईदुनिया’
राहुल बारपुत्ते, ‘दैनिक
जागरण’
नरेन्द्र मोहन ‘राजस्थान
पत्रिका’
कर्पूरचंद्र-कुलिश के नाम से पहचाना जाता था। इसी प्रकार
‘रविवार’
की पहचान सुरेन्द्र प्रताप सिंह थे। ‘नवभारत
टाइम्स’
राजेन्द्र माथुर और ‘जनसत्ता’
प्रभाष जोशी के नाम के साथ जुड़ा था। जून 75 से मार्च 77 का समय स्वतंत्र भारत
की पत्रकारिता के लिए परीक्षा का काल था जब देश में आपातकाल लगा हुआ था। श्री
प्रभाष जोशी ‘इंडियन
एक्प्रेस’
ग्रुप के हिन्दी साप्ताहिक ‘प्रजानीति’
के संपादक थे। अनुपम मिश्र, उदयन शर्मा, बाबूलाल शर्मा व जयंत मेहता उनकी टीम
के सदस्य थे। जयप्रकाश नारायण के विचारों पर आधारित यह साप्ताहिक पत्र था।
आपातकाल में जब आदेश आया कि सेंसर के बिना कोई भी समाचार पत्र नहीं छपेगा।
‘प्रजानीति’
का पहला अंक सेंसर के लिए 16 पृष्ठों का गया पर वापस हुआ केवल चार पृष्ठ जिसमें
सिनेमा, खेल और साहित्य की ही प्रमुखता थी। यही हाल अंग्रेजी के
‘एवरीमैन’
का हुआ । इसका कोई भी पृष्ठ वापस ही नहीं आया।
‘एवरीमैन’
के संपादक श्री अजीत भट्टाचार्य थे । इस पर पत्र के मामले में श्री रामनाथ
गोयनका को सहमत करते हुए प्रभाषजी ने ‘प्रजानीति’
को बंद कर देना बेहतर समझा। ‘दिनमान’
जिसके संपादक रघुवीर सहाय ने पाठकों का विश्वास तोड़ा और वे अपने पाठकों एवं
पत्रकारों के बीच उपहास के पात्र बने । जबकि सुरेन्द्र प्रताप सिंह बम्बई (अब
मुम्बई) से आठ पृष्ठीय पर्चे ‘आवाज’
के लिए लगने वाले खर्च का प्रबंध अपने मित्रों की सहायता से करते थे । तब
पत्रकारिता को लोग समाजसेवा के रूप में स्वीकार करते थे। इसी का परिणाम था कि
संपादकों को सत्ता सम्पन्न माना जाता था। संपादक गौरवान्वित था।
आज का पत्रकार
विशेषतः मुद्रास्फीति, चीनी, सीमेंट, कोयले और तेल का परमिट लेकर पत्रकारिता के
लिए आदर्श पर चल रहे हैं ?
बड़े-बड़े संपादक संपादकीय नैतिकता से हटकर विभिन्न राजनीतिक दलों के एजेण्डों
को अपने पाठकों तक इस प्रकार पहुंचा रहे हैं जैसे वे उस दल के प्रवक्ता हों।
कुछ पत्रकार तो यहां तक दावा करते हैं, उनका काम खबरें देना है, तथ्यों का
सत्यापन नहीं। आज का वरिष्ठ संपादक राजनीतिक दलों के सहारे शासन के सत्ता,
कार्यपालिका और विधायिका तक पहुंचने का कार्य कर रहा है। ऐसे में पत्रकारिता के
पावन आदर्शों एवं लक्ष्यों से भटकना उसका परिस्थितिजन्य स्वभाव बन गया है।
विभिन्न दलों के मुखपत्र के रूप में भी समाचार पत्रों का प्रकाशन खूब तेजी से
हो रहा है तो हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि पत्रकारिता से हमें न्याय मिलेगा
?
एक पक्षीय दृष्टिकोण और पूर्वाग्रहों से प्रेरित पत्रकारिता
को
सच्चे अर्थों में कैसे पत्रकारिता कह सकते हैं
?
आज पत्रकारिता
जैसे
शक्तिशाली संचार माध्यमों का उपयोग लाभार्जन हेचु नहीं किया जा सकता। लाभार्जन
के लिए की जाने वाली सनसनीखेज और भड़कीली पत्रकारिता
को
स्वस्थ और समाजोपयोगी नहीं माना जा सकता। पत्रकारिता
को
स्वस्थ और समाजोपयोगी नहीं माना जा सकता । पत्रकारिता
सच्चे
अर्थों में वह है जो तथ्यों का सत्यान्वेषण करते हुए उसे समाज के समक्ष
प्रस्तुत करे। पत्रकारिता
अपने
विचारों से असहमति रखने वाले व्यक्तियों और वर्गों को विपन्नों और वंचितों को
भी विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान करे। तभी तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने
कहा था “समाचार
पत्र सेवा भाव से ही चलना चाहिए। समाचार पत्र एक प्रचण्ड शक्ति है किन्तु जिस
प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गांव का गांव डूबो देता है और फसलों को नष्ट कर
देता है उसी प्रकार लेखनी का निरंकुश प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। लेखनी
पर अंकुश यदि बाहर से आता है तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है।
अंकुश तो अंदर का ही लाभदायक सिद्ध हो सकता है।”
सामान्यतः
आजादी के पहले पत्रकारिता
में एक
ऐसा समय था जब अधिकांश समाचार पत्रों के मालिक-प्रकाशक ऐसे व्यक्ति थे जो प्रेस
से लाभार्जन तो कर लेते थे फिर भी उनका एक सामाजिक सरोकार था । वे
पत्र-पत्रिकाओं के एक राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक उद्देश्य की प्राप्ति के
रूप में प्रयेग करते थे। वे किसी न किसी प्रकार के सामाजिक दायित्व को समझते
थे। उस समय मालिक और संपादक के बीच नौकर के संबंध नहीं होते थे । दोनों के बीच
एक सामाजिक लक्ष्य एवं दायित्व की कामना, उसकी समझ होती थी। उस समय भी बहुत से
ऐसे प्रकाशक थे जो स्वयं संपादक भी होते थे। संपादक के अलग होने पर उसकी
पर्याप्त प्रतिष्ठा होती थी। यह प्रतिष्ठा पाठक वर्ग में तो थी ही मालिक में भी
थी। यहां हम एक उद्धरण देना उपयुक्त समझते हैं। कालालकांकर (प्रतापगढ़) से जब
राजा रामपाल सिंह दैनिक ‘हिन्दोस्थान’
का प्रकाशन प्रारंभ किया तो उन्होंने पं. मदन मोहन मालवीय को संपादक पद हेतु
आमंत्रित किया । मालवीय जी ने यद दायित्व सशर्त संभालने की स्वीकृति दी। शर्त
थी कि जब राजा साहब ड्रिंक किए होंगे तो न तो मालवीय जी के केबिन में जाएंगे और
न तो उन्हें बुलाएंगे । एक दिन राजा साहब ड्रिंक करके मालवीय जी के केबिन में
पहुँच गये । मालवीय जी को आभास हो गया और वे राजा साहब के जाने के बाद अपना
इस्तीफा लिखकर संपादक की मेज पर रखकर घर वापस चले गए। अगले दिन जब मालवीय जी
दफ्तर नहीं आए और राजा साहब को पता चला तो वे उन्हें मनाने उनके घर गए। मालवीय
जी ने राजा साहब से कहा कि हमारे और आपके बीच जो शर्त थी, वह टूट गई है, अतएव
अब यह संभव नहीं है। राजा साहब ने कहा ठीक है किन्तु आप किसी अन्य अखबार में
नौकरी नहीं करेंगे और राजासाहब मालवीय जी को उनके बेतन के बराबर उन्हें एलएलबी
की पढ़ाई पूरी करने तक धनराशि का भुगतान करते रहे। यह था मालिक और संपादक के
बीच रिश्ता।
किन्तु आज
समाचार पत्रों के उद्योग बन जाने के कारण इन स्थितियों में परिवर्तन हो गया है।
ऐसी स्थिति में अधिकांश पत्रों के अब प्रकाशक और संपादक दोनों के हित अलग-अलग
हो गए हैं। उनकी सोच भी अलग-अलग हो गई है जो प्रायः एक-दूसरे के विपरीत भी है।
मालिक के हित को अभिव्यक्त देने का प्रश्न तो प्रथम प्रेस कौंसिल के गठन के समय
ही उठा था। प्रेस कौंसिल ने इसे स्वीकार भी किया था। हम मालिक के इस मौलिक
अधिकार को नहीं नकारते कि वह समाचार पत्र के माध्यम से अपना दृष्टिकोण व्यक्त
कर सकते हैं...लेकिन हम इस स्थिति से बचना चाहते हैं कि एक संपादक मालिक का
साहित्यिक एजेंट कहलाए ‘टाइम्स
ऑफ इंडिया’
के पूर्व संपादक श्री हरिकृष्ण दुआ ने जिस साहस से अशोक जैन (मालिक) को उनके
द्वारा सौंपे गए अन्य कार्यों को करने से इनकार कर दिया वैसा विरले ही पत्रकार
कर पाते हैं।
वैसे आज
संपादक की एक और भी बड़ी समस्या है। उसे ही अपने पाठकों के बीच जाना पड़ता और
समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नीति संबंधी किसी आकस्मिक परिवर्तन से संपादक की
प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ने लगता है। ऐसी स्थिति में एक संपादक को न केवल
जनहित में बल्कि स्वयं अपनी सार्वजनिक छवि बचाने के लिए भी संपादक के पद की
स्वतंत्रता के लिए खड़ा होना पड़ता है जिसे प्रकाशक/मालिक बर्दाश्त नहीं कर
पाते। इसी का परिणाम है कि अब पत्र-पत्रिकाओं में भी पत्रकारों को संविदा के
आधार पर नियुक्त करने की परंपरा विकसित हो रही है ताकि नौकरी केडर से कोई
पत्रकार मालिक का विरोध न कर सकें।
आज समाचार
पत्र-पत्रिकाओं के मालिकों का मुख्य उद्देश्य ग्राहकों की संख्या में निरंतर
वृद्धि करना होता है। परिणामस्वरूप है कि अब समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी
कारपारेट व्यवस्था लागू होने लगी है। मालिक का अपने उत्पाद से कोई लगाव नहीं
होता, उसे तो अपने प्रबंधकीय टीम के माध्यम से निरंतर परिणाम की ही उपेक्षा
रहती है अर्थात यदि उसके ग्राहकों की संख्या बढ़ेगी तो उसे विज्ञापन अधिक
मिलेंगे और विज्ञापन दर भी अच्छी होगी, जिससे निरंतर आय में वृद्धि होती रहेगी।
आज संपादक के स्थान पर कार्यकारी संपादक, प्रबंध संपादक जैसे शब्दों का प्रयोग
होने लगा है। इसके पीछे भी कारपोरेट दर्शन की अवधारणा ही मुख्यतः जिम्मेदार है।
इसी का परिणाम है कि अब प्रबंध संपादक और कार्यकारी संपादक एक तरह से प्रबंधन
का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। आज भी जनमत को तैयार करने में किसी व्यक्ति को
प्रतिष्ठा को बनाने-बिगाड़ने में मीडिया की भूमिका एक कारक के रूप में है। आज
तो एक ऐसी प्रवृत्ति विकसित हो रही है जिसे देखकर लगता है कि आने वाले दिनों
में समाचार पत्र बिना संपादक के भी चलाए जा सकता हैं । जहां संपादक प्रबंधक का
कार्य करने लगता है वहां संपादकीय स्वतंत्रता का क्या अर्थ होगा। इसे आप सहज ही
समझ सकते हैं। इस संदर्भ में मैं अपनी बात को पुष्ट करते हुए एक उद्धरण देना
उचित समझा हूं “जो
लोग पत्रकारिता का काम कर रहे हैं उन्हें जब यह मानने को मजबूर होना पड़ेगा कि
समाचार पत्र का मुख्य उद्देश्य बिकना ही है तो प्रेस को देश की महत्वपूर्ण
संस्था कहलाने का अधिकार नहीं रहेगा। समाचार पत्र को एक मामूली बाजारू माल से
काफी अधिक उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। अगर सेवा का भाव लाभ के ही अधीन हो तो मैं
कल्पित तौर पर अखबार निकालने से अधिक साबुन या चीनी बेचने का काम सपंद करूंगा।
कम से एक योजनाबद्ध छलावे से मुक्ति का अहसास तो होगा।”
(हिन्दी पत्रकारिता का बाजार भाव लेखक, जवाहर कौल पृष्ठ 88 से उद्धत)
आज भी मालिक
पत्रकारिता को सामाजिक सरोकारों से न जोड़ते हुए व्यवसाय पर ध्यान केन्द्रित कर
रहे हैं जिसे किसी भी दृष्टि से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता । यदि सामाजिक
संदर्भों को दृष्टिगत रखते हुए पत्रकारिता को व्यवस्थापक बनाया जाता है तो वह
काफी हद तक उचित कहा जा सकता है। यदि पत्रकारिता का कोई सामाजिक संदर्भ नहीं
है, अगर वह केवल लाभार्जन का ही व्यवसाय है तो प्रेस आयोग की यह टिप्पणी ठीक ही
है “समाचार
जुटाने वालों और समाचार विक्रेताओं के रूप में पत्रकार दूसरे सामान और सेवाएं
बेचने वाले से अधिक ऊंचे सम्मान का दावा कैसे कर सकता है।”
इसका सीधा अर्ध यही है कि पत्रकार को उसी रूप में व्यवसायी होना चाहिए जिस रूप
में डॉक्टर, व्यावसायिक है। जैसे रोगी डॉक्टर से अपने प्रति सहानुभूति की
अपेक्षा करता है वैसे ही समाज भी संपादक से सहानुभूति की अपेक्षा करता है। अब
हम इस निष्कर्ष पर पहुचते हैं कि समाचार पत्र-पत्रकाएं सार्वजनिक महत्व के
मामलों में नागरिकों को शिक्षित एवं सूचित करने का एक महत्वपूर्ण साधन होता
हैं। इसका सारा उत्तारदायित्व संपादक पर है। आज पत्रकारिता का स्वरूप और
प्रकृत्ति निरंतर परिवर्तित हो रही है। उसकी विषयवस्तु बदल रही है। जैसे-जैसे
पत्रकारिता का स्वरूप परिवर्तित होगा वैसे-वैसे संपादक की सत्ता का अनुरुप ही
उसकी सामाजिक महत्ता भी होगी। अतः संपादक को आत्म-विश्लेषण करने की महती
आवश्यकता है।
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डॉ. श्रीकांत सिंह -
जनसंचार के गंभीर
अध्येता, कई पुस्तकें
प्रकाशित। इन
दिनों रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में
प्रोफेसर हैं। संपर्कः कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, कोटा, रायपुर
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