भास्कर ने बदला पत्रकारिता का चेहरा
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श्रवण गर्ग
हिन्दी
पत्रकारिता को ऊंचाइयां देने वाले अनेक ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें हम समय-समय पर
उद्दृत करते रहते हैं । लेकिन यह कठोर सत्य है कि अपने स्वर्णिम कार्यों के लिए
पहचानी जाने वाली हि्दी पत्रकारिता वह ऊंचा दर्जा नहीं पा सकी, जो वांछित था।
इसलिए जब 19 दिसम्बर 1996 को दैनिक भास्कर ने राजस्थान में जयपुर से अपना
प्रकाशन आरंभ किया तो शायद ही किसी को यह आभास हुआ होगा कि यह दिन हिन्दी
पत्रकारिता
को एक नई
रोशनी से आलोकित कर देगा, जिसकी चमक न केवल भाषायी पत्रकारिता
का
चेहरा बदल देगी बल्कि अंग्रेज अखबारों के लिए भी आत्म-चेतना का कारण बनेगी।
इसलिए दस वर्ष पूर्व के हिन्दी, गुजराती था अन्य भाषायी समाचारों पत्रों पर
ध्यान से गौर करें और उनका आज के अखबारों से तुलनात्मक अध्ययन करें तो उस फर्क
को साफ-साफ देखा जा सकता है कि जयपुर से भास्कर के प्रकाशन के बाद पत्र,
पत्रकार और पत्रकारिता
की
स्थापित छवि कितनी बदल चुकी है। आज यह फर्क करना मुश्कित है कि अंग्रेजी का
अखबार हिन्दी के सामने कितना श्रेष्ठ रह गया है।
यह स्थापित
तथ्य है कि जयपुर में पूर्व से प्रचलित और स्वीकार्य समाचार पत्र को किसी दूसरे
प्रदेश से पहुंचकर चुनौती देना किसी भी प्रकाशन के लिए एक दुष्कर कार्य था,
लेकिन भास्कर की इस पहल ने न केवल अपना उचित स्थान बनाया बल्कि प्रतिस्पर्धी
समाचार पत्र को भी अपना रूप-रंग और कलेवर बदलने के लिए बाध्य कर दिया। इससे
हिन्दी का एक नया पाठक वर्ग तैयार हुआ और जिसका असर आगे चलकर पूरे देश में देखा
गया । राजस्थान और फिर उसके बाद दूसरे प्रदेशों में भास्कर समूह की सफलता देश व
विदेश के अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के लिए अध्ययन का विषय बनी। सभी जानना
चाहते थे कि आखिर वे कौन से प्रयोग थे, जिनके कारण एक प्रकाशन पाठकों की रुचि
पर एक दम खरा उतर रहा है। जयपुर में अखबार का प्रकाशन प्रारंभ करने से पूर्व
सैकड़ों लोगों की टीम ने गुलाबी नगरी में एक-एक घर पर दस्तक दे डाली। पाठकों और
प्रबुद्धजनों से जानकारी प्राप्त की कि उन्हें किस तरह का अखबार चाहिए । पाठकों
की मर्जी का ही अखबार आगे चलकर भास्कर समूह का मूल मंत्र बन गया। इस डोर-टू-डोर
सर्वें का प्रभाव यह हुआ कि जयपुर में अखबार के प्रकाशन के पहले दिन से ही
दैनिक भास्कर अपने प्रतिस्पर्धा समाचारपत्र के आगे हो गया और वह बढ़त दस
वर्षों के बाद भी कायम है। यह रणनीति अब से कोई चार वर्ष पूर्व अहमदाबाद में
‘दिव्य
भास्कर’
के प्रकाशन का प्रारंभ करने में अपनाई गई और
‘दिव्य
भास्कर‘
ने प्रकाशन के पहले दिन से ही प्रतिस्पर्धा समाचार पत्र को पीछे छोड़ दिया।
पिछले वर्षों में भास्कर ने जहां-जहां से अपना प्रकाशन प्रारंभ किया, वहां उसने
सफलता के झंडे गाडे़।
मध्यप्रदेश से
बाहर निकलकर सीमाएं तोड़ने का जो सिलसिला जयपुर से प्रारंभ हुआ, वह बाद में
पूरे राजस्थान में विजय पताका फहराने तक ही सीमित नहीं रहा । चंडीगढ़, हरियाणा,
महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब के बाद अंग्रेजी में मुंबई से डीएनए के प्रकाशन तक
पहुंचा। समूह के प्रकाशनों की प्रसार संख्या आज 45 लाख प्रतियों तक पहुंच गई है
और यह लगातार बढ़ रही है ।
किसी भी राज्य
में अगर दस वर्ष पहले की अखबारों की कुल प्रसार संख्या की आज के आंकड़ों से
तुलना की जाए तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे । पता चलेगा कि लाखों पाठकों के
सुप्त संसार को एक पत्र ने न सिर्फ जागृत कर उन तक अपनी पैठ बनाई बल्कि
प्रतिस्पर्धा समचार पत्रों को भी कायम रखा और उनके विकास में सहायता की। 1996
के पूर्व जो समाचार पत्र दस और बारह पृष्ठों में बदल गए हैं या सत्तर से अस्सी
प्रतिशत श्वेत-श्याम पृष्ठों में हो गए हैं तो उसका बहुत सारा श्रेय उस पहल को
जाता है जिसकी शुरूआत 1996 में जयपुर हुई थी।
किसी भी
समाचार पत्र की सफलता का मापदंड यह भी है कि किसी एक स्थान पर उसे प्राप्त हुई
उपलब्धि, दूसरे स्थान पर भी सफलता का कारण बने। इस कसौटी पर दैनिक भास्कर को
कसें तो राजस्थान में उसे प्राप्त सफलताका संबंध उसकी विश्वसनीयता से है जो
उसने मध्यप्रदेश में हासिल की थी। राजस्थान की सफलता का लाभ उसे चंडीगढ़,
हरियाणी में मिला । भाषायी बंधनों को तोड़कर जब इस समूह ने चार वर्ष पूर्व
अहमदाबाद से गुजरात में दिव्य भास्कर का प्रकाशन प्रारंभ किया तो उसकी सफलता के
प्रति उसी तरह की शंकाए जताई गईं, जैसी 1996 में जयपुर में उठाई गई थीं पर सारे
अनुमानों को निरस्त कर दिव्य भास्कर गुजरात में शीर्ष समाचार पत्र बन गया है।
एक दशक पूर्व
प्रारंभ हुई यह विकास यात्रा केवल अखबारी दुनिया तक ही सीमित नहीं रही। स्थापित
सत्ताओं को चुनौती देकर सफलताएं प्राप्त करने का सिलसिला आज भी जारी है। समूह
ने अपने विस्तार के लिए भौगोलिक सीमाएं तोड़ीं, भाषायी सरहदों को पार किया।
मीडिया के अन्य क्षेत्रों में भी वर्चस्व कायम करने की पहल की है। देश के सत्रह
स्थानों में एफएम रेडियो स्टेशरों की स्थापना के लिए लायसेंस मिलने के बाद पहले
स्टेशन की शुरूआत जयपुर से की गई। आने वाले दिनों चंडीगढ़, गुजरात, मध्यप्रदेश
आदि राज्यों में समूह के एफएम स्टेशन शुरू होने वाले हैं। इसी प्रकार
मल्टीमीडिया के क्षेत्र में भी वह व्यापक विस्तार की योजना लेकर आगे बढ़ रहा
है। भास्कर समूह की प्रगति निश्चित ही उस विश्वास का प्रतीक है, जो दस वर्ष
पूर्व जयपुर में उसे प्राप्त हुआ था और जो भाषायी पत्रकारिता के क्षेत्र में
टर्निंग प्वाइंट माना जाता है।
जयपुर संस्करण
के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाना आवश्यक
है कि राजस्थान में मिली अप्रतिम सफलता के बाद ही कहा जाने लगा था कि दैनिक
भास्कर देश का सबसे तेज बढ़ता समाचार पत्र । इस विकास की यात्रा का अलगा लक्ष्य
विश्व का सबसे बड़ा अखबार और सबसे बड़ा मीडिया हाउस बनने का है। अपने पाठकों के
सहयोग से यह भास्कर समूह इस लक्ष्य को प्राप्त करने में भी निश्चित रूप से सफल
होगा।
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(श्रवण
गर्ग
-
दैनिक भास्कर के संपादक)
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