Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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प्रसंगवश

 

शिल्पा के शो की रियालिटी

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 सुभद्रा राठौर

 

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खबरिया चैनलों में शिल्पा भारत की नाक बन कर छाई रहीं । ब्रिटेन की संसद में भूचाल आया । टोनी ब्लेयर भी चुप नहीं रहे। भारत में कई पुतले भस्म हो गए । तमाम नगर-कस्बे जुलूस की शक्ल में तब्दील हो गए । भारत का विदेश मंत्रालय हरकत में आ गया। राजनैतिक पार्टियाँ बयानबाजी में व्यस्त हो गईं-सब कुछ हुआ जो हो सकता था । 

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खिरकार जीत गई शिल्पा । जिसकी जीत पर सट्टा बाजार गर्म रहा, मीडिया उछलता रहा, नुक्कड़-चौराहे मगन रहे, राष्ट्र-प्रेम चप्पे-चप्पे पर छाया रहा । और जीत गया चैनल फोर, मनोरंजन  जगत का नया हथकंड़ा । जीत हुई सबकी- कार्यक्रम के आयोजक-प्रायोजक, निर्देशक, कलाकार सबकी, फिर हारा तो कौन ? क्या जर्मीन जैक्सन या फिर जेड गुडी ? नहीं, कतई नहीं । वस्तुतः हारा तो इसमें दर्शक ही है, जो अब मनोरंजन जगत में पैदा हुआ सर्वहारा वर्ग है । जो दिन-प्रतिदिन हारता है अपनी भावनाएं । संचार-क्रांति का मायावी लोक गढ़ता दिखाई  देता है शोषक-शोषित की नही परिभाषाएं । बिग ब्रदर का सुखांत भीती ताहि बिसार दे आह्वान अवश्य कर रहा है, पर यह समय दर्शकों के चेत जाने का है । ठीक है कि गाँधी के देश की एक सांवली-सलोनी युवती ने ब्रिटेन को उसकी ही जमीन पर शिकस्त दी, पर काश इस विजय-यात्रा में शुचिता भी रही होती  ।

 

भारतीय चैनल पर बिग बॉस का ताजा-ताजा स्वाद चख रहे भारतीयों ने एक दिन अचानक चौंक कर खबरिया चैनल्स पर रोती-फफकती आँखें फाड़े युवती को देखा । कुछ भूलता-सा चेहरा.... अरे ! यह तो शिल्पा है । बॉलीवुड में भी क्रम पर गिनी जाने वाली शिल्पा  । पर यह हंगामा क्या ? पता चला हमारी शिल्पा ब्रिटेन के चैनल फोर पर बिग ब्रदर में हिस्सा लेने पहुँची हैं, जहाँ उन परनक्सलवादी टिप्पणियाँ की गई है । बस, भारतीय तो होता ही मन से बड़ा भावुक है । आत्मगौरव जाग उठा, देश-प्रेम भड़क गया, अपनी चमड़ी का राग पंचम सुर में पहुँच गया । भारत तो भारत, सारा विश्व काले-गोरे की दो धारा में बँट गया । ब्रिटेन से लेकर भारत तक रंगभेद के इस ताजे मामले ने जबर्दस्त बवंडर मचाया । भारतीय खबरिया चैननों में शिल्पा भारत की नाक बन कर छाई रहीं । ब्रिटेन की संसद में भूचाल आया । टोनी ब्लेयर भी चुप नहीं रहे । भारत में कई पुतले भस्म हो गए । तमाम नगर-कस्बे जुलूस की शक्ल में तब्दील हो गए । भारत का विदेश मंत्रालय हरकत में आ गया । राजनैतिक पार्टियाँ बयानबाजी में व्यस्त हो गईं-सब कुछ हुआ जो हो सकता था । और,  सब होने के बाद अचानक गिरगिट ने रंग बदला । अपने पक्ष में उठे करोड़ों हाथों को ठेंगा दिखाते हुए शिल्पा ने अपने आरोप वापस ले लिए । दर्शक अवाक्, यह क्या हो गया शिल्पा ?  वापस तो तुम्हें आने को कहा गया था । गवाह चुस्त मुद्दई सुस्त। चाय की प्याली में उठाया गया तूफान थम गया था-कुछ हुआ ही नहीं ! फिर सारा हड़कंप क्यों ? क्या शिल्पा सचमुच रंगभेद की शिकार नहीं हुई थी ?  स्वयं को भारत की प्रतिनिधि मान रही भोली शिल्पा को क्या इतनी  समझ नहीं कि वह सामान्य विवाद अथवा नस्लभेदी टिप्पणियों का अंतर बूझ सके ?  दर्शक किसे सच माने ?  जो पहले दिखा गया, उसे अथवा जो अब दिखाया जा रहा है उसे ?  सारे विश्व को मनचाही दिशा में हाँककर शिल्पा का मुकर जाना-बात हजम नहीं हुई ।

 

चूंकि विवाद का विषय सामान्य नहीं था । नाजुक मसले नस्लवाद को हवा देना भावनाओं पर सीधा आघात था - इस प्रकरण पर चर्चा अपरिहार्य हो जाती है । परमाणु और अंतरिक्ष युग के दौर में आज भीगोरे सुपीरियारिटी काम्प्लेक्स से ग्रस्त हो सकते हैं- जेड गुड़ी के रुप में एक वीभत्स चेहरा दर्शकों ने साफ तौर पर देखा । यदि घटनारियल थी, तो भर्त्सना होनी चाहिए और तीखी प्रतिक्रियाएँ हुईं भी । उपनिवेशवादी देशों का सूरज कब का अस्त हो चुका । आज सभ्यता का प्रतिमान चमड़ी नहीं रही।  इसके बावजूद यदि ऐसी घटना घटती हैं, तो इसे उनकी हीनभावना ही समझनी चाहिए । सो, विरोध तो जबर्दस्त हुआ, पर शिल्पा के पलटी मारने और उसकी जीत के बाद विशालकाय प्रश्नचिन्ह यही है कि क्या दर्शाया गया, विवाद सच्चा था ? अथवा यह था मीडिया द्वारा निर्मित सच,  जिसे परोस दिया गया, अपना हित साधने के लिए ।

 

शिल्पा जब अपने कहे से मुकर रही थीं, चैनल फोर और उसके कलाकारों के नाम विश्व की जुबान पर चढ़ चुके थे ।नाम वाद से नहीं, विवाद से बना करते हैं स्पष्ट देखा गया । प्रकरण का सुखांत हुआ। भारतीय संस्कृति के नारे बुलंद हो गए । करोड़ों रुपए जीतकर शिल्पा गद्गदायमान हो गईं । वह क्षमामयी हो गई । महान हो गई । और दर्शक ?  क्या दर्शक के साथ कोई छल नहीं हुआ ? शिल्पा के बहाने यह प्रश्न इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि अब आए दिन दर्शक स्वयं को ऐसी ही अजीत दशा में फँसा पाने लगा है। मीडिया अब बुद्धू बक्सा नहीं रहा । वह कुशल मदारी बन चुका है और नाच रहा है  दर्शक-जैसा वह चाहे । रिमोट भले ही दर्शक के हाथ में है, पर उसके दूसरे हाथ में थमा दिया गया है मोबाइल । ब्रिटेन का बिग ब्रदर हो या भारत का बिग बॉस-क्या ये सचमुच रियालिटी शो है ?  दर्शक ऐसे गेम-शो का फिर से आसान असामी बने, इससे पूर्व वह कुछ सोचता या भाँपता क्यों नहीं ? नए तर्ज के इन सीरियलों ने टी.आर.पी में शीर्ष पर कब्जा कर लिया है, आखिर कैसे ? दरअसल, निर्माता-निर्देशक यह भाँप चुके हैं कि सास-बहू छाप धारावाहिकों की दुकान ज्यादा दिनों तक चलने वाली नहीं है । आज का दर्शक साक्षर, जिज्ञासु, नवीनता का प्रेमी है । उसे कुछ ठोस चाहिए, चौंकाऊ चाहिए, उबाऊ नहीं । खबरिया चैनलों की घड़ाधड़ बढ़ती संख्या और अभूतपूर्व लोकप्रियता इसके प्रमाण हैं ।

 

सच्ची घटनाओं का रोचक व सनसनीखेज प्रसारण दर्शकों की पहली पसंद बन चुका है- समाचार मनोरंजन के पर्याय बना दिए गए हैं । ऐसे में रियालिटी शो ने बिल्कुल सही समय पर अपना जाल फैलाया है । अपने चिरपरिचित, लोकप्रिय एवं विवादास्पद (राखी सावंत, कैरल) कलाकारों की दिनचर्या, गपशप, रोमांस, प्रेम-तकरार-मनोरंजन का अलग ही अंदाज लेकर आता है । परदे के पीछे झाँकना मानुष-मन की सहज-वृत्ति रही है और यहाँ कोई परदा नहीं । पर क्या यहाँ सबकुछ सचमुच पारदर्शी हैं ? ये तथाकथित रियालिटी शो किस हद तक रियल है ? इनका आपसी व्यवहार, लड़ाई-झगड़ा, नोंक-झोंक क्या पूर्णतः अकृत्रिम है ? चूंकि ऐसे शो से बाहर हुए कुछ कलाकारों ने स्वयं स्वीकारा है कि उन्हें बकायदा स्क्रिप्ट दी गई, निर्देश दिए गए कि उनका बरताव कैसा होना चाहिए ? स्पष्ट है कि सीधी-सपाट शांत दिनचर्या में भला किसकी दिलचस्पी होगी, उबली सब्जी किसे भाएगी ? ये संस्कार या आस्था चैनल तो हैं नहीं । यहाँ भरपूर मसाला और छौंक चाहिए । हां, तीखी मिर्च या छौंक से किसी की नाक लाल हो जाए तो इससे उन्हें क्या ?

 

तात्पर्य यह कि शिल्पा के फफकने, बवाल मचने, शांत होने, ब्रिटेन-भारत-विश्व और तिजोरी लूट लेने के पीछे का खेल निश्चित ही सोची समझी रणनीति है । पर, यह है देश व दर्शकों के साथ किया गया अब तक का सबसे भद्दा मजाक ही । जिसमें छिपा है मनोरंजन व्यवसाय का पब्लिसिटी-स्टंट । राखी-मीका प्रकरण हो या फैशन वीक में खिसकते परिधान - प्रसिद्धि और धन का लक्ष्य बेध बखूभी हुआ । उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में उपभोक्ता दर्शक यदि नहीं जागा, उसके साथ खिलवाड़ चलता रहेगा । अतः अब उसे मस्तिष्कशून्यता के साथ देखने की नहीं,  समझने की दृष्टि भी अपनानी होगी । उसे शिल्पाओं को नहीं स्वयं को भावनात्मक दोहन से बचाना होगा । आँखों देखा सब कुछ सच नहीं होता, इस उक्ति पर अमल करना होगा । वह जो कुछ भी देख रहा है, उस पर प्रतिक्रिया देने के पहले चिंतन जरूरी है । भारत तो यों भीदंगे का देश है, यहाँ हंगामा होते देर ही कितनी लगती है ? स्वार्थ में अंधे बने हुए मनोरंजन जगत का कोई धरम तो दिखाई देता नहीं । गनीमत है, शिल्पा के धारदार बहते आंसुओं ने यहां पुतले ही जलवाए अन्यथा भावनाओं पर पड़ी चोट का प्रतिकार भयावह भी हो सकता था । मनोरंजन की दुनिया अपनी सीमाओं में रहे, तभी अच्छा । नाजुक विषयों को छेड़कर अपनी जेबें भरने का रवैया निर्माता, कलाकार और मीडिया बंद करे । आज रियालिटी शो, गेम शो की भरमार हो चुकी है - अंतिम निर्णायक दर्शक बना दिए गए हैं (पता नहीं कहाँ तक?), जिनका एकमात्र उद्देश्य दर्शकों को उकसाकर उनसे अधिसंख्य फोन, एसएमएस प्राप्त करना है। दर्शक अब सोचते हों, आँखें मूंदकर बेगानी शादी के खुशफहम अब्दुल्ला न बने रहें । जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है..... आमीन !

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(सुभद्रा राठौर - समसामयिक विषयों पर समाचार पत्रों में नियमित लिखती हैं । इन दिनों रायपुर के शंकर नगर, डिग्री कालेज में हिन्दी की प्राध्यापिका हैं । संपर्क -शासकीय महाविद्यालय, शंकर नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़)

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