
सम्पादकःसत्ता और महत्ता
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भूमिका
द्विवेदी
पिछले
कुछ वर्षों में मीडिया जगत व्यापक परिवर्तनों का साक्षी रहा है। यह परिवर्तन
तकनीक के थे, कार्यपद्धति के थे, पहुंच के थे, गुणवत्ता के थे, स्वीकार्यता के
थे और कई भी कई बातों के थे। मीडिया ने अपनी व्यापकता के जरिए समाज के और अधिक
निकट पहुंचने में भी इन वर्षों में सफलता पाइ। जो कुछ मीडिया परिदृश्य में हुआ वह
आश्चर्यजनक था और बहुत हद तक अकल्पनीय भी।
लेकिन
परिवर्तन और प्रशस्ति के इस झंझावात में एक संस्था बुही तरह प्रभावित हुई और वह
थी संपादक नाम की संस्था। आज से कुछ समय पहले समाचार पत्र सम्पादकों के नाम से
बिका करते थे। अब यह किवदंती जैसा लगता है । आज समाचार पत्रों का अपना ब्रांड
है और उसका बिकना मार्केटिंग पर निर्भर है । संपादक उसके नियंत्रण है । ककई
समाचार पत्र प्रतिष्ठानों एवं मीडिया संस्थानों में एक ही स्तर के कई सम्पादक
होते हैं, जो उस संस्थान द्वारा संचालित पत्र, पत्रिका या चैनल के विभिन्न
पक्षों को स्वतंत्र रुप से देखते हैं । इस परिवर्तन को देखने के दो नजरिए हैं ।
ऐसा कहने वाले हैं जो कहेंगे कि “संपादक
की संस्था व्यापक हुई है ।”
पर ऐसा कहने वाले भी कम नहीं हैं कि “संपादक
की संस्था विखंडित हुई है ।”
मीडिया में एक
समय ऐसा भी था जब सम्पादक सिर्फ सम्पादकीय लिखा करते थे और सम्पादकीय पृष्ठ की
सामग्री देखा करते थे, लेकिन पूरा अखबार उन्हीं के इशारे पर चलता और उन्हीं के
नाम से जाना जाता था । उस समय विचार की प्रधानता थी । आज सम्पादक, सम्पादकीय
छोड़कर सब देखते हैं या देखने को मजबूर रहते हैं । वह वैचारिक कम और प्रबंधकीय
काम ज्यादा करते हैं क्योंकि आज बाजार की प्रधानता है । पाठक या दर्शक और
उपभोक्ता और क्रेता बन गया है और उसी को केंद्र में रखकर मीडिया का ताना बाना
बुना जाता है ।
मीडिया
संस्थानों में जैसे-जैसे कार्पोरेट संस्कृति की घुसपैठ बढ़ी है । सम्पादक की
सत्ता कमजोर और महत्ता गौण हुई है । सम्पादक के स्वर्णिम युग की समाप्ति होती
नजर आ रही है और उसके स्थान पर ‘समूह
सत्ता’
का वर्चस्व बढ़ने के चिन्ह क्षितिज पर उभरने लगे हैं । शंका यह भी है कि इस
परिवर्तन से मीडिया में विचार का स्थान का कहीं शून्य या तत्सम पर ही न पहुंच
जाए ।
लेकिन इसका एक
दूसरा पहलू भी है जो विस्तार और व्यापकता से जूड़ा है । इस व्यापकता ने
‘सम्पादक’
नाम की इस परिप्रेक्ष्य में सोचा नहीं गया था
। वह सम्पादक की सत्ता और महत्ता
के बारे में एक नई आशा की किरण जगाते हैं । सोचना यह भी है कि परिवर्तन का यह
द्वंद तो नहीं बन गया है ।
बहरहाल अभी इस
दैर में कुछ भी कहना या तय कर पाना कठिन है क्योंकि अभी परिवर्तन प्रक्रिया
में है । दृश्य तो सब कुछ स्थिर होने के बाद ही स्पष्ट होगा लेकिन तब तक देर न
हो जाए इसलिए इस मौंजू पर “सम्पादकः
सत्ता और महत्ता”
पर बहस और चिंतन आवश्यक है । पत्रिका के इस अंक में विश्व के सबसे पुराने
अखबारों में से
एक गुजराती भाषा में छपने वाले मुंबई समाचार की संपादक सुश्री
पिंकी दलाल और गुजराती के महत्वपूर्ण अखबार जन्मभूमि के संपादक श्री कुंदन
व्यास के विचार भी हैं । हमारी कोशिश है कि हम भारतीय भाषाओं के संपादकों एवं
पत्रकारों के साथ संवाद एवं विचार-विनिमय का सिलसिला बना सकें ताकि हमारी यह
कवायद एकालाप बनकर न रह जाए । हिंदी के महत्वपूर्ण कवि-ललित निबंधकार श्री
अष्टभुजा शुक्ल इस अंक से मीडिया विमर्श के लिए
‘इत्यलम्’
नामक स्तंभ लिखेंगे, उनका स्वागत । पत्रिका का यह अंक आपको कैसा लगा अपनी
प्रतिक्रिया से हमें जरूर अवगत कराएं ।
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