क्षरण भले ही हुआ हो तिरोहण कदापि
नहीं
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रमेश नैयर
विश्व
के विशाल लोकतंत्र भारत में आर्थिक-औद्योगिक विकार सी प्रबल संभावनाएं देखी जा
रही हैं। संभावना यह भी देखी जा रही है कि अत्यंत मलिन हो चुकी भारत की राजनीति
में अब स्वच्छता के प्रवेश का सिलसिला शुरू होगा । संसदीय लोकतंत्र के स्वस्थ
मूल्यों की स्थापना के लिए न्यापालिका और खबरपालिका दोनों से प्रभावी भूमिका
निभाने की अपेक्षा की जा रही है । न्यायपालिका के कुछ ताजा़ फैसलों और
पत्रकारिता के चंद नए रुझानों से कहीं-कहीं आस का उजास भी झलकता है । समाचार
पत्रों का लोकतंत्र के तीनों स्तंभों पर प्रभाव बढ़ रहा है । यह भी सच है कि
स्वयं खबरपालिका में भी अपनी ही स्वस्थ परंपराओं से विचलन अनुभव किया जा रहा है
।
भारत में
समाचार पत्रों का विस्तार खूब हो रहा है । वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स की
एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2001 से 2005 के भीच भारतीय दैनिक समाचार पत्रों के
प्रसार में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई । इसकी तुलना में शेष विश्व के अखबारों के
प्रसार में 10 प्रतिशत का ही इजाफा हुआ । भारत में दैनिक समाचार पत्रों की
संख्या लगभग 2000 हो गई । इन आंकड़ों में छोटे-छोटे अल्पजीवी दैनिकों को शुमार
नहीं किया गया है ।
भारत में
प्रेस के इस विस्तार पर अपनी एक संपादकीय टिप्पणी में टाइम्स ऑफ इण्डिया ने
लिखा कि ये आंकड़े उन लोगों को करारा जवाब हैं जो समाचार पत्रों के अवसान की
भविष्यवाणी करते आ रहे थे । “द
वैनिशिंग न्यूजपेपर्स”
शीर्षक पुस्तक में लिखा गया कि 2043 तक अमेरिका से समाचार पत्र गायब हो जाएंगे
। यह सही है कि अमेरिका, यूरोप और विकसित एशियाई देश जापान में समाचार पत्रों
को विषम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है । ताजा बड़ी चुनौती इंटरनेट से मिल
रही है । अन्य यूरोपीय देशों में युवा वर्ग की समाचार पत्र पढ़ने में अभिरुचि
कम होती जा रही है । गंभीर समाचार पत्रों के लिए प्रसिद्ध रहे ग्रेट ब्रिटेन
में भी पिछले कुछ वर्षों से समाचार पत्रों का आकार और स्वरुप बदल रहा है । जिस
लंदन टाइम्स के संपादक को ब्रिटिश प्रधानमंत्री से भी अधिक शक्तिमान माना जाता
था, वहां भी संपादक के प्रभाव का क्षरण हो रहा है । उसका एक कारण यह भी है कि
मनोरंजन, फैशन, जीवनशैली और गपशप के साथ ही ग्लैमर को समाचार पत्रों में अधिक
महत्व दिया जाने लगा है । ऐसा ही परिवर्तन भारत में भी देखा जा रहा है । वे
संपादक जिनके नाम से अखबार को जाना जाता था, अब कम हो रहे हैं । समाचार पत्र
संस्थान में संपादक की जो धाक और उसका जो सम्मान कुछ दशक पहले तक हुआ करता था,
अब क्षीण हो रहा है । संपादक की अपेक्षा समाचार पत्र समूहों की पहचान अधिक
प्रभावी होने का सिलसिला भी चल पड़ा है ।
कुछ क्षेत्रों
में एक अतिवादी घोषणा की जा रही है कि संपादक नाम की संस्था समाप्त हो गयी है ।
यह घोषणा अंशतः ही सही मानी जा सकती है । आज भी अनेक समाचार पत्रों में संपादक
की भूमिका महत्वपूर्ण है और उनका महत्व भी है । परंतु उनके नाम उंगलियों पर ही
गिने जा सकते हैं । समाचार पत्रों के स्वामित्व के स्वरूप में जैसे-जैसे
परिवर्तन होता गया वैसे-वैसे संपादक के महत्व का भी क्षय होता गया । पिछले तीन
दशकों में समाचार पत्रों के स्वामियों ने अखबारों को शुद्ध व्यवसाय के रुप में
चलाने की कला विकसित कर ली । पहले संपादक की संस्था पर प्रबंधन की पकड़ मजबूत
बनाने के लिए अखबार के मालिक अथवा उनके व्यवसायिक हितों की रक्षा करने में कुशल
लोगों को प्रबंध संपादक बनाया जाने लगा । फिर कुछ समाचार पत्रों में सीधे उनके
स्वामी ही अपना नाम प्रधान संपादक अथवा संपादक के रुप में प्रकाशित करने लगे ।
कुछ
समाचार पत्रों के स्वामी चूंकि स्वयं श्रेष्ठ पत्रकार रहे थे और अपने संघर्ष
अथवा पारिवारिक विरासत के कारण समाचार पत्र के संपादक बने, इसलिए वे संपादक नाम
की संस्था की गरिमा को बनाए रखने में सफल हुए । मेरी जानकारी में
‘द
हिंदू’
पत्र-समूह के एन. राम, पंजाभी के ‘अजीत’
पत्र-समूह के संपादक बृजेंदर सिंह और
‘देशबंधू’
समूह के मायाराम सुरजन उनके स्वामी होने के साथ ही श्रेष्ठ संपादक भी रहे ।
उनकी पहचान और प्रतिष्ठा उनके संपादकीय लेखन के कारण ही बनी ।
‘द
हिंदू’
के श्री एन. राम एवं ‘अजीत’
के श्री
बृजेंद्र को
विरासत में पत्रकारिता का आभामंडल प्राप्त हुआ था, जिसे उन्होंने अपनी साधना से
और भी दीप्त किया । सरदार बृजेंदर सिंह को मुझे नजदीक से देखने परखने का अवसर
मिला । उनके पिता साधुसिंह हमदर्द ने पंजाभी अजीत जालंधर से शुरू किया था,
परंतु बृजिंदर सिंह ने ‘द
ट्रिब्यून’
समाचार पत्र-समूह के पंजाभी दैनिक से संपादन को पसंद किया । अजीत में वह मालिक
की हैसियत से रह सकते थे, परंतु उन्होंने पंजाभी ट्रिब्यून में वेतनभोगी
श्रमजीवी पत्रकार के रूप में काम करना श्रेयस्कर समझा । सरदार साधूसिंह हमदर्द
के निधन के बाद उन्हें विवशतः अजीत की बागडोर संभालनी पड़ी । संपादक और
पत्र-समूह के स्वामी के रुप में उन्होंने अजीत की व्यावसायिक सफलता के साथ ही
प्रतिष्ठा में भी इजाफा किया ।
श्री मायाराम
सुरजन के मातहत थोड़े से वक्त तक काम करने का अवसर भी मुझे मिला । देशबंधु उन
दिनों सीमित वित्तीय साधनों के कारण संघर्ष के दौर से गुजर रहा था । मायाराम जी
ने प्रदीर्घ संघर्ष और शब्द की साधना से अपने व्यक्तित्व को तराशा था । सही
मायनों में उन्होंने शून्य से शिखर की यात्रा की थी । तक समाचार पत्र की चाकरी
छोड़कर उन्होंने स्वयं का दैनिक समाचार पत्र शुरु करने का संकल्प किया तो
मन-प्राण से अपने मिशन में जूट गए । मायाराम जी लेखनी के धनी थे । वैचारिक तौर
पर उनका रुझान वामपंध की ओर था और उनके अंतरंग मित्रों में भी अधिकतर वामपंथी
लेखक एवं विचारक थे । परंतु द्वेष अथवा पूर्वाग्रह उन्होंने किसी के प्रति
नहीं रखा । उनका कालम ‘फिलहाल’
पाठकों के प्रायः सभी वर्गों में लोकप्रिय था । मायाराम जी विद्वान थे । उनका
अध्ययन विशाल था । उनकी लेखन-शैली आकृष्ट, उद्वेलित और प्रेरित करती थी । यही
कारण है उनके स्तंभ, संस्मरण और राजनीतिक विवेचन आज भी उनकी पुस्तकों के माध्यम
से पढ़े जाते हैं ।
विषम आर्थिक
चुनौतियों और उस समय के एक साधन संपन्न समाचार पत्र-समूह से प्रतिद्वंद्विता के
कारण मायाराम जी को कभी-कभी छोटे-मोटे समझौते भले ही करने पड़े, परंतु संपादकीय
मूल्यों का उन्होंने अपने समाचार पत्र में क्षरण कभी नहीं होने दिया । अपने
सहयोगियों को भी उन्होंने यथासंभव पत्रकारीय लेखन की पूर्ण स्वंत्रता दी ।
देशबंधू के रायपुर संस्करण के संपादक पं. रामाश्रय उपाध्याय का मायाराम जी इस
सीमा तक सम्मान करते थे कि अपनी रौ में जब उपाध्याय जी ने मायाराम जी पर ही
तीखा कटाक्ष अपने कॉलम- ‘एक
दिन की बात’
में कर दिया तो उन्होंने उपाध्याय जी से एक शब्द नहीं कहा । अविभाजित
मध्यप्रदेश में जिन तीन संपादकों का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता था,
उनमें मायाराम जी को गिना जाता था । दो अन्य थे श्री राहुल बारपुते और श्री
राजेंद्र माथुर । उन तीनों जैसी लोकप्रियता उनके बाद किसी संपादक को मध्यप्रदेश
और छत्तीसगढ़ में अब तक प्राप्त होना शेष है ।
समाज और देश
के प्रति संपादक का एक दायित्व होता था । है तो आज भी । वह पाठक को जानकारी
देने, उसे शिक्षित करने और उसका परिमार्जन करने का काम अपने लेखन के द्वारा
बड़ी सहजता के साथ करता था । यह सहजता और सरलता ही उसके लेखन में रोचकता का
समावेश भी करता थी । खतरे उठाकर भी व्यापक लोककल्याण और समाज तथा देश के हित
में बेबाकी के साथ अपनी बात कहने का साहस संपादक में हुआ करता था । आजादी के
आंदोलन के दौरान तो राष्ट्रीयता की अलख जगाने वाले संपादकों के विषय में कहा
जाता था कि जिस हाथ में इस समय लेखनी है उसमें किसी भी पर हथकड़ी पड़ सकती है ।
प्रायः प्रत्येक महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानी और जन-नेता किसी पत्र का या तो
संपादन करता था, अथवा पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन किया करता था । उस दौर के
ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जब संपादकों ने जेल की यातनाएं भोगीं । कुछ ने तो
प्राणोत्सर्ग भी किया । स्वतंत्र भारत
में
रफ्ता-रफ्ता ऐसे संपादकों की संख्या कम अवश्य होती गई, परंतु समाप्त नहीं हुई ।
सन् 1975-77 के आपातकाल के दौरान दो श्रेणियों के संपादकों के वास्तविक चरित्र
उजागर उए । जालंधर के हिंद समाचार पत्र-समूह के स्वामी-संपादकों ने प्रेस की
बिजली काट दिए जाने के बाद अपनी बात पाठकों तक पहुंचाने के लिए ट्रैक्टर से
प्रिंटिंग प्रेस चालू करने की युक्ति तलाश ली । कुलदीप नैयर सहित अनेक संपादक
जेल गए । परंतु एक बड़ी संख्या में संपादक-पत्रकार-लेखक ऐसे भी निकलने जो
इमरजैंसी की प्रशस्ति गाथाएं लिखने लगे । उनके बारे में यह उक्ति प्रसिद्ध हुई
थी, “हमने
केवल आपको झुकने को कहा था, आप तो घुटनों के बल रेंगने लगे ।”
इमरजैंसी के
बाद भी जब-जब प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने की कोई शासकीय पहल हुई, मूल्यों के
प्रहरी संपादक साहस के साथ खड़े हुए । एक उदाहरण देना चाहूंगा, जून, 1984 के
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान लगाई गई सेंसरशिप का । उन दिनों मैं दैनिक
ट्रिब्यून, चंडीगढ़ में था । ट्रिब्यून पत्र-समूह के प्रधान संपादक श्री प्रेम
भाटिया के एक संपादकीय को सेंसर अधिकारी ने रोकने के लिए कहा । उस अधिकारी की
दृष्टि में संपादकीय आपत्तिजनक था । शाम के 5 बच चुके थे । सेंसर अधिकारी का
मंतव्य भाटिया साहब तक पहुंचाया गया । उन्होंने टेलिफोन से पंजाब के जनसंपर्क
प्रमुख श्री सुरिंदर कपूर से संपर्क करके बताया कि संपादकीय अब पृष्ठ से हटाया
नहीं जा सकता । श्री कपूर ने कहा कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदीरा गांधी के
निर्देश हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के तत्काल बाद के हालात को देखते हुए
संपादकीय-कॉलम में भी कोई आपत्तिजनक बात नहीं जानी चाहिए । भाटिया साहब ने
दृढ़तापूर्वक कहा कि संपादकीय तो ट्रिब्यून के अंग्रेजी, हिंदी और पंजाभी तीनों
संस्करणों में यथावत जायेगा । जो कार्रवाई करना चाहें करते रहें । भाटिया साहब
का तर्क था कि पंजाब और भारत के हितैषी हम भी हैं ।
यह तो थी
संपादकीय साहस की बानगी । संपादक किस प्रकार से गंभीर खतरों के भीच भी लेखन से
समझौता नहीं करते,
यह
देखने-समझने का अवसर मूझे पंजाब के आतंकवाद के उफान के दौरान मिला। पांच वर्षों
से कुछ अधिक समय तक मैं दैनिक ट्रिब्यून में था । पंजाब केसरी के संस्थापक
संपादक लाला जगत नारायण आतंकवादियों की गोलियों से शहीद हो गए । उनके साहसी
सुपुत्र रमेश चंद्र जी ने पंजाब केसरी की कमान संभाली । घर में एक शहादत हो
जाने के बाद भी रमेश जी भयभीत नहीं हुए । पूरी प्रखरता के साथ आतंकवादी मंसूबों
और उनके सरहद पार के पोषकों के विरुद्ध लिखते रहे । इसकी कीमत उन्हें भी अपनी
शहादत से देनी पड़ी । कुछ अन्य राष्ट्र और समाज के हितैषी संपादकों को अपनी जान
से हाथ धोना पड़ा ।
इसी संदर्भ
में संपादक के दायित्व और मूल्यों का उल्लेख श्री प्रेम भाटिया के संदर्भ में
करना चाहूंगा। उनका मानना था कि प्रत्येक पत्रकार को अपने लेखन के माध्यम से
अपने पाठक वर्ग को संस्कारिता करना चाहिए । उनका स्थायी निर्देश था कि
आतंकवादियों द्वारा की जा रही हत्याओं के जुगुप्सापूर्ण चित्र समाचार पत्र के
प्रथम पृष्ठ पर कतई प्रकाशित न किए जाएं । सामूहिक हत्याओं के समाचार प्रकाशित
करते समय भी संयम बरता जाए, ताकि आतंकवादियों का सांप्रदायिक टकराव फैलाने का
जो ध्येय ऐसे हत्याकांडों के पीछ रहता है उसको बल न मिले । भाटिया जी का मानना
था कि पाठक वर्गो को भाषा के संस्कार देना भी संपादक और पूरे संपादकीय विभाग का
दायित्व है। यही कारण है वह नामचीन संतंभ लेखकों द्वारा भेजे जाने वाले कॉलम का
भी खूब कसा हुआ संपादन कराते थे। उनकी भाषा में आवश्यक परिष्कार करने का
दायित्व ट्रिब्यून के विद्वान सहायक संपादकों को दिया जाता था। शब्द के प्रयोग
और भाषा शैली के प्रति वह इतने सजग रहा करते थे कि ट्रिब्यून समूह में एक वाक्य
प्रयोग होता था “मिस्टर
भाटिया वुड यूज ए मिस्प्लेस्ड कॉमा एज़ ए बुलेट टु फायर यू।”
चूंकि भाटिया साहब सुबह की संपादकीय बैठक लेने से पहले स्वयं पूरा समाचार पत्र
पढ़कर आते थे, इसलिए उस दिन के हर अवसर की हर चूक उनके ध्यान में रहती थी। इसी
प्रकार अच्छी रिपोर्ट, फीचर या शीर्षक और इंट्रो भी उनकी नजर से चूकते नहीं थे।
वह स्वयं भी नियमित रूप से संपादकीय, विशेष टिप्पणियां, यात्र वृतांत और
संपादकीय पृष्ठ के लिए लेख लिखते । ऐसे दिग्गज संपादक कुछ अन्य समाचार पत्रों
में भी रहे । एक उदाहरण श्री चेलापति राव का देना चाहता हूं । वह नेहरू परिवार
के स्वामित्व वाले ‘नेशनल
हेरल्ड’
के संपादक थे। इमरजैंसी का विरोध उस अखबार में संभव नहीं था । श्री चेलापति राव
असहाय थे, परंतु उन्होंने निर्देश दिया कि इमरजैंसी का महिमा मंडन संपादकीय
लेखन में न किया जाए इसी प्रकार उन्होंने श्री संजय गांधी की स्तुति पर भी
बंदिश लगा दी।
पिछले दो-ढाई
दशकों में संपादक की सत्ता और महत्ता को लेकर मिश्रित अनुभव रहे हैं। इस तथ्य
से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुल मिलाकर समाचार पत्र संस्थान में और उसके साथ
ही समाज में भी संपादक का प्रभाव कम हुआ है, लेकिन ऐसे संपादक हमेशा रहे हैं और
आज भी विद्यमान हैं, जिन्होंने इस पद की गरिमा को बनाए रखा है।वस्तुतः संपादक
की प्रतिष्ठा दो कारणों से प्रभावित होती है - एक तो समाचार पत्र संस्थान का
चरित्र तथा समाचार पत्र के प्रकाशन के पीछे उसका ध्येय, दूसरे संपादक के पद का
दायित्व संभालने वाले पत्रकार के अपने जीवन मूल्य और उसकी अपनी आकांक्षाएं ।
ऐसे “संपादकों”
की संख्या इधर बढ़ी है, जो सत्ता के गलियारों में राजनीतिज्ञों तथा व्यवसायिक
उद्यमों की लायज़निंग करने को तत्पर रहते हैं। कुछ संस्थान अपने व्यवासायिक
हितों के पोषण के लिए ऐसे व्यक्तियों को संपादक के रूप में रखते हैं, जो
मंत्रियों और नौकरशाहों के भीच उनके हितों के संवर्द्धन के लिए निरंतर संपर्क
साधते रहें। ऐसे व्यक्तियों के लिए संपादक का परिचय पत्र सत्ता के गलियारों में
आमद-रफ्त बढ़ाने का परमिट होता है। सौभाग्य से व्यापक पत्रकार बिरादरी और
विचारशील पाठक वर्ग उन्हें सम्मान नहीं देता।
लेखनी तथा
विचार के धनी संपादक की सत्ता के क्षरण और समाचार पत्रों में उनकी मांग पहले की
अपेक्षा कम होने का एक कारण संपादकीय लेखन के प्रति पाठकों के लालसा में कमी
होना भी माना गया है। अनेक सर्वेक्षणों में पाया गया या उनका हवाला देकर बताया
गया कि संपादकीय टिप्पणियों की पाठक संख्या कम होती जा रही है। कुछ एक
सर्वेक्षणों में तो कहा गया कि मात्र छह-सात प्रतिशत पाठक ही संपादकीय पढ़ते
हैं । तो क्या मान लिया जाए कि सभी तरफ संपादकीय अग्रलेखों ने अपना महत्व खो
दिया है ?
तर्क यह दिया जाता है कि समाचार पत्रों के विस्तार पत्रों के विस्तार, उनमें
जीवन शैली फैशन, मनोरंजक तत्व, हलके-फुलके समाचारों और रोचक सचित्र फीचरों की
बहुलता होने के कारण संपादकीय पृष्ठ और संपादकीय टिप्पणियां समाचार पत्र के
संपूर्ण कार्यकलापों का छोटा-सा हिस्सा बनकर रह गई हैं। लेकिन यह पूरी तरह सच
नहीं है। आज भी न केवल भारत, बल्कि पश्चिमी देशों में भी संपादकीय लेखन का
महत्व बना हुआ ङै।जनमत निर्माण और ज्ञान प्राप्त करने के ध्येय से अभी भी
संपादकीय टिप्पणियों को गंभीरता के साथ लिया जाता है। विशिष्ट स्तम्भकारों की
मांग पाठक वर्ग में बनी हुई है। समाचारों की भीड़ के भीच दिशा-निर्देश करने
वाला लेखन संपादकीय कॉलम ही होता है। हर बड़ी घटना अथवा घटनाक्रम पर पाठक अपने
चहेते न्यूजपेपर की संपादकीय टिप्पणियां पढ़ना चाहता है, ताकि वह वास्तविकता की
आत्मा का साक्षात्कार कर सके । आवश्यकता इस बात की है कि संपादकीय को पठनीय
होने के साथ ही निष्पक्ष, निर्भीक और विचारशील बनाया जाए। संपादकीय अभी भी पाठक
को न केवल दिशा देते हैं, बल्कि प्रभावित भी करते हैं। कई बार ऐसे प्रसंग आते
हैं जब संपादकीय लेखन व्यामोह में एक मशाल की तरह दमकते हैं, जब-जब प्रेरित
समाचारों और विज्ञापनों के भीड़ के भीच सच किसी मेले में बच्चे की तरह खोजाता
है, तो संपादकीय उस सच को सामने लाने का काम करता है। संपादकीय लेखक संपादक के
साहस, उसकी दृष्टि की स्पष्टता और उसके आकलन का दर्पण भी होता है। जब तक यह
दर्पण साफ रहेगा, तब तक संपादकीय की प्रतिष्ठा और संपादक की सत्ता एवं महत्ता
बनी रहेगी । चूंकि संपादकीय में संपादक का संपूर्ण व्यक्तित्व प्रतिध्वनित और
प्रतिबिंबित होता है, इसलिए उसी के आधार पर उसका समाज में स्थान भी बनता है।
संपादक का
महत्व इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह किस प्रकार से अपन सहयोगियों, विशेष
कर युवा प्रतिभाओं को तराश सके। जो संपादक अपने कनिष्ठ सहयोगियों के प्रति
मानवीय संवेदना रखते हुए उन्हें अच्छा पत्रकार बनाने में रुचि रखता है, उसकी न
केवल संस्थान में, बल्कि समाज में भी प्रतिष्ठा बनती है। वह संपादक अपने आप में
एक संस्था बन जाता है। वह अपने व्यक्तित्व की छाप अपने सहयोगियों पर छोड़ता है
और अपने ज्ञान की रश्मियां उनके लेखन में बिखेरता है। ऐसे संपादक हर दौर में
रहे हैं, आज भी हैं, और कल भी रहेंगे। उनका प्रतिशत भले ही कम हो गया हो, परंतु
उनका तिरोहण नहीं हुआ है।
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(रमेश नैयर
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वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक, दैनिक भास्कर, संडे आब्जर्वर (हिन्दी), ट्रिब्यून
सहित कई पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे । संप्रति
छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक हैं । संपर्कः समता
कालोनी, रायपुर,
छत्तीसगढ़)
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