छत्तीसगढ़ में दैनिक पत्रकारिता के
जनक पं. शुक्ल
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oबसंत कुमार तिवारीO
पत्रकारिता
के इतिहास में छत्तीसगढ़ मित्र के प्रकाशन के लिए जिस तरह माधवराव सप्रे को
स्मरण किया जाता है उसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के प्रथम दैनिक
‘महाकोशल’
के प्रकाशन के लिए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल को स्मरण
किया जाएगा । 1952 में साप्ताहिक महाकोशल को दैनिक करके शुक्ल ने दैनिक समाचार
पत्र की पत्रकारिता छत्तीसगढ़ में शुरू की और लंबे समय तक वे पत्र के प्रधान
संपादक और संचालक रहे । उन्हें छत्तीसगढ़ की दैनिक पत्रकारिता का जनक कहा
जाएगा।
श्यामाचरण शुक्ल को राजनीति की तरह पत्रकारिता भी विरासत में मिली थी। शुक्ल
परिवार को पत्रकारिता से बहुत लगाव था। स्व. पंडित रविशंकर शुक्ल ने कांग्रेस
पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ कराया और राज्य की तत्कालीन राजधानी नागपुर से
नागपुर टाइम्स नामक दैनिक का वर्षों तक प्रकाशन कराया । स्व. शुक्ल के पुत्र
अंबिकाचरण और भगवतीचरण शुक्ल भी संपादक रहे। विद्याचरण ने ने
‘प्रतिभा’
नामक साहित्यिक पत्रिका का बहुत वर्षों तक प्रकाशन किया । उनके संपादन में वह
अपने समय की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका थी ।
‘हितवाद’
समाचार पत्र का स्वामित्व भी श्री शुक्ल को है।
नागपुर टाइम्स के संपादक भगवतीचरण शुक्ल और तत्कालीन प्रदेश सरकार के बीच मतभेद
होने के कारण उन्हें संपादक का पद छोड़ना पड़ा। उन्होंने अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता के अपने अधिकार को लेकर प्रेस कौंसिल में याचिका दायर की और निर्णय
उनके पक्ष में ही गया। कहा जाता है कि आजाद देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
का किसी पत्रकार द्वारा जीता गया यह पहला मामला है।
श्यामाचरण
शुक्ल एक आदर्श पत्रकार थे।व्यक्ति और समाज की बेहतरी के लिए अपे पत्र में सदैव
लिखते रहे । उनकी नीति सर्वहारा के हितों की रक्षा करने की सदैव रही। छत्तीसगढ़
के प्रथम दैनिक महाकोशल ने समाज और व्यक्ति के बुनियादी विकास के लिए सदैव
संघर्ष किया। राजनीति और सत्ता की राजनीति में रहते हुए भी शुक्ल ने अपनी इसी
नीति का पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ पालन किया।
शुक्ल सक्रिय
राजनीति में थे । उनके समाचार पत्र में कांग्रेस पार्टी की नीतियों और
कार्यप्रणाली को लेकर आलोचना भी छपती थी। 1962 में उन्हें मध्यप्रदेश कांग्रेस
कमेटी ने अनुशासनहीनता का नोटिस दिया कि वे कांग्रेस के विरूद्ध लिखकर अनुशासन
तोड़ रहे हैं। शुक्ल ने अपने उत्तर में कहा कि समाचार पत्र के संपादक के नाते
उनकी जिम्मेदारी और दायित्य विसंगतियों को उजागर करने और सुधार के लिए प्रयत्न
करने की है। कांग्रेस नेता और संपादक दोनों को एक-दूसरे में विलुप्त करके नहीं
देखा जाना चाहिए । अंततः कांग्रेस कमटी को अपना निर्णय बदलना पड़ा। रायपुर में
गास मेमोरियल कांड के जांच आयोग ने महाकोशल को उत्तरदायी उठराया। शुक्ल ने
अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के अपने पत्र के अधिकार को लेकर तात्कालीन मुख्मंत्री
डॉ. कैलाशनाथ काटजू को सहमत कराया। डॉ. काटजू शुक्ल की राय से सहमत थे कि
समाचार पत्र के निष्पक्ष संपादक पर गतिरोध लगाने से नागरिक अधिकारों पर
हस्तक्षेप होगा।
श्यामाचरण शुक्ल अपने को मूल रूप से पत्रकार ही मानते थे
। राजनिति में सक्रिय और मुख्यमंत्री बनने के बावजूद उन्हें पत्रकार कहलाना ही
अच्छा लगता था । उन्होंने विधायक का चुनाव लड़ते समय व्यवसाय के कालम में
पत्रकार लिखा और अपना पहला पासपोर्ट भी पत्रकार के रूप में ही प्राप्त किया।
पत्रकार को नैतिक मूल्यों की रक्षा करना, समय पर हस्तक्षेप कर रचनात्मक
प्रतिपक्ष की भूमिका अदा करने की बात वे सदैव करते थे। सनसनी पैदा करने और पीत
पत्कारिता से उन्हें सख्त नफरत थी । अपने पत्र और राजनीति दोनों में उन्होंने
नैतिक मूल्यों के विरूद्ध कभी कोई समझौता नहीं किया। पत्रकार के रूप में वे
राष्ट्रीय हित की बात सोचते थे। क्षेत्रीयता जैसी राजनीति की विचारधारा पर उनका
विश्वास नहीं रहा। वे राष्ट्रीय हित के लिए सदैव समर्पित रहे। स्वाधीनता
संग्राम के आग्रणी नेताओं और घटनाक्रम से संबद्ध रहने के कारण उनकी बुनियादी
मूल्यों पर भरपूर आस्था थी। बदलते परिवेश में इन मूल्यों के हास पर वे सदैव
अपनी राय बेबाक कहते और लिखते थे। शुक्ल के
देहावसान से
पत्रकारिता के स्वर्णिम युग का एक प्रकाश विलुप्त हो गया । पत्रकार जगत खास तौर
से छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता उनके योगदान की सदैव ऋणी रहेगी ।
वर्तमान
छत्तीसगढ़ शुक्ल के राजनेता ही नहीं, एक पत्रकार और संपादक के अथक परिश्रम से
बन सका है। वे कहा करते थे कि राजनीति से नहीं, उनकी पहचान पत्रकारिता से की
जानी चाहिए। वर्तमान मीडिया को स्व. शुक्ल के समग्र योगदान के लिए सदैव स्मरण
करना चाहिए। पत्रकारिता में आधी सदी से ज्यादा उनके योगदान को पत्रकारिता
इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाना चाहिए । मेरा सौभाग्य है कि 1952
में दैनिक महाकोशल से प्रारंभ मेरी पत्रकारिता के लगभग 55 वर्ष छत्तीसगढ़ में
ही बीते । शुक्ल के साथ काम करने का बहुत लंबा समय मिला। स्व. शुक्ल के प्रति
इन्हीं शब्दों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
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