ये वासनाकाल !
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प्रमोद भारद्वाज
हिन्दी
पत्रकारिता का यह वासनाकाल है । इसमें पत्रकार को मुख्यमंत्री सत्कार देता है
और परचून की दुकान वाला दुत्कार देता है । इसलिए हिन्दी पत्रकारिता कोई क्रांति
या परिवर्तन लाने वाली है, भविष्य का ऐसा कीर्तन कर कर रहे लोगों से गुजारिश है
कि वे ऐसे अतिआत्म या अतिपर विश्वास से बाज आएं और पहले इस वासनाकाल को तसल्ली
से गुजर जाने दें । लेकिन कुछ व्याकुलताएं हैं कि जैसे कि हिन्दी पत्रकारिता
में हैं तो उसका भला कैसे हो, क्योंकि इसके भले से जाहिर है आखिरकार, अकेला
अपना भला ही नहीं होने वाला है ।
हमें हिन्दी
और अंग्रेजी के पचड़े में नहीं पड़ना है । भाषा के भूगोल और नागरिक भाषा के
लत्ते भी नहीं उतारने हैं । सिर्फ यह भर जानना है कि क्या परिवर्तन ही हमें
खारिज होने से बचाए रख सकता है या परिवर्तन हमारे लिए एक नया गगन प्राप्त कर
सकता है। याद रखें कि शब्द की मृत्यु कभी भी पूर्वाभास नहीं देती । यह तो हो
जाती है या फिर उसका वध होता है । प्रश्न परिवर्तन का है । ये कैसे हो और ये
कैसा हो । और क्या, जैसा भी होगा, क्या हिन्दी पत्रकारिता को सुघड़ता और शुचिता
का कोई संस्कार दे पाएगा या फिर वे हवस के एक जैसे कुसंस्कारों का ही कोई
उत्तरवर्ती विस्तार होगा ।
परिवर्तन जैसा
कि दिख रहा है, सिर्फ तकनीकी है । पत्रकारिता
में
तो बरसों पुरानी ढीठता और उबासी कायम है । अखबारों का महज भूगोल बढ़ रहा है ।
एक से बीस अखबार और एक से बीस मशीनें हो रही हैं । इमारतों की ऊंचाइयां बढ़ रही
हैं । मालिकों के पास कारों के नए मॉडल बढ़ रहे हैं । राष्ट्रीय राजमार्गों पर
कई किलोमीटर में उनके फार्म हाउस बढ़ रहे हैं । पत्रकारिता का क्या हो रहा है
?
खबरें वही हैं । जो टीवी चैनलों पर है । फोटो वही है जो इंटरनेट पर हैं । रपट
वही हैं जो समाचार एजेंसियों पर हैं । छपा शब्द, बस सजा हुआ है । वह फोर कलर
में है । लेकिन क्या यह फोर कलर ही उसे महान बनाता है । उसे साख देता है । उसे
सीख बनाता है । उसे जीवित रखगा ?
संभवतः नहीं । क्योंकि यह शब्द, ब्रह्म नहीं है, ये नश्वर शब्द हैं । यहां खबर,
एक कागज की लूगदी भर तो क्या ऐसा परिवर्तन हमें खारिज होने से बचा लेगा या यह
खुद ही हमें खा जाएगा ?
यह जो दूसरा विकल्प है, यथार्थ है ।
हम खाए जा रहे
हैं । पत्रकारिता बेची जा रही है । या कहें कि पत्रकारिता के सहारे एड बेचे जा
रहे हैं । जबकि देखिए अखबार मालिकों की नई पीढी़ के छोकरे, एक उलटा वातावरण बना
रहे हैं कि एड के सहारे अखबार चलाए जा रहे हैं । यदि यह सच होता और एड अकेले
बिक सकता होता तो इस देश में कम से कंम एक अखबार (बे-खबर) तो केवल एड का होता ।
पर नहीं है । एड अकेले बेचे ही नहीं जा सकते । अखबार, अकेले बेचे जा सकते हैं ।
बिकते रहे हैं । और तब भी बिकते रहे हैं जब शिल्पा शेट्टी या ब्रिटनी स्पीयर्स
की तस्वीरें (अर्थात बाजार का दबाव) नहीं हुआ करती थी और उसे बेचने वाले भी
मार्केटिंग के या एमबीए वाले नहीं होते थे । उसे तो खरीदने वाले होते थे ।
क्योंकि अखबार में हमारी सबकी सूचनाएं होती थीं । छोटी से छोटी और बडी़ से बड़ी
। आज कहां हैं ?
सूचनाएं कातर कतार में हैं । एड आगे हैं । सूचनाएं एड से पछाड़ खा रही हैं ।
पिट रही हैं । आपने जोखिम उठाकर भले ही खबर दी है, पर स्पेस की समस्या है । एड
है । वह जाएगा पहले । तब तक चाहे आपकी खबर ठहरे तो ठहरे अन्यथा उसकी मौत हो जाए
। आपके जोखिम औ रईमानदारी की किसे फिकर है । क्या आपको ऐसा परिवर्तन जंच रहा है
?
मुझे तो नहीं जंच रहा ।
हां, मुझे एक
परिवर्तन की जरूर याद पड़ती है । यह भक्तिपूर्ण याद है । यह परिवर्तन राजेन्द्र
माथुर था । खुदानखास्ता, यह एक पत्रकार का नाम था । पर मैं उसे, हिन्दी
पत्रकारिता का अब तक का पहला और आखिरी परिवर्तन मानता हूं । एक घटना मानता हूं
। यह तकनीकी परिवर्तन नहीं था यह ऐसा परिवर्तन था कि समूची हिन्दी पत्रकारिता
हिल गई थी । यह पत्रकारिता की भाषा, उसकी बौद्धिकता, उसकी गंभीरता, उसकी मारकता
और उसकी पहुंच में एक व्यापक बदलाव था । अखबार से मालिक की मुक्ति और उस पर
संपादक के परम प्रभुत्व का बदलाव था । पर इस परिवर्तन की आयु ज्यादा नहीं थी ।
क्योंकि मालिकों की नई फौजें, विदेशों से लौट रही थीं वे अपने साथ विदेशी
रणनीतियां, उनके उदाहरण साथ ला रही थीं । संपादक की अखबार से इसके बाद मौत
सुनिश्चित थी, सो हो गई । उस ज्ञात तथ्य के बाद भी कि आखिरकार, अखबार कौन
निकालेगा ।
आज जो
परिस्थितियां हैं, उनमें अखबार निकालने के लिए पत्रकारों या जो लिखना जानते
हैं, उनकी उपयोगिता खत्म सी मान ली गई है । उन्हें या तो चूहा बना दिया गया है
या फिर बड़े चूहों का सहयोगी या मातहत । इस पूरे तंत्र में मेरूदंड का कोई काम
नहीं है । कलम का कोई काम नहीं । आपको
‘मैनेज’
करना आना चाहिए । आपको मार्केट पटाना आना चाहिए । जो इस फ्रेम में अपने हाथ या
पैर या लालफीताशीही के कुछ मांस और रोटी के आवश्यक कामों में व्यस्त हो गए । इस
तरह पहले अखबार गया, फिर पत्रकार गया और अब जाने को जो बाकी है, वह भी जाकर
रहेगा । इसके लिए हमारा स्वीकार या हमारे समझौते दोषी हैं, कहना एक बीन को
बजाना ही नहीं, बीन को नचाना भी होगा । दरअसल, हममें ही यानी हिन्दी पत्रकारिता
में ही भीतर परिवर्तन होने थे । पर नहीं हुए ।
एक हुआ,
राजेन्द्र माथुर जैसा, पर वह भी ऐसा कहा गया कि न हुआ था, न होगा । इस एक
निकम्मे और निठल्ले संस्कार में, हमने इस समूची पत्रकारिता को दूबकाकर छोड़
दिया है । हमने न राजेन्द्र माथुर की लकीर को आगे बढ़ाया, न अपनी लकीर खींची ।
इससे पत्रकारिता ठहर गई । हम राजेन्द्र माथुर की चर्चाओं, किताबों और ग्रंथों
में इतने खो गए कि तब तक हम पर तकनीकी हावी हो गई । मशीनें हावी हो गईं ।
मैनेजर हावी हो गए । हम आगे बढ़े ही नहीं । या फिर हमने आपस में पत्रकारिता को
आगे बढ़ने नहीं दिया । हमने अपने पत्रकारों को पहचाना ही नहीं । समय की शिला पर
उनके छैनी हथौड़े देखने की हमने फुर्सत ही नहीं जुटाई ।
हममें भी बहुत
नायक हैं, राजेन्द्र माथुर हैं या उनसे आगे की कोई चीज है पर हम पर हमने ही धूल
डाली हुई है । मिट्टी डाली हुई है । हम एक दूसरे पर लांछन उछालने में जुटे हैं
। इसलिए जिस रास्ते से पेट भरता है, ज्यादातर वही पसंद वही पसंद करते हैं । जिस
रास्ते से कोई उदाहरण या मील का पत्थर निकलता हो, वहां हमें भटक जाने,
कंफ्यूज्ड हो जाने और ठोकरों का डर ज्यादा रहता है । ऐसे में कहीं किसी ने नायक
बन जाने की परिस्थितियां पैदा भी होती हैं, तो हम उनका तक बध कर डालते हैं ।
यदि हमारी ही रवैया ऐसा है तो फिर ये विलाप क्यों
?
हिन्दी पत्रकारिता पर उमड़ते-घुमड़ते संकटों पर ये सेमीनार, ये लफड़े ।
पत्रकारिता विश्वविद्यालयों की भी भूमिका को आप न बख्शें । इनमें पत्रकारिता का
ज्ञान सामान्य ज्ञान की तरह पढ़ाया जा रहा है । वही पुरानी किताबें, वही पुराने
तरीके और वही परीक्षाएं । वही नजारे गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर ले-देकर
राजेन्द्र माथुर तक । उसके बाद बंद । उत्तर पत्रकारिता की मिसालें खत्म । उसके
नायक खत्म और ये सब पढ़ाने जाते हैं अखबारों में, अपेक्षाकृत दिहाड़ी-दिहाड़ी
मजदूरी से भी कम वेतन पर काम कर रहे पत्रकार ।
ऐसे में भी
यदि हिन्दी पत्रकारिता का कबाड़ा न होगा तो यह उसका सौभाग्य ही कहिए । पर यह
हिन्दी पत्रकारिता की सौभाग्य रेखा नहीं है । यह एक रेत की नदी है, जो रेत ही
उगलेगी । और क्या इस रेत में भी कोई फूल खिलने वाले हैं । बिल्कुल नहीं । तो
हमारे पत्रकारिता संस्थाओं को भी अपना पाठ्यक्रम बदलना होगा । बदलने की यह
प्रक्रिया भीतरी है, बाहरी नहीं । जैसे ही यह हिन्दी पत्रकारिता में शुरु होगी,
कई स्तरों पर एक साथ विस्फोट होंगे । इन्हीं विस्फोटों की रोशनी में दिखाई
पड़ेंगे हमारे समय के नायक, हमारे समय की असल और वाकई में होती पत्रकारिता । पर
इससे पहले पत्रकारिता के इस वासनाकाल को गुजरने दीजिए, प्लीज ।
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(प्रमोद
भारद्वाज -
मध्यप्रदेश और
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का एक चर्चित नाम । इन दिनों अमर उजाला इलाहाबाद में
समाचार संपादक है। हाल ही में जो दिखा सो लिखा नामक पुरस्कार साहित्य संगम,
इलाहाबाद से प्रकाशित हुई है ।
संपर्कः 105, ग्रीन अपार्टमेंटस, पन्नालाल रोड,
दरभंगा, इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश
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