Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

संपादकीयआवरण कथादस्तावेजप्रसंगवशबातचीतमेरा समयसक्सेस स्टोरीविमर्शस्मृति-शेषपरदेशअंतरजालसाहित्यइत्यलम्

पत्रिका-जगत्अन्यान्यपाठ्यक्रमगतिविधिसमाचारसंदर्भ-कोशआलेख भेजिएआपके पत्रपुरातन अंकहमारा मिशनप्रकाशनमुख्य-पृष्ठ

 

आवरण कथा

 

सत्य नहीं तथ्य छापते हैं हम

 ---------------------------

 प्रकाश दुबे

नेक संवाद प्रेमियों के मन में बारम्बार प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि सम्पादक नाम की संस्था बची है या तिरोहित हो गई ? डेढ़ सौ बरस पूर्व उदंत मार्तंड समाचार पत्र आरंभ हुआ, तब समाचार पत्र की सत्ता निर्विवाद रुप से सम्पादक में निहित थी । रोचक तथ्य है कि उस दौर में स्वामी, प्रकाशक और सम्पादक एक ही व्यक्ति हुआ करता था । इन दिनों कुछ समाचार पत्रों के स्वामी तीनों भूमिकाओं का निर्वहन करने के आग्रही हैं । कारण अलग है । आरंभिक युग में सम्पादक ही निवेशक था । जेल जाने की तैयारी वही रखता था । अब स्वामी, बतौर सम्पादक नाम छपवाने में दिलचस्पी रखते है क्योंकि संपादक की संस्था का रुतबा है । सत्ताधारी व्यक्ति संपादक से मिलना चाहते हैं । दो प्रसंग याद आ रहे हैं । पहला किस्सा नाम के साथ बखान करता हूं । दूसरा बिना नाम बताए । राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स के संपादक थे । तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संपादक को रात के भोजन पर आमंत्रित किया । माथुर साहब ने हामी भर दी । नियत तिथि के एक दिन पूर्व फोन आया कि किस विषय पर प्रधानमंत्री का साक्षात्कार लेना चाहेंगे ? श्री माथुर ने स्पष्ट कहा कि दावत पर वार्तालाप करेंगे । साक्षात्कार करना हमारे संवाददाताओं का काम है । बातचीत कर मैं समाचार नहीं लिखूंगा । संपादकीय अथवा लेखों पर उनकी छाया रहेगी । यही उन्होंने किया भी । दूसरी घटना रज्जू बाबू के निधन के बाद की है । एक विशाल समाचार पत्र समूह के स्वामी ने प्रधानमंत्री से समय मांगा । प्रधानमंत्री कार्यालय ने तीन महीने के प्रयास के बावजूद समाचार पत्र स्वामी को कृतार्थ नहीं किया । इस भीच स्वामी को सूचना मिली कि सम्पादक को प्रधानमंत्री ने आमंत्रित किया है । प्रसंग से संबंधित प्रधानमंत्री तथा सम्पादक दोनों जानते थे कि भेंट का समय साक्षात्कार लेने की खातिर दिया गया है ।

 

दोनों घटनाओं के परिणाम की जानकारी पहले दी, ताकि हमें विश्लेषण करने में आसानी हो । श्री माथुर ने प्रधानमंत्री से रात्रि भोज पर बात की । इंटरव्यू नहीं किया । श्री माथुर ने राजीव की राजनीति पर अनेक लेख लिखे । एक लेख में यहां तक लिखा कि राजनीतिक ज्ञान के तराजू पर उन्हें नौसिखिया कहना उचित होगा । श्री माथुर के निधन के लगभग 15 बरस बाद छपी पुस्तक का कुछ राजनीतिक तथा पत्रकार मित्रों ने उस आधार पर विरोध किया कि पुस्तक में राजीव विरोधी टिप्पणियां हैं । श्री माथुर के निधन के कुछ बरस बाद जिस सम्पादक का ने प्रधानमंत्री का साक्षात्कार लिया और छापा, उसकी संपादकीय तथा समाचार पत्र दोनों से विदाई हो गई । पत्र स्वामी को संपादक का प्रभाव नागवार गुजरा । यह बात और है कि पत्र मालिक किसी निजी समस्या के हल के लिए प्रधानमंक्री का समय चाहता था । कुछ बरस बाद उसी सम्पादक को फिर नियुक्त किया । वह न घर का रहा न घाट का । पुनर्नियुक्ति में उसे जिस पद पर रखा गया, वह प्रबंधकीय था या सम्पादकीय ? यह स्पष्ट नहीं था । इस समाचार पत्र में आज भी संपादक अनावश्यक माना जाता है । दोनों प्रसंग संपादक की सत्ता और महत्ता के अनेक पहलू उजागर कर देते हैं । राजेंद्र माथुर प्रधानमंत्री का की मुलाकात लिख देते, तब शायद प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करने वाले हिन्दी के पहले सम्पादकों में शुमार किए जाते । वे संपादक की महत्ता के साथ-साथ मर्यादा भी जानते थे और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध थे । संपादक की सत्ता तब तक है, जब तक वह स्वयं तय करें कि उसे क्या करना है और क्या करना चाहिए ? दूसरी तरफ हम इस तथ्य को बिसरा नहीं सकते कि कुछ निवेशक पसंद नहीं करते कि संपादक कर्मचारी से अधिक कुछ नहीं है । हमें बेहिचक स्वीकार कर लेना चाहिए के अनेक बिरादर संपादक स्वयं को कर्मचारी और मात्र कर्मचारी साबित करने के लिए उतावले रहते हैं । विवशतावश कुछ ही नमते हैं । उनकी संख्या अधिक है, जो ऊपर की सीढ़ी छूने की आस में झुकने के लिए आतुर रहते हैं ।

 

संपादक की सत्ता का क्षरण का रोना रोने वाले समुदाय में सभी ईमानदार है, ऐसा मेरा अनुभव नहीं है। अनेक मान्यवर सम्पादक मेरे कथन से असहमत हो सकते हैं। मात्र चार बरस की सम्पादकीय के भरोसे मुझे किसी सिद्धांत के प्रतिपादन का अधिकार नहीं मिल जाता। मेरे कथन का आशय मात्र इतना है कि सम्पादक की सत्ता की चिंता करने वाली बिरादरी में वे राजनेता अगुवा हैं जो सम्पादक की कलम से निकले आलोचना के दो शब्दों पर बिफर उठते हैं। उनका वश चले तो अखबार के मालिक को सम्पादक के प्रहार से बचने के लिए कवच बना दें। हर सम्पादक का पाला ऐसे महानुभावों से पड़ता है। बौखलाहट तब बढ़ती है, जब दाल नहीं गलती। नौकरशाह भी पीछे नहीं हैं। वे जानते हैं कि समाचार पत्र में पूंजी लगाने वाला या वाले व्यक्तियों के अन्य धंधे हैं। किसी का उद्योग है, किसी का व्यापार। सम्पादक से टकराव टालने के लिए वे समाचार पत्र के निवेशक का सहारा लेना चाहते हैं। अपराध को कर्म और व्यवसाय मानने वाले वर्ग को वही सम्पादक अच्छा लगता है जो उनकी तरफ से आंख मूंद ले। एक बात और पांच से पच्चीस हजार प्रसार वाले छोटे समाचार पत्र का सम्पादक या स संवाददाता किसी से विज्ञापन का जुगाड़ कर लेता है, तब वह अनैतिक हो जाता है। दिल्ली में रहकर मैंने जाना है कि किसी व्यक्ति को उम्मीदवारी दिलाने तथा विज्ञापन पाने की खातिर सौदेवाजी करने वाला वर्ग घूमता रहता है। विज्ञापन बटोरने वाले लघु समाचार पत्रों के सम्पादकों पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले कुछ महानगरीय पत्रकार राजनीतिक दल के विज्ञापन बांटने का काम करने या कल-कारखानों के रोड़े दूर करने में गौरव महसूस करते  हैं । हमें स्वीकार करना होगा कि बाबूराव पराड़रकर, माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी या अम्बिका प्रसाद वाजपेयी का युग अलग था । हमें याद रखना होगा कि 15 अगस्त 1947 को लिखे अग्रलेख में पराड़कर ने चेतावनी दी थी कि चौकन्ने नहीं रहे, तब स्वतंत्रता निरर्थक हो जाएगी । हमें यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि राजेंद्र माथुर, मनोहर श्याम जोशी या साहित्यिक सम्पादक धर्मवीर भारती एवं रघुवीर सहाय और राजनीतिक चिंतक गणेश मंत्री के समय की चुनौती अलग थी । ये तो हुई समाज के दृष्टिकोण में बदलाव की बातें ।

 

दो पन्ने के साप्ताहिक या मासिक अखबार निकल रहे हैं । सम्पादक तक नहीं जानता कि अगले दिन क्या छपने वाला है ? मुझे नहीं पता कि बाबूराव पराड़कर ने कभी क्रिकेट सहित किसी खेल पर टिप्पणी लिखी हो । छोटे से द्वीप पहुंचे राजेंद्र माथुर ने वहां के कौओं के बारे में लिख भेजा । प्रभाष जोशी को क्रिकेट पर लिखने का नशा है ।  कुछ सम्पादकों को बता दिया गया है कि उनका काम लिखना नहीं, लिखवाना है । कम्प्यूटर ने नए संस्करण विस्टा से लेकर छत्तीसगढ़, विदर्भ-आंध्र प्रदेश की नक्सली हिंसा का विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है । उसमें इतनी कल्पनाशीलता हो कि इन विषयों पर सामग्री पाठक को परोस सके । संवाददाताओं तथा उप सम्पादकों की बिगड़ती भाषा के कारण सम्पादक की चुनौती कठिन होती चली है । बहुत कम संवाद माध्यमों ने प्रशिक्षण की आंतरिक व्यवस्था की है ।

 

समाचार पत्र को एक तरफ साबित करना है कि वह टीवी चैनल नहीं है और साथ ही यह भी दिखाना है कि चैनलों से पीछे नहीं है उनका अखबार। इसी चुनौती के कारण समाचार पत्र अधिकांश पत्रिकाओं को गटक गए । आज देश में समाचार पत्रिकाएं अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। देश के चार-पांच राज्यों के पाठकों तक पहुंचने वाली शायद ही कोई साहित्यक पत्रिका बची हो । इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि अब वैसे सम्पादक नहीं रहे। देश के अलग-अलग हिस्सों में अच्छे काम करने वाले स्वैच्छिक संगठनों की पीठ थपथपाने तथा लैटरहैड की बदौलत माल खाने वालों का भंडा फोड़ने वाले सम्पादकों से भरतभू खाली नहीं हुई है। पहले सम्पादक का मुख्य काम विचार करना तथा विचार करने के लिए प्रेरित करना था। मूल काम वही है परंतु अब पाठक जागरूक हैं और जिनके पक्ष या विरोध में आप लिखते हैं, वे भी। आजादी के लिए जेल जाने का जोखिम उठाने वाला सम्पादक भी गलत लेखन के लिए अदालत की परिक्रमा करने से बचना चाहेगा। इस बात का ध्यान रखना कमजोरी नहीं है। देश के कानूनों तथा समाजिक मूल्यों का ध्यान रखना है। जयपुर या झुंझनू में बैठकर सतीप्रथा के विरोध में अग्रलेख लिखते समय जिस सम्पादक की कलम कांपती है, वही सम्पादक बुश के इराक पर हमले के विरोध में डंके की चोट पर प्रवचन से कागज भर सकता है।

 

फिल्म या फैशन के बारे में छाप देने भर से सम्पादक पर सामाजिक सरोकर की अनदेखी कर देने का आरोप लग जाता है। कहा जाता है कि वह मालिक और बाजार की गुलामी करने लगा। ध्यान दें। कुछ करोड़ रुपए की खातिर शिल्पा शेट्टी ने रसोई में मुर्गा पकाना स्वीकार किया। बरसों पूर्व मैंने बस्तर के चित्रकोट ने निकट मुर्गा लड़ाई देखी थी । मुर्गों के पैरों में तेज चाकू जैसा औजार बांधा था । दो मुर्गे एक-दूसरे को लहुलुहान कर रहे थे । दर्शक उत्तेजित थे । वे आदिवासी हैं, इसलिए आपकी दृष्टि में पिछड़े हैं । टीवी पर करोड़ कमाने की खातिर शिल्पा फफककर रो रही थीं । कुछ निवेशक एक लाख पाउंड का ईनाम शिल्पा को देकर करोड़ों पाउंड कमा गए । हममें से अधिकांश सम्पादक आदिवासी ग्रामीणों की तरह मुर्गा लड़ाई का आनंद नहीं ले पाए । उल्टे सहानुभूति के आंसू बहाने लगे । बडे़ भाई की सिसकू बहिन शिल्पा जीत गई, तब देश का माथा गर्व से ऊंचा हो गया । शिल्पा के साथ देश की प्रतिष्ठा लहूलुहान होने या जीत पर तुरही बजाने वाले इक्के-दुक्के सम्पादकों ने महत्ता घटाई होगी । अधिकांश सम्पादकों ने बेहिचक इस पाखंड का भांडा फोड़ा । टीवी चैनल दिन रात दिखाते रहे कि बैतूल के निकट एक महाशय मरने वाले हैं । वे नहीं मरे । जान बच जाने पर उन्होंने कहा कि पत्नी के प्रताप से काल पलायन कर गया । इन आधुनिक फर्जी सत्यवान की आलोचना करने की बजाए ज्योतिषी का विकेट गिरने का इंतजार करते रहने पर हम संवेदनहीन संपादक हैं । राजेंद्र माथुर की एक बात हमेशा याद रखता हूँ । उनकी आलोचना होती थी कि वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचते । विश्लेषण कर देते हैं । इस आरोप के बारे में उनसे पूछा । श्री माथुर का उत्तर था- सम्पादक  थानेदार नहीं है । पुलिसकर्मी अभियुक्त को अपराधी मानते हैं । दोष तय करना न्यायपालिका का काम है । हमारी महत्ता घट रही है क्योंकि हम स्वयं को थानेदार और न्यायधीश दोनों समझने लगे । हम जैसे नौसिखिया सम्पादकों को गुरुनानक देव दिलासा देते हैं-

धन्नु सु कागदु कलम धनु, धनु भांडा धन मस्सु ।

धनु लेखारी नानका, जिनि नामु लिखाइआ सच्चु ।। 

अर्थात धन्य वह कागज है, धन्य वह कलम है, धन्य  दावत है, धन्य वह स्याही है ।  गुरुनानक कहते हैं कि धन्य वह लिखनहार-लेखक है, जिसने उस सत्य नाम को लिखा है ।दिलासा इसलिए कि हम जानते हैं कि हम सत्य नहीं लिख रहे हैं । हम तो सिर्फ तथ्यों को परखते, लिखते और छापते हैं ।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------

(प्रकाश दुबे - लेखक दैनिक भास्कर, नागपुर के सम्पादक  हैं)

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------

lll

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रवंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

Google
WWW www.mediavimarsh.com