पुराने सपनों के साथ चलना कठिन
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पिंकी
दलाल
संपादक
अब केवल संपादक नहीं है, बल्कि बदले जमाने में उसकी भूमिका में बड़ा बदलाव आया
है और उसकी जिम्मेदारियां पहले से कहीं ज्यादा बढ़ी हैं। नए जमाने के संपादक
जहां खबरों को संवारने के लिए पहले की तरह कसरत कर रहे हैं वहीं अब वे एक मुख्य
कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ और मार्केटिंग प्रमुख की भूमिका भी निभा रहे हैं।
अब संपादकों पर तिहरी जिम्मेदारी आ गई है। जबकि पहले के जमाने में संपादकों को
केवल समाचार और केवल समाचारों के बारे में ही सोचना होते था। पुरानी पत्रकारिता
में संपादक
मसलन एक विषय राजनीति और गंभीर विषयों पर ही लिखता था लेकिन अब
रोज-रोज की हर खबर में उसे शामिल होना पड़ता है। साथ ही एक अखबार की ब्रांडिंग
भी उसे करनी होती है।
असल
में तो इलेक्ट्रानिक माध्यम के बढ़ते विस्तार से अखबार की ब्रांडिंग एक संपादक
के लिए बेहद जरूरी और अहम जिम्मेदारी है। हर अखबार को एक दूसरे के अलावा
इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की खबरों का फालोअप करना भी जरूरी होता है अन्यथा पाठक
वर्ग की सारी उम्मीदें पूरी नहीं हो पाती । बदले परिवेश में संपादक को
मार्केटिंग प्रमुख की भूमिका में भी आना पड़ा है। जिसके तहत कई तरह की पसंद और
नापसंद का ख्याल रखना पड़ता है। विभिन्न विषयों को लेकर विशेषांक प्रकाशित करने
पड़ते हैं । विशेषांक केवल विज्ञापन का पुलिंदा मात्र नहीं होते । यदि हम
म्युच्युअल फंडों पर कोई विशेषांक प्रकाशित कर रहे हैं तो यह हमारे पाठकों के
लिए भी फायदेमंद होता है । इससे हमारे पाठक जान पाते हैं कि उन्हें आयकर बचाने
के लिए या फिर भविष्य में आय का बंदोबस्त करने के लिए क्या-क्या किया जा सकता
है । ऐसे विशेषांकों से जहां तक अखबार की आय बढ़ती है, वहीं पाठकों को सूचनाएं
भी मिलती हैं और सूचना रखने वाले ही जीतते हैं । यह ऐसा हथियार है जौ आप पर
निर्भर है कि आप इसका कैसे इस्तेमाल करते हैं ।
प्रतिस्पर्धा
के इस युग में आर्थिक मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, यही वजह है कि आज
का संपादक मार्केटिंग के रोल से अपने को अलग नहीं कर सकता । कई दफा कुछ चीजें
नीति से मेल न खाती हों तो भी इस भूमिका को निभाने के लिए संपादक को समझौते
करने पड़ते हैं । बदले माहौल में कोई भी संपादक यह नहीं कह सकता कि मुझे फलां
विज्ञापन नहीं लेना है । मार्केटिंग की भूमिका में आने के बावजूद ऐसी स्थिति
नहीं है कि एक संपादक की सत्ता कमजोर पड़ी हो । संपादक तो जमीनी स्तर से ऊपरी
स्तर के बीच की एक कड़ी है और इस सेतु को बांधने, इसे संवारने और मजबूत करने का
दायित्व संपादक के कंधों पर रहता है । आज के संपादक भी खबरों के लिए पुराने
जमाने के संपादकों की तरह लड़ते हैं और अखबार व समाज के हित में खबरों को भरपूर
कवरेज देते हैं । हो सकता है कि कुछ खबरों के लिए अखबारों के मालिकों से बहस भी
करनी पड़े लेकिन मालिकों व संपादकों के बीच आपसी समझ जरूरी रहती है । आज भी कई
मौकों पर खुद संपादक भी आत्मसम्मान के लिए इस्तीफा दे देते हैं, लेकिन यह भी
यहां जानना जरूरी है कि अखबारों के मालिक भी अच्छे संपादक चाहते हैं । ऐसे में
अच्छे संपादकों को कोई भी मीडिया मालिक अपने से दूर नहीं करना चाहेगा । हो सकता
है कि पुराने जमाने की कुछ घटनाएं सामने नहीं आई हों, लेकिन मैं कह सकती हूं कि
उस समय भी शत-प्रतिशत ऐसा नहीं था कि सब कुछ एकतरफा रहा हो । उस समय भी
संपादकों को कुछ समझौते करने पड़े होंगे लेकिन उसका कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है
।
मेरी नजर में
गुजराती पत्रकारिता के श्रेष्ठ संपादक हसमुख गांधी रहे, जिन्होंने गुजराती
अखबार ‘समकालीन’
का सफल संपादन किया । उनमें काफी खूबियां थीं जिन पर यहां जमकर चर्चा नहीं की
जा सकती । लेकिन एक-एक खबर नहीं, बल्कि हर खबर के एक-एक शब्द पर वे सोचते थे,
लिखते थे और जमकर मेहनत करते थे । उन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान स्पेलिंग, भाषा
और ले-आउट पर दिया । गुजराती में जमकर अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया और अलग
स्वाद खड़ा करने में कामयाब हुए । यहां एक संस्मरण का मुझे ख्याल आता है । एक
बार एक विज्ञापन उन्हें गुजराती का मिला, लेकिन इस विज्ञापन में कुछ शब्द
गुजराती भाषा की दृष्टि से गलत थे । श्री गांधी ने उस विज्ञापन को छापने से साफ
मना कर दिया और कह दिया कि जब तक इस विज्ञापन में से भाषा संबंधी दोष दूर नहीं
हो जाते वे इसे प्रकाशित नहीं कर सकते । इसी तरह एक बार वेस्टइंडीज के क्रिकेट
खिलाड़ी ब्रायन लारा के एक रिकार्ड की खबर जानी थी जिसमें उनका बेहतरीन फोटो भी
शामिल होना था लेकिन एक बड़ा विज्ञापन उनके ले-आउट में आड़े आ रहा था । श्री
गांधी ने इस विज्ञापन को भी लौटा दिया, जबकि इस विज्ञापन के बदले लगभग 25 हजार
रुपए अखबार को मिलने थे, जो उस वक्त बडी़ रकम हुआ करती थी । लेकिन कुछ ऐसे
संपादक भी देखे हैं जिनके पास कोई दृष्टि नहीं थी । ऐसे संपादकों ने केवल
व्यक्तिगत लाभ देखे और व्यक्तिगत पत्रकारिता या संपादकी की । किसी के प्रति
उनकी प्रतिबद्धता ही नहीं दिखी ।
अगर हम संपादक
की महत्ता की बात करें तो उनकी महत्ता कभी कम नहीं होगी । रोज अखबार पढ़ने वाले
पाठकों के साथ संपादक का पारिवारिक रिश्ता सा बन जाता है । ये पाठक जहां अच्छी
चीजों के लिए संपादक को शाबासी देते हैं, वहीं कान भी पकड़ते हैं । पाठक फोन
करते हैं, पत्र लिखते हैं और हर बात पर संवाद स्थापित करते हैं । मुंबई समाचार
ने कुछ समय पहले अपने कुछ पृष्ठों को रंगीन कर दिया था तो ढेरों पाठकों ने हमें
कहा कि आपको पेज रंगीन बनाने की क्या जरूरत है । हमें मुंबई समाचार ओरिजनल
चाहिए । साथ ही विश्व के सबसे पुराने अखबारों में से एक इस समाचार पत्र ने
हमेशा से अपनी भाषा को ऐसा रखा कि जो आम आदमी की समझ में आए ।
पत्रकारिता
में हम मिशन की बात करें तो एक बात मैं यहां साफ कर दूं कि समय के साथ मिशन भी
बदला है । आजादी से पहले जहां हमारा मिशन देश को आजाद करना था उसके बाद अब
हमारा नया मिशन अंतरराष्ट्रीय नक्शे में भारत को राजनीतिक, आर्थिक ताकत के रुप
में जगह दिलाना है । समय के साथ मिशन बदले हैं और बदलने ही होंगे । आज भारत को
मीडिया ही दुनिया में बड़ी ताकत के रुप में स्थान दिला सकता है । अब हम आजादी
से पहले की या तुरंत बाद की बातें नहीं कर सकते । जो लोग पुराने सपने के साथ
चलना चाहते हैं, वे मेरी दृष्टि में उचित नहीं है । जेसिका को न्याय मिल सका ।
महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के मामले
को मीडिया ने ही उठाया जिस पर प्रधानमंत्री को विदर्भ आकर पैकेज की घोषणा करनी
पड़ी । मीडिया ने यह भी बताया कि यह पैकेज किसानों को मिला या नहीं । हालांकि,
आपराधिक खबरों को इलेक्ट्रानिक माध्यम जिस तरह बढ़ावा दे रहा है, वह उचित नहीं
है । इसमें यह माध्यम पश्चिम का अनुसरण कर रहा है । प्रिंट माध्यम ज्यादातर
समझदार है और इस तरह की चीजों को बढ़ावा नहीं देते ।
यहां हम तकनीक
की बात करें तो पहले संपादक या पत्रकारों
के लिए
नई-नई तकनीकी से परिचित होना जरूरी सा नहीं था, या वे इसे जरूरी नहीं मानते थे।
लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता । पुराने पत्रकार यदि शेपअप नहीं होना चाहते तो यह
ठीक नहीं है। नई चुनौतियों को नए लोग स्वीकार कर रहे हैं। मेरी शिकायत यह है कि
पुराने लोग नई तकनीक के साथ नहीं चलना चाहते। लेकिन नई पीढ़ी में एक दोष भी है
जो पुरानी पीढ़ी में नहीं था, वह है पढ़ने की आदत । इलेक्ट्रानिक माध्यम के
बढ़ते प्रसार से नई पीढ़ी के पत्रकार इसे अपनी सोच बढ़ाने को सरल रास्ता समझते
हैं। होम वर्क कमजोर होगा तो न तो एक संपादक बेहतर ढंग से स्थापित हो सकता है
और न ही एक पत्रकार । मेरा मानना है कि एक संपादक की बेहतर विचारधारा ही दूसरी
पीढ़ी तैयार करती है। हालांकि कुछ संपादक ऐसे भी हैं जो दूसरी पीढ़ी तैयार करने
के दायित्व से भाग रहे हैं। ऐसा वे ही संपादक कर रहे हैं जो अपने को असुरक्षित
महसूस करते हैं। लेकिन देखिए एक चीज इस पर भी निर्भर है कि दूसरी पीढ़ी कितनी
जल्दी चीजों को ग्रहण करती है। मेरी राय मे बदले जमाने के साथ हर संपादक के लिए
यह जरूरी है कि वह हर वर्ग के साथ संतुलत व ट्यूनिंग साधे । मौजूदा पाठकों को
संभालने के साथ नई पीढ़ी को भी अपनी ओर खींचना होगा। सूचनाओं पर ज्यादा जोर
देना होगा और पाठक जो चाहेगा वहीं देना होगा । अब टेबल स्टोरी का जमाना नहीं
रहा। एक संपादक की सफलता इसमें होगी कि वह पाठकों को सब कुछ उनकी अपनी भाषा में
समझा सके।(यह
आलेख कमल शर्मा से सुश्री पिंकी दलाल की बातचीत पर आधारित है ।-संपादक)
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(पिंकी
दलाल-
विश्व
के सबसे पुराने समाचार पत्रों में से एक मुंबई समाचार
की संपादक हैं
। गुजराती भाषा की प्रमुख पत्रकार होने के नाते उनकी एक विशिष्ट पहचान है ।
संपर्क - मुंबई समाचार, रेड हाउस, एसए ब्रेलवी रोड, हर्निमन
सर्किल, फोर्ट, मुंबई)
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