Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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आवरण कथा

 

बनी रहेगी संत और संपादक की महत्ता

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 नंदकिशोर शुक्ल

 

हिन्दी-विश्व के संपादकाचार्य कहे जाने वाले सुप्रतिष्ठित पत्रकार-शिरोमणि स्वर्गीय श्री बाबूराव विष्णु पराडकर ने सन 1925 में अपने एक सारगर्भित भाषण में कहा था- पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़-बड़े धनिकों और सुसंगठित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। आकार बड़े होंगे। अच्छी छपाई होगी। मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे। लेखों मे विविधता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति होगी । ग्राहकों की संख्या लाखों सें गिनी जाएगी । सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। भविष्यदृष्टा की तरह ऐसी भविष्यावाणी करने वाले श्री पराडकर का पत्रकारिता जगत के संबंध में प्रस्तुत किया गया वह निष्कर्ष आज शत-प्रतिशत सच होता दिखाई दे रहा है। परतंत्रता के कालखण्ड में स्वतंत्रता-संग्राम के दरम्यान सशक्त शस्त्र के रुप में मिशन बनीप्राणवान पत्रकारिता स्वातंत्र्योत्तर कालखण्ड मेंप्राणहीन होती क्यों दिखाई दे रही है ?  क्योंकि प्राणवान रही, पवित्र पत्रकारिता वर्तमान दौर में पद-पैसा-प्रतिष्ठा प्राप्त करने हेतु महत्वपूर्ण माध्यम के रुप मेंव्यवसाय बन चुकी है ।

 

व्यवसाय का अर्थ ही है- बाजार का बोलबाला । इसीलिए आज  ‘बाजारवाद का बिगुल बड़े जोर-शोर से बजाया जा रहा है । बाजार में नफा-नुकसान का गणित चलता है,  ‘बहुजन-हिताय, बहुजन-सुखाय  का नहीं । स्वार्थान्धता की आंधी चलती है, सिद्धांतार्थ समर्पण का संस्कार नहीं । पत्रकारिता के मिशन पर हावी इस व्यवसाय के कारण ही अखबार भी आज एक उत्पाद याने प्रोडक्ट बन गया है । अपने इस प्रोडक्ट याने अखबार अथवा दूरदर्शनी-वाहिनी (इलेक्ट्रानिक मीडिया के टीवी चैनल) को बाजार में बेचने लायक बनाने हेतु मीडिया-मालिक सभी नैतिक मूल्यों को धता बताते जा रहे हैं । फलतः लक्ष्मी हावी होते जा रही है सरस्वती पर । स्पष्ट अनुभव होता है कि वैश्व-शत्ति ने ब्रह्म-शक्ति को लगभग वनवास ही दे दिया है ।  समसनीखेज बाजारवादी पाश्र्चत्य-पत्रकारिता के अंधानुकरण का यही तो परिणाम प्राप्त होना था बोए बीज बबूल का आम कहां से होय

 

दादा बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपैया के रंग में रंगी बाजारवादी-पत्रकारिता के प्रभावशील रहते प्राणहीन-पत्रजगत में प्राण फूंकने वाले समस्त संचार-माध्यमों के संपादकों की सत्ता और महत्ता बरकरार रहना असंभव ही लगता है । लोकतंत्र की सफलता हेतु उसके चार स्तंभों- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और खबरपालिका या प्रेस याने पत्रकारिता-की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है । इस प्रणाली में सरकार और प्रेस की अहम भूमिका होती है । उनके परस्पर संबंधों की व्याख्या करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति के कभी प्रथम-प्रेस-सचिव रहे, न्यू डे के प्रकाशक बिल डी मॉयर्स ने स्पष्टतः कहा है कि प्रेस और सरकार एक दूसरे के विरोधी होते हैं । इस बात को दोहराना चाहिए - वे एक दूसरे के विरोधी होते हैं । दोनों की अपनी-अपनी विशेष भूमिका होती है । संविधान राष्ट्रपति (भारतीय व्यवस्था के संदर्भ में प्रधानमंत्री) को बनाता है और संविधान ही प्रेस की आजादी की रक्षा करता है । एक को यह जनादेश प्राप्त होना है कि वह राज-काज चलाए, दूसरे को यह सुविधा होती है कि वह भरसक कोशिश करते हुए पता करे कि हो क्या रहा है । दोनों अपना-अपना काम कैसे करते हैं, यह बात समग्र व्यवस्था प्रणाली के लिए अति महत्वपूर्ण होती है क्योंकि खुली तथा स्वतंत्र होते हुए भी नाजुक लोकतंत्र का यह स्वभाव है कि वह प्रेस और सरकार के भीच के संघर्ष पर अपनी बलि चढ़ाए बिना, फलता-फूलता रहे ।

 

स्पष्ट है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए सरकार याने कार्यपालिका पर नजर रखते हुए उसकी खबर लेने का दायित्व खबरपालिका याने प्रेस पूरी ईमानदारी से निभाए, यह अनिवार्य शर्त है । इतना ही नहीं तो शेष दोनों स्तंभों-विधायिका व न्यायपालिका की भी खबर वह ले, यह अपेक्षा भी प्रेस से रहती है ताकि ये सभी अंग बदहाल होने से बचे रहें । और, भ्रष्टाचार-मुक्त रहकर चुस्त-दुरुस्त कर्त्तव्यनिष्ठ बने रहें । प्रेस या मीडिया का महत्वपूर्ण कार्य जनता को जागरुक बनाए रखना भी है । ग्रीन व्हैली (मिसीसिपी) के डेल्टा डेमोक्रैट टाइम्स के प्रकाशक एवं पुलित्जर पुरस्कार विजेता संपादक होडिंग कार्टर के अनुसार यह हमारा (संपादकों का) दायित्व है कि हम अपनी पूरी योग्यता के साथ लोगों को खबरें देते रहें, लोगों को लज्जित करें, लोगों को गैरवान्वित करें और लोगों की इस बात के लिए सहायता करें कि लोग स्वतंत्र रह सकें (Our responsibility is to deep people informed to the best of our ability, to make people ashamed, to make people proud and to help keep people free)” लोकतंत्र के तीनों स्तंभों की खबर लेने और लोगों को खबरदार रखने की जिम्मेदारी संचार माध्यमों के सम्पादकों की है । इसीलिए उस वर्ग को अखबार का कलेवर चयन करने, सजान-संवारने का पूर्ण अधिकार दिया गया था । उसकी स्वतंत्र सत्ता को सभी ने स्वीकारा और मान्य किया था ।

 

स्वातंत्र्य-संघर्षकाल में और स्वतंत्रता मिलने के कुछ कालोपरांत तक भी संपादक की इस सत्ता में सेंध मारने का साहस कोई भी मीडिया-मालिक नहीं करता था । प्रेस में पैसा लगाने वाला पूंजीपति भी हानि सह लेता था परन्तु सम्पादक सरकारी प्रताड़ना सह लेते थे, जेल चले जाते थे, फांका-मस्ती कबूल करते थे । किंतु टूटना-झुकना कभी नहीं स्वीकारते थे । सरकार के सामने सीना ताने शंखनाद किया करते थे । अपराधियों के अधिराज्य में अड़े रहते थे । संपादकों की इस सत्ता के कारण उनकी महत्ता को भी सभी ने स्वीकारा था । तदर्थ सच्चे मन से सम्मानित भी किया था । उनके द्वारा लिखे-छापे गए प्रत्येक वाक्य को ब्रह्मा-वाक्य मानकर पूर्ण सत्य समझ लेता था सम्पूर्ण समाज । उनके विचारों से प्रेरित विशाल आंदोंलनों की आंधी उठ जाया करती थी । आज बाजारवादी हवाओं के थपेड़ों, सूचना विस्फोट के दौर में हमारे संपादकों की सत्ता और महत्ता दोनों ही गुम-सी हो गई है ।

 

मुझे अच्छी तरह याद है कि पिछली शताब्दी के छठवें दशक में उषा भार्गव काण्ड के दरम्यान दंगों के दौर में अपने पत्रकारीय-धर्म निबाहते हुए दैनिक युगधर्म, जबलपुर के सम्पादकीय-मण्डल ने कैसे सरकारी प्रताड़ना झेली थी । सरकार की खबर लेने और समाज को खबर देने के अपराध में सरकारी विज्ञापन बंद कर अखबार का गला घोंटने का प्रयत्न किया गया था । फिर भी उस अखबार के मालिकों ने संपादकीय-सत्ता में कभी हस्तक्षेप नहीं किया । फलतः संपादकीय-सत्ता की महत्ता में इजाफा ही हुआ । सरकारी असहयोग के कारण हुई आर्थिक हानि की पूर्ति स्वयं समाज ने कर दी थी । तब के युगधर्म नाम की साख आज भी बनी हुई है । बाजारवाद के चलते अपने अखबार को बिकाऊ माल बनाने के चक्कर में संपादकीय बंधु ने सत्ता शीर्ष पर बैठे सज्जन की कारगुजारियों पर टिप्पणी क्या लिख दी, बवाल ही मच गया । अखबार-मालिक ने ऐसी डांट पिलाई कि वह संपादक बंधु जब तक उस अखबार में रहे,  लिखना ही भूल गए । मात्र क्लर्क बनकर रह गए थे । एक सज्जन संपादक महोदय को तो अपनी एक टिप्पणी के कारण प्रथम पृष्ठ में बॉक्स आयटम के रुप में माफी मांगनी पड़ी थी, यद्यपि उनकी टिप्पणी सोलह आने सच थी । यह सच्चाई आम पाठकों के साथ-साथ अखबार मालिक भी जानते थे । किन्तु आर्थिक हानि न उठाना पड़े, कोर्ट-कचहरी का चक्कर न लगाना पड़े, इस बाजारवादी मनोवृति के कारण अखबार मालिकों ने सत्ता को चुनौती देने की बजाय अपने संपादक को ही सत्ताच्युत कर दिया ।

 

बाजारवाद के चलते आज सत्ता संपादक के हाथ में नहीं विज्ञापन-प्रमुख के हाथ में है । कितना ही महत्वपूर्ण समाचार या घटना क्यों न हो, उसे प्रथम पृष्ठ पर स्थान नहीं दिला पाएगा संपादक, पर्याप्त पैसा देकर विज्ञापनदाता पूरे प्रथम पृष्ठ पर कब्जा कर लेता । संपादक की सत्ता जब तक कायम थी तब तक समाज को विकृत करने वाला विज्ञापन अखबार के किसी भी कोने में छपवा देने की हिमाकत विज्ञापन-विभाग क्या मीडिया-मालिक भी नहीं कर सकता । अब तो स्थिति ही उल्टी है । दिल्ली के एक बड़े मीडिया ग्रुप के संपादक के निर्णय के विरुद्ध अत्यंत अश्लील विज्ञापन उसके साप्ताहिक में शान से छपने लगे । इसके कारण वह संपादक महोदय अपने परिवार में ही शर्मिन्दगी झेलने को मजबूर हो गए थे । एक दिन मुझसे कहने लगे शुक्ला जी, कुछ सामाजिक संगठनों को इन अश्लील विज्ञापनों के विरुद्ध संपादक के नाम पत्र लिखने हेतु प्रेरित करें । आपको तो अनेक संगठनों से अच्छा संपर्क है । ढेर सारे नाराज पाठकों के पत्र छपने पर मालिकों को नुकसान होने का भय होगा तब अश्लील विज्ञापन रुकेंगे । मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं । यह है आजकल के संपादकों की सत्ता !

 

जब संपादकों की सत्ता घटी तो उनकी महत्ता भी वैसे ही कैसे रहेगी ? यह घटी ही नहीं, घुप्प अंधियारे में अदृश्य हो गई । महत्ता ऐसी घटी की संपादक की कुर्सी छोड़ने या छुड़ा देने के बाद दुआ-सलाम करने वालों के लाले पड़ने लगते हैं । फिर तो प्रायोजित-सम्मान समारोह सम्पन्न कराने पर ही प्रशंसकों की पंक्तियां नसीब हो पाती है । सामाजिक-सरोकार रखने वाले संपादकीय-समुदाय के सहयात्रियों की अवस्था इससे भिन्न रहती है । संपादकों की महत्ता मात्र सत्ताच्युत होने के कारण नहीं घटती । उनके अपने व्यवहार से भी घटती है । लोकतंत्र में सत्ता पर नजर रखते हुए उसकी खबर लेने और लोक को देने वाला पवित्र-पत्रकारिता का पथिक यदि सत्ता के गलियारों, सम्मान व पुरस्कार की गुहार लगाते फिरेगा तो उसकी महत्ता तो घटेगी ही घटेगी । महत्ता तो उसकी बढ़ती है जो पद-पैसा-प्रतिष्ठा को वैसे ही ठोकर मारता है जैसे तुलसीदास ने मारी थी । तत्कालीन बड़े-बड़े धुरंधर सम्राट अकबर के दरबार में नवरत्न बनकर दरबारी सुखोपभोग में तल्लीन तब तुलसीदास जी ने एक झटके में वह पद ठुकरा दिया था । अब्दुर्रहीम खानखाना के माध्यम से आए उस दरबारी सम्मान को वापस करते हुए उन्होंने कहा था-

हम चाकर रघुवीर के, पढ़ो लिखो दरबार ।

अब हम का होहिंगे, नर के मनसबदार ।।

 

संत और संपादक की महत्ता तब तक बढ़ती रहेगी जब तक वे सत्ता के गलियारों से वैसी ही दूरी बनाए रखेंगे । जैसी कवि कुम्भनदास ने बनाए रखी थी । वे अकबर के आमंत्रण पर उसकी राजधानी फतेहपुर सीकरी पहुंच तो गए किन्तु उन्हें लगा कि संतों का राज-द्वार पर पहुंचना प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है । वे उन्टे पांव लौटने लगे, तब स्वागतार्थ सम्मुख आए अकबर ने उन्हें ससम्मान रोकना चाहा। किन्तु वे रुके नहीं, कहते गए

संतन को कहां सीकरी सो काम ?

जिनके मुख देखे दुख लगे, उनको करन परी परनाम ।

आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसर गये हरिनाम ।।

 

ऐसे सत्ता-सुख सुविधा विरोगी संतों की महत्ता तो सदैव कायम रहेगी ही । संत और संपादकीय-समूह जब तक अपने साध्य के प्रति प्रतिबद्ध साधना करते रहेंगे, तब तक कोई भी सत्ता उन्हें महत्ताहीन नहीं कर सकेगी । वह सत्ता चाहे राज-बल, धन-बल या बाहु-बल किसी की भी क्यों न हो । क्योंकि ये दोनों ही वर्ग लोकाराधना में लीन रहते हैं । लोकशक्ति उनकी महत्ता अवश्यमेव बरकरार रखेगी ।

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(नंदकिशोर शुक्ल - राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रखर पत्रकार। दैनिक युगधर्भ जबलपुर सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। संप्रति बिलासपुर में रहकर स्वतंत्र लेखन करते हैं । संपर्क - बड़े गौंटनिन बाड़ा, सीपत चौक, सरकंडा, बिलासपुर, छत्तीसगढ़)

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रवंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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