दृश्य माध्यमों में सौंदर्य चिंतन
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महावीर सिंह
"माध्यमों
को सिर्फ बोल्ड दिखने के लोभ में या धन-ऐष्णा के फिर में सेक्स प्रेरित नग्नता
या द्विअर्थी भाषा के चंगुल से निकलना चाहिए। फूहड़ता किसी भी रूप में
सौंदर्य-सृजन नहीं कर सकती है सैंसर बोर्ड की आलोचना की जाती है और स्वतंत्रता
की उदार परिभाषाएं भी दी जाती है लेकिन इस प्रकार की खुली छूट से न तो कला का
ही भला हुआ है ओर न दर्शक का।"
आकल्पित
रूपंकरों की अभावानुभूति ही सैंदर्यचेतना की जनक है। यह अभावानुभूति जितनी
तीव्र और सघन होगी, सौंदर्योपासना और सौंदर्य-भोग की लालसा उतनी ही बलवती होगी।
भौतिक संसार अनेक प्रकार की विकृतियों एवं कुरुप कृतियों का घर है। वस्तुगत
प्रतिकूलताएं एवं जीवन की अग्राह्म परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की अरुचिकर
मनोदशा को विकसित करती हैं। सारा पर्यावरण स्वच्छ, स्वास्थ्यवर्धक,
सौंदर्ययुक्त, सुंगधित और मनोकूल नहीं है। व्यक्ति का प्रकृति के विरुद्ध
संघर्ष इसी प्रतिकूलता की भौतिक एवं मानसिक टीस के कारण है। सौंदर्य चेतना भी
अनुकूलीकरण की प्रक्रिया का एक भाग है। दृश्य माध्यम, वस्तु रुपों और उत्पादनों
की वास्तविक आकृतियों को आकर्षक दृश्यों में अभिव्यक्त करने का उपक्रम है।
भावनात्मक एवं विषयगत अनुभूति को दृश्य रुपांतरण द्वारा भावक के लिए ग्राह्य
बनाने की चुनौती एक बड़ी चुनौती है। पांचों ज्ञानेन्द्रियों के पृथक अनुभव
तंत्र है लेकिन अनुभूति के स्तर पर भिन्नता का आभास नहीं होता । दृश्य माध्यम
विभिन्न इंद्रियों की अनुभूतियों को भी दृश्य सौंदर्य में परिवर्तित करने की
चेष्टा करते हैं और यही कारण है कि उनका वर्चस्व सर्वत्र दिखाई देता है।
चित्रकला में
सर्वाधिक प्रयोग और नवाचार दृश्य चेतना तथा दृश्य रुपंकारों का प्रभाव अनेक
गुना बढ़ गया है। आज डिजीटल तकनीक के कारण दृश्य क्षमता में तेजी से विकास हुआ
है और दृश्य की अपेक्षा दृश्य का छायाचित्र अधिक आकर्षक लगता है। वहनीयता के
कारण छायादृश्योंको कहीं भी प्रस्तुत किया जा सकता है । आशंसक या भावक वास्तविक
दृश्यों की अपेक्षा उनके कैमरा चित्रों को अधिक पसंद करता है। क्योंकि
छायाचित्र वास्तविकता की प्रतिकृति है, स्वयं वास्तविकता नहीं है। कहा गया है
कि “सुवरन
को ढूंढत फिरे कवि, कामी और चोर”
।
सौंदर्य की
खोज और उसके उपभोग की लालसा न केवल कवि कलाकार, धनी एवं रूचि सम्पन्न लोगों में
होती है वरन आम व्यक्ति भी सौंदर्य का पोषक है । सुखद अनुभूति से जुड़ा होने के
कारण सौंदर्य चिंतन अभिव्यक्ति माध्यमों का मुख्य आयाम है। साहित्य में अनेक
रचनाकारों में सौंदर्यवर्णन के लिए अनेक विधाओं की रचना की है लेकिन वस्तु एवं
सौंदर्य में अभेद के कारण सौंदर्य की अपेक्षा वस्तु की ही व्याख्या की गई है।
फ्रांस के लेखक ने कहा है कि मैं सुंदरता को पसंद करता हूं। सुंदर वस्तु को
नहीं। सौंदर्य की अभिव्यक्ति किसी भौतिक माध्यमों के अभाव में संभव नहीं है और
इस स्थिति को बदला भी नहीं जा सकता । इस कारण हमारा ध्यान कला से हटकर कलाकार
पर केंद्रित हो जाता है । साहित्य में रस, ध्वनि, रीति, भाव, अंलकार, वक्रोक्त
आदि जो भी सौंदर्य संबंधी उपकरण है, वह सभी अधूरे हैं। काव्य सौंदर्य,
रेखा-चित्रीय सौंदर्य, शिल्प-सौंदर्य, वस्तु-सौंदर्य, भाव-सौंदर्य,
छवि-सौंदर्य, नाद सौंदर्य, आस्वाद-सौंदर्य अर्थात, आकृति और मनुष्यकृत सौंदर्य
रूपों की लंबी श्रृंखला हमारे आसपास विद्यमान है। इस सभी उपादानों में दृश्य
सौंदर्य सर्वोपरि है क्योंकि दृश्य तत्व अन्य सभी तत्वों में दृश्य या अदृश्य
रुप में विद्यमान है। व्यक्ति प्रमुख रुप से दृश्य में ही सर्वाधिक संतुष्टि
प्राप्त करता है। सौंदर्य की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति दृश्य में ही संभावित है। अतः
वह दृश्य में आत्मलीन होना चाहता है, वहीं उसकी प्राण प्रतिष्ठा होती है ।
ईश्वर दर्शन के प्रति जो बेचैनी उसके हृदय में है वह किसी अन्य विधा में नहीं
है। दृश्यलोभ सभी प्रकार के लोभ लालच से उत्कट है। आत्मा की पिपासा, अद्भुत रूप
से ही शांत हो जाती है। अन्य विधाएं उसे रूप-दर्शन के लिए प्रेरित कर सकती है
लेकिन उसकी पूरी तसल्ली वांछित रूप-दर्शन में ही संभव है। प्रकृति का सौंदर्य
उसका सहचर है। वह हर क्षण प्रकृति के साथ रहता है। ईश्वर की प्राप्ति उतना सरल
नहीं है अतः वह ईश्वर के असीम सौंदर्य का अनुभव सुंदर स्त्री-पुरुष के रूप में
करने के लिए विवश है। सौंदर्य एक दुर्लभ उत्पादन है। कुरुपता, दुर्गध, सड़न और
विकृतियां सर्वत्र विद्यमान हैं। प्रकृति भी कुरुपता को ढंकने का प्रयास करती
है। लताएं, पत्ते, पुष्प और फल वृक्ष के रूक्ष एवं खुरदुरे स्वरूप को ढंकने का
उपक्रम है। इसी प्रकार वस्त्राभूषण एवं अन्य प्रसाधन भी मनुष्य के कुरुप,
बेढंगे, अनाकर्षक ढांचे या रंग-रोगन को कोमोफ्लाज करने की कोशिश करते हैं। आजकल
इन प्रसाधनों का व्यवसाय हो रहा है। प्रसाधनों पर आधारित फैशन, डिजाइन आदि के
पाठयक्रम चल रहे हैं। सौंदर्य को एक उद्योग के रुप में चलाकर हम उसे बाजार का
रूप दे रहे हैं। फिर भी क्या सौंदर्य को खरीदा-बेचा जा सकता है
?
यह विचारणीय प्रश्न है। ऐसा कहते समय इस तथ्य को भूला दिया गया है कि
“मन
की रुचि तेजी जितै, तितै तिली रुचि होय”।
प्रेक्षक की
अपनी इच्छा, कामानुभूति और काम उपभोग की लालसा उसकी सौंदर्य जिज्ञासा और उसे
प्राप्त करने की चेष्टा हर क्षण विचलित करती रहती है। वह सामाजिक नियम, संयम,
रीति-नीति, मूल्यबोध के तटबंधों को तोड़कर सौंदर्य प्राप्ति की ओर लपकता है।
उसका प्रबल कामोन्माद उसे उन्मुक्त सौंदर्यपासना या उपभोग के लिए प्रेरित करता
है। संसार में सौंदर्य चेष्टा से बढ़कर कोई लालच नहीं है। कवियों ने सौंदर्य की
महानता का गुणगान खुले रूप से किया है। दूरदर्शन के आप्त वाक्य
‘सत्यं
शिवं सूंदर’
में भी यही ध्वनि है अर्थात जो सुंदर है वही शिव है और सत्य भी है । सौंदर्य
संसार का सर्वोंत्कृष्ट प्राप्य है। ‘ए
थिंग ऑफ ब्यूटी इज ए ज्वाय फार एवर ।’
यदि यह सम्पदा व्यक्ति के पास है तो उसे किसी अन्य गुण अर्जन की आवश्यकता नहीं
है। सौंदर्य ही सर्वशक्तिमान है । इस सम्पदा का दोहन करने के लिए पूरे विश्व
में सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। सौंदर्य अपने आप में अद्भुत आकर्षण
है। वह सबसे ऊंची बोली पर बिकता है। उसके ग्राहकों का टोटा नहीं है । उसकी
पूर्ति कम होने का कारण वह बहुमूल्य बना रहता है । कला-साहित्य, संगीत,
संस्कृति सभी उसके दास है । बिना सौंदर्य मिश्रण के कोई विज्ञापन ग्राहकों को
लुभा नहीं सकता । सौंदर्य प्रेम की रचना करता है और फिर प्रेम सौंदर्य का सृजन
करता हैं । दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं ।
आधुनिक तकनीकी
उपकरणों और प्रौद्योगिकी के कारण सारे विश्व की सौंदर्य-गतिविधियां हमारे घरों
में उपलब्ध हैं । उपग्रह, इंटरनेट, सेलफोन आदि अनेक माध्यम हमारे अनुभवों को
साकार रूप देने के लिए तत्पर है। दृश्य-माध्यम, प्रेक्षक की इस दुर्बलता को
समझते है । अतः उन्हें अपनी कला के लिए एक बड़ा बाजार मिल जाता है । सौंदर्य
अनुभूतियों के छिछोड़े-संस्कारणों में परिवर्तन हो रहीं है । ऑन-लाइन सौंदर्य
की सेक्सी छवियां सौंदर्योपभोग से जुड़ी हुई है। क्योंकि बिना हिंसक संघर्ष के
सौंदर्य प्राप्ति असंभव है। मॉडल, डीजे, वीजे, स्टेज शो, डिस्को, चैट-कैफे,
नृत्य-वीडियो, संगीत वीडियो आदि विधाओं का बाजार गरम है। लाइफ-स्टाइल ही एक
मात्र ध्येय दिखाई दे रहा है। कांटेन्ट का स्थान फार्म ने ले लिया है।
वास्तविकता के साथ इनता बड़ा मजाक या उपहास इस उत्तर आधुनिकता की एक पहचान बन
गई है। यह सच है कि विन्यास या आकल्पन किसी भी वस्तु या व्यक्ति के बाहरी कलेवर
की साजसज्जा के लिए आवश्यक तत्व है। स्वच्छता, सुरूचिपूर्ण वस्त्राभूषण,
सौंदर्य-प्रसाधन आदि भी एक सीमा तक जीवन की आवश्यक मांग या मनोविज्ञान की
संपूर्ति के लिए समीचीन है। लेकिन वे पूर्ण सत्य को ढंकने के असफल प्रयास कर
रहे हैं। जब किशोरों को सच्चे यथार्थ का सामाना करना होता है तो निराशा, तनाव
और असफलता ही हाथ लगती है।
आप बाहरी आवरण
में कांट-छांट कर सकते हैं लेकिन किसी व्यक्ति की शारीरिक बनावट को कांट-छांट
नहीं सकते । पेड़ पौधों की पत्तियों का कैंची से विन्यास कर सकते हैं
?
प्रकृति द्वारा शरीर या वनस्पतियों को ज्यों का त्यों स्वीकार करना होता है ।
क्या सौंदर्य की भी प्रतियोगिता संभव है
?
यह प्रकृति की रचनात्मक का अपमान है । इन प्रतियोगिताओं में चुनी गई इनी-गीनी
बालिकाओं के कारण असंख्य युवतियों के भीतर ही भावनाएं घर कर जाती हैं और उनका
जीवन तनाव ग्रस्त हो जाता है । सौंदर्य जीवन की अमूल्य सम्पदा होते हुए व्यक्ति
के स्तर पर जीवन-मूल्यों से सर्वथा असम्पृक्त नहीं रह सकता । छायाचित्रों में
शारीरिक सौष्ठव का अंकन होता है लेकिन वास्तविक व्यक्ति वहां छुप जाता है । अतः
सौंदर्य तत्व को कुरुपता को ढंकने वाले आवरण के रुप में नहीं लेना चाहिए । उसे
शरीर और स्वभाव से जोड़कर की देखा जा सकता है । रुप को सुन्दर स्वभाव से
जोड़कर ही देखा जा सकता है । बाहरी रुप की नुमाइश ने हमारे भीतरी व्यक्ति को
कुरुप कर दिया है और काम-लालच ने हमें कामिनीदास बना दिया है । हमारी सौंदर्य
लोलुपता, काम-लोलुपता में बदलती जा रही है । प्रेम और काम दो विरोधी तत्व है ।
“जहां
राम तह काम नहीं, जहां काम नहीं राम।”
दृश्य
माध्यमों ने मूल्यपरक सौंदर्य से पल्ला झाड़ लिया है और आकृति पर ही ध्यान
केंद्रित कर दिया है । शरीर का वजन घटाने के फेर में व्यक्ति के चारित्रिक भार
को ही कम कर दिया है और व्यक्ति भारहीनता की स्थिति में अस्थिर होकर कुलांचे
मार रहा है । दृश्य-छवि से दीवाना होकर व्यक्ति आवरणों के रंग-रुप, विन्यास,
कांट-छांट, मैंचिंग आदि में ही उलझा हुआ है । सौंदर्य प्रसाधनों की ओट में
व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को कभी समझ नहीं पाता । लोलुपता का दास बनाने के लिए
प्रेक्षक के साथ छल नहीं करना चाहिए । सौंदर्य की वास्तविकता और वस्तु की
वास्तविकता दो अलग-अलग सत्य है । इन्हें एक साथ गड्ड्-मड्ड् नहीं करना चाहिए ।
वस्तु का अपना चरित्र है । वह थोड़े दिनों में नष्ट हो जाती है । जबकि व्यक्ति
चिर-सौंदर्य की कामना करता है । प्रेम, सौंदर्य, लगाव, काम-भाव सभी अलग-अलग
सत्ता रखते है और सभी में किसी एक बिंदु पर साम्य स्थापित नहीं हो सकता । यही
कारण है कि इनमें से किसी के साथ रिश्ता जोड़ते समय हमें सभी कुछ साथ प्राप्त
नहीं होता और हम निराकार छवियों के एक वेक्यूम में छटपटाते रहते हैं । जो कुछ
दिखाई दे रहा है, वह ईश्वर में दिखाई दे रहा है । वह छवि है अवश्य, लेकिन उस
छवि का कोई आधार नहीं है । तुलसीदास ने इस ओर इंगित किया हैः
केशव कहि न
जाय का कहिए ।
देखत तब रचना
विचित्र अति समुझि मनहिं मन रहिए ।।
शून्य भीत पर
चित्र रंग नहिं तनु बिनु लिखा चितेरे ।
धोये मिटाय न
मरे भीति दुःख पाय यहै तनु हेरे ।
ऐसी रचना में
जहां सौंदर्य केवल चित्र सत्य है, वहां प्राप्ति की कल्पना कितनी असंभव है । एक
भ्रम में भ्रमित होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है । दृश्य माध्यम को दृश्य की
विडम्बना को नहीं भूलना चाहिए कि वह छवि की छवि दे रहा है जो भौतिक सत्य की झलक
से नितांत दूर है । आकार को देखा जा सकता है लेकिन उसे उसी रुप में अनुभूत नहीं
किया जा सकता । कलाकार उन्हें विभिन्न रुपंकर विधाओं द्वारा दृश्य बनाने की
चेष्टा अवश्य करता है, लेकिन आकार हमारे मन की कल्पना है । मन के पर्दे पर
असंख्य छवियां आती-जाती रहतीं है । एक सेकेंड में 25 या 30 फ्रेम से भी अधिक
छवियां हमारे मन के कैमरे में उतरती है और हम उन्हें एक साथ सहेज कर नहीं रख
सकते । मन किसी एक छवि से संतुष्ट नहीं होता । अतः छवि के नवीन रूपों की वह
कल्पना करता है । कामुकता प्रधान छवियों के कारण व्यक्ति की मनोवृति कामप्रेरित
अपराधों की ओर मुड़ जाती है और वह रिश्ते नाते भुलकर काम-अपराध कर बैठता है ।
सौंदर्य
चिन्तन को सामाजिक मूल्यों से जोड़ना आवश्यक है । सामाजिक समरसता तथा स्वस्थ
मानसिकता के विकास के लिए दृश्य-चित्रण सौंदर्य की गरिमा को नष्ट कर सकता है और
कलात्मक भावबोध को सीधे काम-उपभोग से सम्बद्ध कर सकता है । कला वस्तुतः व्यक्ति
की रुप संवेदना को वस्तु के सीधे उपभोग से दूर रखने का उपक्रम है ।
सौंदर्य-संसार, अनुभुति का विषय है, वह वस्तुओं या सेवाओं का सीधा क्रय-विक्रय
या आदान-प्रदान नहीं है । सौंदर्य चेतना आत्मा के स्तर पर अलौकिक आनंद का सृजन
करती है । यह वस्तुगत होते हुए भी आत्मगत है और दृश्य-सत्य होते हुए अदृश्य
आनंद
की मौलिक शर्त है। सौंदर्य चित्रण के समय सारा ध्यान समाज की कला संवेदना को
समाज के व्यापक मूल्य बोध से जोड़कर देखना चाहिए। यह तात्कालिक मनोरंजन या
मांसल भाव-भंगिमाओं का कार्य व्यापार नहीं है वरन भावकों की मनोवृत्ति को
पवित्रता एवं गरिमापूर्ण आशयों से समृद्ध करने का उपक्रम है। सार्वजनिक उत्सव,
आयोजनों में या आडियो-वीडियो प्रस्तुतियों में इसके भव्य एवं लोक मंगलकारी रूप
को ही अभिव्यक्त करना चाहिए । देहोपभोग की कीचड़ से सौंदर्य चिंतन को मुक्त
करना चहिए अन्यथा सामाजिक एवं पारिवारिक रिश्ते प्रेरणा-शक्ति के प्रतीक नहीं
बन सकते । सौंदर्य-चिन्तन की आवश्यकता आज इसलिए भी अधिक है क्योंकि आम आदमी
रंगीन एवं चटपटे विज्ञापनों आयोजनों या वीडियो प्रदर्शनों की चमक-दमक में उनके
भीतरी यथार्थ से अपरिचित रह जाता है। तन की संतुष्टि और आत्मा की संतुष्टि दो
भिन्न एवं विपरीत स्थितियां है। आत्मा और शरीर के स्तर पर सौंदर्य चेतना के दो
भिन्न रूप हमारे सामने आते है। आत्मा की सुचिता के लिए शरीर की आकांक्षाओं पर
संयम का अंकुश आवश्यक है।
आजकल
पारिवारिक सीरियलों में परिवार का रूपक कामचेष्टाओं को प्रदर्शित करने और
काम-अपराधों को उचित ठहराने के लिये किया जा सकता है। परिवार के सभी सदस्य जिस
दृश्य-कार्यक्रम को एक साथ बिना संकोच कि सहज रूप से देख सकें, उसी कार्यक्रम
को सार्वजानिक प्रसारण के लिए मान्य करना चाहिए । काम-उत्तेजना से प्ररित या
परिपूर्ण कार्यक्रमों के लिए अलग से श्रेणी बनानी चाहिए और उन्हें अवयस्कों के
लिए प्रतिबंधित करना चाहिए फिल्मों के लिए यू एवं ए सर्टीफिकेट की व्यवस्था है
लेकिन वीडियो और इंटरनेट माध्यमों के लिए यह व्यवस्था नहीं है। अधिकांश
विज्ञापन निर्वस्त्र नारियों का चित्रण करते हैं, जो ब्लू फिल्मों से भी
बुराअसर छोड़ते हैं । इस विज्ञापनों को कोड द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता
। क्योंकि कोड या आचार संहिता सुझावात्मक है, दंडात्मक नहीं।
सौंदर्य
जिज्ञासा की परिणति सेक्स जिज्ञासा और उसके उपभोग में होती है। अतः सारी
मान-मर्यादाओं को लांघते-लांघते हम सेक्स के सार्वजनिक प्रदर्शन तक आ गए हैं।
सेक्स सौंदर्य का विकृत एवं अश्लील रूप है। देह-लालच किसी संयम को स्वीकार नहीं
करता। फिल्मों में रेप और कामुक दृश्यों की भरमार है और उसकी नकल वीडियो
कार्यक्रमों में हो रही है। बोल्ड कार्यक्रम का अर्थ सेक्स को सार्वाजनिक करना
नहीं होना चाहिए। सौंदर्य यदि अपराध का रूप धारण कर ले, तो संस्कृति का विकृत
रूप ही हमारे सामने आएगा। नग्नता, फूहड़ता का ही रूप है। दिग्म्बर अवस्था में
हर स्वस्थ्य व्यक्ति भले ही सून्दर लगे लेकिन क्या पूरे समाज को नग्नता की आग
में ढकेला जा सकता है। सौंदर्य को यथोचित एवं कलात्मक रूप से ढंकने जा सकता है।
सौंदर्य को यथोचित एवं कलात्मक रूप से ढंकने पर उसकी कलात्मकता में कोई कमी
नहीं आती । माध्यमों को सिर्फ बोल्ड दिखने के लोभ में या धन-ऐष्णा के फिर में
सेक्स प्रेरित नग्नता या द्विअर्थी भाषा के चंगुल से निकलना चाहिए । फूहड़ता
किसी भी रूप में सौंदर्य-सृजन नहीं कर सकती है सैंसर बोर्ड की आलोचना की जाती
है और स्वतंत्रता की उदार परिभाषाएं भी दी जाती है लेकिन इस प्रकार की खुली छूट
से न तो कला का ही भला हुआ है ओर न दर्शक का। कथ्य के आधार पर स्क्रिप्ट के
औचित्य की बात करते हुए सेक्स दृश्यों को उचित ठहराना और भी खतरनाक है। अपने
कुकृत्य को ढांकने के लिए ऐसे आधारहीन तर्क दिए जाते है। नायिकाएं भी ऐसे
तर्कों के भुलावे में आ जाती है और देह शोषण का शिकार हो जाती है।
“विशाखा”
प्रकरण में कामकाजी महिलाओं के साथ अश्लीलता या अभद्र आचरण के नैतिकता और
स्वस्थ्य आचरण की अनदेखी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश जारी किए है।
सौन्दर्य संबंधी चिन्तन में नैतिक आचरण की अनदेखी करना छोटा-मोटा अपराध नहीं
है। यह छूट ही छुटभैय्ये पुरूषों को बलात्कार करने की हिम्मत देती है। यह छूट
अपने आप में बड़ा अपराध है। छूट व्यक्ति को छोटा बना देती है।
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महावीर सिंह
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आकाशवाणी के निदेशक रहे । इन दिनों माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता
विश्वविद्यालय में दृश्य-श्रव्य अध्ययन केंद्र के विभागाध्यक्ष हैं । कई
पुस्तकें प्रकाशित । संपर्कः माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता
विश्वविद्यालय,
भोपाल, मध्यप्रदेश
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