संपादक का हत्यारा बाजारवाद
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कमल कुमार
थोड़ा
सा पीछे जाकर देखें तो बीजी वर्गीस ने हिन्दुस्तान टाइम्स के अपने संपादकीय में
लिखा था ‘अब
काफी हुआ, अब समय है कि इन्दिरा गांधी जाएं’
। यह 1974 की बात है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के सरकारी मिशनरी का
चुनाव में इस्तेमाल करने पर अपना फैसला दिया था । इसी संपाकीय पर वर्गीस को
नौकरी से निकाला गया था और उसी वर्ष उन्हें उनकी निर्भीक और स्वतंत्र
पत्राकरिता के लिए मैगमे पुरस्कार मिला था ।
अरुण शौरी को
कौन नहीं जानता । कैसे अरुण शौरी ने सच्चाई का साथ निभाया और सच्चाई को प्रमाण
रुप में लाने के लिए क्या कुछ नहीं किया । यह सन 1989 की घटना है जब देवीलाल
उप्रधानमंत्री थे और उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री थे उन
पर मेहम के चुनावों में विपक्ष के सदस्य को मरवा देने के आरोप लगे । अरुण शौरी
ने अपने संपादकीय में लिखा था ‘बाप
उपप्रधान मंत्री और बेटा मुख्यमंत्री इससे देश को कितना बड़ा खतरा है, इसको
बाहर फेकों ।’
देवीलाल ने अरुण शौरी को खूब गालियां भरा पत्र लिखा जिसे ज्यों का त्यों अरुण
शौरी ने छाप दिया । अरुण शोरी ने अब्दुल रहमान अंतुले के सीमेंट घोटाले का भी
भंडाफोड़ किया
था । साथ ही
मध्यप्रदेश सरकार की इस सच्चाई का भी पर्दाफाश किया था कि उनके यहां आदिवासी
लड़कियां की बिक्री के लिए मंडी नहीं लगती । इंडियन एक्सप्रेस के एक पत्रकार ने
कमला नाम की लड़की को खरीकर प्रेस कान्फ्रेंस में उसे सामने ला दिया था ।
वर्गीस की तरह शौरी को भी कई बार परेशानियां उठानी पड़ीं । बाद में जो भी हुआ
हो । सुकरात ने कहा था, ‘सच्चाई
और न्याय’
के मार्ग
पर खड़ा होने
का दंड तो मिलता ही है । गर्मी और सर्दी में उसके पास पहनने के लिए एक ही कोट
था । उसके पास जूते और अच्छी कमीज तक पहनने को नहीं थी । अगर किसी गुलाम को भी
उन स्थितियों में रखा जाएगा तो वह नहीं रहेगा । लेकिन अपनी आध्यात्मिक
स्वतंत्रता के लिए उसे यह कीमत तो चुकानी ही है ।
लोकतंत्र में
संपादक एक संस्था होता है । वह एक निरंतर क्रुसेडर होता है । वह मशाल लेकर चलता
है । समाज में उसका वही स्थान होता है जो सुकरात का प्लेटो के अकादमिक क्षेत्र
में था । अरस्तू और दूसरे ग्रीक विचारकों का था । संपादक की शक्ति-शिक्षित वर्ग
के मन को प्रभावित और प्रेरित करने में होती है । कहा यह भी जाता है, संपादक
राष्ट्र की नियति का नियन्ता होता है । लेकिन इसके लिए उसमें एक मसीहा का विवेक
होना भी अनिवार्य है । क्योंकि संपादक की आवाज़ उसके राष्ट्र की आवाज़ की ही
गूंज है । उन राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों, अफसरशाही, व्यापारियों के हुजूम के
बीच जो हमेशा न्याय को, कानून को अपने पक्ष में परिभाषित करते हैं और लाभ उठाना
चाहते हैं । हमारे यहां ऐसे संपादकों की एक पूरी परंपरा और पीढी़ रही है
जिन्होंने स्वतंत्रता के पहले और बाद में अपने संपादकीयों द्वारा इतिहास बनाया
है, समाज को जगाया और चेताया है । पोथेन जोज़फ फ्रेंक मोरेस, चलपाती राओ, प्रेम
भाटिया, डीआर मनकेकर इत्यादि । स्वाधीनता के बाद भी इन्होंने अपना निर्भीक लेखन
जारी रखा, फर्क यह था कि अब स्वाधीनता मिल चुकी थी, अब राष्ट्र के निर्माण का
कार्य सामने था । फ्रैंक मोरेस के संपादकीय में पाठकों को विचारों को जीवंतता
मिलती थी । पॉथर जोसेफ ‘ओवर
ए कप आफ टी’
में ऐसा चुटीला व्यंग्य कसते थे कि ब्रिटिश वायसराय भी हिल जाते थे ।
एम जे
नानपोरिया, श्यामलाल, अजित भट्टाचार्य जी, एस मुलगांवकर, खुशवंत सिंह, कुलदीप
नैयर और दिलीप मुखर्जी इत्यादि इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के पहले के संपादक थे
। जिनके लेखन का आधार इंदिरा गांधी थीं ।
वह
कहाँ सही थीं और कहाँ गलत थीं यह उसके ईर्द-गिर्द की एकत्रित भीड़ ने उन्हें
पता नहीं लगने दिया । जिसका परिणाम हुआ आपात स्थिति का लगाना । कहते हैं रात
में उल्लू पुकारता है, रात का अंधेरा ही हमारे लिए अच्छा है । सूर्य की किरणें
हमे भय से कंपा देती हैं । पर इससे सुबह तो नहीं रुकती ।
इसीलिए आपात
स्थिति के बाद के संपादकों में आमूल परिवर्तन हुआ । कुछ समय के लिए प्रेस की
विश्वसनीयता, लक्ष्य और शक्ति सब नष्ट हुए थे । प्रेस में सत्ता का प्रदूषण
फैला । प्रेस का उद्देश्य रहा ‘मारो
या मरो’
उस सब को नष्ट करो जिसको पसंद न करते हो और जो पसंद हो उसे बढा़, फैला और
फुलाकर जनता के दिलों दिमागों में हावी कर दो । लेकिन तभी एस.निहालसिंह,
गिरिलाल जैन, इंदु मलहोत्रा, प्रेमशंकर झा, अरुण शौरी, राजेंद्र माथुर जैसे
संपादक आए,
जिन्होंने
पत्रकारिता के प्रतिमान बनाए। साथ ही सुन्दर राजन, एमबी कामथ का नाम महत्वपूर्ण
है जिनके साहस और ईमानदारी ने देश का ध्यान खींचा।
इन संपादकों
के लेखन की कुछ अपनी विशिष्टता थी, जिनके कारण ये जाने जाते थे। अरुण शौरी
जिन्हें भारत का जैक एडरसन कहा जाता है जैसे खोजी पत्रकारिता
के
लिए जाने गये । वीके नरसिंहम ने आपात स्थिति में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए
लड़ाई लड़ी। प्रेमशंकर आर्थिक विषयों पर इतनी स्पष्टता से लिखते थे कि पाठक के
मन से सारे संदेह दूर हो जाते । एस. सहाय के पास विशेषता थी कानूनविद् होने की।
उनकी कानूनी मामलों पर लिखने की असाधारण क्षमता थी। टीजेएम जार्ज के लेखन में
खास तरह की नाटकीयता थी, जो पाठक को मंत्रमुग्ध करती थी । कुलदीप नैयर
‘स्कूप
नायर’
थे नाम से जाने जाते थे, जो राष्ट्र की समस्याओं में जुड़ा हाता था। एस.
निहालसिमह राजनीतिक विषयों विश्लेषण करते थे - पूरी समग्रता में और प्रामाणिकता
के साथ गिरिलाल जैन अकादमिक तरह के संपादक थे। जो अंतराष्ट्रीय विषयों पर लिखते
थे। उनके चाहने वालों में प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग था। इसलिए
उनके पास संपादक होने की विशेष ताकत भी आई । इंदर मल्होत्रा भी राजनीतिक विषयों
पर लिखते थे और राजनीति के निष्ठात थे। उनके लेखन में ऐसी संप्रेषणीयता थी कि
अपने समय के संपादकों में सबसे बड़ा पाठक वर्ग और लोकप्रियता उन्हें मिली। फिर
खुशवंत सिंह जिन्हें अपने दुस्साहसी लेखन के कारण जाना गया औरतों में बहुत
लोकप्रिय थे। चाहे शराब हो या औरत के साथ रिश्ता हो उन्होंने कभी कुछ भी छिपाया
नहीं । जो वे करते थे या सोचते थे उसे कहने और लिखने की उनमें हिम्मत थी। बहुत
ही संतुलित प्रवृत्ति के ये अकेले संपादक थे। इलेक्ट्रेटिड वीकली में उनके
लेखने ने उन्हें लोकप्रिय बनाया। बीजी वर्गीज बहुत ही संतुलित प्रवृत्ति के
संपादक थे । उनमें नैतिक साहस था, कतर्व्यनिष्ठता थी जिसने उनहें सबसे योग्य
राजनीतिक कमेंटेटर सिद्ध
किया।
लेकिन फ्रैंक मारेज और बीजी वर्गीय के भाग्य का सितारा इंदिरा गांधी के राजनीति
उतार-चढ़ाव के साथ जुड़ा रहा। अजित भट्टाचार्य जी लोकतांत्रिक प्रतिमानों के
वाहक थे। शामलाल अंग्रेजी साहित्य के विद्वान थे। सबसे अधिक अध्ययनशील संपादक
थे जिनकी अंग्रेजी पर रश्क किया जा सकता है। लेकिन आज के परिदृश्य में
बाजारवादी ताकतों ने ‘समाचार
पत्र’
को उद्योग बनाया वहीं संपादक का अंत कर दिया।
कभी किसी भी
अखबार की विश्वसनीयता के पीछे संपादक होता था। अखबार का मूल्याकंन संपादक के
विवेक उससे नेतृत्व उसकी अंर्तदृष्टि और भविष्यदृष्टि होने से आंका जाता है।
लेकिन आज संपादक हैं ही नहीं । मालिक खुद निदशक हैं या संपादक हैं।
‘लाभ
के फायदे’
की राजनीति हो रही है। ‘समाचार
को छोटा, तुच्छ कर दिया है’
। फैशन, माडलिंग, विज्ञापन प्रमुख हैं मार्केट सबसे ऊपर है। समाचार वह है जो
बिके । बिकने के लिए खबर को सनसनी बनाना जरूरी हो गया है। परिणाम यह है कि भूख,
गरीबी, किसानों की आत्महत्या की ‘न्यूज
वैल्यू’
नहीं है। किसी बड़ी हस्ती के कुत्ते की खबर महत्वपूर्ण है। समाचार की, न्यूज की
परिभाषा ही बदल दी गई है। सामाजिक सरोकार, समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन और
प्रेरणा देने वाला संपादक अदृश्य कर दिया गया है। यह स्थिति चिंताजनक है। समय
रहते इस पर चिंतन अनिवार्य है। प्रोपराईटर का भूत प्रेस की स्वतंत्रता,
स्वायत्तता और निर्भीकता को और कितना ध्वस्त करेगा । सैल्समैन की तरह संपादकों
को ‘हायर
और फायर’
किया जाता है। इसलिए समाचार-पत्र आम आदमी की, समाज की, हमारी बात कैसे कहेगा
?
जबकि कोई बड़ा उद्योगपति, कोई बड़ी हस्ती या एजेंसी पैसे देकर
‘न्यूज
स्पेस’
किसी भी राष्ट्रीय समाचार पत्र में खरीद सकती है। प्रोपराइटर की यह दखलअंदाजी
दिन पर दिन बढ़ती जा रही है । वो संपादक जो सभ्यता के, समाज के, राष्ट्र के
पहरुए थे-कहां है ?
नहीं हैं तो
सोचिए, विचारिए, हो सके तो कुछ करें भी।
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(डॉ.कमल
कुमार
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हिन्दी की
प्रख्यात कथाकार एवं कवियत्री। कई पुस्तकें प्रकाशित । इन दिनों
दिल्ली के जीसस एण्ड मेरी कालेज (दिल्ली
विश्वविद्यालय) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं ।
संपर्क
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डी-38, प्रेस एन्कलेव, साकेत, नई दिल्ली - 110017)
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